तेली के बैल का गोल-गोल चक्कर…

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इस पूरे प्रकरण पर कुछ नया कहने लायक बचा ही नहीं है। मूल पोस्ट और उसकी चर्चा के बीच अभिमन्यु प्रसंग की याद दिलाती एक अन्य पोस्ट और इन पोस्टों पर आयी टिप्पणियों को आद्योपान्त पढ़ने के बाद मन बड़ा दुविधाग्रस्त हो गया। कुछ बोलें कि न बोलें। जार्ज बुश की प्रसिद्ध उक्ति याद गयी कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में आप या तो हमारे साथ हैं या हमारे विरुद्ध हैं। यानि तटस्थता की कोई गुन्जाइश नहीं है।

दोनो ओर से ललकारे जाने के बाद कुछ लोग सफाई देते भी नजर आये। कुछ ऐसा आभास दिया जाने लगा कि अब मानव सभ्यता के इतिहास में कोई युगान्तकारी फैसला होने वाला है। इसके बाद अब दुनिया पहले जैसी नहीं रह जाएगी। अब मानव समाज में केवल दो वर्ग बचेंगे- नर और नारी। बाकी सारे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक वर्ग-भेद मिट जाएंगे। दलित, पिछड़ा, अगड़ा, अमीर, गरीब, शिक्षित, अशिक्षित, नैतिक, अनैतिक, पारम्परिक, आधुनिक, जैसी टुच्ची धारणाएं इस लैंगिक पहचान की आँधी में उड़ जाएंगी। मुझे तो थोड़ी खुशी भी होने लगी थी। कितना क्रान्तिकारी परिवर्तन हमारी आँखों के सामने मूर्तिमान होने जा रहा था। एक पल को तो मैने सोचा कि अगले दिन के सभी अखबार इस घटना को सबसे बड़ी खबर के रूप में छापेंगे। टीवी चैनेल्स पर बजट की समीक्षा और ढोंगी बाबाओं के कुकर्म की चर्चा से पक चुके दर्शकों को एक ‘बम्फाट’ ब्रेकिंग न्यूज मिलेगी। पैनेल डिस्कशन के लिए समाजशास्त्रियों की पूछ बढ़ जाएगी। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थाओं में सेमिनार आयोजित होंगे। पत्रिकाएं विशेषांक निकालेंगी।

इसी खुशी में मुझे रात भर नींद नहीं आयी। ऐसा इसके पहले मेरे साथ सिर्फ़ एक बार हुआ है। जब पहली बार पी.सी.एस. में सेलेक्शन का फाइनल रेजल्ट निकला था [जब लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित किये जाने का पहली बार परिणाम घोषित हुआ था- शुद्ध हिन्दी :)]। हॉस्टेल के कमरे में रात भर करवट बदलता रहा था। अगले दिन के अखबार में अपना नाम छपा देखने की उत्सुकता थी।

लेकिन इस बार निराशा हाथ लगी। रविवार की सुबह जस की तस थी। अखबारों में वही हत्या, लूट, बलात्कार, राजनीति, महंगाई, भ्रष्टाचार, दलित उत्पीड़न, प्रशासनिक लापरवाही, प्रेम प्रसंग में फाँसी की सजा, फिल्मी दुनिया, क्रिकेट, व हाँकी विश्वकप की खबरें छायी हुई थीं। विज्ञापनों में भी कमनीय काया की धनी सुन्दरियाँ बदस्तूर मोबाइल से लेकर पुरुष अण्डरवियर, शेविंग क्रीम, कम्प्यूटर, शक्तिवर्द्धक चूर्ण और गाड़ियों के टायर तक बेंच रही थीं। टीवी पर भी एंकर चीख-चीखकर कृपालु महाराज की कृपा से काल-कवलित भक्तगणों के पीछे छूट गये परिवारी जनों का हाल सुना रहा था। राहुल महाजन के स्वयंवर के पटाक्षेप की खबरें ही तारी और जारी थीं। मुझे बड़ा धोखा हुआ जी…

मैने हिन्दी ब्लॉगजगत का दुबारा मुआयना किया। सभी बातें दुबारा पढ़ी। इस बार थोड़ी सावधानी से। उसमें कुछ नया तत्व छाँटने की कोशिश की। इस सारी कोशिश के दौरान मुझे अपने गाँव के सोभई तेली का कोल्हू से तेल पेरना याद आ गया। चूँ..चाँ..चर्र करते लकड़ी के कोल्हू में जुता हुआ बैल गोल-गोल चक्कर लगाता रहता था। सोभई तेली अपने बाकी काम निपटाते हुए बीच-बीच में आकर ‘घानी’ चला दिया करते। बैल की आँख पर मूज की बुनी हुई तश्तरीनुमा डलिया औंधाकर बाँध दी जाती थी ताकि बैल द्वारा पेरी जा रही सरसो खा न ली जाय। वह बैल ढंकी हुई आँखों के साथ उसी गोल दायरे में चक्कर पर चक्कर लगाये जाता था।

यह नर-नारी प्रसंग जिस प्रकार और जितनी बार इस हिन्दी ब्लॉगजगत में उठाया जाता है इसका स्वरूप लगभग उसी गोल-गोल चक्कर वाला ही रहता है। जब कोई नया ब्लॉगर मुद्दे को नये ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास करता है तो कदाचित्‌ अन्य चिठ्ठाकारों के प्रति कोई पूर्वाग्रह मन में रखे बगैर उसकी पोस्ट आती है। लेकिन पहले से तयशुदा खाँचों में फिट दिमाग वाले लोग अपने-अपने हथियारों के साथ या तो उसके संरक्षण का जिम्मा उठा लेते हैं या उसपर पिल पड़ते है। रूढ़ हो चुकी धारणाओं, कुन्द हो चुके तर्कों और प्रगाढ़ हो चुके पूर्वाग्रहों के साथ गोलबन्द हो चुके ब्लॉगरजन अपनी-अपनी भड़ास निकालने वहाँ पहुँच ही जाते हैं। सबकुछ इतना यन्त्रवत्‌ सा लगता है कि आश्चर्य होता है। कोई समाधान दूर-दूर तक नहीं दिखायी देता।

इसबार नया यह हुआ कि माननीयों ने अपनी रही-सही मर्यादा भी ताख पर रख दी और खुलकर दो-दो हाथ कर लेने का उद्‌घोष कर दिया। एक-एक चुनिन्दा शब्दवाण चलाये गये। असली मुद्दा न जाने कहाँ चला गया और ‘दे तेरी की… ले तेरे की’ शुरू हो गयी। वही जाने-पहचाने चेहरे और वही घिसी-पिटी उक्तियाँ, जैसे इस युद्ध में विरोधी को हर हाल में परास्त कर देना है। ऐसे बिगड़े माहौल में एक साझे सत्य को खोजने और पहचानने की मेरी कोशिश कैसे सफल हो? अब यहाँ रवि रतलामी जी अलग-अलग श्रेणियों के टॉप-टेन ब्लॉग की ख्वाहिश भी नहीं कर पा रहे हैं तो इसका दोष हम खुद को न दें तो किसे दें?

मेरी बात पर यदि आपको विश्वास नहीं है तो जुलाई-२००८ में लिखी  हुई मेरी यह कविता पढ़िए। ताजे प्रकरण पर यदि मुझे आज भी लिखना होता तो शायद इसमें कुछ नया जोड़ने की जरूरत न पड़ती:

 

प्रगतिशील स्वातन्त्र्य-प्रेम की लौ जलती है,
समता के अधिकारों की इच्छा पलती है।
इस समाज ने डाल दिये हैं जो भी बन्धन
छिन्न-भिन्न करने देखो,‘नारी’ चलती है॥

घर की देवी, पुण्य-प्रसूता, कुल की रानी,
ममतामयी, सहचरी, प्रिया, बात-बेमानी।
अब दुर्गा, काली का रूप धर रही माया;
करुणा छोड़ ध्वंस करने की इसने ठानी॥

वैवाहिक बंधन अब बेड़ी सा लगता है,
है नर का वर्चस्व, भाव ऐसा जगता है।
इस अन्याय भरी दुनिया के खण्डन से ही;
इनके मन से क्षोभ-कलुष देखो भगता है॥

जंगल के बाहर मनुष्य का वो आ जाना,
नर-नारी के मिलन-प्रणय का नियम बनाना।
घर, परिवार, समाज, देश की रचना करके
कहतीं, “नर ने बुना स्वार्थ का ताना-बाना”॥

पढ़ी ‘सभ्यता के विकास’ की गाथा सबने,
इन्सानी फ़ितरत को अर्स दिया था रब़ ने।
इन कदमों को रोक सकेगी क्या चिन्गारी;
जिसे हवा देती हैं नारीवादी बहनें॥

क्या लम्बी यात्रा पर निकला पुरुष अकेला?
बिन नारी क्या सृजित कर लिया जग का मेला?
इस निसर्ग के कर्णधार से पूछ लीजिये,
जिसने देखी प्रथम-प्रणय की वह शुभ बेला॥

प्रकृति मनुज की है ऐसी, ‘होती गलती है’,
पर विवेक से, संयम से यह भी टलती है।
है ‘सत्यार्थ मित्र’ को पीड़ा चरमपंथ से;
छिन्न-भिन्न करती नारी मन को खलती है॥

(सिद्धार्थ)

पुछल्ला: आज मैं आदरणीय ज्ञान जी के घर गया था। सपरिवार बैठकर खूब गुझिया, नमकीन, सकरपारा, पकौड़ी और कॉफ़ी का आनन्द लिया गया। गुरुदेव अपनी पोस्ट में चाहे जो लिखें लेकिन वे बिल्कुल ठीक-ठाक और सक्रिय हैं। अलबत्ता इस धींगा-मुश्ती से दूरी बनाये हुए हैं। उनकी कुशलता का राज कहीं इस पॉलिसी में ही तो नहीं छिपा हुआ है 🙂
ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के साथ DSC02516

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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पुण्यदायी व्यवसाय- तीर्थयात्रा कम्पनी…!

