क्या अखबार का पाठक चिरकुट है…?

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राष्ट्रीय संगोष्ठी में बहस का मुद्दा बना एक प्रबंध संपादक का बयान

देश की प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे थे। विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले प्रोफ़ेसर, बड़े अखबारों के संपादक और न्यूज चैनेल्स के एंकर सिर जोड़कर वर्धा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों और अकादमिकों को मीडिया की असली दुनिया से परिचित करा रहे थे। मिशनरी पत्रकारिता पर बहस चल रही थी। मीडिया द्वारा मिशन छोड़कर व्यावसायिकता की ओर मुड़ जाने पर चिंता व्यक्त की जा रही थी। मीडिया और राडिया के अंतर्सम्बन्ध खंगाले जा रहे थे। तभी एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने यह मंतव्य रखा कि जब एक साबुन की टिकिया के लिए लोग अपना अखबार बदल देते हैं तो उनसे प्रतिबद्धता की उम्मीद क्या की जाय। दो-ढाई रूपये देकर क्या उन्होंने अखबार के मालिक को खरीद लिया है जो उससे मिशन और नैतिकता की अपेक्षा करते हैं?

पाठकों को उक्त प्रकार से चिरकुट बताने से पहले उन्होंने पत्रकारों को भी उनकी औकात बताने की कोशिश की। बोले- आप इस भ्रम में मत रहिएगा कि यह राज-काज आपके भरोसे चल रहा है। आपकी स्थिति उस छिपकली जैसी है जो छत से चिपककर यह भ्रम पाल बैठी है कि इसे उसी ने रोक रखा है; या हाथी की पीठ पर बैठी उस मक्खी की तरह है जो उसे छोड़कर अकेले जंगल में इसलिए नहीं जाने देती कि उसके बिना इसकी (हाथी की) रक्षा नहीं हो सकेगी।

उनके पहले के वक्ताओं ने “मिशनरी पत्रकारिता- संदर्भ और प्रासंगिकता” नामक विषय पर बोलते हुए देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार, माफ़ियागीरी, घोटालों, इत्यादि के परिप्रेक्ष्य में मीडिया की भूमिका पर अनेक सुंदर व्याख्यान दिए थे और भविष्य के मीडियाकर्मियों को उनकी बढ़ती जिम्मेदारियों का बोध कराने का प्रयास किया था। चहुँओर निराशा के घने बादलों के बीच आशा का एक मात्र सूरज समाज के चौथे स्तंभ को बताया गया था। तब प्रबंध सम्पादक जी ने अपनी बात की शुरुआत एक रोचक कहानी से की थी-

बताने लगे- एक वृद्ध मौलवी लैंप पोस्ट के नीचे सड़क पर बहुत देर से कुछ ढूँढ रहा था।  एक नौजवान को उसकी परेशानी देखी नहीं गयी। सहायता करने की गर्ज़ से पूछा- बाबा क्या खोज रहे हो?

“बेटा, मैं अपनी टोपी सी रहा था, अचानक सुई हाथ से गिर गयी। वही ढूँढ रहा हूँ लेकिन मिल नहीं रही है” मौलवी ने तफ़सील से बताया।

“अच्छा बताइए टोपी कहाँ सिल रहे थे और सूई ठीक कहाँ गिरी? मैं खोजता हूँ।” युवक ने सहानुभूति दिखायी।

“बेटा सुई तो मस्ज़िद में गिरी थी लेकिन वहाँ बहुत अंधेरा है इसलिए यहाँ रोशनी में ढूँढ रहा हूँ।”

हाल में ठहाका लगना तय था ही। तालियाँ थमीं तो उक्त वक्ता ने बताया कि आज यहाँ की चर्चा भी कुछ इसी प्रकार की हो रही है। समस्या की असली जड़ जहाँ है उसे कोई नहीं देखना चाहता। सबका समाधान मीडिया से कराना चाहता है। देश की सरकारें भ्रष्ट है, संसद अपना काम नहीं कर पा रही। न्यायालय भी संदेह से परे नहीं रह गये हैं। उद्योगपति तेजी से अपना पैसा बढ़ा रहे हैं। गुप्त गठबंधन हो रहे हैं। हर आदमी लाभ कमाने के उद्यम में लगा है, लेकिन मीडिया को नैतिकता और मिशन का पाठ पढ़ाया जाता है। जब हम मीडिया में प्रोफ़ेशनलिज़्म की बात करते हैं तो इसे गाली समझा जाता है। आजादी से पहले अखबारों ने एक मिशन के साथ काम किया था- देश को गुलामी से मुक्त कराने का मिशन। लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है। आज यह अन्य प्रोफेशन्स की तरह एक पेशा के रूप में क्यों नहीं पहचाना जाना चाहिए? अख़बार या टीवी चैनेल का जो मालिक करोड़ो रुपये का पूँजी निवेश करता है उसे लाभ कमाने के बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए? मात्र दो रूपये में चालीस पृष्ठ का अखबार आपके दरवाजे पर पहुँचाने का प्रबंध करने वाला अखबार मालिक आपके बारे में कितना सोचे जब आप दो रुपये की साबुन की टिकिया पाने के लिए अपना वर्षों पुराना अखबार बदल देते हैं। आपकी कोई प्रतिबद्धता नहीं है तो अखबार चलाने वालों से आप क्या अपेक्षा रखते हैं?

उन्होंने अखबार पहुँचाने वाले हॉकर के प्रति पाठकों के रूखे व्यवहार का वर्णन भी किया कि कैसे वह विपरीत मौसम में भी सुबह छः बजे घर पर अखबार पहुँचाता है और कभी देर हो जाने पर सुबह की चाय का स्वाद खराब कर देने का दोषी बन जाता है। बिना नागा किए तीस दिन अखबार देने के बाद जब वह पैसा लेने पहुँचता है तो महानुभावों को  ‘आज नहीं कल’ का जवाब देते देर नहीं लगती। “ऐसे लोग जब बिना जाने समझे अखबार के मालिक, अखबार के सम्पादक और अखबार के रिपोर्टर पर आरोप लगाते हैं तो मुझे आपत्ति होती है।”

कोई भी व्यवसाय जब प्रारम्भ किया जाता है तो उसकी प्रगति का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। लाभ कमाना एक सर्वमान्य लक्ष्य है। उसके लिए जरूरी उपाय तलाशे जाते हैं और उन्हें अपनाया जाता है। स्वतंत्रता मिलने के बाद पत्रकारिता भी किसी अन्य  व्यवसाय की तरह कुछ लक्ष्यों की पूर्ति के उद्देश्य से आगे बढ़ी। समय के साथ तालमेल बिठा कर चलने वाले सफल हुए। यह कार्य आज भी एक मिशन बना हुआ है, लेकिन इसका स्वरूप बदल गया है। आज पत्रकारिता ‘स्वांतः सुखाय’ नहीं है।

