नयी कहानी – मोहन बाबू

22 टिप्पणियाँ

मित्रों,

लम्बे अंतराल के बाद आना हुआ। कुछ संयोग ही ऐसा बन पड़ा कि कोलकाता यात्रा का फल अधर में अटक गया और हमारी ब्लॉगरी भी मद्धम पड़ गयी। फिल्म अभिनेता उत्तम कुमार जी की पत्नी सुप्रिया जी का जो मकान हम क्षेत्रीय केंद्र के लिए पसन्द कर आये थे उसे ज्यादा किराया देकर किसी बैंक ने हथिया लिया। हमारी मेहनत व्यर्थ हो गयी।

पिछली पोस्ट में जो चित्र पहेली पूछी गयी थी उसका सही जवाब कोलकाता वासी मनोज कुमार जी ने दे दिया था। उम्मीद के मुताबिक ही कुछ लोग गलत लेकिन बेहद रोचक जवाब के साथ भी आये। वैसे तो हम गर्मियों में काले पके हुए जामुन का फल सीधे पेड़ से तोड़कर खाने का मजा ले चुके हैं लेकिन मुझे यह फल इस रूप में पहली बार कोलकाता में ही देखने को मिला। कौतूहलवश मैने इसे सौ रूपये किलो की दर से खरीद तो लिया लेकिन इसे मेज पर सजाने और फोटू खींचने में ही अच्छा लगा। खाने में तो यह बिल्कुल बेस्वाद और फीका ही था। अलबत्ता इसमें बीज नहीं होने से इसे बुजुर्गों और बिना दाँत वालों को आसानी से खिलाया जा सकता है।

080520111145जी हाँ, यह जामुन का फल है जो मुझे कोलकाता में मिला 080520111146इसमें कोई बीज नहीं है, न ही कोई स्वाद या मिठास ही

 

पिछली रामकहानी को यहीं विराम देते हुए आज पेश कर रहा हूँ बिल्कुल ताजी लिखी कहानी। इतना बताता चलूँ कि इस कहानी के पात्र मेरी कल्पना की उपज हैं। यदि कोई वास्तविक घटना या किसी व्यक्ति की कहानी इससे मिलती-जुलती पायी जाय तो इसे मात्र संयोग समझा जाय।

कहानी
मोहन बाबू

राम मोहन सक्सेना के भाग्य को सराहने वालों की कमी नहीं थी। वे थे तो राज्य सरकार के आबकारी महकमें के एक अदने से मुलाजिम लेकिन इस छोटी सी नौकरी से उन्होंने काफी अच्छी हैसियत बना ली थी। उनके दोनो बेटे अपनी पढ़ाई में अव्वल रहे और इन्जीनियरिंग कॉलेज से निकलकर बड़ी कंपनियों में मोटा पैकेज पा चुके थे। बड़े बेटे ने तो अमेरिका जाकर एम.बी.ए. कोर्स पूरा किया और अपनी कंपनी का सी.ई.ओ. हो गया था। बेटियों ने मेडिकल की पढ़ाई की। एम.बी.बी.एस. पूरा कराने के बाद मोहन बाबू ने उनकी पसंद की शादी कर दी। बड़ा दामाद जर्मनी में सरकारी मेडिकल रिसर्च इन्स्टीट्यूट में ज्वाइंट डाइरेक्टर था और छोटा दामाद आस्ट्रेलिया में सिविल सर्जन था।

जब छोटे बेटे प्रशांत ने विदेशी नौकरी के बजाय भारत में ही विप्रो की नौकरी चुनी तो पूरे स्टाफ ने मोहन बाबू को बधाई दी। माँ-बाप की देख-भाल के लिए बेटे द्वारा किये गये इस त्याग की सर्वत्र सराहना हुई।

आबकारी दफ़्तर में मोहन बाबू बड़ा से बड़ा काम भी अपनी लगन और सूझ-बू्झ से आसान बना देते। उन्होंने कभी किसी का दिल नहीं दुखाया। सबसे बड़ी विनम्रता से मिलते, उच्चाधिकारियों के आगे हाथ जोड़े रहते।  दफ़्तर में चारो ओर उनकी पूछ थी। मंत्री जी का दौरा हो या कलेक्टर साहब के घर होली की पार्टी हो, बड़े साहब लोगों के घर शादी-ब्याह में रंग जमाने का इन्तजाम करना हो या विभागीय समीक्षा बैठक में लक्ष्यों की पूर्ति का आँकड़ा तैयार करना हो, मोहन बाबू को ऐसा कोई भी काम सौंपकर अधिकारी आश्वस्त हो जाते कि विभाग की इज्जत रह जाएगी। वे हर काम इतनी चतुराई से करते कि विभाग की धाक तो जमती ही, खर्चा-पानी में से काफी कुछ बचा भी लेते। हर ठेकेदार मोहन बाबू के इशारे की ताक में रहता। रहे भी क्यों न, साहब लोग किसी भी फाइल का निपटारा उनकी राय के बिना नहीं करते थे। विभाग में नियुक्त आबकारी इन्स्पेक्टर मनचाहा हल्का पाने के लिए मोहन बाबू को ही खुश करने की जुगत भिड़ाते रहते। उनकी व्यवहार कुशलता और काबिलियत के कारण मंत्री जी भी उन्हें बखूबी पहचानने लगे थे। मोहन बाबू इस नजदीकी का फायदा भी मौके-बेमौके उठा लेते।

इन्ही जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए मोहन बाबू ने राजधानी के सबसे विकसित (पौश) इलाके में एक आलीशान महलनुमा घर खड़ा कर लिया था। शहर और गाँव में अनेक जमीनें खरीद डालीं। कितनों को नौकरी दिलवायी, ठेके में लगवाया। समृद्धि के सभी साधन जुटा लिए। जब मोहन बाबू की पत्नी कैंसर का शिकार होकर असमय चल बसीं तो उनके अंतिम संस्कार में पूरा शहर उमड़ पड़ा। जाने कितने मंत्री, विधायक, आइ.ए.एस. और पी.सी.एस. अफसर उनकी मातमपुर्सी में आये। बारह-तेरह दिन तक लाल-नीली बत्ती वाली गाड़ियों का आना-जाना लगा रहा। मोहन बाबू का संपर्क कितना विस्तृत और कितना प्रभावशाली था यह पहली बार सबके सामने प्रकट हो रहा था। विदेश से बड़ा बेटा सपरिवार आया था। अमेरिकन बहू और उसके सफ़ेद बालों वाले बच्चे सबकी विस्मृत निगाहों के केंद्र में थे। दोनो बेटियाँ भी अपने-अपने पति व बच्चों के साथ आयीं थीं। इन सबकी आव-भगत में दफ़्तर का अमला और छोटा बेटा प्रशांत लगा रहा। पहली बार पूरा घर भरा हुआ था। सबने खूब तस्वीरें खींचीं, वीडियो बनायी और तेरहवीं बीत जाने के बाद सभी अपने-अपने देश काम पर लौट गये।

मोहन बाबू ने भौतिक संसार की सभी सहूलियतें अपनी मेहनत और चतुराई से अर्जित कर ली थीं। यद्यपि मधुमेह, रक्तचाप और हृदयरोग की परेशानी नौकरी के अंतिम वर्षों में शुरू हो गयी थी, फिर भी वे सफलतापूर्वक सेवारत रहने के बाद अपनी अधिवर्षता आयु पूरी करके धूमधाम से सेवानिवृत्त हुए।

mohan babuविदाई समारोह में विभागीय सहकर्मियों ने मोहन बाबू को गुलाब और गेंदें की फूलमालाओं से लाद दिया। अधिकारियों ने इन्हें खूब सराहा और भविष्य का जीवन सुखमय और सानंद होने की शुभकामनाएँ दीं। जब सभी बोल चुके तो अंत में कार्यक्रम के संचालक और कर्मचारी संघ के अध्यक्ष ने मोहन बाबू से आशीर्वाद स्वरूप दो शब्द बोलने और अपने अनुभव के आधार पर छोटे भाइयों का मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया। माइक पर मोहन बाबू ने भावुक भाषण दिया। सरकारी सेवा में अनुशासन, कर्तव्यपरायणता, सच्चाई, ईमानदारी, और विनम्रता के महत्व पर प्रकाश डाला और यह कहते हुए लगभग रो पड़े कि कल से जब मैं दफ़्तर आने के बजाय घर पर अकेला बैठ रहूँगा तो जीवन शायद बहुत कठिन हो जाएगा। लोगों ने उन्हें ढाँढस बँधाया और जरूरत पड़ने पर किसी को भी याद कर लेने की सलाह दी। मन बहलाने के लिए जब जी चाहे दफ़्तर आ जाने को कहा। चलते-चलते भेंट स्वरूप लाल कपड़े में लपेटकर गीता की पुस्तक व नक्काशीदार पॉलिश की हुई चमचमाती छड़ी दी गयी और रेशमी शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। उन्हें विभागीय कार से घर तक छोड़ा गया। कार के बोनट पर सैकड़ों फूलमालाएँ लाद दी गयीं थी।

पिता की सेवानिवृत्ति की खबर पाकर बेटियों ने फोन पर ‘विश’ किया। बड़े बेटे को वीक-एंड में फुर्सत मिली तो अमेरिका से एक घंटे तक बात करता रहा। उसने अपनी पत्नी और बच्चों से भी बात कराया। सबने ‘कांग्रेट्स’ और ‘टेक-केयर’ कहा। प्रशांत ने भी बंगलुरू से लखनऊ का बिजनेस टूर बनाया और पिता को अपनी सेहत का ख्याल रखने और फोन पर बात करते रहने की ताकीद कर गया। कंपनी में रिसेसन की वजह से छँटनी की कार्यवाही की संभावना की चर्चा की और जल्दी ही इस बारे में डिटेल में बात करने का वादा करके वापस चला गया। मोहन बाबू अपने आलीशान बंगले में अकेले रह गये।

नौकरानी समय से आती और झाड़ू-बुहारू करके व खाना बनाकर ढककर चली जाती। मोहन बाबू सुबह उठकर पार्क में टहलने जाते और दिनभर बेटे-बेटियों के फोन का इन्तजार करते और अखबार पढ़ते। समय के साथ फोन काल्स की आवृत्ति घटती जाती। सबकी अपनी-अपनी व्यस्तता थी जो लगातार बढ़ती जा रही थी। इसी बीच एक दिन प्रशांत ने फोन पर बताया कि उसकी विप्रो से छुट्टी हो गयी है और वह कनाडा की एक कंपनी में सीनियर सॉफ़्टवेयर एनलिस्ट के बड़े पैकेज पर ज्वाइन करने के लिए टोरंटो की फ्लाइट पकड़ने जा रहा है। सबकुछ इतना जल्दी हुआ कि उसे सोचने और बताने का मौका ही नहीं मिला। अभी वह अकेले जा रहा है। सब कुछ ठीक रहा तो तीन महीने बाद पत्नी और बच्चे को भी ले जाएगा। तबतक वे बंगलुरू में कंपनी के फ़्लैट में ही रह लेंगे।