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भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने हेतु आदि शंकराचार्य नें भारत की चार दिशाओं में चार धामों की स्थापना की। उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम , पूरब में जगन्नाथपुरी एवं पश्चिम में द्वारका, हिन्दुओं के चार धाम हैं। आस्थावान हिन्दू इन धामों की यात्रा करना अपना पवित्र कर्तव्य मानते थे। शंकराचार्य से पूर्व पौराणिक काल से बद्रीनाथ, केदारनाथ, जमुनोत्री और गंगोत्री को चार धामों की प्रतिष्ठा प्राप्त है।  कालान्तर में हिन्दुओं के नये तीर्थ आते गये हैं। बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी के चार धामों के अतिरिक्त केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, ऋषिकेष, हरिद्वार, वैष्णो देवी, वाराणसी, प्रयाग, अयोध्या बैजनाथधाम, तिरुपति, शिरडी, गंगासागर, पशुपतिनाथ (काठमाण्डू) आदि तीर्थस्थल आस्थावान हिन्दुओं द्वारा विशेष श्रद्धा के साथ भ्रमण किये जाते हैं। शक्ति की देवी दुर्गाजी के अनेक रूपों के मन्दिर प्रायः पहाड़ों की चोटियों व दुर्गम स्थानों पर स्थापित है। लेकिन भक्तगण दुर्गम रास्तों की परवाह किए बिना माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने निकल पड़ते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रतिष्ठित भगवान शंकर से संबन्धित द्वादश ज्योतिर्लिंग भी हिन्दू आस्था और भक्ति के अनन्य केन्द्र हैं:

सौराष्ट्रे सोमनाथम्‌ च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्‌

उज्जयिन्याम्‌ महाकालम्‌ ओंकाराममलेश्वरम्‌

केदारम्‌ हिमवत्पृष्ठे डाकिन्याम्‌ भीमशंकरम्‌

वाराणास्यान्तु विश्वेशम् त्र्यम्बकम् गौतमीतटे

बैद्यनाथम्‌ चिताभूमौ नागेशम्‌ दारुकावने

सेतुबन्धेतु रामेश्वरम्‌ द्युश्मेशं च शिवालये

द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्‌

सर्वयाय विनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिः फलंलभेत्‌

इन पवित्र तीर्थस्थलों का दर्शन करने और पवित्र नदियों में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होने और पुण्य के अर्जन का विश्वास प्रायः सभी हिन्दुओं को तीर्थयात्रा के लिए प्रेरित करता है। मार्ग की तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुए प्राचीन काल में चारों धाम की यात्रा हिन्दुओं द्वारा देश की सांस्कृतिक एकता का दर्शन करने के लिये नहीं वरन्‌ अपना परलोक सुधारने के लिये ही की जाती होगी। इसी प्रकार गंगा का दर्शन करने लोग इस भाव से नहीं जाते कि वे सांस्कृतिक दृष्टि से भावविभोर हो जायें वरन्‌ इस भाव से जाते होंगे कि गंगा स्वयं शिव की जटा से निकली हैं और इसमें स्नान करने से उनके पापों का मोचन होगा।

पुराने जमाने में ये तीर्थयात्राएं बहुत कष्टकारी होती थीं। घर से बाहर निकलते ही कष्ट सहयात्री बन जाता था। कच्चे और दुर्गम मार्ग, दुर्लभ और धीमी सवारियाँ, प्रायः पैदल यात्रा की मजबूरी, खान-पान में कठिनाई और ठहरने के स्थानों का अभाव साधारण हैसियत वालों को यात्रा से रोकते थे। बहुत कम हिन्दू चारोधाम की यात्रा कर पाते थे। सुना जाता है कि भविष्य अनिश्चित्‌ जान बहुत से लोग यात्रा पर निकलने से पहले ही मृत्यु के बाद कराये जाने वाले कर्मकाण्ड और अनुष्ठान सम्पन्न कराकर जाते थे। जो भाग्यशाली होते थे और सकुशल यात्रा समाप्त कर लौट आते थे उनके दर्शन को भी पुण्यदायी माना जाता था। उनके पाँव पखारने और सेवा करने वालों की लाइन लग जाती थी।

पाप-पुण्य का विचार हमारे जनमानस में बहुत गहराई तक पैठा हुआ है। अच्छी और संस्कारित शिक्षा से हमारे मन को अच्छे और बुरे का भेद करना आता है। कम से कम हमारी आत्मा तो जानती ही है कि क्या गलत है और क्या सही। लेकिन लाख पढ़े-लिखे होकर भी ऐसे कम ही लोग हैं जो अपने सदाचरण पर टिके रहने को ही सबसे बड़ा पुण्य मानें। बहुतायत तो उन्हीं की है  जो इसके बजाय पहले काम, क्रोध, मद और लोभ के वशीभूत होकर निरन्तर अनैतिक कार्य करते जाते हैं और उसके बाद विश्वास रखते हैं कि पुरोहित द्वारा बताये गये कर्मकाण्डों के आयोजन और पवित्र तीर्थों के दर्शन द्वारा अपने एकाउण्ट से पाप की liability घटा लेंगे और पुण्य का asset बढ़ा लेंगे। इसी बैलेन्स शीट को कृत्रिम रूप से प्रभावशाली बनाने के प्रयास में  नये जमाने के लोग भी अपने पाप धोने के लिए संगम सहित तमाम नदियों व सरोवरों में खास मूहूर्त पर स्नान करने के लिए उमड़े जाते हैं और मन्दिरों में दर्शनार्थियों की भीड़ साल-दर-साल बढ़ती जा रही है।

इस पाप-पुण्य के व्यापार में बहुत से असली व्यापारियों ने व्यावसायिक पूँजी निवेश किया है। अब यात्रा की अनेकानेक सुविधाएं बढ़ती जा रही हैं। अब तो घर से ज्यादा बाहर की यात्रा खुशगवार होती जा रही है। पैकेज टूर ऑपरेटर्स, ट्रैवेल एजेन्सियाँ और सरकारी संस्थान, जैसे- रेलवे और पर्यटन विभाग द्वारा भी यात्रियों की जरूरत के अनुसार सुविधाए उपलब्ध करायी जा रही हैं। अब पुण्य कमाने निकले यात्रियों को सेवा देकर आर्थिक लाभ अर्जित करने वाली एजेन्सियों की भरमार होती जा रही है। मुझे यह सब चर्चा करने का मन इसलिए हुआ है कि हाल ही में मुझे एक ऐसी सुविधा से साक्षात्कार हुआ जो अत्यन्त सस्ते दर पर भारत के अधिकांश महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों की सैर लगातार पैंतीस दिनों तक कराती है। वह भी ऐसे कि यात्री को न तो अपने ठहरने का स्थान बदलना पड़ता और न ही सोने का बिस्तर। अपने सामान की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी नहीं, उसे यहाँ से वहाँ ढोने की फिक्र भी नहीं और खाने-पीने के लिए गर्म व ताजे घरेलू भोजन को मिस करने की मजबूरी भी नहीं है। मुझे तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगा।

रेलगाड़ी की चार बोगियों को विशेष रूप से तैयार कराकर  इस बड़ी यात्रा के लिए तीर्थयात्रा कम्पनी को उपलब्ध करा दिया जाता है। तीर्थयात्री को उसकी जो आरक्षित बर्थ यात्रा के प्रारम्भ में मिलती है वही अगले पैंतीस दिनों तक उसका बिस्तर होता है और वही कम्पार्टमेण्ट उसका घर बन जाता है। कम्पार्टमेण्ट की अन्य बर्थों के यात्री उसके परिवार के सदस्य बन जाते हैं और बगल का कम्पार्टमेण्ट उसका पड़ोसी घर हो जाता है। पूरी बोगी एक मुहल्ला और चार-पाँच बोगियाँ मिलकर एक शहर बना देती हैं। एक ऐसा शहर जिसमें देश के अलग-अलग राज्यों से आकर लोग बसे हुए हैं। सच में ‘भारत-दर्शन’ को निकले ये लोग स्वयं भारत का दर्शन कराते हैं। ये चारो डिब्बे अलग-अलग मार्गों पर अलग-अलग ट्रेनों से जुड़ते और टूटते हुए एक साथ देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँचते रहते हैं।

मुझे यह सब देखने और जानने का सुअवसर तब मिला जब एक ऐसी ही यात्रा मण्डली बसन्त पञ्चमी के दिन इलाहाबाद पहुँची। इस यात्रा दल में मेरे गाँव के आठ लोगों की टोली में मेरे माता-पिता भी शामिल थे। उत्सुकतावश मैं सुबह सोकर उठने के बाद जल्दी-जल्दी तैयार होकर आठ बजे स्टेशन पहुँच गया। इलाहाबाद जंक्शन पर मजार वाली प्लैटफ़ॉर्म के दोनो ओर यात्री दल के दो-दो डिब्बे खड़े थे लेकिन उनमें ताला बन्द था। कम्पनी के स्टिकर से पहचान हुई जिसके कर्मचारियों ने बताया कि यात्रा बनारस से रात में ही यहाँ आ गयी थी। प्रातःकाल सभी यात्री लक्जरी कोच बसों से संगम क्षेत्र की ओर चले गये हैं। गंगा स्नान करके बड़े हनुमान जी, अक्षयबट आदि का दर्शन करके आनन्द भवन जाएंगे। वहाँ से भारद्वाज आश्रम देखने के बाद  बसें उन्हें करीब बारह बजे स्टेशन छोड़ जाएगी। प्लैटफ़ॉर्म पर यात्रियों का भोजन कम्पनी के रसोइए तैयार कर रहे थे।

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मैं फौरन लौटकर घर आया। कार्यालय में बॉस से मिलकर छुट्टी लिया और बच्चों को तैयार कराकर श्रीमती जी के साथ स्टेशन पर पहुँच गया। अपने सास-ससुर की पसन्द का भोजन तैयार करने में श्रीमती जी सुबह से ही व्यस्त रही थीं। चम्पा की मदद से हरे मटर की पूड़ियाँ, गोभी, लौकी, आलू और टमाटर की पकौड़ियाँ और पिताजी की पसन्दीदा खीर अपने हाथों तैयार कर डिब्बे में भर लिया था और झोले में अन्य जरूरी सामान डालकर हम स्टेशन पहुँच गये। ठोड़ी देर बाद यात्रियों का समूह प्लेटफ़ॉर्म पर आने लगा। प्रायः सबकी उम्र पचास के ऊपर थी। सबके चेहरे पर सन्तुष्टि का भाव तैर रहा था। लम्बी यात्रा की थकान जैसा कुछ भी नहीं दिखा। सबके गले में लटका परिचय पत्र जरूर ध्यान आकर्षित कर रहा था।

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एक चादर बिछाकर मैने अपने गाँव की यात्रा मण्डली को बिठाया। श्रीमती जी ने डिब्बा खोलकर अपने घर का पकवान परोसना शुरू किया और मैने इस यात्रा के प्रबन्धक को खोजना। वे निकट ही मिल गये। इतनी बड़ी यात्रा को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने वाला व्यक्ति निश्चित ही बहुत जानकार और गुणी होगा यह अनुमान पहले से कर चुका था।