धारा प्रवाह बोलते हुए उन्होंने एक-दो और चुटकुले और आख्यान सुनाये और बोले- यह अजीब स्थिति है कि प्रायः सभी पत्रकार अपने प्रबंधन को कोसते रहते हैं। उनके अनैतिक कार्यों और शोषक प्रवृत्तियों का रोना रोते हैं। लेकिन वे ही जब स्वयं प्रबंधक अर्थात्‌ मालिक बन जाते हैं तो वे सारी मिशनरी बातें हवा हो जाती हैं और वे सभी बुराइयाँ अपना लेते हैं जिन्हें कोसते इनका समय बीता है। फिर उन्होंने जोड़ा कि इन सारी बातों के बावजूद आज भी जब देशहित का मुद्दा उठता है तो देश की पूरी मीडिया एकजुट होकर आवाज उठाती है। उन्होंने इसके कई उदाहरण भी गिना डाले।

अपने को एक अदना सा पत्रकार बताते हुए उन्होंने ‘छोटे-छोटे प्रयासों का महत्व’ रेखांकित करने के लिए उस गिलहरी की कथा सुनायी जिसने समुद्र पर रामसेतु के निर्माण की प्रक्रिया में योगदान कर्ताओं की सूची में अपना नाम लिखाने के लिए बार-बार तट पर लोटपोट कर शरीर में रेत बटोरने और पुल पर जाकर शरीर झाड़ देने का उद्यम किया था। ताकि भविष्य में इतिहास लिखने वाले यह न लिखें कि जब सारा  बानर समाज पुल बना रहा था तो वहाँ मौजूद एक गिलहरी कुछ नहीं कर रही थी। अस्तु कुछ न कुछ यथा सामर्थ्य करते रहना चाहिए। इसके बाद उन्होंने एक जोरदार वीररस की कविता सुनायी। मैं एक ही पंक्ति नोट कर पाया क्योंकि उन्होंने दुहराया नहीं था। हाल को गुँजाने वाली तालियाँ बजीं और अगले वक्ता बुलाये गये।

यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन जब प्रश्न-उत्तर का दौर चला तो प्रबंध-संपादक महोदय को उठकर सफाई देनी पड़ी। छात्र श्रोताओं के तीखे प्रहार वाकई बेचैन करने वाले थे। अंततः कुलपति जी को अध्यक्षीय भाषण में इस मसले पर अंतिम बात कहनी पड़ी। वह बहुत ही मार्मिक और सजग करने वाली बात थी। लेकिन उसकी चर्चा अगली कड़ी में। अभी तो आप उस वीररस की कविता का आनंद लेते हुए इस ‘चिरकुटई के आरोप’ का जवाब दीजिए।

गूगल महराज ने उस एक लाइन का ‘जामन’ लेकर पल भर में अपने क्षीर सागर के भंडार से पूरी कविता की दही परोस कर रख दी।

वह लाइन थी-

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में

इस लंबी कविता के मूल कवि हैं डॉ. हरिओम पवार। इसके आगे पीछे की कुछ और लाइनें यहाँ आपके लिए। पूरी कविता यहाँ है।

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का
कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का
एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है
अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है

जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो
चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो
हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो
गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में
हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं
डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं

जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं
तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की
हमने बूढ़े जे.पी. के आँसू की भी नीलामी की
परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था
भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था

अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर
कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर
अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर
शोकसभाएं कहाँ हुई हैं मजदूरों की लाशों पर

निर्धनता का खेल देखिये कालाहांडी में जाकर
बेच रही है माँ बेटी को भूख प्यास से अकुलाकर
यहाँ बचपना और जवानी गम में रोज बुढ़ाती हैं
माँ , बेटे की लाशों पर आँचल का कफ़न उढाती है

जब तक बंद तिजोरी में मेहनतकश की आजादी है
तब तक हम हर सिंहासन को अपराधी बतलायेंगे
बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

हिंदी में लिखा जा रहा साहित्य प्रायः प्रासंगिक नहीं है

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प्रोफेसर गंगा प्रसाद विमल ने ‘शुक्रवारी’ में रखी बेबाक राय…

शुक्रवारी चर्चा आजकल जबर्दस्त फॉर्म में है। माहिर लोग जुटते जा रहे हैं और हम यहाँ बैठे लपक लेते हैं उनके विचार और उद्‌गार। इस विश्वविद्यालय की किसी कक्षा में मैं नहीं गया ; क्योंकि न यहाँ का विद्यार्थी हूँ और न ही शिक्षक हूँ। लेकिन एक से एक आला अध्यापकों को सुनने का मौका मिल रहा है जो देश और विदेश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों और दूसरे शिक्षा केंद्रों में लंबे समय तक पढ़ाते रहे हैं। विषय भी देश की नब्ज टटोलने वाले। पिछले दिन अशोक चक्रधर जी आये तो कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिंदी की दशा और दिशा पर अपने तीस-चालीस साल के अनुभव बताकर गये। पूरी तरह अपडेटेड लग रहे थे। रिपोर्ट यहाँ है। उसके पहले विनायक सेन को हुई सजा के बहाने नक्सलवादी आंदोलन के हिंसक स्वरूप और मानवाधिकार संबंधी मूल्यों की चर्चा गांधी हिल के मुक्तांगन में हुई। राजकिशोर जी ने अपनी कविता के साथ विनायक सेन का भरपूर समर्थन व्यक्त किया तो कुलपति विभूतिनारायण राय ने स्पष्ट किया कि उनके साथ सहानुभूति रखते हुए भी हम इतना जरूर याद दिलाना चाहेंगे कि आज के जमाने में राजसत्ता को हिंसा के भय से दबाया नहीं जा सकता। किसी हिंसक आंदोलन को समर्थन देना उचित नहीं है। हाँ, मनुष्यता की रक्षा के लिए जरूरी है कि विनायक सेन जैसे लोग जेल से बाहर रहें और स्वतंत्र होकर समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए कार्य कर सकें।

