क्या लिखूँ…? बताइए न…!

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ब्लॉगरी भी अजीब फितरत है। इसमें लगे रहो तो मुसीबत और न लग पाओ तो और मुसीबत। अभी एक पखवारे तक जो लोग इसमें लगे रहे वे निरापद लेखन की खोज में हलकान होते रहे और मैं इस चिन्ता में दुबला होता रहा कि मैं तो कुछ लिख ही नहीं पा रहा हूँ।

28052009306 बेटे के मुण्डन में गाँव जाना क्या हुआ मैने उसकी व्यस्तता की आड़ में खूब आलस्य का मजा लिया। कार्यक्रम की फोटुएं भी भतीजे की तगड़ी मोबाइल में वहीं छोड़ आया। घर-परिवार वालों ने सलाह दी कि बच्चे को ज्यादा एक्सपोजर दोगे तो नज़र लग जाएगी। बस मेरे आलस्य की बेल इस सलाह की डाल का सहारा पाकर लहलहा उठी। आज ही कुछ तस्वीरें मेरे हाथ लगी हैं लेकिन कौन सी लगाऊँ समझ नहीं पा रहा। …चलिए कोट माई के चरणों में खड़े सत्यार्थ की मुस्कान का आनन्द लीजिए।

इधर सत्यार्थ की मौसी श्रीमती रागिनी शुक्ला जी से भी भेंट हुई। उन्होंने एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की विधवा की करुण सत्यकथा हमें भेंट की। सोचा था पिछली दो कहानियों की कड़ी में उनकी तीसरी कहानी भी यहाँ पोस्ट कर दूंगा। लेकिन यहाँ घर में ही मात खा गया। श्रीमती जी ने अपनी दीदी की कहानी पर पहला हक़ जता दिया और वह भी टूटी-फूटी पर जा लगी।

उधर छ्ठे वेतन आयोग ने बुजुर्गों के साथ थोक भाव से सहानुभूति दिखायी है। अस्सी साल की उम्र पाते ही उन्हें २० प्रतिशत अधिक पेंशन दिए जाने और उसके बाद प्रत्येक पाँच साल पर इतना ही और बढ़ा देने का निर्णय ले लिया गया है। सौ साल पार करते ही वेतन के बराबर पेंशन हो जाएगी। इसमें अपने पति के स्थान पर पारिवारिक पेंशन पाने वाली अनेक बुजुर्ग और अनपढ़ महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें स्वयं अपनी उम्र नहीं मालूम, और न ही कोई अभिलेख ऐसे हैं जो ठीक-ठीक उम्र बता सकें। सी.एम.ओ.(Chief Medical Officer) दफ़्तर आयु बताने का काउण्टर खोलकर बैठा है; जहाँ फौरन आयु का प्रमाणपत्र बन जा रहा है। शरीर पर ‘आला’ (Stethoscope) लगा कर और जीभ-मुँह देखकर आयु का निर्धारण कर दिया जा रहा है। सुना था कि किसी खास हड्डी का एक्स-रे लेकर सही आयु बतायी जा सकती है। लेकिन वहाँ शायद इसकी जरूरत नहीं पड़ रही।  विज्ञ पाठक इसपर प्रकाश डाल सकते हैं। डॉक्टर ब्लॉगर्स से विशेष अनुरोध है।

सावित्री देवी हाई स्कूल १९४४ऐसे में सावित्री देवी जैसी पेंशनर से मन प्रसन्न हो गया जिन्होंने १९४४ में हाई स्कूल की परीक्षा पास करके अपना प्रमाणपत्र सजो कर रखा है और आज उसका लाभ ८२ साल की उम्र में पाने जा रही हैं।

गाँव में लगभग सभी बच्चे बोर्ड परीक्षाओं में अच्छे अंको के साथ सफल रहे। वे भी जिन्हें खुद ही अपनी सफलता की आशा नहीं थी। नकल महायज्ञ की घनघोर सफलता ने सारे रिकार्ड पीछे छोड़ दिए। लड़कियाँ एक बार फिर लड़कों से आगे रहीं। इस शीर्षक की वार्षिक पुनरावृत्ति अखबारों में इस बार भी पूरे जोश से हुई। इसमें छिपी विडम्बना पर कुछ कहने की इच्छा थी, लेकिन संयोग से मेरी नज़र एक अज्ञेय ब्लॉगर की पोस्ट पर पड़ गई जहाँ इन साहब ने इस विषय पर काफी कुछ कह दिया है। सो यह प्रोजेक्ट भी जाता रहा।