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लाला लक्ष्मीनारायण अग्रवाल को देखकर कोई सहज ही अन्दाज लगा सकता है कि उन्होंने किसी मैनेजमेण्ट स्कूल से इवेन्ट मैनेजमेण्ट का कोई कोर्स नही किया है। न ही उन्होंने उन्होंने कोई प्रोफ़ेशनल डिग्री ही हासिल की होगी। लोहे की एक फोल्डिंग चेयर पर बैठे हुए वे अपने स्टाफ़ को जरूरी हिदायतें दे रहे थे। बीच-बीच में देश के अन्य हिस्सों में चल रही उनकी कम्पनी की अन्य तीर्थयात्रा बोगियों से आने वाले फोन काल्स भी सुनते जा रहे थे। अगली यात्रा की बुकिंग भी करते जा रहे थे, और टूर-पैकेज के बारे में भी बताते जा रहे थे। मल्टी-टास्किंग का बेजोड़ नमूना थे लालाजी।

“लालाजी, कबसे हैं आप इस धन्धे में…?” मैने उनका मोबाइल बन्द होते ही पूछ लिया।

“सरसठ से चल रहा है जी… बयालीस साल हो गये है” उन्होंने सहजता से उत्तर दिया।

मुझे अपनी अल्पज्ञता पर लज्जा आयी। जो काम १९६७ से वर्षानुवर्ष हो रहा है मुझे उसका पता अब जाकर चल पाया है। मैने झेंप छिपाते हुए आश्चर्य से पूछा, “लगातार बयालिस साल से आप यह वार्षिक यात्रा आयोजित कराते है…?”

“नहीं जी, …यह तो साल भर चलता रहता है। …अगला टूर एक हफ्ते बाद रवाना होगा। वह सत्रह दिन का है। साल में चार-पाँच हो जाते हैं”

“कैसे करते हैं आप यह सब?” मैने अपना कौतूहल छिपाते हुए पूछा।

“स्टाफ़ लगा रखा है जी। बाकी तो ऊपर वाला सब कराता है…सारा सामान हम साथ लेकर चलते हैं। लोकल केवल सब्जियाँ खरीदते हैं। हमारा स्टाफ़ अब ट्रेण्ड है। …सब प्रभु का आशीर्वाद है”

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मैने जब यात्रा के रूट और प्रमुख दर्शनीय स्थलों का व्यौरा जानना चाहा तो उन्होंने एक गुलाबी पर्चा थमा दिया। इस पर्चे में यात्रियों की जानकारी के लिए बहुत स्पष्ट और सूक्ष्म तरीके से सभी जरूरी बातें बतायी गयी थीं। नीचे सारणी में यात्रापथ का विवरण दूंगा। (अभी देर रात हो गयी है इसलिए इसे टालता हूँ)

वहीं पर गर्मागरम रोटियाँ सेंकी जा रही थीं। चार लोग मिलकर जिस कुशलता से लकड़ी की आग पर फुलके बना रहे थे उन्हें देखकर मैं लोभसंवरण न कर सका। आप यह वीडियो देखिए:

 

खाने में लहसुन-प्याज का प्रयोग नहीं होता। तेल, मिर्च और मसाला का प्रयोग भी बुजुर्गों की सहूलियत के हिसाब से कम किया जाता है। यात्री की उम्र, पसन्द और डाक्टरी सलाह का ध्यान रखते हुए सुबह की चाय, नाश्ता और दोपहर व शाम के भोजन को तैयार किया जाता था। हमारे गाँव के लोगों ने कहा कि ‘बहूजी’ ने इतना खिला दिया है कि अब कम्पनी का खाना हम नहीं खा सकते। हमें दावत दी गयी। हमने सहर्ष दावत कबूल की और सपरिवार डिब्बे में बैठ गये। डिब्बा क्या था बम्बई की किसी चाल का कमरा लग रहा था। ऊपर बाँधी गयी रस्सियों पर कपड़े झूल रहे थे। ऑलआउट मशीन और मोबाइल चार्जर की व्यवस्था सभी कूपों में थी। दवाइयाँ, चश्मे, और मोबाइल सबके सिरहाने रखे हुए। किसी चोर उचक्के या उठाई गीर के खतरे निश्चिन्त सबकुछ खुला हुआ जैसे घर में रखा हुआ हो। यात्रियों की आपसी बातचीत में घरेलू परिचय का पुट। इलाहाबाद में हम उनलोगों से मिलने वाले हैं यह पूरी बोगी के लोग जानते थे। वे सभी पिछले महीने भर से साथ जो थे।DSC02250

भोजन परोसने के लिए दक्ष कर्मचारी थे। सभी यात्रियों को उनकी बर्थ पर थालियाँ थमा दी गयीं। सादी सब्जी, तीखी-मसालेदार सब्जी, सादा चावल, मीठा चावल, मटर-पनीर स्पेशल (दाल के बदले) आदि बाल्टियों में भर-भरकर एक ओर से आते और जरूरत के हिसाब से थालियों में डालते हुए दूसरी ओर निकलते जाते। दस-पन्द्रह मिनट में ही स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन का काम पूरा हो गया।

वहाँ से लौटकर आया तो यही सोचता रहा कि स कम्पनी के बारे में आप सबको बताऊंगा। घर आकर गुलाबी पर्चा खोला तो उसमें सबसे पहले यही बताया गया था कि-

‘हमारी संस्था की सफलता को देखते हुए अन्य बहुत से अनुभवहीन व्यक्तियों ने नाम के आरम्भिक ‘श्री’ के स्थान पर अन्य नाम डिजाइन जोड़कर अपना नाम रख लिया है।और वे मिलते-जुलते नामों से VIP ए.सी. कोच से यात्रा करने के प्रलोभन द्वारा यात्रियों को भ्रमित कर रहे हैं। कृपया उनसे दस वर्ष पुराने यात्रियों की सूची रिकार्ड मांगे व उनके पुराने यात्रियों से सम्पर्क करके सुविधा, व्यवस्था की जानकारी करें तभी आपको वास्तविकता ज्ञात होगी। चूँकि हम यात्रियों को पूरी-पूरी सुविधा प्रधान करते हैं इसलिए हमारा खर्चा अन्य संस्थाओं से ज्यादा है। कृअपया आप हमारे पुराने यात्रियों से सुविधा व्यवस्था की जानकारी प्राप्त कर्रें व सन्तुष्ट होने के बाद हि सीट बुक कराएं।’ 

मुझे महसूस हुआ कि इस क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा का दखल हो गया है। ग्राहकों (यात्रियों) को इससे लाभ मिलना ही है। धार्मिक आस्था के वशीभूत हिन्दुओं को चारोधाम व द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से अधिकांश की यात्रा एक मुश्त कराने वाली यह योजना इन कम्पनियों को आर्थिक लाभ चाहे जो दे रही हो लेकिन प्रतिवर्ष हजारों लोगों को पुण्य अर्जन में सहयोग और सेवा प्रदान करने वाली कम्पनी के कर्मचारी और प्रबन्धक पुण्य का लाभ जरूर कमा रहे हैं। आप क्या सोचते हैं?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

वीडिओ पता:  http://www.youtube.com/watch?v=4vIE27ViX4o

एक घटिया व्यक्ति को चुनने के लिए इतनी कसरत… बाप रे बाप?

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जनवरी की बेहद सर्द रात… एलार्म की घण्टी भोर में साढ़े चार बजे बज उठी है। घर के तीनो मोबाइल सेट एक साथ बजे हैं। तीनों में एलार्म इस लिए सेट किए कि कहीं कोई चूक न हो जाय। मामला इतना संवेदनशील है कि तैयार होकर साढ़े पाँच बजे तक हर हाल में निकल पड़ना है। सीजन का सबसे ठण्डा दिन… दाँत बज रहे हैं। बाहर कुहरे की मोटी चादर फैली हुई है। गहरी नींद और गर्म रजाई से निकलकर बाथरूम में… ऊफ़्‌ टैप का पानी तो हाथ काटे दे रहा है। इमर्सन रॉड से पानी गरम करने में आधा घण्टा लग जाएगा…. चलो तबतक ब्रश करके सेव करते हैं… किसी तरह ये दिन ठीकठाक बीत जाय …नहाकर पूजा करते हुए यही प्रार्थना मन में चल रही है…।

ड्राइवर का मोबाइल स्विच ऑफ़ है… उफ़्‌। यदि वह समय से नहीं आया तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी। सुरक्षाकर्मी न आया तो अकेले ही निकल लूंगा लेकिन ड्राइवर और गाड़ी के बिना तो कुछ भी सम्भव नहीं। रात ग्यारह बजे छोड़ते वक्त मैने उन दोनो को ठीक से समझा दिया था कि सुबह साढ़े पाँच बजे निकलना है… एक मिनट भी देर की तो मैं डीएम साहब के यहाँ जाकर दूसरी गाड़ी ले लूंगा… उसके बाद तुम लोग जेल जाना… मैं तो चुनाव कराने चला ही जाऊंगा…। लेकिन क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ? खुद की फसन्त भी तो है। डीएम साहब पूछेंगे कि रात में आए ही क्यों… क्या जवाब दे पाऊंगा। ड्राइवर ने फिर भी मोबाइल बन्द कर लिया है। उफ़्‌…! टेन्शन… टेन्शन…टेन्शन… चुनाव में यह किस-किसको नहीं झेलना पड़ता है…!