इस बार शुक्रवारी के संयोजक राजकिशोर जी ने चर्चा का विषय रखा था- वर्तमान समय में साहित्य की प्रासंगिकता; और बिशिष्ट वक्ता के रूप में बुलाया था प्रो. गंगा प्रसाद विमल को।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके पहले वे केंद्रीय हिंदी निदेशालय में निदेशक पद पर भी कार्यरत थे। आप एक सुपरिचित कवि और उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं। विमल जी के एक उपन्यास ‘मृगांतर’ पर हॉलीवुड में एक फिल्म भी बन चुकी है और इसका जर्मन भाषा में अनुवाद भी छप चुका है। चाय की चुस्कियों के बीच आपने हल्के मूड में जो बातें कहीं वो बहुत गम्भीर किस्म की थीं।

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बाएँ से:राजकिशोर,ए.अरविंदाक्षन,विमल

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बोले- साहित्य की प्रासंगिकता सदा से रही है। आज भी बनी हुई है। इसका सबूत यह है कि आज भी साहित्य का डर मौजूद है। समाज का प्रभु वर्ग आज भी साहित्य के प्रभाव के प्रति सतर्क रहता है। एक अमेरिकी लेखक ने उपन्यास लिखा- ‘पैलेस ऑफ़ मिरर्स’। इसमें उन्होंने चार बड़े अमेरिकी व्यावसायिक घरानों की पोल पट्टी खोल कर रख दी थी।  इसपर उनके प्राण संकट में पड़ गये। उन्हें मार डालने के लिए माफ़िया ने सुपारी दे दी। किताब का प्रकाशक बहादुर और जिम्मेदार निकला। लेखक को पाताल में छिपा दिया। उनकी रॉयल्टी पाबंदी से भेज देता है और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करता है। लेखक गुमनाम और भूमिगत है, लेकिन उसका रचा साहित्य खलबली मचा रहा है।

सलमान रुश्दी की किताब का नाम भी उन्होंने लिया। बोले- इसके चालीस पृष्ठ पढ़कर मैने छोड़ दिया था। कलात्मक दृष्टि से मुझे यह उपन्यास बहुत घटिया लगा। इसके रूपक भद्दे और बेकार लगे। फिर जब इसकी चर्चा बहुत हो ली तो मैने ‘मनुष्य जाति को इस्लाम का योगदान’ विषयक एम.एन.रॉय की पुस्तक पढ़ने के बाद इसे दुबारा पढ़ा। तब मुझे यह किताब कुछ समझ में आनी शुरू हुई। उन्होंने इस पुस्तक में बहुत बारीकी से मनुष्यता विरोधी विचारण को निरूपित किया है। यह विचारण किसी धर्म की रचना नहीं कर सकता। जिन लोगों ने उसे अपने धर्म का दुश्मन मान लिया वे मूर्ख हैं। वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से डरते हैं। सलमान रुश्दी मनुष्यता का दुश्मन नहीं है बल्कि मूर्खों को उससे दुश्मनी है।

ये उदाहरण बताते हैं कि साहित्य कितना बड़ा प्रभाव छोड़ सकता है। लेकिन हिंदी के साहित्य जगत पर दृष्टिपात करें तो निराशा ही हाथ लगती है। यहाँ ऐसी प्रासंगिक रचनाये प्रायः नहीं लिखी जा रही हैं। मनुष्यता के जो सही सवाल हैं उन्हें ठीक से नहीं उठाया जा रहा है। यह साहित्य पढ़कर मन में बेचैनी नहीं उठती। कोई एक्सटेसी महसूस नहीं होती। यहाँ प्रायोजित लेखन अधिक हो रहा है। एक खास समूह और वर्ग में रहकर उसके अनुकूल साहित्य रचा जा रहा है। पुरस्कारों के लिए लिखा जा रहा है। आपकी साहित्यिक प्रतिभा का मूल्यांकन इस या उस गुट की सदस्यता के आधार पर किया जा रहा है।

यहाँ भी शोषक और शोषित का समाजशास्त्र विकसित हो चुका है। जो लोग सबसे अधिक दबे-कुचले वर्ग की बात करते हैं वे ही मौका मिलने पर शोषक वर्ग में शामिल हो जाते हैं। केरल और पश्चिम बंगाल में सबसे पहले वामपंथी सरकारें बनी। बंगाल में तो एक अरसा हो गया। लेकिन विडम्बना देखिए कि आज भी कलकत्ते में हाथगाड़ी पर ‘आदमी को खींचता आदमी’ मिल जाएगा। मार्क्स का नाम जपने वाले वामपंथी सत्ता प्राप्त करने के बाद कांग्रेस की तरह व्यवहार करने लगे और पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ बनाने लगे। यह दो-मुँहापन यहीं देखने को मिलता है। साहित्य जगत में भी ऐसी ही प्रवृत्तियाँ व्याप्त हैं।

ऐसी निराशाजनक स्थिति हिंदी साहित्य के क्षेत्र में खूब मिलती है। विरोधी खेमे को घेरकर चारो ओर से हमला किया जाता है। लेकिन यूरोप में स्थिति दूसरी है। फ्रांस में द’ गाल के शासनकाल में सार्त्र द्वारा उनका विरोध बड़े आंदोलन का रूप ले रहा था। सार्त्र को जेल में डाल देने की सलाह पर द’ गाल ने कहा कि मैं फ्रांस को गिरफ़्तार नहीं कर सकता। विरोधी विचार का सम्मान करना हिंदी पट्टी ने नहीं सीखा है। यहाँ पार्टी लाइन पर चलकर जो विरोध होता है वह भोथरे किस्म का होता हैं। तलवार की धार कुंद हो चुकी है। गदा जैसा प्रहार हो रहा है। प्राणहीन सा। हिंदी में जो कृतियाँ आ रही हैं वे निष्प्राण सी हैं। मन को उद्वेलित करने वाला कुछ नहीं आ रहा है।

वे पूछते हैं कि क्या स्वतंत्रता के बाद के साठ साल में ऐसी कोई घटना नहीं हुई जिसपर उत्कृष्ट साहित्य रचा जा सके। इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपात काल हो या पाकिस्तान के साथ लड़े गये युद्ध हों; या चीन के साथ हुआ संघर्ष। इन घटनाओं ने हिंदी साहित्यकारों को उद्वेलित नहीं किया। इनपर कोई बड़ी कृति सामने नहीं आयी। सुनामी जैसी प्राकृतिक विपदा भी मनुष्यता के पक्ष में साहित्यकारों को खड़ा नहीं कर सकी। क्या कारण है कि बड़ी से बड़ी घटनाएँ हमें विचलित नहीं करती। कड़वे यथार्थ से तालमेल बिठाने में हिंदी साहित्य असफल सा रहा है।