तीन महीने बाद प्रशांत एक दिन के लिए अपनी पत्नी और दो साल के बच्चे के साथ आया और पिता को ढाढस बँधाकर कनाडा चला गया। उसने यह कहा कि जब भी कोई जरूरत हो वे निस्संकोच उसे फोन करके बता दें। वह हर संभव कोशिश करके उनकी मदद करेगा। उधर प्रशांत कनाडा पहुँचा और इधर मोहन बाबू बीमार रहने लगे। इनके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी इसलिए इलाज कराते रहे। बेटों को इसकी खबर नहीं होने दी। फोन पर बातचीत का सिलसिला दैनिक से साप्ताहिक और फिर पाक्षिक स्तर पर चला गया। आत्मीयता का स्थान औपचारिकता लेती गयी। बड़े बेटे से तो महीने में एकाध बार ही बात हो पाती।

इसी बीच एक घटना ने मोहन बाबू को हिला दिया। उनके पड़ोस में अकेले रह रहे एक सेवानिवृत्त आई.ए.एस. अधिकारी की रहस्यमय मौत घर के भीतर हो गयी थी और इसका पता तब चला जब उनकी लाश की बदबू अड़ोस-पड़ोस तक फैलने लगी। इस बात की आशंका जतायी गयी कि उनकी हत्या घर के नौकर ने ही कर दी थी। विदेश में रह रहे बेटों को अपने पिता के अंतिम दर्शन का अवसर भी नहीं मिला था। एक एन.जी.ओ. द्वारा उनका अंतिम क्रिया-कर्म किया गया। बेटे उनका अस्थि-कलश लेने के लिए ही पहुँच सके थे। मोहन बाबू ने जब दबी जुबान से इस घटना की जानकारी अपने छोटे बेटे को दी तो उसने फौरन इंटरनेट से शहर में उपलब्ध ‘ओल्ड-एज-होम’ सर्च किया और ऑनलाइन बुकिंग करते हुए सबसे मंहगी सुविधाओं से लैस वृद्धाश्रम में मोहन बाबू को शिफ़्ट करा दिया।

अब मोहन बाबू की देखभाल प्रशिक्षित नर्सों के हाथ से होने लगी। विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ.मिश्रा रुटीन चेक-अप करते और खान-पान की व्यवस्था भी विशेषज्ञ परामर्श के अनुसार की जाने लगी। इन सबके बावजूद मोहन बाबू की सेहत सुधरने का नाम नहीं ले रही थी। वे फोन पर प्रशांत से अपनी तकलीफ़ बताने से परहेज करते। प्रशांत की कम्पनी पहले मुश्किल दौर से गुजर रही थी लेकिन इसके काम सम्भालने के बाद उसकी स्थिति सुधरने लगी थी। प्रबंध-तंत्र उसपर बहुत प्रसन्न था और तरक्की की लालच देकर उससे दोगुनी मेहनत करा रहा था। उसने दिन-रात मेहनत कर अपनी स्थिति मजबूत करने की धुन में पिता की बातों में छिपे दर्द को अनसुना कर दिया। उनकी देखभाल कर रहे डॉ.मिश्रा से पूछकर अच्छी से अच्छी दवाएँ चलाते रहने का अनुरोध करता और पैसे की चिन्ता न करने की बात कहता। पैसे की कमी तो वहाँ वैसे भी नहीं थी।

अंततः मोहन बाबू ने बिस्तर पकड़ लिया। साँस मद्धम पड़ने लगी। जीवन रक्षक उपकरण लगा दिए गये। वेन्टीलेटर लग गया। कृत्रिम ऑक्सीजन दी जाने लगी। नियमित डायलिसिस होती रही। प्रशांत लगातार डॉ.मिश्रा से हाल-चाल लेता रहा। एक दिन डॉ.मिश्रा ने बताया कि अब आखिरी समय नजदीक आ गया है। सभी उपाय आजमाये जा चुके हैं लेकिन सुधार नहीं हो रहा है। सभी इंद्रियाँ शिथिल पड़ गयी हैं। मोहन बाबू अधिक से अधिक दो सप्ताह के मेहमान हैं। प्रशांत ने अपने कंपनी मालिकों से बताया- पिता के जीवन के आखिरी पंद्रह दिन उनके साथ रहने के लिए और अगले पंद्रह दिन अंतिम क्रिया-कर्म के लिए चाहिए थे। प्रबंधन ने एक महीने की छुट्टी मंजूर कर दी। प्रशांत स्वदेश पिता को देखने चल दिए।

जूते बाहर निकाल आई.सी.यू. का दरवाजा खोलकर प्रशांत ने भीतर प्रवेश किया तो मोहन बाबू आँखें बंद किए बेसुध पड़े थे। इन्होंने धीरे से ‘पापा’ ‘पापा’ की आवाज लगायी। मोहन बाबू के हाथों में हरकत हुई। फिर उन्होंने धीरे से आँखे खोली। सामने बेटे को देखकर आँखों में अजीब चमक लौट आयी। उन्होंने आशीर्वाद में हाथ उठाने की चेष्टा की लेकिन ज्यादा सफल नहीं हुए। हाथ जरा सा उठने के बाद एक ओर लुढ़क गया। बेटे ने उनका हाथ थाम लिया। थोड़ी ही देर में उन्होंने इशारे से बैठने की इच्छा व्यक्त की। नर्स की मदद से प्रशांत ने बिस्तर में लगे हाइड्रॉलिक सिस्टम का प्रयोगकर बिस्तर एक ओर से उठा दिया। अब मोहन बाबू के शरीर में हरकत लौट आयी थी। वे बोल नहीं पा रहे थे लेकिन उनकी सजल आँखे चिल्ला-चिल्लाकर बता रही थीं कि बेटे के पास बैठना उनके लिए सबसे बड़ी दवा थी। डॉ. मिश्रा ने खिड़की से जब यह चमत्कार देखा तो सामने टंगे कैलेंडर पर सिर झुकाए बिना न रह सके।

एक सप्ताह बाद मोहन बाबू उठ खड़े हुए और दूसरे सप्ताह का अंत आते-आते बेटे के साथ पार्क तक टहलने लगे। दवाएँ अब अपना असर दिखाने लगीं थीं। प्रशांत को आये पच्चीस दिन हो गये थे। शाम को दोनो टहलने के बाद पार्क में लगी बेंच पर बैठकर आपस में बातें कर रहे थे। तभी मोबाइल की घंटी बजी। कनाडा से प्रशांत के बॉस का फोन था-

हेलो सर… गुड मॉर्निंग टु यू…

नो सर, हियर इट्ज़ इवनिंग, …वेरी गुड वेथर इन डीड

नो सर, दैट्स नॉट द केस… थिंग्स अर नॉट गोइंग माइ वे…

नो सर, आई मे नॉट बी फ्री बाई दिस वीक एन्ड… आई ऐम एक्ट्रीम्ली सॉरी सर…

नो, नो, ही इज़ स्टिल एलाइव सर, आइ कांट हेल्प… आइ ऐम सॉरी

येस सर, इ्ट हैज़ सरप्राइज़्ड मी टू सर… डॉ.मिश्रा इज़ आलसो परटर्ब्ड, ही सेड इट वाज़ ए गॉन केस बट…

येस सर, इट्ज़ अनफॉर्चुनेट फ़ॉर मी टू. आइ एम इक्वली कन्सर्न्ड विथ आवर कम्पनीज़ इन्टरेस्ट्स सर…

इसके बाद प्रशांत बेंच पर से उठकर थोड़ी दूर चला गया। अपने बॉस को समझाता रहा कि कैसे उसकी योजना फेल हो गयी। पिता के रोग ने उसे ‘धोखा’ दे दिया। यह भी कि वह उन्हें समझाने की कोशिश करेगा कि वह एक महीने से ज्यादा कतई नहीं रुक सकता। उसका हाव-भाव यह बता रहा था कि बॉस बेहद नाराज है और प्रशांत उससे गिड़गिड़ा रहा है।

बार-बार ‘सॉरी’ और ‘आइ विल ट्राई’ की आवाज मोहन बाबू के कानों तक पड़ती रही। अचानक उन्हें सीने में दर्द महसूस हुआ और जोर की हिचकी आयी। प्रशांत जब आधे घंटे बाद माथे पर पसीना पोंछते बेंच की ओर वापस लौटा तो मोहन बाबू का सिर एक ओर लुढक गया था और शरीर ठंडा पड़ चुका था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Advertisements

कोलकाता यात्रा का फल

22 टिप्पणियाँ

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के लिए एक किराये का मकान खोजने के लिए हम कोलकाता गये थे। जी हाँ, वर्धा (महाराष्ट्र) में खुले इस विश्वविद्यालय का एक क्षेत्रीय केंद्र इलाहाबाद में तथा एक कोलकाता में खोले जाने हेतु केंद्र सरकार की ओर से इस साल अनुदान की घोषणा वित्त मंत्री के बजट भाषण में की गयी थी। इस स्वीकृति की प्रत्याशा में इलाहाबाद केंद्र तो दो साल पहले ही प्रारंभ कर दिया गया था; लेकिन इस साल अब कोलकाता में  भी वर्धा ने दस्तक दे दी है।

कोलकाता जाने पर हमें सबसे पहले इस बात की खुशी हुई कि शिव कुमार मिश्र जी से भेंट होने वाली थी। सूचना पाते ही वे ढाकुरिया ब्रिज के पास स्थित आइ.सी.एस.आर. के गेस्ट हाउस आ गये। यूँ तो इंटरनेट पर ब्‍लॉगजगत में उनका जो ऊँचा कद दिखायी देता है वह उनकी  जोरदार लेखनी से संबंध रखता है। लेकिन कोलकाता में मेरे प्रत्यक्ष जब वे आये तो मुझे उनका शारीरिक कद देखकर अपने मन में बनी उनकी तस्वीर को रिवाइज़ करना पड़ा। मैने पता नहीं कैसे उनकी जो तस्वीर मन में बना रखी थी वह एक शानदार व्यंग्यकार ब्‍लॉगर की तो थी लेकिन एक लंबे कद वाले आदमी की नहीं थी।

हम देर तक बातें करते रहे। गेस्ट हाउस वालों ने चाय की आपूर्ति में पर्याप्त विलम्ब किया लेकिन हम उससे परेशान दिखते हुए भी मन ही मन खुश हुए जा रहे थे कि इसी बहाने कुछ देर तक साथ बैठने को मिलेगा।

lava se 034

अंततः हमें बताया गया कि एक मकान देखने जाने के लिए गाड़ी आ गयी है और ‘खोजी समिति’ के बाकी सदस्य तैयार हो चुके हैं तो हम इस वादे के साथ उठे कि अगले दिन गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर पर आयोजित सेमिनार के उद्‌घाटन में फिर मिलेंगे। अगले दिन हम मिले और दिनभर उस विलक्षण सेमिनार में विद्वान वक्ताओं को सुनते रहे। सबकुछ इतना रोचक था कि शिव जी  को अपने ऑफिस जाने का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। वे तो प्रो.गंगा प्रसाद विमल को सुनने के लिए अगले दिन भी आने का वादा करके गये लेकिन शायद कुछ लिखने-पढ़ने में व्यस्त हो गये।