पूजा अधूरी छोड़नी पड़ी। भगवान को क्या समझाना… वह तो सब जानता है। चुनाव ड्यूटी के लिए छूट दे ही देगा। लेकिन ५:२५ पर भी ड्राइवर का फोन बन्द होना डरा रहा है। अचानक मुँह जल जाता है तो पता चलता है कि श्रीमती जी गरम चाय हाथ में दे गयी हैं। पहले उस ओर ध्यान नहीं गया। मोबाइल पर अटका हुआ है… अब क्या करूँ…??? सुबह-सुबह टेन्शन…।

ठीक साढ़े-पाँच बजे काल-बेल बज उठती है। दौड़ कर दरवाजा खोलता हूँ…। प्याली की चाय छलक जाती है। बाहर ड्राइवर और गार्ड दोनो मौजूद हैं। जान में जान आती है। चुनाव ड्यूटी का खौफ़ किसे न होगा…? फाइल लेकर गाड़ी में बैठ जाता हूँ।

“तुमने मोबाइल क्यों बन्द कर लिया भाई…?” मन में खुशी है कि समय पर प्रस्थान हो गया है।

“साहब, बैटरी डिस्चार्ज हो गयी है। रात में लाइट नहीं थी…” ओहो, मैने तो इन्हें ग्यारह बजे छोड़ा ही था। इन्हें अपने घर जाकर सोते हुए बारह बज गये होंगे फिर भी सुबह ठीक समय पर हाजिर हैं… इन्हें तो मुझसे भी कम समय सोने को मिला… मन को तसल्ली देता हूँ।

फिर उनके बारे में सोचने लगा जो उस देहात के अन्धेरे में कड़ी ठण्ड से ठिठुरते हुए ब्लॉक में बने बूथ पर टिके हुए हैं। चुनाव कराने गये करीब बीस शहरी लोगों की सुविधा के नाम पर ब्लॉक में लगा एक ‘इण्डिया मार्क-टू हैण्ड पम्प’, खुली खिड़कियों वाले बड़े से हाल में बिछी टेन्ट हाउस की चरर-मरर करती चारपाइयाँ और उनपर बिछे धूलधूसरित गद्दे, बीडिओ और ‘पंचायत साहब’ के सौजन्य से रखी कुछ मटमैली रजाइयाँ। रात में ब्लॉक के स्टाफ़ ने पूरी सेवा भावना से जो गरम-गरम पूड़ी और आलू की मसालेदार सब्जी खिलायी थी उसे खाने के बाद उस शौचालयविहीन परिसर में रुककर सोने की हिम्मत न हुई। वहाँ से मैं रात में दस बजे भाग आया। करीब साठ किलोमीटर की यात्रा वहाँ रुकने से कम दुखदायी थी।

हालाँकि ऑब्जर्वर महोदय की इच्छा थी कि सेक्टर मजिस्ट्रेट भी बूथ पर ही रात्रि विश्राम करें। यह भी कि रात भर इसपर निगरानी रखी जाय कि किसी दल या प्रत्याशी द्वारा पोलिंग पार्टी को प्रभावित करने का प्रयास न हो। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए ‘कुछ भी करेगा’ टाइप तैयारी। …पोलिंग पार्टी जब खा-पीकर सो गयी तब मैं वहाँ से हटा और जब सुबह सात बजे हाजिर हो गया तो पार्टी वाले अभी जगकर पहली चाय की बाट जोह रहे थे।

मतदान आठ बजे से प्रारम्भ होना था… आनन-फानन में हाल खाली करके मतदान की तैयारी कर ली गयी। मतदान के लिए गोपनीय घेरा बना लिया गया था। पुलिस वालों को स्ट्रेट्जिक प्वाइण्ट्स पर तैनात किया गया, वीडियो कैमरा वाले को लगातार आठ घण्टे वोटिंग की रिकॉर्डिंग करने के लिए जरूरी बैटरी बैकअप और कैसेट के साथ तैयार किया गया… पीठासीन अधिकारी अपनी टीम के साथ मुस्तैद होकर माननीय मतदाता की राह देखने लगे… प्रथम वोटर ग्यारह बजे पधारे।

***

“साहब आप बहुत गलत कर रहे हैं, इतनी सख़्ती करेंगे तब तो हम चुनाव ही हार जाएंगे… ‘भाई’ को मुँह दिखाने लायक ही नहीं रह जाएंगे” प्रत्याशियों की ओर से तैनात मतदान अभिकर्ताओं में से एक ने व्यग्र होकर कहा।

प्रत्येक मतदेय स्थल (पोलिंग बूथ) पर प्रत्याशी द्वारा अपना एजेन्ट नियुक्त किया जाता है जो मतदाताओं की पहचान करने में पोलिंग पार्टी की मदद करते हैं और प्रतिद्वन्दी पार्टी द्वारा सम्भावित धाँधली पर भी नजर रखते हैं। इन्हें हाल के भीतर ही कुर्सियाँ दी जाती हैं। ये प्रत्येक मतदाता को देखते हैं और किसी भी फर्जी मतदाता की पहचान को चैलेन्ज कर सकते हैं। जो महोदय शिकायत कर रहे थे उनको मैने वोट डाल रहे मतदाताओं के नजदीक जाकर मतपत्र देखने की कोशिश से रोक दिया था। मतदान की गोपनीयता भंग होने की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती थी। हारकर वे हाल से बाहर आ गये थे और मुझे ‘समझाने-बुझाने’ की कोशिश करने लगे

“मैं समझा नहीं, आप चाहते क्या हैं…?” मैने अनभिज्ञता प्रकट की।

“अरे साहब, यदि वोटर को हमें वोट नहीं दिखाने देंगे तब तो वह धोखा दे देगा”

“कैसा धोखा…? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, गुप्त मतदान का तो उसे अधिकार है। इसी की रक्षा के लिए तो यह सारी मशीनरी लगी है”

“कैसा अधिकार साहब…, चार-चार लोगों से पैसा खाकर बैठे हैं सब… अगर ऐसे वोट डलवा देंगे तब तो यह हमारा खाकर भी दूसरे को वोट दे देंगे…”

“नहीं-नहीं, मैं ऐसा नहीं मानता… ये सभी खुद ही जनप्रतिनिधि हैं। जनता के वोट से चुनकर प्रधान और बीडीसी मेम्बर बने हैं। आज ये अपना एम.एल.सी चुनने आये हैं। ये लोकतन्त्र के खिलाफ़ कैसे जा सकते हैं?”

“बेकार की बात कर रहे हैं आप, इसी एलेक्शन की राजनीति में मैने जिन्दगी गुजार दी है साहब… यहाँ हमारी जाति के वोटर नहीं हैं। आपने अगर मदद नहीं की तो यहाँ से तो हम हार ही जाएंगे”

“मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ? मदद तो वोटर ही करेगा। आपके प्रत्याशी खासे लोकप्रिय हैं, मैने सुना है आसानी से जीत रहे हैं…” मैने ढाढस देते हुए कहा।

“बात वो नहीं है। चुनाव तो ‘भाई’ जीत ही रहे हैं, लेकिन इस बूथ से हार हो जाएगी तो मेरी बड़ी फजीहत हो जाएगी। क्या मुँह दिखाऊंगा मैं?”

“मुँह तो मैं नहीं दिखा पाऊंगा अगर यहाँ कोई धाँधली हो गयी… मेरी तो नौकरी ही चली जाएगी” मैने मजबूरी बतायी।

“किसकी मजाल है साहब जो आँख उठाकर देख ले… सख्ती सिर्फ़ आप कर रहे हैं। यहाँ किसी भी एजेण्ट की हिम्मत नहीं है जो हमारे खिलाफ़ खुलकर ऑब्जेक्शन करे। पता नहीं, आप ही क्यों नहीं समझ रहे है?”

“अभी यहाँ जोनल मजिस्ट्रेट, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और स्वयं ऑब्जर्वर कभी भी आ सकते हैं… आप किसी अनियमितता की उम्मीद मत करिए। तुरन्त शिकायत हो जाएगी…”

“कोई कुछ नहीं कहेगा साहब, ये साले वोटर एक बार मुझसे आँख मिलाएंगे तो जो मैं चाहूंगा वही करेंगे।”

मैने साफ हाथ जोड़ लिया। मुझसे निराश हो जाने के बाद एजेण्ट महोदय उठकर बेचैनी से टहलने लगे। थोड़ी दूर जाकर मोबाइल मिलाने लगे। दूर से उनका हाव-भाव बता रहा था कि काफ़ी कोशिश के बाद फोन मिल गया है। फोन के उस ओर जो भी था उसे कुछ समझाने लगे… काफ़ी देर तक समझाने के बाद मेरे नजदीक आए और मोबाइल मुझे थमाते हुए बोले-

“लीजिए साहब, बहुत मजबूरी में मुझे यह कदम उठाना पड़ा है… भाई से ही बात कर लीजिए”

“ओहो…! हेलो… कौन साहब बोल रहे हैं?” मैने गर्मजोशी से अभिवादन करते हुए कहा।

“साहब नमस्ते… ‘मैं’ बोल रहा हूँ… कैसे हैं? सब ठीक चल रहा है न…” इस बीच बगल से एजेण्ट महोदय ने इशारे से बता दिया कि फोन पर उनके प्रत्याशी हैं।

“हाँ-हाँ, सब आपकी दुआएं हैं। सब कुछ फ्री एण्ड फेयर चल रहा है। इधर निरक्षर मतदाता अधिक हैं इसलिए प्रिफ़रेन्शियल वोट डालने में समय अधिक लग रहा है। नियमानुसार आवश्यक होने पर वोटिंग हेल्पर की सुविधा दी जा रही है”

“वो तो ठीक है, लेकिन `इनको’ आप कोई सुविधा नहीं दे रहे हैं… ऐसे काम नहीं चलेगा, थोड़ी मदद कर दीजिए…”

“कैसी मदद, पोलिंग पार्टी तो वोटर्स की मदद कर ही रही है… आराम से वोट पड़ रहे हैं। किसी को कोई शिकायत नहीं है”

“अरे, इनकी शिकायत पर तो ध्यान दीजिए… कह रहे हैं कि आप वोट देखने नहीं दे रहे हैं…”

“नेता जी, क्या आप यह कहना चाहते हैं कि मैं मतदान की गोपनीयता भंग हो जाने दूँ”

“नहीं-नहीं, बस इनको देख लेने दीजिए, नहीं तो वोटर टूट जाएंगे, हमारा नुकसान कराकर आप को क्या मिल जाएगा…?”

“भाई साहब, इसके लिए माफ़ करिए। मैं अकेला नहीं हूँ यहाँ। पीठासीन अधिकारी है, माइक्रो ऑब्जर्वर हैम, पुलिस वाले हैं, दूसरे उच्चाधिकारी हैं, आयोग के ऑब्जर्वर हैं और सबके बाद पूरी वोटिंग की वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही है जिसे ऑब्जर्वर द्वारा देखकर संतुष्ट होने के बाद ही मतगणना करायी जाएगी। किसी प्रकार की धाँधली मतदान निरस्त करा सकती है। सरकार की और प्रशासन की बड़ी बदनामी हो जाएगी। आप अब भगवान के ऊपर छोड़ दीजिए… जो होगा अच्छा ही होगा।”

एक साँस में अपनी बात कहकर मैने फोन बन्द कर दिया और एजेन्ट महोदय से खेद प्रकट करते हुए उन्हें मोबाइल वापस कर दिया। भाई से हुई बात की जानकारी मैने अपने नजदीकी उच्चाधिकारी को फोन से दे दी। थोड़ी देर में अतिरिक्त फोर्स भी आ गयी। चार बजे की निर्धारित समय सीमा पूरी हो जाने तक एक स्थिर तनाव बना रहा। अन्ततः ९५ प्रतिशत मतदाताओं ने अपना वोट डाला।

***

ajit-ninan-024 पंचायतीराज व्यवस्था के लागू होने के बाद ग्राम पंचायत अध्यक्ष (ग्राम-प्रधान) और क्षेत्र पंचायत समिति के सदस्य (बीडीसी मेम्बर) पदों पर अनेक महिलाएं चुनी जा चुकी हैं।  विधान परिषद के स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता यही पंचायत प्रतिनिधि होते हैं। मतदान के लिए वहाँ आयी हुई अधिकांश महिलाएं अनपढ़ और निरक्षर थीं। उन्हें जिस वोट का अधिकार मिला था वस्तुतः उसका प्रयोग उनके पति, श्वसुर, देवर या पुत्र द्वारा ही किया जाना प्रतीत होता था। एक रबर स्टैम्प की भाँति उन्होंने बतायी गयी जगह पर ‘१’ की लकीर खींची होगी, शायद कुछ वोट सही जगह न पड़ पाने के कारण निरस्त भी करना पड़े। लोकतन्त्र की दुन्दुभि बजाते ये चुनाव क्या देश के जनमानस का सही प्रतिनिधि दे पा रहे हैं। ऐसा नेता जो हमें आगे की ओर सही दिशा में ले जा सके?