इतनी निराशा भरी बातें कहने के बाद उन्होंने पहलू बदला और बोले कि ऐसा नहीं है कि अच्छी प्रतिभाएँ हमारे बीच नहीं है। मुश्किल बस ये है कि उनका लिखा सामने नहीं आ पाता। आलोचना के जो बड़े मठ हैं वे इसे आने नहीं देते। उनकी देहरी पर माथा टेकने वाला ही पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाता है। समीक्षा उसी की हो पाती है जो उस परिवार का अंग बनने को तैयार होता है। राजकिशोर जी ने गुटबंदी की बात का समर्थन करते हुए विनोदपूर्वक कहा कि ‘यदि आप हमारे किरायेदार हैं तो आप सच्चे साहित्यकार हैं; यदि आप दूसरे के घर में हैं या अपना स्वतंत्र घर जमाने की कोशिश में हैं तो आपका साहित्य दो कौड़ी का भी नहीं है। एक खास विचारधारा का पोषण यदि आप नहीं करते तो आप अप्रासंगिक हैं।

मीडिया ने भी साहित्य जगत का और हिंदी भाषा का बड़ा नुकसान किया है। शब्द बदल गये हैं, शैली दूषित हो गयी है, वाक्य रचना अंग्रेजी की कार्बन कॉपी जैसी हो गयी है। कृतियों पर अंग्रेजी प्रभाव होता जा रहा है। नकल के आरोप भी खुलकर आ रहे हैं। मौलिकता समाप्त सी होती जा रही है।

आज हम सबका दायित्व है कि हम हिंदी में लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य को सामने लायें। मनुष्यता के मुद्दे उठाने वाली रचनाओं को तलाशें। संकुचित सोच के दायरे से बाहर आकर विराट धरातल पर विचार करें। मैं हद दर्जे का आशावादी भी हूँ। कुछ लोग बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। लेकिन उनकी संख्या अत्यल्प है। इसे कैसे बढ़ाया जाय इसपर विचार किया जाना चाहिए।

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विमल जी की बात समाप्त होने के बाद प्रश्न उत्तर का दौर चला। कई लोगों ने कई कारण गिनाए। मैंने पिछले दिनों श्रीप्रकाश जी की शुक्रवारी वार्ता के हवाले से बताया कि अच्छी रचना तब निकल कर आती है जब कोई बड़ा आंदोलन चल रहा हो। क्रांति का समय हो। शांतिकाल में तो साधारण बैद्धिक जुगाली ही होती रहती है। मुद्दों को तलाशना पड़ता है। इसपर जर्मनी से आये एक हिंदी अध्यापक ने अनेक ताजा मुद्दे गिनाये। दलित और स्त्री संबंधी विमर्श की चर्चा की। प्रायः सबने इसका समर्थन किया। लेकिन इन मुद्दों पर भी अच्छी रचनाओं की दरकार से प्रायः सभी सहमत थे। विदेशी मेहमान ने यह भी बताया कि यूरोप में हिंदी रचनाओं को ‘पश्चिम की नकल’ पर आधारित ही माना जाता है।

विमल जी ने हिंदी साहित्य के पाठकों की भी कमी के प्रति चिंता जाहिर की। बोले कि अब अच्छी रचनाओं के लिए भी पाठक नहीं मिलते। जेब से पैसा खर्च करके हिंदी की किताबें खरीदने और पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम है। इसके लिए वे ‘अध्यापक समाज’ को दोषी ठहराते हैं। कह रहे थे कि आजकल के अध्यापक न तो अपना पैसा खर्च करके किताबें खरीदते हैं, न पढ़ते हैं और न ही अपने छात्रों व दूसरे लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने बताया कि यदि उन्हें कोई अच्छी किताब मिल जाती है तो कम से कम सौ लोगों को उसे पढ़ने के लिए बताते हैं।

अन्य के साथ राजकिशोर जी ने अच्छी रचनाओं की कमी होने की बात का प्रतिवाद किया। बोले- मैं आपको हिंदी की कुछ मौलिक कृतियों का नाम बताता हूँ। आप इनके मुकाबले खड़ा हो सकने लायक एक भी अंग्रेजी पुस्तक का नाम बता पाइए तो बोलिएगा…। उन्होंने नाम बताने शुरू किए जिसमें दूसरे लोगों ने भी जोड़ा- श्रीलाल शुक्ल की `राग दरबारी’, रेणु का `मैला आँचल’, रांगेय राघव का `कब तक पुकारूँ’, यशपाल की `दिव्या’, अज्ञेय का `नदी के द्वीप’, अमृतलाल नागर का `बूँद और समुद्र’, भगवतीचरण वर्मा की `चित्रलेखा’, हजारी प्रसाद द्विवेदी की `बाणभट्ट की आत्मकथा’, आदि-आदि। किसी ने चुनौती देते हुए जोड़ा कि निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ यदि नकल पर आधारित है तो इसका असल अंग्रेजी रूप ही दिखा दीजिए। इसकी पहली पंद्रह पंक्तियों का अनुवाद ही करके कोई दिखा दे। इसके बाद और भी अनेक रचनाओं का नाम लिया जाने लगा।

अंततः मुझे विमल जी से उनके प्रारम्भिक वक्तव्य की पुष्टि करानी पड़ी। उन्होंने माना कि अपनी इस बात को स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है कि साहित्य की प्रासंगिकता बनी हुई है लेकिन हिंदी में जो लिखा जा रहा है उसमें अधिकांश प्रासंगिक नहीं है। उन्होंने पहले यह भी बताया था कि वे एक नियमित स्तंभ लिखते रहे हैं जिसका नाम है ‘अप्रासंगिक’।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

प्रयाग का पाठ वर्धा में काम आया… शुक्रिया।

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वर्धा में जो कुछ हुआ वह आप ब्लॉगजगत की रिपोर्टों से जान चुके हैं। मैं भी अपने ब्लॉगर अतिथियों को विदा करने के बाद लगातार उनकी पोस्टें ही पढ़ रहा हूँ। उनकी स्नेहिल भाव-धारा में डूब-उतरा रहा हूँ। कृतज्ञता ज्ञापन के लिए शब्दों की मेरी झोली रिक्त हो चुकी है। मेरे लिए जैसी सद्‍भावनापूर्ण टिप्पणियाँ और उत्साहवर्द्धक बातें लिखीं गयी हैं उसके बाद तो मन में नयी ऊर्जा का संचार हो गया है। लगता है कि मौका मिले तो बार-बार उन अविस्मरणीय क्षणों को जीवन में उतारना चाहूँगा।