Image039एक दिन के लिए ससुराल जाना हुआ। आम के बाग में बन्दरों की सेना समायी हुई थी। गाँव भर के लड़के बन्दरों को भगाने के बहाने गुलेल लेकर वहाँ जमा थे। उनकी निगाह बन्दरों द्वारा काटकर या तोड़कर गिराये जा रहे आमों पर अधिक थी। लेकिन जिस नन्हें और लुप्तप्राय जीव ने वहाँ मेरा मन मोहा वह थी वहाँ के पुराने मकान में जहाँ-तहाँ घोसला बनाकर रहने वाली नन्हीं गौरैया। घर के कोने-कोने में निर्भय होकर चहकने वाली और चुहू-चुहू की आवाज से पूरा घर गुंजायमान करने वाली गौरैया का बड़ा सा परिवार मुझे एक दुर्लभ आनन्द दे गया। मोबाइल से कठिनाई पूर्वक खींचे गये फोटू तो अभी भी सुरक्षित हैं लेकिन इस लुप्त होती प्रजाति पर एक खोजी और वैज्ञानिक रिपोर्ट बनाने के सपने ने इसपर भी एक पोस्ट को रोक रखा है। डॉ. अरविन्द जी या तसलीम जी कुछ मदद करें तो अच्छा हो।

लोकसभा चुनावों के परिणामों से मायावती जी को अपने खिसकते जनाधार का अंदेशा हुआ तो उन्होंने सत्ता की पकड़ मजबूत करने के लिए कई बड़े प्रशासनिक फैसले कर डाले। उस समय जब सरकारी अफसर ट्रान्सफर सीजन की तैयारी कर रहे थे और अच्छी पोस्टिंग के लिए अपने मन्त्रीजी को प्रसन्न करने के रास्ते तलाश रहे थे तभी मैडम ने शून्य स्थानान्तरण की नीति घोषित कर दी। कहते हैं कि कितनों के हाथ के तोते उड़ गये। लेकिन मैं स्वयं एक सरकारी मुलाजिम होने के नाते इन सुनी-सुनायी बातों पर चर्चा करने से बचता रहा।

28052009324

गाँव पर इस बार सन्ताइन और उनकी हिरमतिया से भेंट हुई। जब हम ‘कोट माई’ के स्थान पर बाबू के बाल चढ़ाने गये तो देखा कि वहीं पंचायत भवन के बरामदे में दोनो माँ-बेटी परित्यक्त और नारकीय जीवन जी रहे है। डिस्कवरी चैनेल पर दिखने वाला सोमालिया का भुखमरी का दृश्य वहाँ साक्षात्‌ उपस्थित था। मेरे कुछ मित्र और रिश्तेदार जिन्होंने हिरमतिया की कहानी पढ़ रखी थी वे भी उन्हें सजीव देककर आहत हो गये। लेकिन यहाँ सच कहूँ तो चाहकर भी मुझे इस दारुण कथा का अग्र भाग लिखने की हिम्मत नहीं हुई।

शशि पाण्डेय उधर इलाहाबाद संसदीय सीट की निर्दल प्रत्याशी शशि पाण्डेय ने सबसे कम वोट पाने के बाद अगले पाँच साल के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किया है उसमें सबसे पहला लक्ष्य है- एक दूल्हा तलाशकर उससे शादी रचाना, उसके साथ देश विदेश घूमकर मजे करना और घर-गृहस्थी बस जाने के बाद पुनः जनसेवा के मैदान में कूद जाना। यह सब मुझे तब पता चला जब वो परिणाम घोषित होने के बाद अपने चुनावी खर्च का आखिरी हिसाब जमा करने के सिलसिले में मेरे कार्यालय आयी थीं। कल मुझे फोन करके पूछ रही थीं संसद में महिला आरक्षण बिल के बारे में मेरा क्या नजरिया है। मैने उनका नजरिया पू्छा तो बोलीं कि ‘आइ अपोज इट टूथ एण्ड नेल’ कह रहीं थीं कि इससे तो अगड़े कांग्रेसियों की बहुएं और बेटियाँ ही संसद में भर जाएंगी। …एक बार फिर उनके साहसी कदम की चर्चा करना चाहता था लेकिन उन्हीं के डर से आइडिया ड्रॉप कर दिया। निरापद लिखने का दौर जो चल पड़ा है इन दिनों…। 🙂