चुनाव के एक दिन पहले सुबह-सुबह कलेक्ट्रेट परिसर से पोलिंग पार्टियों की रवानगी से लेकर अगले दिन शाम तक वापस मतपेटियों के जमा होने तक की प्रक्रिया तो चुनावी महागाथा का बहुत संक्षिप्त अंश है। करदाता से वसूले गये करोड़ो रूपयों को खर्च करने, आम जन-जीवन अस्त-व्यस्त करने और लाखों कर्मचारियों-अधिकारियों द्वारा अपना रुटीन खराब करने के बाद चुनाव की प्रक्रिया सम्पन्न होती है तो एक ऐसे विजयी उम्मीदवार के नाम की घोषणा से जो अगले कुछ सालों में कुछ भी गुल खिला सकता है:

वह सदन में प्रश्न पूछने के लिए पैसा खा सकता है, सरकार चलाने के लिए माफ़िया से हाथ मिला सकता है, सरकार बचाने के लिए दलबदल कर करोड़ो कमा सकता है, कबूतरबाजी कर सकता है, साम्प्रदायिक और जातीय दंगे करवा सकता है, ईमानदार अधिकारियों की हत्या करा सकता है, आत्महत्या के लिए मजबूर कर सकता है, बेईमान अधिकारियों का गोल बनाकर सरकारी खजाना लूट सकता है, सरकारी ठेके दिला सकता है, सरकारी सौदों में दलाली खा सकता है, आम जनता और गरीबों का हक छीन कर अपनी तिजोरी भर सकता है, आतंकवादियों को जेल से छुड़ाकर उनके देश भेंज सकता है, राजभवन में पहुँचकर एय्याशी कर सकता है, मधु कोड़ा बन सकता है, देश बाँटने की साजिश रच सकता है।

ऐसी प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाकर क्या हम उस पाप के भागी नहीं बन रहे हैं?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

गृहिणी की कविता

14 टिप्पणियाँ

 

मन के भीतर उमड़-घुमड़

कुछ बादल सघन

ललक बरसन

पर पछुआ की धार से छितर-बितर

कुछ टुकड़ा इधर

कुछ खाँड़ उधर

 

घर के भीतर की खनखन

कलरव बच्चों का

कि अनबन

घरनी के मन में कुछ तड़पन

फिर ठनगन

उठता नहीं स्वर गगन

बस होती भनभन

मन ही मन

घरवाला अपने में मगन

देख ना सके है अगन

जाने किस बुरी घड़ी

लग गयी थी लगन

मन चाहे अब तोड़कर दीवारें

सरपट भगन

 

निकल नही पाती

मन से सब बात

लिखने को पाती

अब उठते नहीं हाथ

होकर अनाथ

साथ छोड़ रहा साहस

बिलाता एहसास अपनेपन का

दिखता नहीं कुछ भी

मन का

तन का

अब क्या करना

बस पेट भरना

तन कर

अब क्या रहना

बरबस अब है कहना

थाती मिटाती

ये आँधी

युगों ने थी बाँधी

जिस डोर से

चटक रही कैसे

किस ओर से

 

कैसे बतलाए

मन तो सकुचाए

अबतक तो रहे थे अघाए

नहीं….

खेले-खाए-अघाए

जितना भी पाए

उलीच दिया गागर

पर जो थी खाली

सारे मत अभिमत

सिद्ध हुए जाली

रखवाली का भ्रम था

जो करते नहीं थे

बस हो जाती थी

 

एक चिन्गारी लगी

ज्वाला फूटी

निकल पड़ी लेकर लकूटी

टूटी-फूटी…

 

ना ना

यह थी छिद्रहीन साबुत

जिन्दगी से भरी

भरी सी गगरी

न थी पत्थर की बुत

थोड़ी अलसाई

फिर लेती अंगड़ाई

छलक उठी गागर

समोए है सागर

कल-कल झरने की अठकेली

कई नदियों की धारा

लो इनको भी आँचल में लेली

अब खुलती हथेली

  गृहिणी

बन्द हुई मोटी किताबें

दूर धरी थियरी

सीधी सी बतियाँ बस

लाइव कमेन्टरी

घटित हो रहा मन में

जो घर में आँगन में

हस्तामलकवत्‌

चेतन मन कानन में

 

बात बेबात पे लड़ना

घड़ी-घड़ी झगड़ना

क्या दे देगा

किसी और का मुँह ताकते

एक ही लउर से हाँकते

भीतर बाहर झाँकते

आते-जाते को आँकते

हाँफ़ते फाँकते

सब ले लेगा

फिर

चाहिए ही क्या?

जो टाले न टले

हटाये न हटे

उसे यूँ साध लेना

मासूम बच्चा सा

मोहपाश सच्चा सा

डालकर यूँ बाँध लेना

सीखो तो सही

यह प्रेम की भाषा

दूर करेगी सारी निराशा

बोलो तो सही

बसता है ईश्वर

सबके भीतर बनकर

चेतना, दया और करुणा

जगाओ तो सही

 

फिर तो मनुष्य

बुरा कैसे रह जाएगा

सारा मालिन्य

इस अनुपम उजियारे में

झट से बह जाएगा

 

यह वाद वह आन्दोलन

यह भाषण वह सम्मेलन

अपने पूर्वाग्रह गठरी में बाँधकर

धर दो आले पर

मन की गाँठ खोलकर

चोट करो ताले पर

पहले घर से शुरू करो

कर डालो रिहर्सल

रियाज में ही राह दिखेगी

जिन्दा बनो हर पल

अन्धेरे को चीरकर

बन्द दिमागों से टकराएगी

आशा की उजली किरण

चहुँ ओर छा जाएगी।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

खाकी में भी इन्सान बसते हैं और कम्प्यूटर में…!?!

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पिछले रविवार की सुबह बड़ी मायूसी के साथ शुरू हुई थी। शनिवार तक कम्प्यूटर में वायरस का प्रकोप इतना बढ़ चुका था कि उसे अस्पताल ले जाना पड़ा था। डॉक्टर (इन्जीनियर?) ने कहा कि इसे भर्ती करना पड़ेगा। पूरा चेक-अप होगा। तंत्रिका तंत्र में इन्फ़ेक्शन पाये जाने पर पूरी सफाई करनी पड़ेगी। सारा खून बदलना पड़ सकता है। सब का सब पुराना डेटा उड़ जाएगा। मैं तो घबरा ही गया।

वागीशा और सत्यार्थ की पैदाइश से लेकर अबतक खींची गयी सैकड़ों तस्वीरें, मोबाइल, हैण्डीकैम और सोनी डिजिटल से तैयार अनेक यादगार वीडिओ फुटेज, दोस्तों यारों और रिश्तेदारों की शादियों और मेल-मुलाकातों की याद दिलाती तस्वीरें। हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित कार्यक्रमों की चित्रावलियाँ और इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलन की अविस्मरणीय झाँकी दिखाते मनभावन स्लाइड शो। इसके अतिरिक्त बेटी और मेरे हाथ की ‘पेण्ट’ पर बनायी अनेक कलाकृतियाँ और सबसे बढ़कर मेरे द्वारा लिखे गये एक-एक शब्द का मूल पाठ जो ‘माई डॉक्यूमेण्ट’ फोल्डर में सेव था वह सब उड़ जाएगा।

डीलर ने कहा कि हम किसी का डेटा बचाने का जिम्मा नहीं लेते। आप चाहें तो इसे कहीं कॉपी कर लें। चार जीबी का पेन ड्राइव, दो जीवी का सोनी कैमरा, चार-छः जीबी की डीवीडी आदि जोड़कर भी करीब चालीस जीबी डेटा को सुरक्षित नहीं कर पा रहे थे। इलाहाबाद जैसे शहर में लगभग मोनोपॅली बनाकर रखने वाले एच.पी. के डीलर साहब मुझे टहला रहे थे कि इतना बड़ा डेटा बचाने का उसके पास कोई उपाय नहीं है। वारण्टी के चक्कर में किसी दूसरे जानकार से मशीन खुलवायी भी नहीं जा सकती थी।

…यानि यदि मुझे आगे इस कम्प्यूटर पर काम करना है तो मोह त्याग कर इसकी फॉर्मैटिंग करानी होगी। बड़े जतन से सजोयी गयी उस मुस्कान को अलविदा कहना होगा जो एक महीने के सत्यार्थ के चेहरे पर तब खिल उठती थी जब उसने पहली बार मुझे पहचानना शुरू किया था और मैंने उस नैसर्गिक सुख के लोभ में जैसे-तैसे सीटी बजाना सीख लिया था। उसका पहली बार ‘माँ’ बोलना, पहली बार करवट बदलना, पहली बार सरकना, पहली बार बँकइयाँ चलना, पहली बार खड़ा होना, फिर डग भरना, पहली बार अन्न ग्रहण करना और न जाने क्या-क्या अब केवल यादों में रह जाएगा। बेटी के गाए तोतले गाने, उसका पहला स्कूली बस्ता, लाल रिबन की पहली चोटी, पहला स्कूली ड्रेस, दोनो का साथ-साथ खेलना, लड़ना, झगड़ना, सबकुछ अब वापस तो नहीं आएगा न। ऑफिस के बुजुर्ग पेंशनर्स तो अगले साल फिर आ जाएंगे लेकिन हिरमतिया की माँ जो मर गयी अब कैसे आएगी?