हमने कोलकाता में आने से पहले ही यहाँ के दो अखबारों में इस आशय का विज्ञापन प्रकाशित कराया था  कि क्षेत्रीय केंद्र खोलने के लिए किराये के भवन की आवश्यकता है। इच्छुक भवन स्वामी संपर्क करें। इसके नतीजे में चार लोगों ने पत्र भेजकर मकान देने का प्रस्ताव दिया था। जब हम इन लोगों से मिले तो पता चला कि असली भवन स्वामी को पता ही नहीं है कि उनके भवन को किराये पर दिये जाने की बात हमसे चल रही है। जिनलोगों ने हमसे सम्पर्क किया था वे सभी कमीशन एजेंट निकले जिसे आमतौर पर दलाल या ब्रोकर के रूप में ख्याति प्राप्त है। इन सबने मिलकर हमें खूब टहलाया। एक से एक विशाल भवनों में ले गये और खाली हिस्सों को दिखाया। एक नौ मंजिला भवन तो ऐसा था जिसमें एक लाख साठ हजार वर्गफीट कार्पेट एरिया होना बताया गया। एक-एक फ्लोर इतना बड़ा था कि 20-T मैच हो जाये। लेकिन किराया सुनकर हम भाग खड़े हुए।  उस बिल्डिंग से  इस बिल्डिंग और इस मंजिल से उस मंजिल जाते-आते हमारा थकान से बुरा हाल हो गया; लेकिन काम    लायक जगह नहीं मिली। कोलकाता में किरायेदारी इतनी महंगी होगी इसका हमें अंदाज  ही नहीं था।

अगले दिन हमारे खोजी दल के एक सदस्य और कोलकाता केंद्र  के प्रभारी पद पर तैनात किये गये डॉ. कृपाशंकर चौबे जी ने हमें महाश्वेता देवी से मिलवाया। आदिवासियों की सेवा और संरक्षण में अपना जीवन तपा देने वाली महाश्वेता जी को देखकर हमारे लिए समय थोड़ीदेर के लिए रुक सा गया। इतने बड़े-बड़े पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित जिस व्यक्ति से हम मिल रहे थे वे सादगी व सरलता की प्रतिमूर्ति बनी एक टेबल लैंप की रोशनी में किताबों के बीच डूबी हुई मिलीं और हम उन्हें अपनी नंगी आँखों से प्रत्यक्ष देख रहे थे। कोई बनावटीपन नहीं था उस घर में। कृपा जी उनके मुँहलगे से जान पड़े।  दूध वाली चाय मांगने लगे; बल्कि जिद करने लगे लेकिन मिली काली चाय ही। उतनी देर को दूध भला कहाँ से आता! कृपा जी बताने लगे कि कैसे एक बार दिल्ली में महाश्वेता जी से मिलने एक्सप्रेस समूह में सम्पादक बने अरुण शौरी और राजेन्द्र माथुर के साथ वे उनके घरपर गये। वहाँ आदिवासियों को बाँटने  के लिए बोरों में तमाम जीवनोपयोगी सामग्री  भरी जा रही  थी। सामान अधिक था और भरने वाले आदमी कम थे। दीदी ने इन लोगों को भी बोरा भरने पर लगा दिया। कुछ ही देर में जब ये पसीना-पसीना हो गये तो बोले-दीदी काम पूरा हो गया। इसपर दीदी ने कुछ और बोरे और सामान मंगा दिये। थोड़ी देर बाद बताया गया कि इन पत्रकार सम्पादकों को वापस फ्लाइट पकड़ने जाना है तो दीदी ने उनकी वहीं से छुट्टी कर दी। मतलब  आदिवासियों के लिए बोरा भरे जाने से अधिक महत्वपूर्ण कोई काम ही नहीं सूझा था इन्हें।

कोलकाता केंद्र के लिए किराये के मकान की समस्या महाश्वेता जी से बतायी गयी। उन्होंने तत्काल फोन उठाया और एक-दो जगह बात की। अगले दिन साढ़े दस बजे एक फ़्लैट देखने का कार्यक्रम तय हो गया।

अगले दिन हम जहाँ गये वह फिल्म अभिनेता स्व. उत्तम कुमार का घर था। बांग्ला फिल्मों के सुपर स्टार जिन्होंने हिंदी में भी  कुछ यादगार फ़िल्में   की थी; जैसे-अमानुष। उनकी पत्नी भी बांग्‍ला फिल्मों की मशहूर हिरोइन हुआ करती थीं। नाम था सुप्रिया मुखर्जी। इन्हीं सुप्रिया जी से हमारी भेंट हुई वहाँ। उत्तम कुमार जी के   भांजे और स्वयं एक अभिनेता जय मुखर्जी भी हमें मिले। उनसे बात हुई तो लगा कि इस शानदार अपार्टमेंट में हमारा केंद्र स्थापित हो सकता है। शर्त बस यह है कि कोलकाता नगर निगम इस रिहायशी मकान का प्रयोग  शैक्षणिक गतिविधियों के लिए करने का लाइसेन्स दे दे। भारतीय भाषा परिषद के भवन से सटा हुआ यह भवन निश्चित रूप से हिंदी विश्वविद्यालय की गतिविधियों के लिए सर्वथा अनुकूल है। सुप्रिया जी की अवस्था अस्सी से ऊपर की हो चुकी है लेकिन उनके चेहरे पर वह स्मित मुस्कान अभी भी पहचानी जा सकती थी जो उनके ड्राइंग रूम में लगी पुरानी फिल्मी तस्वीरों   में उनके चेहरे पर फब रही थी। हमने वहाँ जा कर अपने को धन्य महसूस किया। अलबत्ता संकोच के  मारे हम उनकी तस्वीरें नहीं ले सके जिसकी इच्छा हमें लगातार होती रही।

कोलकाता यात्रा में हमें ऐसा फल प्राप्त होगा इसकी तो हमने कल्पना तक नहीं की थी। जब चले थे तो बहुत कुछ देखने और घूमने का मंसूबा बनाया था लेकिन एक अदद मकान की खोज और सेमिनार में शिरकत के अलावा कहीं आने जाने का मौका ही नहीं मिला। फिर भी हम खुशी-खुशी लौट आये। जितना मिला वह भी कम नहीं है।

लगे हाथों एक चित्र पहेली भी पूछ लेता हूँ। इसके बारे में मैं भी कुछ खास नहीं जानता हूँ। आप में से कोई जानता होगा तो जरूर बतायेगा यही उम्मीद है। तो बताइए यह क्या है जो एक खड़ा और एक औंधा पड़ा है-

 guess-what

यदि कोई इतना भी नहीं बता पाया जितना मैं जानता हूँ तो अगली पोस्ट में उतना मैं बता दूंगा। धन्यवाद।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

प्रेमचंद को दुबारा पढ़ना…

16 टिप्पणियाँ

शिक्षा के प्राथमिक स्तर से लेकर उच्‍च स्तर तक कोई ऐसा हिंदी पाठ्यक्रम नहीं होगा जिसमें प्रेमचंद की कोई न कोई रचना सम्मिलित न की गयी हो। मुझे याद है जब मैं आठवीं में पढ़ रहा था तो कहानियाँ पढ़ने का नशा जोरों पर था। कोर्स की किताबें ताख पर रखकर कहानियों का रसपान करना अच्छा लगता था। प्रेमचंद की कहानियाँ तो इतनी सुहातीं कि जब भी मुझे कहीं से कुछ निजी पैसे मिल जाते तो उनकी मंजिल इन किताबों की दुकान ही होती। जब मुझे अपने सबसे बड़े भाई की शादी में ‘सहबाला’ बनने पर ‘परछावन’ के रूप में अच्छे पैसे मिल गये तो मैंने अगले दिन मानसरोवर के पाँच खंड एक साथ ही खरीद लिए। गर्मी की छुट्टियाँ थीं। गाँव के बच्चे जब आम का टिकोरा बीनने के लिए बाग में पेड़ों के चक्‍कर लगा रहे होते तो मैं एक पेड़ के नीचे बने मचान पर बैठा मानसरोवर निपटा रहा होता।

तब जल्द से जल्द सारी कहानियाँ बाँच लेने का कीर्तिमान बनाने की सनक सी सवार थी। उन्हीं दिनों गोदान, गबन, रंगभूमि, कर्मभूमि, सेवासदन, आदि भी पढ़ डाले। मेरे शिक्षक पिता उन किशोरों व नौजवानों पर बहुत कुढ़ते थे जो लुग्दी कागज पर छपने वाले गुलशन नंदा, सुरेन्द्र मोहन पाठक और केशव पंडित जैसे लेखकों के मोटे-मोटे मसालची उपन्यास पढ़ते थे। लेकिन मेरी लत पर वे कुछ नहीं कह पाते क्योंकि प्रेमचंद पर एतराज करते भी तो कैसे…? अबसे पच्‍‍चीस-तीस साल पहले इन कहानियों  और उपन्यासों को पढ़ने पर जो आनंद मिला वह इन कहानियों में निहित घटनाओं की किस्सागोई का ही आनंद था। किसी विमर्श या सामाजिक मुद्दे पर लेखक के दृष्टिकोण या शिल्प इत्यादि की बात हम सोच भी नहीं पाते थे। उस समय की सामाजिक संरचना में विद्यमान बिडंबनापूर्ण स्थितियों का जो मार्मिक वर्णन इन रचनाओं में है तब उसकी समझ मुझे प्रायः नहीं थी।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की साहित्यिक वेबसाइट हिंदीसमय.कॉम पर प्रेमचंद का समग्र साहित्य अपलोड करने का कार्य अपने अंतिम चरण में है। इस साइट से जुड़ने के बाद मुझे भी उत्कृष्ट साहित्य का आस्वादन करने के सुखमय अनुष्ठान में हाथ बँटाने का अवसर मिला है। यहाँ मानसरोवर की कहानियों को दुबारा पढ़ते समय जो अनुपम आनंद मिल रहा है वह इससे पहले नहीं मिला था। मैं तो अब बचपन में पढ़ा हुआ सारा साहित्य दुबारा पढ़ने का मन बना रहा हूँ। आप भी यदि बहुत पहले यह सब पढ़ चुके हैं तो दुबारा पढ़िए। शर्तिया आनंद आएगा। अभी आपको मानसरोवर भाग-8 की एक कहानी “विध्वंस” यहाँ पढ़वाने का लोभसंवरण नहीं कर पा रहा हूँ। आप अन्य कहानियों के लिए इस लिंक पर जा सकते हैं। हमारी कोशिश है कि प्रेमचंद की लिखी सभी कहानियाँ वहाँ आपको निःशुल्क एक स्थान पर मिल सकें।