बीच-बीच में एक-दो महानुभावों की टिप्पणियाँ देखकर मन विचलित होता है तो पिछले साल के इलाहाबाद महासम्मेलन की याद ताजा कर अपना आत्मविश्वास मजबूत कर लेता हूँ।

पहला सम्मेलन विश्वविद्यालय के वर्धा मुख्यालय से दूर इलाहाबाद में था, यहाँ जैसा संसाधन व ‘लॉजिस्टिक सपोर्ट’ वहाँ उपलब्ध न था, अनुभव की कमी थी और ब्लॉग जगत का स्वभाव प्रायः अपरिचित था। लेकिन वहाँ भी जमावड़ा अच्छा हुआ था। खूब सार्थक बहस हुई। गरमा-गरमी भी हुई। एक जीवंत गोष्ठी का सफलता पूर्वक समापन कराकर जब हम घर लौटे तो अंतर्जाल पर हमारे प्रयत्नों को तार-तार करती कुछ पोस्टें हमारा स्वागत (काले झंडे से) करती मिलीं। हमने धैर्य से सबकुछ पढ़ा। …इसे बुलाया, उसे छोड़ दिया, इन्हें ये मिला, उन्हें वो नहीं मिला, यहाँ ये कमी वहाँ वो कमी। पब्लिक का पैसा बहा दिया गया,  …पारदर्शिता नहीं बरती गयी, आदि-आदि।

इन सब के बीच मेरा सौभाग्य यह रहा कि उस समय भी नकारात्मक आलोचनाओं से अधिक मात्रा में सम्मेलन की सकारात्मक बातों ने अन्तर्जाल पर स्थान बनाया। दुनिया को सही तस्वीर का पता चल गया। अंततः मेरा विश्वास पक्का हो गया कि हिंदी ब्लॉगिंग को प्रत्येक पढ़े-लिखे व्यक्ति से जोड़ने और इस अनूठे माध्यम की स्वतंत्रता और सहजता से सबको परिचित कराने के लिए इस आभासी दुनिया के स्थापित हस्ताक्षरों को सेमिनारों, गोष्ठियों व सम्मेलनों के माध्यम से एक दूसरे से व अन्य विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों से मिलने-मिलाने का सिलसिला चलते रहना चाहिए।

मैंने वर्धा में संपन्न इस कार्यक्रम की तैयारी के समय आदरणीय अरविंद जी द्वारा वर्ष पर्यन्त दी गयी सलाह के आधार पर कुछ मोटी-मोटी बातें नोट करके रख ली थीं लेकिन ऐन वक्त पर वह नोट ही गायब हो गया। अब जैसा कि सभी लोग कार्यक्रम को सफल बता रहे हैं तो स्मृति के आधार पर उन बातों को लिखने की कोशिश करता हूँ –

  1. आमंत्रितों की सूची अपने निजी संपर्क के आधार पर नहीं बल्कि ऐसी रीति से तैयार की जाय जिसमें इस माध्यम से गंभीरता पूर्वक जुड़ने वाले प्रत्येक ब्लॉगर को अपनी पहल पर यहाँ आने का मौका मिल सके।
  2. बजट की सीमा के अनुसार अतिथियों की जो भी सीमा तय हो उसको पूरा करने के लिए ‘प्रथम आगत-प्रथम स्वागत’ का नियम अपनाया जाय।
  3. आमंत्रित अतिथियों के लिए समान शिष्टाचार व उपलब्धता के आलोक में यथासम्भव समान संसाधन व सुविधाएँ उपलब्ध कराये जाय।
  4. सभाकक्ष में समय-प्रबंधन के उद्देश्य से बोलने वालों की संख्या नियंत्रित करने के लिए समूह-चर्चा की विधि अपनायी जाय जिसमें अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करने के लिए छोटे-छोटे समूह बनाकर गहनता से अलग-अलग चर्चा करा ली जाय और समूह के निष्कर्षों को उनके द्वारा नामित प्रतिनिधि द्वारा सभाकक्ष में प्रस्तुत किया जाय।
  5. अतिथियों के आवागमन, सुबह की चाय, नाश्ता, भोजन व शयन को निर्बाध बनाने के लिए अलग-अलग कर्मचारियों की लिखित ड्यूटी लगाकर उनका अनुश्रवण किया जाय।
  6. सभाकक्ष में परिचय-पत्र, कलम-कागज, कम्प्यूटर, इंटरनेट, माइक, ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग, फोटोग्राफी, प्रेस-रिपोर्ट इत्यादि की जिम्मेदारी दूसरे कुशल विशेषज्ञों के हाथ में दे दिया जाय।
  7. प्रत्येक सत्र में संपन्न कराये जाने वाले कार्यक्रम की रूपरेखा पहले ही तय कर ली जाय और उसका समयबद्ध अनुपालन प्रत्येक दशा में किया जाय।
  8. किसी भी ब्लॉगर को अपने मन से बक-बक करने की इजाजत न दी जाय। विषय से इतर न कुछ कहने दिया जाय और न ही कुछ करने दिया जाय। इधर-उधर घूमने और टंकी इत्यादि खोजने का मौका तो कतई नहीं।:)

इस प्रकार सारे काम दूसरों के सुपुर्द कर मैने अपना कैमरा उठाया और एक विचित्र संयोजक बनकर अनूप जी को एक बार फिर शिकायत का मौका देता हुआ गेस्ट हाउस पहुँच गया। शिकायत यह कि मैं एक संयोजक की तरह परेशान हाल, सिर खुजाता हुआ और बेचैनी से टहलता हुआ क्यों नहीं दिखायी दे रहा था।

जब पंचों की यही राय है कि संगोष्ठी सफल रही तो मैं यह क्यों बताऊँ कि ऊपर गिनाये गये किसी भी बिन्दु का अनुपालन ठीक-ठीक नहीं हो पाया? साथ ही कुछ दूसरी कमियाँ भी अपना मुँह लटकाये इधर-उधर ताकती रहीं तो उन्हें चर्चा का विषय मैं क्यों बनाऊँ? …लेकिन एक भारी समस्या है। यह बात लिखकर मैं आफ़त मोल ले रहा हूँ। शुचिता और पारदर्शिता के रखवाले मुझे जीने नहीं देंगे। यदि कमियाँ थीं तो उन्हें सामने आना चाहिए। अनूप जी ने यह कई बार कहा कि सिद्धार्थ अपना नमक खिला-खिलाकर लोगों को सेट कर रहा है। तो क्या मानूँ कि नमक अपना असर कर रहा है? छी-छी मैं भी कैसा अहमक  हूँ… अनूप जी की बात पर जा रहा हूँ जो खुले आम यह कहते हुए पाये गये कि आओ एक दूसरे की झूठी तारीफ़ें करें…।