इसी दुश्चिन्ता में जब रविवार की सुबह आँख खुली तो मन भारी था। तकनीकी ज्ञान का अभाव मुझे साल रहा था। निःशुल्क वायरस रोधी सॉफ़्टवेयर के फेर में पड़कर मैने बहुत कीमती सामग्री को संकट में डाल दिया था। रविवार को सिविल लाइन्स बन्द होने के कारण उसदिन कुछ हो भी नहीं सकता था इसलिए खालीपन के एहसास के साथ बाजार और वायरस को कोसता हुआ देर तक बिस्तर पर पड़ा रहा। करीब नौ बजे श्रीमती जी ने याद दिलाया कि मेज पर एक आमन्त्रण-पत्र पड़ा है जो किसी पुस्तक पर चर्चा से सम्बन्धित है।

“आप वहाँ जाएंगे क्या?” प्रश्न ऐसे किया गया जैसे मेरे वहाँ न जाने पर ज्यादा खुशी होती। लेकिन मैं…

“अरे वाह!” मुझे तो जैसे तिनके का सहारा मिल गया। अब रविवार अच्छा कट जाएगा। अच्छा क्या, जबर्दस्त बात हो गयी साहब…।

हुआ यूँ कि के.पी.कम्यूनिटी सेन्टर में जो कार्यक्रम आयोजित था उसके मुख्य अतिथि थे- विभूति नारायण राय जी, जिनके सौजन्य से हमने हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हाल ही में सम्पन्न कराया था। इलाहाबाद के डी.आई.जी. जो अब जिले के पुलिस कप्तान होते हैं, चन्द्रप्रकाश जी ने अपने एक मित्र और आई.पी.एस.बैचमेट अशोक कुमार जी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक पर भव्य परिचर्चा का आयोजन किया था। उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय, इलाहाबाद के अपर पुलिस महानिदेशक एस.पी. श्रीवास्तव जी भी, जो स्वयं एक कवि, शौकिया फोटोग्राफर और ब्लॉगर हैं इस गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे। भारत सरकार की ओर से इलाहाबाद में स्थापित उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक आनन्दबर्द्धन शुक्ल जी भी एक आई.पी.एस. अधिकारी रह चुके हैं। वे इस मंच को विशिष्ट अतिथि के रूप में सुशोभित कर रहे थे।

खाकी में इन्सान पर (पुलिस) परिवर्चा

एक मंच पर पाँच-पाँच आई.पी.एस. इकट्ठा होकर यदि हिन्दी की एक पुस्तक पर परिचर्चा कर रहे हों तो सोचिए नजारा कैसा रहा होगा। मजे की बात यह रही कि उस बहुत बड़े हाल में आमन्त्रित साहित्यप्रेमियों की संख्या से कहीं अधिक पुलिस के जवान दिखायी दे रहे थे। लेकिन वर्दी में नहीं, सादे कपड़ों में। पीछे की आधी सीटें तो प्रशिक्षु रंगरूटों से भर गयी थीं। आगे की सीटों पर शहर के प्रतिष्ठित आमजन, व्यापार मंडल के प्रतिनिधि, अधिकारी वर्ग और मीडिया आदि के लोग जमे हुए थे। लेकिन जब चर्चा शुरू हुई तो मुझे लगने लगा कि आज छुट्टी बेकार नहीं गयी है। पुलिस विभाग में होकर भी बेहद संवेदनशील बने रहकर लोकहित के बारे में सोचने वाले एक ऐसे अधिकारी से साक्षात्कार हो रहा था जिसने बीस साल तक पुलिस महकमें में उच्च पदों पर सेवा देने के बाद अपने अनुभवों को बिना किसी लाग-लपेट के दूसरों से बाँटने का उद्यम कर रहा था।

लेखकीय - अशोक कुमार IPS ऐसे में मेरे भीतर का ब्लॉगर खड़ा हो गया। झटपट मोबाइल कैमरे से तस्वीरें ले डाली और पुस्तक के लेखक को ब्लॉग लिखने की मुफ़्त सलाह दे डाली। वे बोले, “सिद्धार्थ जी, आप मेरा ब्लॉग तैयार कर दीजिए, इसपर जो कॉस्ट आती होगी वह मैं तुरन्त दे दूंगा।” मैने जब यह बताया कि ‘यहाँ सबकुछ मुफ़्त में उपलब्ध है’ तो वे खुश हो गये। तुरन्त लान्च करने की बात करने लगे। अब मैंने संकोचवश बताया कि मेरा कम्प्यूटर घर पर है ही नहीं। आपका काम थोड़ा समय ले सकता है। …लेकिन ब्लॉगरी के प्रसार की गुन्जाइश हो तो किसी ब्लॉगर को प्रतीक्षा करने में चैन कहाँ। हिन्दुस्तानी एकेडेमी का ताला खोलवाया, ब्लॉग बना और इस हिन्दी परिवार में एक चमकीले सितारे का अभ्युदय हो गया। आप यह पूरी पोस्ट पढ़ने के बाद वहाँ जाइए  और सराहिए खाकी में इन्सान को।

इसी में यह बता दूँ कि आदरणीय आलसी गिरिजेश राव जी ने मेरी कम्प्यूटरी समस्या का समाधान फोन पर ही कर दिया। बोले, एक पोर्टेबल हार्ड डिस्क में सारा डेटा आसानी से आ जाएगा जो १६०, २५०, ३२० जी.बी. या उससे अधिक क्षमता की भी होती है। मैने डीलर से फोन पर कहा तो उन्होंने कहा कि आप इसपर तीन हजार खर्च करने को तैयार हों तो मुझे कोई ‘प्रॉब्लेम’ नहीं है। मरता क्या न करता। मैने हामी भर दी। जब दुकान पर पहुँचा तो उनके इन्जीनियर ने अपनी पुरानी डिस्क में डेटा कॉपी करके फॉर्मेटिंग शुरू कर दी क्यों कि नई डिस्क वे मंगा नहीं पाये थे।  यानि समस्या केवल मेरे अज्ञान के कारण घनीभूत हुई थी। अन्ततः भारी खर्चे की आशंका से ग्रस्त श्रीमती जी को जब मैने बताया कि मुझे केवल पाँच सौ खर्चने पड़े तो उनके चेहरे पर वही मुस्कान फिर लौट आयी थी जो सुबह विलुप्त हो गयी थी। हाँलाकि कम्प्यूटर को अगले दिन दुबारा अस्पताल जाना पड़ा क्योंकि कोई वायरस छिपा रह गया था। फिलहाल विस्टा स्टार्टर हटाकर वापस एक्सपी डलवा लेने के बाद शायद मामला ठीक हो गया है।

एक अच्छी खबर और है- वी.एन.राय साहब ने अनौपचारिक बात चीत में इलाहाबाद के ब्लॉगर सम्मेलन के बाद का हाल-चाल पूछा। जब मैने सच-सच हाल बयान कर दिया तो खुश होकर बोले कि हिन्दी चिठ्ठाकारी की दुनिया पर विचार-विमर्श के लिए वर्धा विश्वविद्यालय प्रति वर्ष एक वृहद राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन करेगा जो विश्वविद्यालय के रमणीक प्रांगण में अक्टूबर-नवम्बर महीने में सम्पन्न हुआ करेगा। नामवर सिंह जी के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वालों की असुविधा का हमें खेद है, लेकिन जबतक वे वहाँ के कुलाधिपति बने रहेंगे तबतक हम उन्हें उद्‍घाटन के लिए बुलाकर सम्मानित करते रहेंगे। अलबत्ता यदि इस पुनीत कार्य के लिए महामहिम राष्ट्रपति हामी भर दें तो बात दीगर हो जाएगी।

आगे-आगे देखिए होता है क्या…!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

कौन कहता है कि राजनीति का पतन हो रहा है…?

28 टिप्पणियाँ

 

दस साल पहले संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के साक्षात्कार में एक सदस्य ने मुझसे पूछा था कि भारत के राजनेताओं और पश्चिमी देशों के राजनेताओं में मौलिक अन्तर क्या है? मेरे बायोडेटा में शायद यह देखकर कि मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी रह चुका हूँ उन्होंने मुझसे यह मुश्किल सवाल पूछ दिया था। तब सरकारी सेवा में दो साल तक रह लेने के बाद मुझे नेता नामक जीव के बारे में जो अनुभव हुआ था उसके आधार पर मैने कुछ स्पष्ट टिप्पणी न करना ही उचित समझा। अकस्मात् मुझे कोई सटीक अन्तर सूझ भी नहीं रहा था।

…फिर उन्होंने ही बताया कि भारत में राजनीति पेशेवर नहीं है। इसमें एक खास पारिवारिक पृष्ठभूमि के लोग ही आगे बढ़ पाते हैं। भकुआकर मैं उनकी बात सुनता रहा… कह रहे थे कि यदि आप किसी दूसरे पेशे में लगे हुए हैं तो  आप नेता नहीं हो सकते और यदि आप नेता हैं तो किसी दूसरे पेशे में नहीं जा सकते। लेकिन पश्चिमी लोकतन्त्रों में आप किसी भी पेशे में रहते हुए चुनाव लड़ सकते हैं, जीत सकते हैं, मन्त्री बन सकते हैं और फिर वापस अपने काम पर लौट सकते हैं।

मुझे उनकी बातें तब बिल्कुल ‘हट के’ लगी थीं लेकिन बाद में जब मैने इस पर विचार किया तो उनकी बात ठीक ही लगी। यहाँ आप अच्छे डॉक्टर, वकील, शिक्षक, इन्जीनियर, मैनेजर, प्रशासक, कलाकार, फौजी, नर्तक, चित्रकार, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री  आदि हैं तो अच्छी नेतागीरी नहीं कर सकते। सरकारी नौकरी करने वाले तो बाकायदा इस काम से प्रतिबन्धित हैं। यहाँ जो नेता है वह सिर्फ नेता ही है। वह चुनाव लड़ने-लड़वाने, जीतने-हारने, और विधायक, सांसद और मन्त्री बनने या न बन पाने   के अलावा कुछ नहीं कर सकता। अनेक परिवार पूरी तरह इस राजनीति कर्म को ही समर्पित हैं।