विध्वंस

कहानी – प्रेमचंद

जिला बनारस में बीरा नाम का एक गाँव है। वहाँ एक विधवा वृद्धा, संतानहीन, गोंड़िन रहती थी, जिसका भुनगी नाम था। उसके पास एक धुर भी जमीन न थी और न रहने का घर ही था। उसके जीवन का सहारा केवल एक भाड़ था। गाँव के लोग प्रायः एक बेला चबैना या सत्तू पर निर्वाह करते ही हैं, इसलिए भुनगी के भाड़ पर नित्य भीड़ लगी रहती थी। वह जो कुछ भुनाई पाती वही भून या पीस कर खा लेती और भाड़ ही की झोंपड़ी के एक कोने में पड़ रहती। वह प्रातःकाल उठती और चारों ओर से भाड़ झोंकने के लिए सूखी पत्तियाँ बटोर लाती। भाड़ के पास ही, पत्तियों का एक बड़ा ढेर लगा रहता था। दोपहर के बाद उसका भाड़ जलता था। लेकिन जब एकादशी या पूर्णमासी के दिन प्रथानुसार भाड़ न जलता, या गाँव के जमींदार पंडित उदयभान पाँडे के दाने भूनने पड़ते, उस दिन उसे भूखे ही सो रहना पड़ता था। पंडित जी उससे बेगार में दाने ही न भुनवाते थे, उसे उनके घर का पानी भी भरना पड़ता था। और कभी-कभी इस हेतु से भी भाड़ बन्द रहता था। वह पंडित जी के गाँव में रहती थी, इसलिए उन्हें उससे सभी प्रकार की बेगार लेने का अधिकार था। उसे अन्याय नहीं कहा जा सकता। अन्याय केवल इतना था कि बेगार सूखी लेते थे। उनकी धारणा यह थी कि जब खाने ही को दिया गया तो बेगार कैसी। किसान को अधिकार है कि बैलों को दिन भर जोतने के बाद शाम को खूँटे से भूखा बाँध दे। यदि वह ऐसा नहीं करता तो यह उसकी दयालुता नहीं है, केवल अपनी हित चिन्ता है। पंडित जी को उसकी चिंता न थी क्योंकि एक तो भुनगी दो-एक दिन भूखी रहने से मर नहीं सकती थी और यदि दैवयोग से मर भी जाती तो उसकी जगह दूसरा गोंड़ बड़ी आसानी से बसाया जा सकता था। पंडित जी की यही क्या कम कृपा थी कि वह भुनगी को अपने गाँव में बसाये हुए थे।

चैत का महीना था और संक्रांति का पर्व। आज के दिन नये अन्न का सत्तू खाया और दान दिया जाता है। घरों में आग नहीं जलती। भुनगी का भाड़ आज बड़े जोरों पर था। उसके सामने एक मेला-सा लगा हुआ था। साँस लेने का भी अवकाश न था। गाहकों की जल्दबाजी पर कभी-कभी झुँझला पड़ती थी, कि इतने में जमींदार साहब के यहाँ से दो बड़े-बड़े टोकरे अनाज से भरे हुए आ पहुँचे और हुक्म हुआ कि अभी भून दे। भुनगी दोनों टोकरे देख कर सहम उठी। अभी दोपहर था पर सूर्यास्त के पहले इतना अनाज भुनना असंभव था। घड़ी-दो-घड़ी और मिल जाते तो एक अठवारे के खाने भर को अनाज हाथ आता। दैव से इतना भी न देखा गया, इन यमदूतों को भेज दिया। अब पहर रात तक सेंतमेंत में भाड़ में जलना पड़ेगा; एक नैराश्य भाव से दोनों टोकरे ले लिये।

चपरासी ने डाँट कर कहा- देर न लगे, नहीं तो तुम जानोगी।

भुनगी- यहीं बैठे रहो, जब भुन जाय तो ले कर जाना। किसी दूसरे के दाने छुऊँ तो हाथ काट लेना।

चपरासी- बैठने की हमें छुट्टी नहीं है, लेकिन तीसरे पहर तक दाना भुन जाय।

चपरासी तो यह ताकीद करके चलते बने और भुनगी अनाज भूनने लगी। लेकिन मन भर अनाज भूनना कोई हँसी तो थी नहीं, उस पर बीच-बीच में भुनाई बन्द करके भाड़ भी झोंकना पड़ता था। अतएव तीसरा पहर हो गया और आधा काम भी न हुआ। उसे भय हुआ कि जमींदार के आदमी आते होंगे। आते ही गालियाँ देंगे, मारेंगे। उसने और वेग से हाथ चलाना शुरू किया। रास्ते की ओर ताकती और बालू नाँद में छोड़ती जाती थी। यहाँ तक कि बालू ठंडी हो गयी, सेवड़े निकलने लगे। उसकी समझ में न आता था, क्या करे। न भूनते बनता था न छोड़ते बनता था। सोचने लगी कैसी विपत्ति है। पंडित जी कौन मेरी रोटियाँ चला देते हैं, कौन मेरे आँसू पोंछ देते हैं। अपना रक्त जलाती हूँ तब कहीं दाना मिलता है। लेकिन जब देखो खोपड़ी पर सवार रहते हैं, इसलिए न कि उनकी चार अंगुल धरती से मेरा निस्तार हो रहा है। क्या इतनी-सी जमीन का इतना मोल है ? ऐसे कितने ही टुकड़े गाँव में बेकाम पड़े हैं, कितनी बखरियाँ उजाड़ पड़ी हुई हैं। वहाँ तो केसर नहीं उपजती फिर मुझी पर क्यों यह आठों पहर धौंस रहती है। कोई बात हुई और यह धमकी मिली कि भाड़ खोद कर फेंक दूँगा, उजाड़ दूँगा, मेरे सिर पर भी कोई होता तो क्या बौछारें सहनी पड़तीं।

वह इन्हीं कुत्सित विचारों में पड़ी हुई थी कि दोनों चपरासियों ने आकर कर्कश स्वर में कहा- क्यों री, दाने भुन गये।

भुनगी ने निडर हो कर कहा- भून तो रही हूँ। देखते नहीं हो।

चपरासी- सारा दिन बीत गया और तुमसे इतना अनाज न भूना गया ? यह तू दाना भून रही है कि उसे चौपट कर रही है। यह तो बिलकुल सेवड़े हैं, इनका सत्तू कैसे बनेगा। हमारा सत्यानाश कर दिया। देख तो आज महाराज तेरी क्या गति करते हैं।

परिणाम यह हुआ कि उसी रात को भाड़ खोद डाला गया और वह अभागिनी विधवा निरावलम्ब हो गयी।

भुनगी को अब रोटियों का कोई सहारा न रहा। गाँववालों को भी भाड़ के विध्वंस हो जाने से बहुत कष्ट होने लगा। कितने ही घरों में दोपहर को दाना ही न मयस्सर होता। लोगों ने जा कर पंडित जी से कहा कि बुढ़िया को भाड़ जलाने की आज्ञा दे दीजिए, लेकिन पंडित जी ने कुछ ध्यान न दिया। वह अपना रोब न घटा सकते थे। बुढ़िया से उसके कुछ शुभचिंतकों ने अनुरोध किया कि जा कर किसी दूसरे गाँव में क्यों नहीं बस जाती। लेकिन उसका हृदय इस प्रस्ताव को स्वीकार न करता। इस गाँव में उसने अपने अदिन के पचास वर्ष काटे थे। यहाँ के एक-एक पेड़-पत्ते से उसे प्रेम हो गया था ! जीवन के सुख-दुःख इसी गाँव में भोगे थे। अब अंतिम समय वह इसे कैसे त्याग दे ! यह कल्पना ही उसे संकटमय जान पड़ती थी। दूसरे गाँव के सुख से यहाँ का दुःख भी प्यारा था।

इस प्रकार एक पूरा महीना गुजर गया। प्रातःकाल था। पंडित उदयभान अपने दो-तीन चपरासियों को लिये लगान वसूल करने जा रहे थे। कारिंदों पर उन्हें विश्वास न था। नजराने में, डाँड़-बाँध में, रसूम में वह किसी अन्य व्यक्ति को शरीक न करते थे। बुढ़िया के भाड़ की ओर ताका तो बदन में आग-सी लग गयी। उसका पुनरुद्धार हो रहा था। बुढ़िया बड़े वेग से उस पर मिट्टी के लोंदे रख रही थी। कदाचित् उसने कुछ रात रहते ही काम में हाथ लगा दिया था और सूर्योदय से पहले ही उसे समाप्त कर देना चाहती थी। उसे लेशमात्र भी शंका न थी कि मैं जमींदार के विरुद्ध कोई काम कर रही हूँ। क्रोध इतना चिरजीवी हो सकता है इसका समाधान भी उसके मन में न था। एक प्रतिभाशाली पुरुष किसी दीन अबला से इतना कीना रख सकता है उसे उसका ध्यान भी न था। वह स्वभावतः मानव-चरित्र को इससे कहीं ऊँचा समझती थी। लेकिन हा ! हतभागिनी ! तूने धूप में ही बाल सफेद किये।

सहसा उदयभान ने गरज कर कहा- किसके हुक्म से ?

भुनगी ने हकबका कर देखा तो सामने जमींदार महोदय खड़े हैं।

उदयभान ने फिर पूछा- किसके हुक्म से बना रही है ?

भुनगी डरते हुए बोली- सब लोग कहने लगे बना लो, तो बना रही हूँ।

उदयभान- मैं अभी इसे फिर खुदवा डालूँगा। यह कह उन्होंने भाड़ में एक ठोकर मारी। गीली मिट्टी सब कुछ लिये दिये बैठ गयी। दूसरी ठोकर नाँद पर चलायी लेकिन बुढ़िया सामने आ गयी और ठोकर उसकी कमर पर पड़ी। अब उसे क्रोध आया। कमर सहलाते हुए बोली- महाराज, तुम्हें आदमी का डर नहीं है तो भगवान् का डर तो होना चाहिए। मुझे इस तरह उजाड़ कर क्या पाओगे ? क्या इस चार अंगुल धरती में सोना निकल आयेगा ? मैं तुम्हारे ही भले की कहती हूँ, दीन की हाय मत लो। मेरा रोआँ दुखी मत करो।

उदयभान- अब तो यहाँ फिर भाड़ न बनायेगी।

भुनगी- भाड़ न बनाऊँगी तो खाऊँगी क्या ?

उदयभान- तेरे पेट का हमने ठेका नहीं लिया है।

भुनगी- टहल तो तुम्हारी करती हूँ खाने कहाँ जाऊँ ?