तो मित्रों, मैं पूरे होशो-हवाश में पारदर्शिता के तकाजे से यह बताना चाहता हूँ कि ऊपर तय की गयी पॉलिसी शुरुआत से ही फेल होती रही, और मैं अपने को जबरिया पास करता रहा। उद्‍घाटन सत्र में ही अनूप जी ने स्पष्ट भी कर दिया कि सिद्धार्थ के ‘साहस’ की दाद देनी पड़ेगी कि इलाहाबाद सम्मेलन पर इतनी गालियाँ खाने के बाद भी साल भर के भीतर ही फिर से सबको दुबारा बुला लिया। इस कथन को भी मैने सकारात्मक मान लिया है जबकि आप इसका अर्थ समझ ही रहे होंगे। बहरहाल ऊपर गिनाये गये नियमों पर बिंदुवार आख्या निम्नवत है:

  1. मैने अपने ब्लॉग सत्यार्थमित्र व विश्वविद्यालय की दोनो साइट्स पर यह सूचना पोस्ट कर दी कि अमुक तिथियों को संगोष्ठी होगी। उसमें जो भी सज्जन शामिल होना चाहें वे ‘ब्लॉगिंग इथिक्स’ की थीम पर एक आलेख लिखकर उसे अपनी प्रविष्टि के रूप में हमें भेजें। चयनित होने पर उन्हें प्रतिभाग हेतु आमंत्रण पत्र भेजा जाएगा। कार्यशाला में प्रशिक्षण प्राप्त करने के इच्छुक अभ्यर्थियों से  निर्धारित प्रारूप पर आवेदन/पंजीकरण प्रपत्र भरने का अनुरोध किया गया था। सुरेश चिपलूनकर जी के एक टिप्पणी रूपी प्रश्न के जवाब में ‘प्रतिभागी’ और ‘अभ्यर्थी’ का अंतर भी बताया गया। इस सूचना के आधार पर जिस किसी ने अपनी प्रविष्टि भेजी उसको आमंत्रण पत्र भेज दिए गये। कोई आलेख अस्वीकृत नहीं हुआ। लेकिन हमारी उम्मीद के उलट यह संख्या बहुत कम थी। इस खुले आमंत्रण से संख्या पूरी न होते देखकर हमें सामूहिक चर्चा से कुछ नाम तय करने पड़े। करीब पचास बड़े और अनुभवी ब्लॉगर्स से संपर्क किया गया। इनमें से अनेक अपनी निजी व्यस्तता के कारण असमर्थता व्यक्त करते गये। अंततः करीब पैतीस लोगों ने आने की सहमति जतायी। अंतिम क्षण तक आकस्मिक कारणों से लोगों की यात्राएँ रद्द होती रहीं। प्रमुख कारणों में स्वयं अथवा किसी परिजन की तबियत खराब होना, अथवा नौकरी से छुट्टी न मिल पाना रहा। इस प्रकार हमने अवसर सबको दिया लेकिन उसे लपक लेने का ख्याल कम ही लोगों के मन में आया। जो आ गये उन्हें ही पाकर हम धन्य हो गये। जिन्होंने न बुलाने का स्पष्टीकरण मांगा उन्होंने अपनी भाषा और शैली से जतला भी दिया कि उन्हें न बुलाकार इस कार्यक्रम का कोई नुकसान नहीं हुआ।
  2. अंतिम समय तक लोगों के नाम कटते रहे इसलिए दूसरे नियम के पालन की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। जिसने भी चाहा उसे आने दिया गया। हम सभी आने वालों से उनके आलेख अंतिम समय तक माँगते रहे। जिन्हें नहीं देना था उन्होंने नहीं ही दिया। कुछ लोगों का ‘न आना’ तय था लेकिन उन्होंने आलेख पाबंदी से भेज दिया। इसमें इस बात की पुष्टि हुई कि ब्लॉगर अपने मन का राजा है। जब मूड होगा तभी लिखेगा। किसी के कहने से नहीं।
  3. संसाधनों-सुविधाओं की समानता के बजाय उनकी उपलब्धता ने तीसरे नियम को ज्यादा प्रभावित किया। ए.सी.-नॉन-ए.सी., उत्तर-दक्षिण, ऊपर-नीचे, सिंगल-डबल इत्यादि मानकों के कमरों की उपलब्धता सीमित थी इसलिए जिसे जैसा बन पड़ा उसे वैसा टिका दिया गया। लेकिन सौभाग्य से इस बार कोई ब्लॉगर ऐसा नहीं निकला जो इन बातों की तुलना करके अपना दिन खराब करे। सबने हमारी वाह-वाह की और हम सच्ची में खुश होते रहे।
  4. समूहों का गठन भी हुआ, चर्चा भी हुई और प्रतिनिधियों का प्रस्तुतिकरण भी हुआ। लेकिन इस चक्कर में कई अच्छे वक्ता बोलने से रह गये। तकनीकी रूप से उनके विचार उनके समूह प्रतिनिधि ने व्यक्त कर दिए, लेकिन कलकत्ता से आये प्रियंकर जी, मुम्बई से आयी अनीता जी, रायपुर से आये संजीत जी अपने समूह के बाहर बोलने का मौका ही नहीं पा सके। इनको सुनना निश्चित रूप से बहुत लाभकारी होता, लेकिन समय-प्रबंधन की नयी तकनीक के आगे यह नुकसान हो गया।
  5. पाँचवें नियम के आलोक में ड्य़ूटी तो लगा दी गयी लेकिन कर्मचारियों ने यदि कोई ढिलाई बरती होगी तो उसका पता नहीं चल पाया। हमारे अतिथि इतने अच्छे थे कि उन्होंने मुझे खुश देखने के लिए किसी कमी की ओर इशारा ही नहीं किया। खुद आगे बढ़कर चाय माँगकर पीते रहे और लाइव रिपोर्ट में हमारा नाम रौशन करते रहे। एक बाथरूम में पानी ही नहीं आ रहा था। अविनाश जी गमछा कन्धे पर डालकर दूसरे ब्लॉगर के बाथरूम में हो लिए। किसी कर्मचारी ने एक दिन पहले टंकी का ओवरफ़्लो रोकने के उद्देश्य से गेटवाल की चकरी बंद करने के बाद उसे दुबारा खोलना जरूरी नहीं समझा था। पहले दिन रात के दस बजे ‘आल-आउट’ का जुगाड़ हो सका लेकिन सुनते हैं कि मच्छरों ने पहले ही अपना प्लान पोस्टपोन कर दिया था।
  6. सभाकक्ष में लॉजिस्टिक सपोर्ट निश्चित ही अच्छा रहा होगा लेकिन इसका प्रमुख कारण यह है कि उसमें मेरा कोई हाथ नहीं था। विश्वविद्यालय के कर्मचारियों, पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों व तकनीकी विशेषज्ञों ने कोई कसर नहीं रखी। जिससे काम बिगड़ने का डर था वह अपने निजी कैमरे से ब्लॉगर्स की फोटो खींचने में व्यस्त था। बाद में पता चला कि कैमरे की सेटिंग ऐसी हो रखी थी कि सभी तस्वीरें सबसे कम (AVG) क्वालिटी की ही आ सकीं। केवल नेट पर चढ़ाने लायक।:(
  7. कार्यक्रम की रूपरेखा ऐसी तय हुई कि पहले सत्र को छोड़कर बाकी सत्रों में मंच पर कुर्सियाँ खाली ही रह गयीं। प्रत्येक सत्र के लिए औपचारिक अध्यक्ष और वार्ताकार तय कर मंच पर नहीं बैठाये गये। ब्लॉगर्स मंच के सामने लगी दर्शक-दीर्घा की कुर्सियों पर ही आसीन रहे और पवन दुग्गल को छोड़कर शेष वक्ता नीचे से सीधे पोडियम पर आते रहे। बाद में श्रीमती रचना त्रिपाठी ने बताया कि मंच खाली-खाली लग रहा था। लेकिन कार्यक्रम के दौरान किसी ने इस ओर इशारा नहीं किया। वहाँ उपस्थित कुलपति जी ने भी नहीं। बाद में उन्होंने बताया कि आप संचालक कम और हेडमास्टर ज्यादा लग रहे थे। ईल्ल्यौ… 😦
  8. यदि यशवंत जी की भड़ास का अपवाद जबरिया निकाल दें तो विषय से हटकर बिना इजाजत बोलने वालों को मौका न देने का नतीजा यह हुआ कि चर्चा घूम-फिरकर इसी मुद्दे पर केंद्रित रही कि ब्लॉग लिखने वाले किसी आचार-संहिता के बारे में न सोचें तो ही ठीक है। किसी ने सामान्य सामाजिक नियमों को पर्याप्त बताया तो किसी ने स्व- नियंत्रण की बात की, कोई संहिता को गोली मारने के लिए ललकार रहा था तो कोई साइबर कानून की सीमाएँ बता रहा था। कुलपति जी ने भी अपनी लक्ष्मण रेखा खुद खींचने की ही सलाह दी। कुछ लोगों ने ब्लॉगर के उचित आचरण गिनाये तो किसी ने इसे उद्यमिता के परिप्रेक्ष्य में जोड़ते हुए यह कहा कि जो जिम्मेदार नहीं बनेगा वह यहाँ ज्यादा दिन नहीं टिकेगा। लफ़्फ़ाजी और घटिया प्रपंच की मार्केटिंग बहुत दिनों तक नहीं चलने वाली है। ब्लॉगरों को थोड़ा घूमने का मौका क्या दिया वे बस लेकर गांधी जी के आश्रम के बाद विनोबा जी के द्वार तक चले गये। वहाँ पवनार नदी की उजली धारा देखकर उसमें कुछ लोग कूदने को उतारू थे। लेकिन जिस विधाता ने गोष्ठी की सफलता  का वरदान दे रखा था उसी ने उन लोगों को कूदने से रोक लिया और सभी सकुशल ठीक समय से सभाकक्ष तक लौट आये। 