मुझे यह सोचकर मन ही मन कोफ़्त सी होने लगी थी कि एक स्वतंत्र पेशा  के रूप में राजनीति का  कैरियर चुनने का विकल्प सबके पास मौजूद नहीं है। अपनी निजी प्रतिभा, अभिरुचि और परिश्रम से अन्य सभी व्यवसाय अपनाए जा सकते हैं लेकिन किसी व्यक्ति में इन गुणों की प्रचुरता के बावजूद राजनीति के क्षेत्र में सफलता की गारण्टी नहीं है।  देश में कितनी प्रतिभाएं भरी पड़ी हैं लेकिन राजनीति के क्षेत्र में वही लोग पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आ रहे हैं। टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का लीड इण्डिया कैम्पेन भी शायद इसी सोच के आधार पर शुरू किया गया था लेकिन अपेक्षित बदलाव दिखायी नहीं दिये।

लेकिन जरा ठहरिए…  पिछले दस बारह साल में राजनीतिक पटल पर जो कुछ घटित हुआ है उसे देखकर आप क्या कहेंगे? अपने देश में एक उच्च कोटि का वैज्ञानिक राष्ट्रपति बना और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री बन गया। विडम्बना देखिए कि यह सब तभी सम्भव हुआ जब इस प्रकार का निर्णय किसी खानदानी राजनैतिक परिवार द्वारा लि्या गया। इन विभूतियों ने अपने जीवन के उद्देश्य तय करते समय कभी नहीं सोचा होगा कि उन्हें राजनैतिक सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचना है। न ही इन्होंने इस दिशा में कोई स्वतन्त्र प्रयास किया होगा। वस्तुतः इनका राजनीति में आना और टिके रहना इनके असली आका के प्रसादपर्यन्त ही सम्भव हुआ। कलाम साहब को जब पूरा देश चाहता था तब भी वो हटा दिये गये थे। इसलिए इन दो उदाहरणों को अपवाद ही माना जाना चाहिए।

ये सारी बातें आज मेरे मन में आने की एक खास वजह है। मेरी मुलाकात एक ऐसे दुर्लभ प्राचीन कालीन नेता जी से हुई जो उत्तर प्रदेश में विधायक रह चुके हैं। उत्तर प्रदेश राज्य की विधान सभा के माननीय सदस्य जो अत्यन्त गरीब और बदहाल हैं…।

 

पूर्व विधायक श्री रामदेव जी

श्री रामदेव

पुत्र-रामनाथ

ग्राम-पुरा लच्छन

पोस्ट/तहसील-मेजा

कांगेसी बिधायक-मेजा

(१९७४-१९७७)

आजकल एक बार विधायक हो जाने का मतलब  आप सहज ही जान सकते हैं। मधु कोड़ा जी का उदाहरण तरोताजा है। कुल जमा चार पाँच सालों में आर्थिक विकास की जो गंगा उन्होंने बहायी है उसका वर्णन यहाँ करना जरूरी नहीं है। सभी कोड़ा साहब की तरह मधु ही मधु तो इकठ्ठा नहीं कर पाएंगे लेकिन किसी भी विधायक के लिए अब देखते-देखते करोड़ों जुटा लेना सामान्य बात हो गयी है। बड़ी सी चमचमाती गाड़ी में चार-चार बन्दूकधारियों के साथ घूमते, नौकरशाहों पर रोब गाँठते ये जनता के नुमाइन्दे जिस ओर निकल पड़ते हैं उस ओर तीमारदारों की लाइन लग जाती है। एक बार विधायकी का दाँव लग गया तो पूरी जिन्दगी के पौ-बारह हो जाते हैं। पीढ़ियाँ निहाल हो जाती हैं।

ऐसे में यदि आपको एक ऐसा पूर्व विधायक मिल जाय जिसको अपनी रोजी-रोटी के लिए खेत में मजदूरी करनी पड़ रही हो, तहसील में जाकर किसी वकील का बस्ता ढोना पड़ रहा हो और १०-२० रूपए लेकर दस्तावेज नवीसी करनी पड़ रही हो तो क्या कहेंगे? जी हाँ, इलाहाबाद की मेजा विधान सभा का प्रतिनिधित्व १९७४ से १९७६ तक करने वाले विधायक रामदेव जी आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले भूमिहीन दलित परिवार के मुखिया हैं। उनके तीन बेटों को शिक्षा नसीब न हो सकी। खेतों में मेहनत मजदूरी करना और बैलों के साथ हल चलाना उनका जीविका का साधन है।

“आपने बच्चों को पढ़ाया नहीं…?”

“कहाँ साहब, हम गरीब आदमी ठहरे… बच्चों का पेट पालें कि स्कूल भेंजें…?”

बात बात में दोनो हाथ जोड़कर अपनी सरलता का परिचय देते  रामदेव जी ने जब अपनी राम कहानी बतायी तो मेरे मन में एक हूक सी उठने लगी। खुद भी मुश्किल से दर्जा पाँच पास कर सके थे। कांग्रेस पार्टी के जलसों में आया जाया करते थे। बहुगुणा जी ने हरिजन सुरक्षित सीट से टिकट दे दिया तो विधायक बन गये लेकिन अपने घर परिवार के लिए कोई संसाधन नहीं जुटा सके। लखनऊ की सत्ता की गलियों में पहुँच जाने के बावजूद बच्चों को गाँव के प्राइमरी स्कूल से आगे नहीं ले जा सके।

तीनो बेटों की कम उम्र में शादी कर दी। स्थानीय अनपढ़ समाज से बाहर कोई रिश्ता नहीं हुआ। बेटों ने खेतों में मजदूरी की और घर में बच्चे पैदा किए। तीनो के मिलाकर बारह लड़कियाँ और एक लड़का। सभी अशिक्षित रहे और मजदूर  बन गये। पैतृक सम्पत्ति के नाम पर खेत का जो छोटा टुकड़ा मिला उस पथरीली जमीन पर थोड़ी सी ज्वार, बाजरा और मक्का की फसल अपने श्रम से उगा लेते हैं, लेकिन चावल गेहूँ दाल तो खरीदना ही पड़ता है।

“बी.पी.एल. कार्ड बनवा लिए हैं कि नहीं…?” सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से खरीदारी की सुविधा देने वाले इस कार्ड की बावत पूछने पर सकुचा जाते हैं।

“है तो साहब, लेकिन कहाँ मिल पाता है…। राशन का खर्चा बहुत है… वहाँ से कभी-कभार दस-बीस किलो चुपके से ले आता हूँ… थोड़ी लाज भी लगती है साहब… बड़ी कठिनाई है… ” उनके बार-बार हाथ जोड़ने से मुझे उलझन होने लगती है।

“आपका मकान कैसा है?” ब्लॉगर ने साहस करके पूछ ही लिया।

“कच्चा है साहब… हम बहुत गरीब हैं”…चेहरे पर वही संकोच तारी है।

“भूतपूर्व विधायक को तो सरकार अनेक सुविधाएं देती है। आपने कोशिश नहीं की…?” मेरा आशय राजनैतिक पेंशन, मुफ़्त  की यात्रा सुविधा इत्यादि से था।

“साहब ट्रेन और बस का ‘पास’ तो है लेकिन हमें खेत-खलिहान और तहसील तक ही जाना होता है… उसके लिए साइकिल या पैदल से काम चल जाता है। कभी लखनऊ या इलाहाबाद जाना होता है तभी पास का काम पड़ता है।”

“पेंशन तो मिल रही है न…?”

“डेढ़ हजार में क्या होता है साहब?”

“बस डेढ़ हजार…?” मुझे आश्चर्य हुआ।

“असल में साहब, मैं टाइम पर फॉर्म नहीं भर पाया था… सरकार का कोई दोष नहीं है” विनम्रता में हाथ बदस्तूर जुड़ा हुआ है।

मैने सम्बन्धित बाबू को बुलाकर पूछा तो पता चला कि समय-समय पर पेंशन पुनरीक्षण (revision) की प्रक्रिया का लाभ इन्हें मिला ही नहीं है। मई ’९७ से इनकी मूल पेंशन १४५०/- रूपये पर अटकी हुई है। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में पहुँच चुके रामदेव जी की खराब माली हालत पर जब यहाँ के सांसद प्रत्याशी की निगाह पड़ी तो उन्होंने विधान सभा सचिवालय में पैरवी करके इनकी पेंशन में सुधार करा दिया था। उसी प्राधिकार पत्र के अनुसार भुगतान शुरू कराने के लिए रामदेव जी ने कोषागार की राह पकड़ी थी।

मैने देखा कि इनकी पेंशन सितम्बर-९८ से १९००/-, अप्रैल-२००४ से २५००/-, अगस्त-२००५ से ३६००/- और दिसम्बर-२००७ से ७०००/- कर दिए जाने का आदेश एक साथ जारी हुआ था। यानि विधायक जी अपनी मेहनत मजदूरी, और तहसील की मुंशीगीरी में इतना उलझे रहे कि अपनी पेंशन भी समय से नहीं बढ़वा सके। मूल पेंशन पर देय महंगाई भत्ता जोड़कर एकमुश्त एरियर की धनराशि लाखों में मिलने की बात सुनकर उनके चेहरे पर जो खुशी उतर आयी उसका बयान करना मुश्किल है। बार बार हाथ जोड़कर ऊपर वाले के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते रहे। आँखों की कोर से नमी झँकने लगी थी।

क्या आज का कोई विधायक या टुटपुँजिया नेता भी इस दारुण दशा का शिकार हो सकता है?  किसी विधायक के इर्द-गिर्द चलने वाले लटकन भी ठेकेदारी और रंगदारी का धन्धा चमकाकर मालदार और रौबदार हो लेते हैं। राजनीति के क्षेत्र में उतरने वाले अब इतना विकास तो आसानी से कर लेते हैं कि उन्हें कभी रामदेव जी जैसे दिन न देखने पड़े। मधु कोड़ाओं के तो कहने ही क्या…।

फिर कौन कहता है कि राजनीति का पतन हो रहा है…? 🙂

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

इलाहाबाद की राष्ट्रीय संगोष्ठी के बाद…

24 टिप्पणियाँ

यह पोस्ट सातवें आसमान से लिख रहा हूँ… कारण है आप सभी की जोरदार, शोरदार और बेजोड़दार प्रतिक्रियाओं की सतत्‌ श्रृंखला। वाह, मुझे तो उड़न तश्तरी होने का इल्म हो रहा है… (आदरणीय समीर जी क्षमा याचना सहित)

श्री विभूति नारायण राय जी से २३ अगस्त २००९ को मेरी प्रथम मुलाकात हुई, नितान्त अनौपचारिक और व्यक्तिगत। सत्यार्थमित्र पुस्तक भेंट करने और हिन्दी विश्वविद्यालय द्वारा हिन्दी भाषा और साहित्य से सम्बन्धित पाठ्येत्तर गतिविधियों के सम्बन्ध में कुछ चर्चा कर अपने को अद्यतन कर लेना  ही मेरा उद्देश्य था।