अभी एक शादी में शामिल होने के लिए गोरखपुर तक ट्रेन से जाना-आना हुआ। सफर के दौरान लालू जी की चमत्कारी सेवाओं से लेकर उनके निर्णयों को पलटने वाली ममता बनर्जी की खूब गर्मागर्म चर्चा सुनने को मिली। लालूजी के साइड मिडिल बर्थ की खोज पर लानत भेंजने वालों के कष्ट को स्वयं महसूस करने का मौका मिला। लेकिन जो बर्थें अब निकाली जा चुकी हैं उनकी चर्चा बेमानी लगती है। साइड अपर बर्थ को भी ऊपर सरकाकर जो छत से सटा दिया गया था वो अभी वहीं अटकी हुईं हैं और मुसल्सल कष्ट देती जा रही हैं। यह सब लिखकर मैं उस जनादेश का अनादर नहीं करना चाहता जो लालूजी को इतिहास की वस्तु बना चुका है। अब लालू ब्रैण्ड की टी.आर.पी. नीचे हो चली है।

तो मित्रों, ये सभी मुद्दे मेरे मन में पिछले एक पखवारे से उमड़-घुमड़ रहे थे लेकिन एक पूरी पोस्ट के रूप में नहीं आ सके। अभी कल जब मैने एक शत-प्रतिशत निरापद पोस्ट देखा तो मन में हुलास जगा कि एक अदद पोस्ट तो चाहे जैसे निकाली जा सकती है। लेकिन बाद में किसी ने मेरे कान में बताया कि यह निरापद पोस्ट भी हटाये जाने के आसन्न संकट से दो-चार है तो मेरे होश गु़म हो गये।

अब तो यह सोच ही नहीं पा रहा हूँ कि क्या लिखूँ…! आप विषय बताकर मेरी मदद करिए न…! सादर!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-४ डॉ.कविता वाचक्नवी (हिन्दी कम्प्यूटिंग) प्रथम भाग

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“हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया” के बारे में जो कार्यशाला इलाहाबाद में हुई उसकी तस्वीरें, विषय-प्रवर्तन, अखबारी चर्चा, अनूप शुक्ल जी की कथा-वार्ता और डॉ. अरविन्द मिश्रा जी की साइंस ब्लॉगिंग सम्बन्धी वार्ता के बारे में आप पिछली कड़ियों में देख और पढ़ चुके है। अब आगे…

आशीर्वाद मुख्य अतिथि का... इमरान ने बड़े आदर पूर्वक यह बताया कि ब्लॉगिंग की चर्चा को एक ब्रेक देना पड़ेगा क्योंकि हमारे मुख्य अतिथि महोदय को किसी जरूरी कार्य से जाना पड़ रहा है। इसलिए उनके हिस्से की औपचारिकता बीच में ही पूरी करनी पड़ेगी। प्रदेश के पुलिस मुख्यालय में अपर पुलिस महानिदेशक के पद की जिम्मेदारियाँ निभाने वाले एस.पी.श्रीवास्तव जी ने इस कार्यक्रम से इतना भावुक जुड़ाव महसूस किया कि उन्होंने अपनी घोर व्यस्तता के बावजूद उपस्थित श्रोताओं को करीब बीस मिनट तक आशीर्वाद दिया।

मुख्य अतिथि जी बताने लगे कि ब्लैक बेरी पर अंग्रेजी में बहुत दिनों से ब्लॉग लिखते रहे हैं।

“आज का यह कार्यक्रम देखकर मुझे यह ज्ञान हुआ है कि हिन्दी में भी ब्लॉगिंग की जा सकती है। मैं आज ही अपना हिदी ब्लॉग बना डालूंगा और नियमित रूप से लिखता रहूंगा।”

स्मृति चिह्नउन्होंने कम्प्यूटर और इन्टरनेट के बारे में अनेक गूढ़ बातें बतायी। मुख्य अतिथि महोदय कविता के क्षेत्र में भी बड़ा दखल रखते हैं, लेकिन समय ने इसकी इजाजत नहीं दी। उन्होंने वार्ता समाप्त करने के बाद सभी अन्य वक्ताओं को स्मृति चिह्न प्रदान किए जिसे इमरान ने बड़ी मेहनत और शौक से तैयार कराया था।