उदयभान- गाँव में रहोगी तो टहल करनी पड़ेगी।

भुनगी- टहल तो तभी करूँगी जब भाड़ बनाऊँगी। गाँव में रहने के नाते टहल नहीं कर सकती।

उदयभान- तो छोड़ कर निकल जा।

भुनगी- क्यों छोड़ कर निकल जाऊँ। बारह साल खेत जोतने से असामी काश्तकार हो जाता है। मैं तो इस झोंपड़े में बूढ़ी हो गयी। मेरे सास-ससुर और उनके बाप-दादे इसी झोंपड़े में रहे। अब इसे यमराज को छोड़ कर और कोई मुझसे नहीं ले सकता।

उदयभान- अच्छा तो अब कानून भी बघारने लगी। हाथ-पैर पड़ती तो चाहे मैं रहने भी देता, लेकिन अब तुझे निकाल कर तभी दम लूँगा। (चपरासियों से) अभी जा कर उसके पत्तियों के ढेर में आग लगा दो, देखें कैसे भाड़ बनता है।

एक क्षण में हाहाकार मच गया। ज्वाला-शिखर आकाश से बातें करने लगा। उसकी लपटें किसी उन्मत्त की भाँति इधर-उधर दौड़ने लगीं। सारे गाँव के लोग उस अग्नि-पर्वत के चारों ओर जमा हो गये। भुनगी अपने भाड़ के पास उदासीन भाव में खड़ी यह लंकादहन देखती रही। अकस्मात् वह वेग से आ कर उसी अग्नि-कुंड में कूद पड़ी। लोग चारों तरफ से दौड़े, लेकिन किसी की हिम्मत न पड़ी कि आग के मुँह में जाय। क्षणमात्र में उसका सूखा हुआ शरीर अग्नि में समाविष्ट हो गया।

उसी दम पवन भी वेग से चलने लगा। ऊर्ध्वगामी लपटें पूर्व दिशा की ओर दौड़ने लगीं। भाड़ के समीप ही किसानों की कई झोंपड़ियाँ थीं, वह सब उन्मत्त ज्वालाओं का ग्रास बन गयीं। इस भाँति प्रोत्साहित होकर लपटें और आगे बढ़ीं। सामने पंडित उदयभान की बखार थी, उस पर झपटीं। अब गाँव में हलचल पड़ी। आग बुझाने की तैयारियाँ होने लगीं। लेकिन पानी के छींटों ने आग पर तेल का काम किया। ज्वालाएँ और भड़कीं और पंडित जी के विशाल भवन को दबोच बैठीं। देखते ही देखते वह भवन उस नौका की भाँति जो उन्मत्त तरंगों के बीच में झकोरे खा रही हो, अग्नि-सागर में विलीन हो गया और वह क्रंदन-ध्वनि जो उसके भस्मावशेष में प्रस्फुटित होने लगी, भुनगी के शोकमय विलाप से भी अधिक करुणाकारी थी।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)   

स्वस्थ और ईमानदार मीडिया मात्र खुशफ़हमी : विभूति नारायण राय

17 टिप्पणियाँ

साबुन की फैक्ट्री चलाने वाली मानसिकता छोड़नी होगी अखबार के मालिकों को…

पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि कैसे एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने अखबार की दुनिया की कथित ‘सच्चाई’ बताते हुए अखबार पढ़ने वालों की प्रतिबद्धता और पत्रकार बिरादरी की शक्तियों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिये थे। उनके बाद हिंदी साहित्य की दुनिया के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर प्रो. गंगा प्रसाद विमल बोलने आये। उन्होंने बिना लाग-लपेट के अखबार मालिकों और संपादकों पर हमला बोल दिया। बोले- आज हमारे बीच अखबारों की संख्या और प्रसार में बहुत वृद्धि हो गयी है लेकिन अखबारों ने आम पाठक की चिंता करना छोड़ दिया है। उन्होंने अपने वक्तव्य में मीडिया जगत पर तीन गम्भीर आरोप लगाये-

  1. अत्यल्प को छोड़कर अधिकांश संपादक बिचौलिए की भूमिका निभा रहे हैं।
  2. अंग्रेजी अखबारों ने भारतीय भाषा के अखबारों के साथ घोर दुष्कृत्य किया है।
  3. एक आम पत्रकार के लिए ‘प्रोफ़ेशनलिज़्म’ का सीधा अर्थ है अपने मालिक के लिए पैसा खींचना।

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि आजकल मनुष्यता का सवाल कहीं नहीं उठाया जा रहा है। एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ क्या व्यवहार होना चाहिए इसपर कुछ उच्‍च आदर्शात्मक (lofty) किस्म की बातें प्राथमिक स्तर की स्कूली किताबों में भले ही मिल जाय लेकिन अखबारों और दूसरी मीडिया से यह गायब हो गयी हैं। आजकल ऊँची तनख्वाह पर काम करने वाले बड़े पत्रकार अपने मालिक के ‘टटके गुलाम’ हो गये हैं। व्यावसायिक हित सर्वोपरि हो गया है। भारत की सांस्कृतिक विरासत को समझना, इसे मिटाने के वैश्विक षड़यंत्र को पहचानना और उसे निष्फल करने के लिए देश को तैयार करने की जिम्मेदारी मीडिया में बैठे बुद्धिजीवियों की है; लेकिन इनके बीच ऐसे लोग घुसे हुए हैं जिनका एजेंडा ही अलग है। आज मीडिया को बाहर से कम चुनौतियाँ दरपेश हैं। भीतर के लोगों से ही खतरा है जिनसे लड़ना जरूरी हो गया है।

इनके बाद बोलने की बारी सत्र की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय की थी। उनके बोलने से पहले श्रोताओं को पूर्व वक्ताओं से प्रश्न करने का अवसर दिया गया। अनेक छात्र तो जैसे इसी पल का इंतजार कर रहे थे। प्रश्नों की झड़ी लग गयी। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ  की ऐसी रूपरेखा की कल्पना कदाचित्‌ आदर्श पत्रकारिता का स्वप्न पाल रहे विद्यार्थियों ने नहीं की होगी। मुनाफ़ा कमाने के हिमायती प्रबंध संपादक को अपनी स्थिति स्पष्ट करने दुबारा आना पड़ा। भारतीय समाज में व्याप्त अन्याय और शोषण के विरुद्ध आम जनता को न्याय दिलाने और उसके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने के माध्यम के रूप में इन समाचार माध्यमों की जवाबदेही के प्रश्नों का उनके पास फिर भी कोई जवाब नहीं था। प्रश्नों का शोर जब थमने का नाम नहीं ले रहा था तब कुलपति जी ने माइक सँभाला।VNRai-last-words

बोले- पूर्व के एक वक्ता की यह धारणा कि चालीस पेज़ के अखबार के लिए दो रूपये देने वाले पाठक कोई हक नहीं रखता सर्वथा ग़लत  है। अखबार मालिक ने अपनी पूँजी जरूर लगा रखी है लेकिन पाठक के stakes अखबार वालों से ज्यादा हैं। उसका पूरा जीवन ही दाँव पर लगा है। वह ज्यादा बड़ा जोखिम उठा रहा है। मार्क ट्वेन को उद्धरित करते हुए उन्होंने कहा- “If you don’t read newspapers, you are uninformed; but if you read newspapers you are misinformed’’

आज जिस ठसक के साथ अखबार के पूँजीपति मालिक के मुनाफ़े के हक में दलील दी जा रही है वह कभी शर्म की बात मानी जाती थी। कोई संपादक या दूसरे बुद्धिजीवी ऐसी बात कहते झेंपते थे। लेकिन अब समय बदल गया है। यह बिडम्बना ही है कि आम जनता में ही दोष निकाले जा रहे हैं। यह वैसा ही है जैसा ब्रेख्त ने कहा था कि राजा अब बदला नहीं जा सकता इसलिए अब प्रजा को ही बदल देना होगा। यह स्थिति कतई ठीक नहीं है। जनता के प्रति अखबार की जिम्मेदारी उस प्रकार की नहीं है जैसी किसी फैक्ट्री मालिक की अपने उत्पाद के ग्राहकों के प्रति।

उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करने के लिए प्रसिद्ध संपादक स्व.राजेंद्र माथुर जी के साथ अपनी एक बहस का हवाला दिया। वृंदावन में आयोजित एक गोष्ठी में राजेन्द्र माथुर जी ने कुछ ऐसे ही विचार रखते हुए कहा था कि एक स्टील कारखाना लगाने वाला उद्योगपति अथवा साबुन की फैक्ट्री चलाने वाला मालिक अपने निवेश पर लाभ कमाने के लिए स्वतंत्र है; लेकिन अखबार निकालने के लिए करोड़ो खर्च करने वाला हमारा मालिक यदि कुछ मुनाफ़ा कमाना चाहता है तो आपको यह बुरा क्यों लगता है? उस समय (1980 के दशक) की परिस्थितियों को देखते हुए यह बड़ा ही साहसिक वक्तव्य था। उनकी इस बात का विरोध उस समय भी हुआ था और आज भी इस तरह की सोच को नकारा जाना चाहिए।

कुलपति जी ने बताया कि स्टील या साबुन का कारखाना चलाने की तुलना में अखबार निकालना एकदम अलग किस्म का कार्य है। यदि किसी कारणवश स्टील या साबुन की फैक्ट्री बंद होने की नौबत आ जाय तो उससे आम जनता आंदोलन नहीं करती। लेकिन अखबार पर यदि किसी तरह की पाबंदी लगती है तो जनता सड़कों पर उतर आती है। राजीव गांधी के जमाने में सेंसरशिप कानून लगाने की कोशिश हुई तो पूरे देश में उबाल आ गया था। मीडिया को जो शक्तियाँ मिली हुई हैं वह इसी पाठक ने दी हैं। दो रूपये में अखबार देकर आप न तो एहसान कर रहे हैं और न ही घाटे में है। आप करोड़ों के विज्ञापन इसी जनता के कारण पाते हैं।

बाद के सत्रों में साधना चैनल प्रमुख व ब्रॉडकास्टिंग एडीटर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी एन.के.सिंह, आईबीएन के वरिष्‍ठ संवाददाता अनन्‍त विजय, दैनिक भास्‍कर के समूह संपादक प्रकाश दूबे, लोकमत समाचार- नागपुर के संपादक गिरीश मिश्र, सुपसिद्ध न्यूज एंकर और स्‍तंभकार पुण्‍य प्रसून वाजपेयी, हिंदुस्तान टाइम्स के प्रदीप सौरभ इत्यादि ने विस्तार से प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की वस्तुनिष्ठता, सामाजिक सरोकार और जिम्मेदारियों को समझने के बारे में सुंदर वक्तव्य दिये।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल और विभूतिनारायण राय द्वारा लगाये गये आरोपों (बिचौलियापन व भ्रष्ट आचरण) पर अनंत विजय ने गम्भीर आपत्ति दर्ज़ करते हुए कहा कि हमारे बारे में इस प्रकार का सामूहिक आरोप लगाने के पहले  आपको सबूत जुटाना चाहिए। आप एक जिम्मेदार पद पर रहते हुए जब भी कुछ कहते हैं तो पूरा देश उसपर ध्यान देता है और अपनी राय बनाता है।

उक्त आपत्ति का जवाब देते हुए कुलपति जी ने अपनी पूरी बात दुहराते हुए अंत में कहा कि इस समय जब हमारे समाज के सभी अंग भ्रष्टाचार की सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं, मैं अपनी उस मूर्खता को कोस रहा हूँ जो एक स्वस्थ और ईमानदार मीडिया की इच्छा रखती है। लेकिन यदि हमने आशावाद नहीं बनाये रखा तो जल्दी ही हम cynical state में चले जाएंगे।

 

इस कार्यक्रम से संबंधित कुछ और रिपोर्टें यहाँ और यहाँ हैं।

Infotainment के दौर में भी नैतिक मूल्यों को बचाये रखना और जीवन से इनके जुड़ाव को रेखांकित करना एक सजग संपादक की जिम्मेदारी है।

प्रो.राम मोहन पाठक, वाराणसी

लोकतंत्र के सारे स्तंभ धराशायी हो रहे हैं, मीडिया भी। पत्रकारों को अपना कैनवास बड़ा करना होगा और विश्वसनीयता (credibility) बनाये रखनी होगी।

पुण्य प्रसून वाजपेयी- ZEE News

द्रौपदी के चीर हरण के समय भीष्म की भाँति यदि आज की मीडिया खामोश रह गयी तो लोकतंत्र की वेदी पर दुबारा महाभारत होगा।

गिरीश मिश्र, संपादक-लोकमत समाचार

ज्यादातर संपादक आजकल मालिक के लिए बिचौलिये की भूमिका निभा रहे हैं। पत्रकार का प्रोफ़ेशनलिज़्म मालिक के लिए पैसा खींचना हो गया है।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल, जे.एन.यू. (से.नि.)