राय साहब ने मेरी पुस्तक पर प्रसन्नता जाहिर की और तत्क्षण ही अपने लैपटॉप पर हिन्दुस्तानी एकेडेमी और सत्यार्थमित्र के ब्लॉग पर विहंगम दृष्टि डालने के बाद अपने विश्वविद्यालय की साइट के दर्शन भी कराये। हिन्दी साहित्य के एक लाख पृष्ठों को नेट पर चढ़ाने की परियोजना के बारे में बताया। मैने भी उन्हें बताया कि पिछली मई में हमने इलाहाबाद वि.वि. के निराला सभागार में एक ब्लॉगिंग की कार्यशाला करायी थी जिसमें इन्टरनेट पर ब्लॉग लेखन के माध्यम से हिन्दी के बढ़ते कदमों की चर्चा की गयी थी। उन्होंने उस कार्यशाला सम्बन्धी पोस्ट के लिंक पर जाकर उसे देखा और उसके बाद उन्होंने मुझसे जो प्रस्ताव रखा उससे मैं सकते में आ गया था-

“इलाहाबाद में हिन्दी ब्लॉगों के बारे में एक राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार का आयोजन जिसमें देश के सबसे अच्छे ब्लॉगर्स को बुलाकर इस माध्यम पर दो दिन की चर्चा कराई जाय।” संगोष्ठी स्मृति भेंट

उसके बाद अबतक जो-जो हुआ है वह इतिहास बनता जा रहा है। राय साहब और नामवर जी की व्यस्तता के कारण तिथियों को आगे सरकाए जाने की मजबूरी हो या बर्धा से इलाहाबाद की दूरी और नेट पर सम्पर्क का अभाव रहा हो, विश्वविद्यालय के अधिकारियों के साथ इस नवीन माध्यम पर की जा रही संगोष्ठी के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाने की जटिल प्रक्रिया रही हो या मेरे मन में उत्साह और सदाशय का प्राचुर्य और अनुभव की न्यूनता रही हो; इन सभी दिक्कतों और खूबियों-खामियों के बावजूद यह संगोष्ठी जिस रूप में सम्पन्न हुई उससे मेरा मन बल्लियों उछल रहा है। अब प्रायः सभी मान रहे हैं कि यह संगोष्ठी अबतक का सबसे बड़ा आयोजन साबित हुई है।

मेरी अप्रतिम प्रसन्नता मात्र इसलिए नहीं कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक का विमोचन नामवर जी के हाथों होने का जुगाड़ हो गया, वह कार्य तो एकेडेमी पहले भी कराती रही है; बल्कि मैं तो इसलिए अभिभूत हूँ कि मात्र डेढ़ साल पहले बिल्कुल नौसिखिया बनकर इस माध्यम से जुड़ने के बाद मुझे ऐसे अवसर और समर्थन मिलने लगे कि इस माध्यम को व्यक्तिगत कम्प्यूटर कक्षों से बाहर निकालकर  अखबारी सुर्खियाँ बनाने, सभागारों में चर्चा का विषय बनाने, पारम्परिक साहित्य के प्रिण्ट माध्यम से इसे विधिवत जोड़ने के जो प्रयास हो रहे हैं उसमें एक माध्यम मैं भी बन गया। इतना ही नहीं, अन्ततः हिन्दी जगत के शिखर पर विराजने वाले एक ख्यातिनाम हस्ताक्षर को जब इस माध्यम पर गम्भीरता से मनन करने और अपनी राय बदलने या अपडेट करने पर मजबूर होना पड़ा तो मैं इस ऐतिहासिक घटना का न सिर्फ़ प्रत्यक्षदर्शी बना  बल्कि उस हृदय परिवर्तन के प्राकट्य का एक संवाहक भी हो लिया।

मैं इस जोड़-घटाने में कभी नहीं पड़ने वाला कि मुझे इस बात की कितनी क्रेडिट दी गयी है या दी जाती है, लेकिन पिछले एक सप्ताह से जो कुछ घटित हो रहा है उसे देखकर मुझे असीम आनन्द, तृप्ति और आत्मसंतुष्टि ने घेर रखा है। आत्ममुग्ध हो गया हूँ मैं। …अब इससे किसी विघ्नसंतोषी का दिल बैठा जा रहा हो तो मैं क्या कर सकता हूँ? चुपचाप काम निबटाने के बाद ब्लॉग उदधि में उठने वाली ऊँची तरंगों को सुरक्षित दूरी बनाकर शान्ति और कौतूहल के मिश्रित भाव से देखने और मुक्त भाव से उनमें मानसिक गोता लगाने का जो सुख मुझे मिला है वह जीवन भर सँजो कर रखना चाहूंगा।

मेरे वरिष्ठ मित्रों और आदरणीय अग्रजों ने जो स्नेह, समर्थन और आशीर्वाद दिया उससे मुझे आगे बढ़ने का उत्साह मिला। असीम ऊर्जा मिली। (एक अदना सा ‘धन्यवाद’ देकर मैं उस ऋण से उऋण नहीं हो सकता।) लेकिन जिन लोगों ने पूरी शक्ति लगाकर इस संगोष्ठी का छिद्रान्वेषण किया, अनेक कमियों को ढूँढकर  बताया, और बड़े-बुजुर्गों की ऊटपटांग आलोचना की उससे मेरे मन को कुछ ज्यादा मजबूती मिली। अब मुझे विश्वास हो गया है कि किसी अच्छे और बड़े कार्य के लिए आपके पास बहुत लम्बा अनुभव होना या अधिक उम्र का होना बहुत जरूरी नहीं है। यह कोई गारण्टी नहीं देता। अराजकता, अविवेक, अहमन्यता, अधीरता, अति भावुकता और अनाड़ीपन का प्रकोप वहाँ भी हो सकता है। ऐसा बोध कराने के लिए उन सबको तहेदिल से शुक्रिया…।

हिन्दी ब्लॉग-जगत में मेरी छोटी सी यात्रा को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने का निर्णय हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सचिव द्वारा जिन उद्देश्यों से किया गया था उसे उन्होने पुस्तक के प्रकाशकीय में स्पष्ट किया है। इसके औचित्य पर प्रश्न उठाने वालों को पुस्तक खरीदकर पढ़नी चाहिए और तभी कोई राय बनानी चाहिए। मैं तो बड़ी विनम्रता से हिन्दुस्तानी एकेडेमी के उच्चाधिकारियों से लेकर अपने आस-पास के आम लोगों को जो मेरी विचार भूमि में बीज समान अंकुरित होते रहे हैं; और घर-परिवार से लेकर इस ब्लॉग-परिवार के सुधीजनों के प्रति हृदय से कृतज्ञता व्यक्त कर चुका हूँ जिनका इस पुस्तक के निर्माण में प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी प्रकार का योगदान है। एक बार खरीदकर पढ़िए तो सही…।

आप सोच रहे होंगे कि मैं फिरसे विज्ञापन करने लगा…। तो जरूर सोचिए क्योंकि मैं ऐसा ही कुछ कर रहा हूँ और मैं ऐसा करना बुरा नहीं मानता। पुस्तकों का बाजार कितना कमजोर और उपेक्षित है इसका जिक्र अनेकशः कर चुका हूँ। आगे भी इस चिन्ता को जाहिर करता रहूंगा और पुस्तकों के प्रति लोगों में प्रेम भाव जागृत करने के लिए जो बन पड़ेगा वह भी करता ही रहूंगा…।

संगोष्ठी समाप्त होने के बाद मैने सब काम छोड़कर अन्तर्जाल पर पोस्ट के रूप में आने वाली प्रतिक्रियाओं को टिप्पणियों-प्रतिटिप्पणियों  को पढ़ता रहा, मुझे अपनी ओर से किसी सफाई की जरूरत नहीं पड़ी। (एक जगह केवल यह बताना पड़ा कि नामवर जी उस वि.वि. के कुलाधिपति हैं।) इतने समझदार और जानकार लोग इस मंच को आलोकित कर रहे हैं कि सबकुछ शीशे की तरह साफ होता चला गया। कल समीर जी ने जब पुल के उस पार से इलाहाबाद का दर्शन किया तो हठात्‌ मेरे भावों को निरूपित करती कविता निकल पड़ी-

मैं इसलिये हाशिये पर हूँ क्यूँकि

मैं बस मौन रहा और

उनके कृत्यों पर

मंद मंद मुस्कराता रहा!!

-समीर लाल ’समीर’

 

इस मौन ने मुझे ऐसा घेरा कि इस गोष्ठी की अनेक यादगार तस्वीरें आपको दिखाना भूल गया। आज कुछ ऐसे चेहरे लगा रहा हूँ जिन्हें नये-पुराने सभी ब्लॉगर देखना चाहेंगे। कोई मानक क्रम निर्धारित नहीं किया है, बस एलबम से जो जहाँ मिला वहीं से उठा लिया है:

वी.एन.राय प्रो.नामवर सिंह राकेश जी, OSD
अनूप जी ‘फुरसतिया’  प्रियंकर जी.. रवि रतलामी
सिद्धार्थ ‘सत्यार्थमित्र’ हर्षवर्धन त्रिपाठी  अजित बडनेरकर
गिरिजेश राव विनीत कुमार विजेन्द्र चौहान ‘मसिजीवी’
अफ़लातून भूपेन सिंह इरफान
संजय तिवारी ‘विस्फोट’  यशवन्त ‘भड़ासी’ अविनाश ‘मोहल्ला’
हेमन्त कुमार डॉ. अरविन्द मिश्र हिमांशु पाण्डेय
 वर्धा की शोध छात्रा मीनू खरे  मनीषा पांडेय
समरेन्द्र ‘मोहल्ला’ वाले अखिलेश मिश्र ‘बोधिसत्व’ ज़ाकिर अली ‘रजनीश’

इस मौके पर कुछ महारथियों ने अपने ‘लोटपोट’ के साथ त्वरित पोस्ट ठेलने का काम किया और अभय तिवारी की लघु फिल्म सरपत का प्रदर्शन भी हुआ। बेहद उम्दा फिल्म है। जरूर देखने लायक।

त्वरित प्रसारण

चिट्ठाकारी की दुनिया में ‘सरपत’

 लघु फिल्म ‘सरपत’ का प्रसारण अन्त में इतना ही कि २३-२४ अक्टूबर के बाद हिन्दी चिठ्ठाकारी की दुनिया में कुछ नयी बातें होने लगी हैं। मैं यही महसूस कर रहा हूँ कि भविष्य में भी ऐसा कोई आयोजन करने का अवसर मिले तो मैं दुबारा लग जाऊंगा।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

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