कहीं यह निष्कर्ष निकाला गया है कि “और जो कुछ भी हुआ हो मगर प्रवर्तित विषय ही भलीभांति विवेचित नहीं हो सका सारी रिपोर्टें यही बताती हैं ……बस छिछला सा निर्वाह …..बस जुमले दागे गए …..” हजार किलोमीटर दूर पंचायत चुनाव कराते हुए भी इतना गहरा अध्ययन करके तुरत-फुरत निष्कर्ष प्रस्तुत करने की क्षमता वाला कोई दूसरा ब्लॉगर यहाँ था ही नहीं जो गहराई तक निर्वाह कर सके और जुमलों से बाहर निकल सके। पवन दुग्गल भी वह गहराई नहीं पा सके। हैरत है कि फिर भी चारो ओर जय-जयकार मची है इस संगोष्ठी की। मन चकरा रहा है।

मुझे तो लग रहा था कि निम्न चार विषयों पर उनके समूहों द्वारा जो चर्चा की गयी वह गहन भी थी और सार्थक भी लेकिन कदाचित्‌ इसका संदेश सभाकक्ष के बाहर अंतर्जाल पर पूरा नहीं गया।

१- ब्लॉगिंग में नैतिकता व सभ्याचरण (etiquettes)

श्री सुरेश चिपलूनकर, श्री विवेक सिंह, श्री संजीत त्रिपाठी, डॉ.महेश सिन्हा, डॉ. (श्रीमती) अजित गुप्ता,

२- हिंदी ब्लॉग और उद्यमिता (व्यावसायिकता)

श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी, श्री शैलेश भारतवासी, श्री संजय वेंगाणी, श्री अविनाश वाचस्पति, श्री अशोक कुमार मिश्र, श्रीमती रचना त्रिपाठी, श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, श्री विनोद शुक्ल

३-आचार संहिता क्यों व किसके लिए?

श्री रवीन्द्र प्रभात, श्रीमती अनिता कुमार, श्री प्रवीण पांडेय, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, डॉ कविता वाचक्नवी, डॉ. प्रियंकर पालीवाल

४- हिंदी ब्लॉग और सामाजिक सरोकार

-श्री जय कुमार झा, श्री यशवंत सिंह, श्री अनूप शुक्ल, श्री जाकिर अली रजनीश, सुश्री गायत्री शर्मा

अब समूह के प्रतिनिधि अपनी लाज रखने के लिए पूरी बात अपने ब्लॉग पर लिखकर सबको लिंक भेजें तब शायद बात बने। 

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि मेरी लाख न्यूनताओं के बावजूद ईश्वर ने मुझसे एक जानदार, शानदार और अविस्मरणीय कार्यक्रम करा दिया तो यह निश्चित रूप से मेरे पूर्व जन्म के सद‌कर्मों का पल रहा होगा जिससे मुझे इस बार अत्यंत सुलझे हुए और सकारात्मक दृ्ष्टि के सम्मानित ब्लॉगर्स के साथ संगोष्ठी के आयोजन का सुअवसर मिला। कुलपति श्री विभूति नारायण राय जी ने बड़ी सहजता से पूरे कार्यक्रम के दौरान मेरी गलतियों को नजर अंदाज कर मेरा हौसला बढ़ाये रखा, पूरा विश्वविद्यालय परिवार मुझे हर प्रकार से सहयोग करता रहा, और ब्लॉगजगत में मेरे शुभेच्छुओं की दुआओं ने ऐसा रंग दिखाया कि कुछ खल शक्तियाँ अपने आप किनारे हो गयीं वर्ना बुलावा तो सबके लिए था। इसे भाग्य न मानूँ तो क्या?