सबको समान रूप से आरोपित करना ग़लत है। मीडिया में अच्छे लोग भी काम कर रहे हैं। टीआरपी के आँकड़े दोषपूर्ण हैं। लाइसेंसिंग प्रक्रिया में सुधार जरूरी।

अनंत विजय- आई.बी.एन.

अब क्षेत्रीय अखबार की परिभाषा बदल रही है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने भाषाई अखबारों का बड़ा नुकसान किया है। मत्स्य न्याय का वातावरण बन गया है।

प्रदीप सौरभ- मीडिया समीक्षक, स्वतंत्र पत्रकार नयी दिल्ली

मीडिया का स्वरूप तकनीक ने बदल दिया है। अब इसकी पहुँच और रफ़्तार दोनो बढ़ चुकी है। हमें इसके साथ तालमेल बिठाना होगा।

प्रो.प्रदीप माथुर, IIMC, N.Delhi

मिशनरी पत्रकारिता का स्थान कमीशनरी पत्रकारिता ने ले लिया है। क्षेत्रीय पत्रकारों से लोग वैसे ही डरते हैं जैसे पुलिस से।

राजकिशोर, स्तम्भकार व राइटर इन रेजीडेंस, वर्धा वि.वि.

संपादक नामक संस्था का क्षरण हो रहा है। अब व्यावसायिक मालिक की महत्ता बढ़ गयी है। पत्रकारों को पैसा अधिक मिल रहा है लेकिन आजादी छिन गयी है।

शीतला सिंह- जनमोर्चा, फैज़ाबाद 

(compulsive corruption) भ्रष्टाचार अब मजबूरी भी हो गयी है। न केवल सरकारी क्षेत्र में बल्कि मिडिया जगत में भी।

सोमनाथ पाटील- सकाळ, पुणे

स्थानीय जरूरतों के हिसाब से मीडिया को अपना स्वरूप बदलना होगा। भविष्य का मीडिया ‘कम्यूनिटी रेडियो’ होगा। इसमें मालिकाना नियंत्रण स्थानीय समूह का ही होगा।

डॉ.गिरिजा शंकर शर्मा, आगरा

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

क्या अखबार का पाठक चिरकुट है…?

12 टिप्पणियाँ

राष्ट्रीय संगोष्ठी में बहस का मुद्दा बना एक प्रबंध संपादक का बयान

देश की प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे थे। विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले प्रोफ़ेसर, बड़े अखबारों के संपादक और न्यूज चैनेल्स के एंकर सिर जोड़कर वर्धा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों और अकादमिकों को मीडिया की असली दुनिया से परिचित करा रहे थे। मिशनरी पत्रकारिता पर बहस चल रही थी। मीडिया द्वारा मिशन छोड़कर व्यावसायिकता की ओर मुड़ जाने पर चिंता व्यक्त की जा रही थी। मीडिया और राडिया के अंतर्सम्बन्ध खंगाले जा रहे थे। तभी एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने यह मंतव्य रखा कि जब एक साबुन की टिकिया के लिए लोग अपना अखबार बदल देते हैं तो उनसे प्रतिबद्धता की उम्मीद क्या की जाय। दो-ढाई रूपये देकर क्या उन्होंने अखबार के मालिक को खरीद लिया है जो उससे मिशन और नैतिकता की अपेक्षा करते हैं?

पाठकों को उक्त प्रकार से चिरकुट बताने से पहले उन्होंने पत्रकारों को भी उनकी औकात बताने की कोशिश की। बोले- आप इस भ्रम में मत रहिएगा कि यह राज-काज आपके भरोसे चल रहा है। आपकी स्थिति उस छिपकली जैसी है जो छत से चिपककर यह भ्रम पाल बैठी है कि इसे उसी ने रोक रखा है; या हाथी की पीठ पर बैठी उस मक्खी की तरह है जो उसे छोड़कर अकेले जंगल में इसलिए नहीं जाने देती कि उसके बिना इसकी (हाथी की) रक्षा नहीं हो सकेगी।

उनके पहले के वक्ताओं ने “मिशनरी पत्रकारिता- संदर्भ और प्रासंगिकता” नामक विषय पर बोलते हुए देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार, माफ़ियागीरी, घोटालों, इत्यादि के परिप्रेक्ष्य में मीडिया की भूमिका पर अनेक सुंदर व्याख्यान दिए थे और भविष्य के मीडियाकर्मियों को उनकी बढ़ती जिम्मेदारियों का बोध कराने का प्रयास किया था। चहुँओर निराशा के घने बादलों के बीच आशा का एक मात्र सूरज समाज के चौथे स्तंभ को बताया गया था। तब प्रबंध सम्पादक जी ने अपनी बात की शुरुआत एक रोचक कहानी से की थी-

बताने लगे- एक वृद्ध मौलवी लैंप पोस्ट के नीचे सड़क पर बहुत देर से कुछ ढूँढ रहा था।  एक नौजवान को उसकी परेशानी देखी नहीं गयी। सहायता करने की गर्ज़ से पूछा- बाबा क्या खोज रहे हो?

“बेटा, मैं अपनी टोपी सी रहा था, अचानक सुई हाथ से गिर गयी। वही ढूँढ रहा हूँ लेकिन मिल नहीं रही है” मौलवी ने तफ़सील से बताया।

“अच्छा बताइए टोपी कहाँ सिल रहे थे और सूई ठीक कहाँ गिरी? मैं खोजता हूँ।” युवक ने सहानुभूति दिखायी।

“बेटा सुई तो मस्ज़िद में गिरी थी लेकिन वहाँ बहुत अंधेरा है इसलिए यहाँ रोशनी में ढूँढ रहा हूँ।”

हाल में ठहाका लगना तय था ही। तालियाँ थमीं तो उक्त वक्ता ने बताया कि आज यहाँ की चर्चा भी कुछ इसी प्रकार की हो रही है। समस्या की असली जड़ जहाँ है उसे कोई नहीं देखना चाहता। सबका समाधान मीडिया से कराना चाहता है। देश की सरकारें भ्रष्ट है, संसद अपना काम नहीं कर पा रही। न्यायालय भी संदेह से परे नहीं रह गये हैं। उद्योगपति तेजी से अपना पैसा बढ़ा रहे हैं। गुप्त गठबंधन हो रहे हैं। हर आदमी लाभ कमाने के उद्यम में लगा है, लेकिन मीडिया को नैतिकता और मिशन का पाठ पढ़ाया जाता है। जब हम मीडिया में प्रोफ़ेशनलिज़्म की बात करते हैं तो इसे गाली समझा जाता है। आजादी से पहले अखबारों ने एक मिशन के साथ काम किया था- देश को गुलामी से मुक्त कराने का मिशन। लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है। आज यह अन्य प्रोफेशन्स की तरह एक पेशा के रूप में क्यों नहीं पहचाना जाना चाहिए? अख़बार या टीवी चैनेल का जो मालिक करोड़ो रुपये का पूँजी निवेश करता है उसे लाभ कमाने के बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए? मात्र दो रूपये में चालीस पृष्ठ का अखबार आपके दरवाजे पर पहुँचाने का प्रबंध करने वाला अखबार मालिक आपके बारे में कितना सोचे जब आप दो रुपये की साबुन की टिकिया पाने के लिए अपना वर्षों पुराना अखबार बदल देते हैं। आपकी कोई प्रतिबद्धता नहीं है तो अखबार चलाने वालों से आप क्या अपेक्षा रखते हैं?

उन्होंने अखबार पहुँचाने वाले हॉकर के प्रति पाठकों के रूखे व्यवहार का वर्णन भी किया कि कैसे वह विपरीत मौसम में भी सुबह छः बजे घर पर अखबार पहुँचाता है और कभी देर हो जाने पर सुबह की चाय का स्वाद खराब कर देने का दोषी बन जाता है। बिना नागा किए तीस दिन अखबार देने के बाद जब वह पैसा लेने पहुँचता है तो महानुभावों को  ‘आज नहीं कल’ का जवाब देते देर नहीं लगती। “ऐसे लोग जब बिना जाने समझे अखबार के मालिक, अखबार के सम्पादक और अखबार के रिपोर्टर पर आरोप लगाते हैं तो मुझे आपत्ति होती है।”

कोई भी व्यवसाय जब प्रारम्भ किया जाता है तो उसकी प्रगति का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। लाभ कमाना एक सर्वमान्य लक्ष्य है। उसके लिए जरूरी उपाय तलाशे जाते हैं और उन्हें अपनाया जाता है। स्वतंत्रता मिलने के बाद पत्रकारिता भी किसी अन्य  व्यवसाय की तरह कुछ लक्ष्यों की पूर्ति के उद्देश्य से आगे बढ़ी। समय के साथ तालमेल बिठा कर चलने वाले सफल हुए। यह कार्य आज भी एक मिशन बना हुआ है, लेकिन इसका स्वरूप बदल गया है। आज पत्रकारिता ‘स्वांतः सुखाय’ नहीं है।

धारा प्रवाह बोलते हुए उन्होंने एक-दो और चुटकुले और आख्यान सुनाये और बोले- यह अजीब स्थिति है कि प्रायः सभी पत्रकार अपने प्रबंधन को कोसते रहते हैं। उनके अनैतिक कार्यों और शोषक प्रवृत्तियों का रोना रोते हैं। लेकिन वे ही जब स्वयं प्रबंधक अर्थात्‌ मालिक बन जाते हैं तो वे सारी मिशनरी बातें हवा हो जाती हैं और वे सभी बुराइयाँ अपना लेते हैं जिन्हें कोसते इनका समय बीता है। फिर उन्होंने जोड़ा कि इन सारी बातों के बावजूद आज भी जब देशहित का मुद्दा उठता है तो देश की पूरी मीडिया एकजुट होकर आवाज उठाती है। उन्होंने इसके कई उदाहरण भी गिना डाले।