मुख्य अतिथि जी को आदर पूर्वक विदा करने के बाद इमरान ने अगली वार्ताकार डॉ. कविता वाचक्नवी जी को आमन्त्रित किया। वे यह बताना नहीं भूले कि आप स्त्री विमर्श की विशेषज्ञ हैं। आपका इन्टरनेट पर बहुत बड़ा पाठक वर्ग है। "हिन्दी भारत", वागर्थ, पीढियाँ, स्वर – चित्रदीर्घा, ब्लॉगरबस्ती (BLOGGER BUSTI), "बालसभा", हिन्दुस्तानी एकेडेमी
चिट्ठा चर्चा, Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श), *रामायण- संदर्शन
आदि अनेक ब्लॉग हैं जिनमें आप अकेले या सामूहिक रूप से लेखन का कार्य करती है।

कार्यशाला में यद्यपि ब्लॉगिंग की ही चर्चा की जानी थी और किसी सामाजिक – राजनैतिक मुद्दे पर भटकने की इजाजत नहीं थी लेकिन इमरान उनसे स्त्री विमर्श पर कुछ सुनने का लोभ संवरण नहीं कर सके। उन्हें यह छूट प्रदान कर दिया कि वे अपनी पसन्द से जो बोलना चाहें बोल सकती हैं। लेकिन कविता जी ने कार्यशाला के उद्देश्यों को महत्व देते हुए अन्तर्जाल पर हिन्दी के अनुप्रयोग और हिन्दी टूल्स के बारे में ही चर्चा करना उचित समझा।

कविता वाचक्नवी कविता जी ने अपनी बात की शुरुआत इस ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए किया कि भारत में हिन्दी का बहुत बड़ा प्रयोक्ता समाज है। (वैसे तो बाहर भी कम नहीं है।) हिन्दी का प्रसार हो रहा है। लेकिन कम्प्यूटर में अभी हिन्दी के अनुप्रयोगों में बहुत कुछ किया जाना शेष है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि देवनागरी लिपि में लिखी हुई संस्कृत भाषा कम्प्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त भाषा है। लेकिन अंग्रेजी का प्रयोग अभी भी इण्टरनेट पर इतना छाया हुआ है कि हम अंग्रेजी में काम करने के आदी हो गये हैं। यदि हमारा ब्राउजर अंग्रेजी में काम करता है तो हिन्दी पढ़ने-लिखने के बावजूद हम अंग्रेजी प्रयोक्ता ही कहलाएंगे। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी हिन्दी को सर्वथा कम्प्यूटर-समर्थ बनाएं। इस दिशा में अनेक लोगों ने व्यक्तिगत स्तर पर बड़े प्रयास किए हैं। किसी बड़ी संस्था की मदद के बिना भी अनेक उत्साही हिन्दी-सेवियों ने हिन्दी अनुप्रयोगों की विशाल पूँजी इकठ्ठा कर दी है।

कुछ महत्वपूर्ण हिन्दी सुविधाएं निम्नवत्‌ हैं:

१.शब्दकोश (Dictionary):

अब आपको कागज पर छपे शब्दकोश के पन्ने पलटने की आवश्यकता नहीं है। दुनिया की अच्छी से अच्छी डिक्शनरी ऑन लाइन उपलब्ध है। मॉउस की एक क्लिक के साथ ही आप किसी भी शब्द का अर्थ सहज ही जान सकते हैं। अब हिन्दी का वृहत् शब्दकोश समानान्तर कोश के नाम से उपलब्ध है।

२. अनुवाद (Translation):

अब ऐसे सॉफ़्टवेयर उपलब्ध हैं कि आप किसी भी आलेख को दुनिया की किसी भी भाषा का तत्क्षण अनूदित कर सकते हैं। अन्तर्जाल पर विचरण करते हुए यदि आप को मिसाल के तौर पर स्कैन्डिनेवियाई भाषा में कोई रोचक सामग्री प्राप्त होती है तो आप उसे एक माउस की क्लिक से अपनी मनचाही भाषा में बदल सकते हैं। अपना हिन्दी में लिखा लेकर उसका दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी करा सकते हैं। हाँलाकि इस क्षेत्र में अभी बहुत कुछ अपेक्षित है। उदाहरणार्थ साहित्यिक रचनाओं का उचित अनुवाद मशीन द्वारा किया जाना सम्भव नहीं लगता है।