एक बात जरूर कहूँगा कि प्रयाग के सम्मेलन से जो सीखा था वह वर्धा में काम आया। यहाँ भी अपनी गलतियों से कुछ सीखने को मिला है। निश्चित ही वे आगे मार्गदर्शन करेंगी।

शेष बातें जानने के लिए इन लिंक्स पर जाना उपयोगी होगा-

  1. कई अनुत्तरित प्रश्नों को छोड़ गयी वर्धा में आयोजित संगोष्ठी (रवीन्द्र प्रभात)
  2. कैमरे में कैद वर्धा में आयोजित संगोष्ठी की सच्चाई (रवीन्द्र प्रभात)
  3. अविस्मरणीय रहा वर्धा में आयोजित संगोष्ठी का दूसरा दिन (रवीन्द्र प्रभात)
  4. वर्धा में केवल विचार मंथन ही नहीं मस्ती की पाठशाला भी (रवीन्द्र प्रभात)
  5. हिन्दी ब्लॉगिंग पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला और संगोष्ठी पूरी भव्यता के साथ संपन्न (रवीन्द्र प्रभात)
  6. वर्धा सम्मेलन: कुछ खट्टा कुछ मीठा (जाकिर अली रजनीश)
  7. वर्धा यात्रा ने बना दिया गाय, वर्ना आदमी तो हम भी थे काम के.(अनीता कुमार)
  8. बर्धा ब्लॉगर सम्मेलन की रिपोर्ट “जरा हटके” (सुरेश चिपलूनकर)
  9. स्वतंत्र वार्ता हैदराबाद: ब्लॉगरों को अपनी लक्ष्मण रेखा खुद बनानी पड़ेगी- विभूति नारायण राय
  10. वी.एन.राय, ब्लॉगिंग और मेरी वर्धा यात्रा (भड़ास पर यशवंत)
  11. वर्धा की शानदार तस्वीरें (पिकासा पर सुरेश चिपलूनकर)
  12. वर्धा में दो दिवसीय राष्‍ट्रीय कार्यशाला एवं संगोष्‍ठी संपन्न (डॉ.कविता वाचक्नवी)
  13. वर्धा ब्लॉगर मिलन से वापसी, बाल बाल बचे (डॉ. महेश सिन्हा)
  14. ब्लोगिंग के जरिये गणतंत्र को आगे बढाने का एक अभूतपूर्व आयोजन का सार्थक प्रयास..(जय कुमार झा)
  15. ब्लोगर संगोष्ठी वर्धा चित्रों क़ी नजर से ..(जय कुमार झा)
  16. वर्धा संगोष्ठी और कुछ अभूतपूर्व अनुभव व मुलाकातें ….(जय कुमार झा)
  17. ब्लोगिंग का उपयोग सामाजिक सरोकार तथा मानवीय मूल्यों को सार्थकता क़ी ओर ले जाने केलिए किये जाने क़ी संभावनाएं बढ़ गयी है …..(जय कुमार झा)
  18. वर्धा में मिले ब्लॉगर (विवेक सिंह)
  19. वर्धा के गलियारों से (कुछ झूठ कुछ सच ) (विवेक सिंह)
  20. "ब्‍लोगिंग की कार्यशाला – अभी छाछ को बिलौना बाकी है – डॉ. (श्रीमती)अजित गुप्‍ता
  21. वर्धा सम्‍मेलन की तीन अविस्‍मरणीय बातें (संजय बेंगाणी)
  22. साला न कहें भाई साहब कहें चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  23. ब्लॉगिंग सबसे कम पाखंड वाली विधा है चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  24. ब्लॉगिंग की आचार संहिता की बात खामख्याली है चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  25. वर्धा में भाषण जारी चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  26. वर्धा में ब्लागर सम्मेलन चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  27. नदी उदास नहीं थी  (डॉ. कविता वाचक्नवी)
  28. गांधी जी सफलतम ब्लॉगर हुए होते : वर्धा आयोजन का भरत वाक्य  (डॉ.ऋषभदेव शर्मा)
  29. "वर्धति सर्वम् स वर्धा – 1 (प्रवीण पांडेय)
  30. वर्धा ब्लोगर संगोष्ठी के पर्दे के पीछे के असल हीरो … (जय कुमार झा)
  31. वर्धा संगोष्ठी में उपस्थित थे गांधी, निराला, शमशेर और अज्ञेय भी … (रवीन्द्र प्रभात)
  32. हिंदी ब्लॉगिंग-आचार संहिता-देश के ब्लॉगर और कुछ बातें, एक रपट जैसा कुछ (संजीत त्रिपाठी)
  33. महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय,वर्धा से लौटकर …. हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की एक महारैली का आयोजन देश की राजधानी दिल्‍ली के इंडिया गेट पर करें (अविनाश वाचस्पति)
  34. ब्‍लागिंग में आना और कार्यशाला में पहचाना एक-दूसरे को डॉ.(श्रीमती) अजित गुप्ता
  35. तनिक रुको भाई, आ रहे हैं बताते हैं बताते हैं (अनीता कुमार)
  36. महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में… (गायत्री शर्मा)
  37. वर्धा और बिरयानी घर (राम त्यागी)
  38. वर्धा से आप लोग क्यों चले गये… ? (मास्टर सत्यार्थ)
  39. …अथ वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन कथा (अनूप शुक्ल)
  40. वर्धा – कंचन मृग जैसा वाई-फ़ाई (अनूप शुक्ल)

अभी इतना ही। कुछ लिंक्स छूट गये हों तो टिप्पणियों के माध्यम से या मेल से बताएँ। (हम कोशिश करेंगे कि इस सूची को समय-समय पर आगे बढ़ाते रहें)

    (सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)