अपने को एक अदना सा पत्रकार बताते हुए उन्होंने ‘छोटे-छोटे प्रयासों का महत्व’ रेखांकित करने के लिए उस गिलहरी की कथा सुनायी जिसने समुद्र पर रामसेतु के निर्माण की प्रक्रिया में योगदान कर्ताओं की सूची में अपना नाम लिखाने के लिए बार-बार तट पर लोटपोट कर शरीर में रेत बटोरने और पुल पर जाकर शरीर झाड़ देने का उद्यम किया था। ताकि भविष्य में इतिहास लिखने वाले यह न लिखें कि जब सारा  बानर समाज पुल बना रहा था तो वहाँ मौजूद एक गिलहरी कुछ नहीं कर रही थी। अस्तु कुछ न कुछ यथा सामर्थ्य करते रहना चाहिए। इसके बाद उन्होंने एक जोरदार वीररस की कविता सुनायी। मैं एक ही पंक्ति नोट कर पाया क्योंकि उन्होंने दुहराया नहीं था। हाल को गुँजाने वाली तालियाँ बजीं और अगले वक्ता बुलाये गये।

यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन जब प्रश्न-उत्तर का दौर चला तो प्रबंध-संपादक महोदय को उठकर सफाई देनी पड़ी। छात्र श्रोताओं के तीखे प्रहार वाकई बेचैन करने वाले थे। अंततः कुलपति जी को अध्यक्षीय भाषण में इस मसले पर अंतिम बात कहनी पड़ी। वह बहुत ही मार्मिक और सजग करने वाली बात थी। लेकिन उसकी चर्चा अगली कड़ी में। अभी तो आप उस वीररस की कविता का आनंद लेते हुए इस ‘चिरकुटई के आरोप’ का जवाब दीजिए।

गूगल महराज ने उस एक लाइन का ‘जामन’ लेकर पल भर में अपने क्षीर सागर के भंडार से पूरी कविता की दही परोस कर रख दी।

वह लाइन थी-

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में

इस लंबी कविता के मूल कवि हैं डॉ. हरिओम पवार। इसके आगे पीछे की कुछ और लाइनें यहाँ आपके लिए। पूरी कविता यहाँ है।

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का
कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का
एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है
अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है

जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो
चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो
हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो
गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में
हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं
डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं

जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं
तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की
हमने बूढ़े जे.पी. के आँसू की भी नीलामी की
परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था
भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था

अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर
कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर
अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर
शोकसभाएं कहाँ हुई हैं मजदूरों की लाशों पर

निर्धनता का खेल देखिये कालाहांडी में जाकर
बेच रही है माँ बेटी को भूख प्यास से अकुलाकर
यहाँ बचपना और जवानी गम में रोज बुढ़ाती हैं
माँ , बेटे की लाशों पर आँचल का कफ़न उढाती है

जब तक बंद तिजोरी में मेहनतकश की आजादी है
तब तक हम हर सिंहासन को अपराधी बतलायेंगे
बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

हिंदी में लिखा जा रहा साहित्य प्रायः प्रासंगिक नहीं है

15 टिप्पणियाँ

प्रोफेसर गंगा प्रसाद विमल ने ‘शुक्रवारी’ में रखी बेबाक राय…

शुक्रवारी चर्चा आजकल जबर्दस्त फॉर्म में है। माहिर लोग जुटते जा रहे हैं और हम यहाँ बैठे लपक लेते हैं उनके विचार और उद्‌गार। इस विश्वविद्यालय की किसी कक्षा में मैं नहीं गया ; क्योंकि न यहाँ का विद्यार्थी हूँ और न ही शिक्षक हूँ। लेकिन एक से एक आला अध्यापकों को सुनने का मौका मिल रहा है जो देश और विदेश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों और दूसरे शिक्षा केंद्रों में लंबे समय तक पढ़ाते रहे हैं। विषय भी देश की नब्ज टटोलने वाले। पिछले दिन अशोक चक्रधर जी आये तो कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिंदी की दशा और दिशा पर अपने तीस-चालीस साल के अनुभव बताकर गये। पूरी तरह अपडेटेड लग रहे थे। रिपोर्ट यहाँ है। उसके पहले विनायक सेन को हुई सजा के बहाने नक्सलवादी आंदोलन के हिंसक स्वरूप और मानवाधिकार संबंधी मूल्यों की चर्चा गांधी हिल के मुक्तांगन में हुई। राजकिशोर जी ने अपनी कविता के साथ विनायक सेन का भरपूर समर्थन व्यक्त किया तो कुलपति विभूतिनारायण राय ने स्पष्ट किया कि उनके साथ सहानुभूति रखते हुए भी हम इतना जरूर याद दिलाना चाहेंगे कि आज के जमाने में राजसत्ता को हिंसा के भय से दबाया नहीं जा सकता। किसी हिंसक आंदोलन को समर्थन देना उचित नहीं है। हाँ, मनुष्यता की रक्षा के लिए जरूरी है कि विनायक सेन जैसे लोग जेल से बाहर रहें और स्वतंत्र होकर समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए कार्य कर सकें।

इस बार शुक्रवारी के संयोजक राजकिशोर जी ने चर्चा का विषय रखा था- वर्तमान समय में साहित्य की प्रासंगिकता; और बिशिष्ट वक्ता के रूप में बुलाया था प्रो. गंगा प्रसाद विमल को।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके पहले वे केंद्रीय हिंदी निदेशालय में निदेशक पद पर भी कार्यरत थे। आप एक सुपरिचित कवि और उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं। विमल जी के एक उपन्यास ‘मृगांतर’ पर हॉलीवुड में एक फिल्म भी बन चुकी है और इसका जर्मन भाषा में अनुवाद भी छप चुका है। चाय की चुस्कियों के बीच आपने हल्के मूड में जो बातें कहीं वो बहुत गम्भीर किस्म की थीं।

shukrawari-charcha2 shukrawari-charcha

बाएँ से:राजकिशोर,ए.अरविंदाक्षन,विमल

shukrawari-charcha1

बोले- साहित्य की प्रासंगिकता सदा से रही है। आज भी बनी हुई है। इसका सबूत यह है कि आज भी साहित्य का डर मौजूद है। समाज का प्रभु वर्ग आज भी साहित्य के प्रभाव के प्रति सतर्क रहता है। एक अमेरिकी लेखक ने उपन्यास लिखा- ‘पैलेस ऑफ़ मिरर्स’। इसमें उन्होंने चार बड़े अमेरिकी व्यावसायिक घरानों की पोल पट्टी खोल कर रख दी थी।  इसपर उनके प्राण संकट में पड़ गये। उन्हें मार डालने के लिए माफ़िया ने सुपारी दे दी। किताब का प्रकाशक बहादुर और जिम्मेदार निकला। लेखक को पाताल में छिपा दिया। उनकी रॉयल्टी पाबंदी से भेज देता है और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करता है। लेखक गुमनाम और भूमिगत है, लेकिन उसका रचा साहित्य खलबली मचा रहा है।

सलमान रुश्दी की किताब का नाम भी उन्होंने लिया। बोले- इसके चालीस पृष्ठ पढ़कर मैने छोड़ दिया था। कलात्मक दृष्टि से मुझे यह उपन्यास बहुत घटिया लगा। इसके रूपक भद्दे और बेकार लगे। फिर जब इसकी चर्चा बहुत हो ली तो मैने ‘मनुष्य जाति को इस्लाम का योगदान’ विषयक एम.एन.रॉय की पुस्तक पढ़ने के बाद इसे दुबारा पढ़ा। तब मुझे यह किताब कुछ समझ में आनी शुरू हुई। उन्होंने इस पुस्तक में बहुत बारीकी से मनुष्यता विरोधी विचारण को निरूपित किया है। यह विचारण किसी धर्म की रचना नहीं कर सकता। जिन लोगों ने उसे अपने धर्म का दुश्मन मान लिया वे मूर्ख हैं। वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से डरते हैं। सलमान रुश्दी मनुष्यता का दुश्मन नहीं है बल्कि मूर्खों को उससे दुश्मनी है।

ये उदाहरण बताते हैं कि साहित्य कितना बड़ा प्रभाव छोड़ सकता है। लेकिन हिंदी के साहित्य जगत पर दृष्टिपात करें तो निराशा ही हाथ लगती है। यहाँ ऐसी प्रासंगिक रचनाये प्रायः नहीं लिखी जा रही हैं। मनुष्यता के जो सही सवाल हैं उन्हें ठीक से नहीं उठाया जा रहा है। यह साहित्य पढ़कर मन में बेचैनी नहीं उठती। कोई एक्सटेसी महसूस नहीं होती। यहाँ प्रायोजित लेखन अधिक हो रहा है। एक खास समूह और वर्ग में रहकर उसके अनुकूल साहित्य रचा जा रहा है। पुरस्कारों के लिए लिखा जा रहा है। आपकी साहित्यिक प्रतिभा का मूल्यांकन इस या उस गुट की सदस्यता के आधार पर किया जा रहा है।

यहाँ भी शोषक और शोषित का समाजशास्त्र विकसित हो चुका है। जो लोग सबसे अधिक दबे-कुचले वर्ग की बात करते हैं वे ही मौका मिलने पर शोषक वर्ग में शामिल हो जाते हैं। केरल और पश्चिम बंगाल में सबसे पहले वामपंथी सरकारें बनी। बंगाल में तो एक अरसा हो गया। लेकिन विडम्बना देखिए कि आज भी कलकत्ते में हाथगाड़ी पर ‘आदमी को खींचता आदमी’ मिल जाएगा। मार्क्स का नाम जपने वाले वामपंथी सत्ता प्राप्त करने के बाद कांग्रेस की तरह व्यवहार करने लगे और पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ बनाने लगे। यह दो-मुँहापन यहीं देखने को मिलता है। साहित्य जगत में भी ऐसी ही प्रवृत्तियाँ व्याप्त हैं।

ऐसी निराशाजनक स्थिति हिंदी साहित्य के क्षेत्र में खूब मिलती है। विरोधी खेमे को घेरकर चारो ओर से हमला किया जाता है। लेकिन यूरोप में स्थिति दूसरी है। फ्रांस में द’ गाल के शासनकाल में सार्त्र द्वारा उनका विरोध बड़े आंदोलन का रूप ले रहा था। सार्त्र को जेल में डाल देने की सलाह पर द’ गाल ने कहा कि मैं फ्रांस को गिरफ़्तार नहीं कर सकता। विरोधी विचार का सम्मान करना हिंदी पट्टी ने नहीं सीखा है। यहाँ पार्टी लाइन पर चलकर जो विरोध होता है वह भोथरे किस्म का होता हैं। तलवार की धार कुंद हो चुकी है। गदा जैसा प्रहार हो रहा है। प्राणहीन सा। हिंदी में जो कृतियाँ आ रही हैं वे निष्प्राण सी हैं। मन को उद्वेलित करने वाला कुछ नहीं आ रहा है।

वे पूछते हैं कि क्या स्वतंत्रता के बाद के साठ साल में ऐसी कोई घटना नहीं हुई जिसपर उत्कृष्ट साहित्य रचा जा सके। इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपात काल हो या पाकिस्तान के साथ लड़े गये युद्ध हों; या चीन के साथ हुआ संघर्ष। इन घटनाओं ने हिंदी साहित्यकारों को उद्वेलित नहीं किया। इनपर कोई बड़ी कृति सामने नहीं आयी। सुनामी जैसी प्राकृतिक विपदा भी मनुष्यता के पक्ष में साहित्यकारों को खड़ा नहीं कर सकी। क्या कारण है कि बड़ी से बड़ी घटनाएँ हमें विचलित नहीं करती। कड़वे यथार्थ से तालमेल बिठाने में हिंदी साहित्य असफल सा रहा है।

इतनी निराशा भरी बातें कहने के बाद उन्होंने पहलू बदला और बोले कि ऐसा नहीं है कि अच्छी प्रतिभाएँ हमारे बीच नहीं है। मुश्किल बस ये है कि उनका लिखा सामने नहीं आ पाता। आलोचना के जो बड़े मठ हैं वे इसे आने नहीं देते। उनकी देहरी पर माथा टेकने वाला ही पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाता है। समीक्षा उसी की हो पाती है जो उस परिवार का अंग बनने को तैयार होता है। राजकिशोर जी ने गुटबंदी की बात का समर्थन करते हुए विनोदपूर्वक कहा कि ‘यदि आप हमारे किरायेदार हैं तो आप सच्चे साहित्यकार हैं; यदि आप दूसरे के घर में हैं या अपना स्वतंत्र घर जमाने की कोशिश में हैं तो आपका साहित्य दो कौड़ी का भी नहीं है। एक खास विचारधारा का पोषण यदि आप नहीं करते तो आप अप्रासंगिक हैं।

मीडिया ने भी साहित्य जगत का और हिंदी भाषा का बड़ा नुकसान किया है। शब्द बदल गये हैं, शैली दूषित हो गयी है, वाक्य रचना अंग्रेजी की कार्बन कॉपी जैसी हो गयी है। कृतियों पर अंग्रेजी प्रभाव होता जा रहा है। नकल के आरोप भी खुलकर आ रहे हैं। मौलिकता समाप्त सी होती जा रही है।

आज हम सबका दायित्व है कि हम हिंदी में लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य को सामने लायें। मनुष्यता के मुद्दे उठाने वाली रचनाओं को तलाशें। संकुचित सोच के दायरे से बाहर आकर विराट धरातल पर विचार करें। मैं हद दर्जे का आशावादी भी हूँ। कुछ लोग बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। लेकिन उनकी संख्या अत्यल्प है। इसे कैसे बढ़ाया जाय इसपर विचार किया जाना चाहिए।

ganga-prasad-vimal

विमल जी की बात समाप्त होने के बाद प्रश्न उत्तर का दौर चला। कई लोगों ने कई कारण गिनाए। मैंने पिछले दिनों श्रीप्रकाश जी की शुक्रवारी वार्ता के हवाले से बताया कि अच्छी रचना तब निकल कर आती है जब कोई बड़ा आंदोलन चल रहा हो। क्रांति का समय हो। शांतिकाल में तो साधारण बैद्धिक जुगाली ही होती रहती है। मुद्दों को तलाशना पड़ता है। इसपर जर्मनी से आये एक हिंदी अध्यापक ने अनेक ताजा मुद्दे गिनाये। दलित और स्त्री संबंधी विमर्श की चर्चा की। प्रायः सबने इसका समर्थन किया। लेकिन इन मुद्दों पर भी अच्छी रचनाओं की दरकार से प्रायः सभी सहमत थे। विदेशी मेहमान ने यह भी बताया कि यूरोप में हिंदी रचनाओं को ‘पश्चिम की नकल’ पर आधारित ही माना जाता है।

विमल जी ने हिंदी साहित्य के पाठकों की भी कमी के प्रति चिंता जाहिर की। बोले कि अब अच्छी रचनाओं के लिए भी पाठक नहीं मिलते। जेब से पैसा खर्च करके हिंदी की किताबें खरीदने और पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम है। इसके लिए वे ‘अध्यापक समाज’ को दोषी ठहराते हैं। कह रहे थे कि आजकल के अध्यापक न तो अपना पैसा खर्च करके किताबें खरीदते हैं, न पढ़ते हैं और न ही अपने छात्रों व दूसरे लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने बताया कि यदि उन्हें कोई अच्छी किताब मिल जाती है तो कम से कम सौ लोगों को उसे पढ़ने के लिए बताते हैं।

अन्य के साथ राजकिशोर जी ने अच्छी रचनाओं की कमी होने की बात का प्रतिवाद किया। बोले- मैं आपको हिंदी की कुछ मौलिक कृतियों का नाम बताता हूँ। आप इनके मुकाबले खड़ा हो सकने लायक एक भी अंग्रेजी पुस्तक का नाम बता पाइए तो बोलिएगा…। उन्होंने नाम बताने शुरू किए जिसमें दूसरे लोगों ने भी जोड़ा- श्रीलाल शुक्ल की `राग दरबारी’, रेणु का `मैला आँचल’, रांगेय राघव का `कब तक पुकारूँ’, यशपाल की `दिव्या’, अज्ञेय का `नदी के द्वीप’, अमृतलाल नागर का `बूँद और समुद्र’, भगवतीचरण वर्मा की `चित्रलेखा’, हजारी प्रसाद द्विवेदी की `बाणभट्ट की आत्मकथा’, आदि-आदि। किसी ने चुनौती देते हुए जोड़ा कि निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ यदि नकल पर आधारित है तो इसका असल अंग्रेजी रूप ही दिखा दीजिए। इसकी पहली पंद्रह पंक्तियों का अनुवाद ही करके कोई दिखा दे। इसके बाद और भी अनेक रचनाओं का नाम लिया जाने लगा।

अंततः मुझे विमल जी से उनके प्रारम्भिक वक्तव्य की पुष्टि करानी पड़ी। उन्होंने माना कि अपनी इस बात को स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है कि साहित्य की प्रासंगिकता बनी हुई है लेकिन हिंदी में जो लिखा जा रहा है उसमें अधिकांश प्रासंगिक नहीं है। उन्होंने पहले यह भी बताया था कि वे एक नियमित स्तंभ लिखते रहे हैं जिसका नाम है ‘अप्रासंगिक’।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

वर्धा परिसर के क्लब में झूमने का मजा…

12 टिप्पणियाँ

 

वर्धा विश्वविद्यालय शहर से दूर एक वीरान स्थल पर बसाया गया था। पाँच निर्जन शुष्क पहाड़ी टीले इस संस्था को घर बनाने के लिए नसीब हुए। बड़े-बड़े पत्थर और कंटीली झाड़ियाँ चारो ओर पसरी हुई थीं। लेकिन मनुष्य की अदम्य ऊर्जा और निर्माण करने की अनन्य शक्ति के आगे प्रकृति को भी रास्ता देना पड़ता है। शुरू-शुरू में एक कागज पर अवतरित हुआ विश्वविद्यालय आज इस पंचटीला पर धड़कता हुआ एक सुंदर रूपाकार ले रहा है। पहाड़ी ढलान से तादात्म्य बनाती इमारतों की डिजाइन ऐसी बनी है कि प्राकृतिक सौंदर्य अक्षुण्ण बना रहे। यहाँ वृक्षारोपण और जल-संग्रहण के विशेष प्रयास किए गये हैं।

परिसर में अध्यापकों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के परिवार भी आकर बसने लगे हैं। शहर से दूरी के कारण मौलिक जरूरतों की वस्तुओं को जुटाना कठिन है। अब धीरे धीरे दुकानें इस ओर सरकती आ रही है। आस-पास की जमीनें महँगी होने लगी हैं। यहाँ अब खेल और मनोरंजन की जरूरत पूरी करने का उपाय भी खोजा गया है। फैकल्टी एंड ऑफिसर्स क्लब का गठन हो गया है। वर्ष २०११ का आगमन हुआ तो उसी समय क्लब का विधिवत उद्‌घाटन किया गया। कुलपति जी की पत्नी पद्‍मा जी ने लाल फीता काटा। प्रतिकुलपति जी की पत्नी ने केक काटकर सबको बाँटा। बच्चों ने गुब्बारे फोड़ने की प्रतियोगिता खेली। बड़ों ने भी हाउज़ी का लुत्फ़ उठाया। खूब धूमधाम से नये साल का जश्न मना।

इसके पहले विश्वविद्यालय के १३वें स्थापना दिवस (२९ दिसंबर) को भी सबके परिवारों और विद्यार्थियों ने मिलजुलकर शाम को रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किया। क्रिकेट, वॉलीबाल और बैडमिंटन की प्रतियोगिताएँ हुईं। पाककला का प्रदर्शन भी हुआ। मेरे बच्चों की उम्र छोटी है, लेकिन बड़ों के साथ उन्हें फैशन परेड और नृत्य करते देखकर मेरा मन झूम उठा। यहाँ कुछ तस्वीरें लगा रहा हूँ।

 

 

 

 

स्थापना दिवस समारोह के रंगारंग कार्यक्रम को परिसर में रहने वाले परिवारों की महिलाओं व बच्चों ने छात्रावासी छात्र-छात्राओं के साथ मिलकर तैयार किया था। दीपाजी के निर्देशन में एक बांग्ला गीत पर नृत्य प्रस्तुत किया चार बेटियों ने जिसमें एक मेरी वागीशा भी थी।

स्थापना दिवस समारोह में बांग्ला नृत्य प्रस्तुत करती वागीशा की टीम

भीषण गर्मी और नीरस दिनचर्या की बातें नेपथ्य में चली गयी हैं। आजकल यहाँ एक से एक कार्यक्रमों की झड़ी लगी है। रिपोर्ट लगाना मुश्किल हो गया है। यहाँ के मौसम के क्या कहने…! सारा देश कड़ाके की ठंड से परेशान है और हमें दोपहर की धूप से बचने के लिए छाया तलाशनी पड़ती है। घर के भीतर हाफ स्वेटर से काम चल जाता है। इलाहाबाद से बाँध कर लायी हुई रजाइयाँ खुली ही नहीं। पतला कम्बल पर्याप्त है। मेरे जैकेट और सूट भी ड्राई क्लीनर के टैग के साथ बक्से में सो रहे हैं।

क्या कहा, …जलन हो रही है? अजी यहाँ कुछ कठिनाइयाँ भी हैं। लेकिन इस मजे के वक्त हम अपनी तकलीफ़ें क्यों बताएँ…!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Older Entries