३. पारिभाषिक शब्दावली:

कुछ स्वप्रेरित लोगों के परिश्रम से विविध विषयों से सम्बन्धित पारिभाषिक शब्दों का संकलन तैयार हुआ है। इनका उपयोग भाषा के मानकीकरण में बहुत सहायक है।

४. लिप्यान्तरण (transliteration):

इस सुविधा का प्रयोग उन सभी लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर किया जा रहा है जिन्हें हिदी टाइपिंग की कोई जानकारी नहीं है। रोमन अक्षरों को की-बोर्ड पर देखकर टाइप करते हुए उनका हिन्दी प्रतिरूप प्राप्त किया जा सकता है। यानि ‘kavita’ टाइप करके ‘कविता’ पाया जा सकता है। यह सुविधा गूगल सहित अन्य अनेक साइट्स पर निःशुल्क ऑन लाइन’ उपलब्ध हैं। barahaIME इसके ‘ऑफ़ लाइन’ संस्करण निःशुल्क उपलब्ध कराती है जो इन्टरनेट से दो मिनट में डाउनलोड करके अपने कम्प्यूटर पर इन्स्टाल किया जा सकता है।

५. यूनीकोड:

इन्टरनेट पर सहज प्रयोग के लिए यूनिकोड फ़ॉण्ट की पद्धति लागू की गयी है। विश्व की सभी भाषाओं के समस्त वर्णों (अक्षरों) के लिए एक युनीक कोड निर्धारित कर दिया गया है तथा सभी कम्प्यूटर निर्माता कम्पनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि सभी कम्प्यूटर इस सुविधा से अनिवार्य रुप से लैस हों। देवनागरी लिपि के वर्णों को भी यूनीकोड फ़ॉण्ट में स्थान प्राप्त है। इससे दुनिया में कहीं भी हिन्दी नेट के माध्यम से लिखी और पढ़ी जा सकती है।

६. पारिभाषिक तकनीकी शब्दावली:

आप ज्ञान के जिस भी क्षेत्र में कार्य कर रहे हों उस क्षेत्र से सम्बन्धित मानक शब्दों की सर्वमान्य परिभाषा अत्यन्त आवश्यक होती है। हिन्दी सेवियों ने अन्तर्जाल पर इस विषय पर भी कठोर परिश्रम किया है। और विपुल मात्रा में तकनीकी शब्दकोशों की रचना कर डाली है।

७. कविता कोश:

अमीर खुसरो से लेकर आधुनिक भारत के वर्तमान कवियों तक की करीब ६०००० कविताओं को अन्तर्जाल पर कविता कोश में अपलोड कर दिया गया है। यह पूँजी अभी भी लगातार बढ़ रही है।

…क्रमशः

 कविता जी के श्रोता [कविता जी की वार्ता कुछ लम्बी ही थी। पूरे विषय को एक कड़ी में समेटना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने अपनी पाठ्य सामग्री से सम्बन्धित लिंक्स देने को कहा था, जो अभी प्रतीक्षित है। अगली कड़ी में इसे पूरा करने की कोशिश की जाएगी।]

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

सालगिरह से निकली नयी राह…

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ये रही एक माइक्रो-पोस्ट

टूटी-फूटी से हुआ, सपना इक साकार।

भेंट चढ़ा ब्लॉगरी के पूरा इक परिवार॥

आप सबकी शुभकामनाओं की सख़्त जरूरत है।

पुछल्ला:

डॉ. अरविन्द मिश्रा ने आज हमारी जोड़ी की तस्वीर तलाश किया जो थी ही नहीं। नहीं मिली तो किसी जोड़ा-जामा टाइप फोटू की फरमाइश भी कर दिए। हम ठहरे तकनीक से पैदल, सो शादी वाली फोटू यहाँ चेंप न सके। लेकिन एकदम ताजी फोटू भतीजे से खिंचवा ली है। आप भी देखिए 🙂

परिणय दशाब्दि  (2) (सिद्धार्थ)

वाह भोजपुरी… वाह!

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हिन्दी और संस्कृत भाषा के प्रकाण्ड विद्वान, मनीषी, आचार्य और ग्रन्थकार पं. विद्या निवास मिश्र जी के सारस्वत जीवन पर ‘हिन्दुस्तानी’ त्रैमासिक का विशेषांक निकालने की तैयारी हिन्दुस्तानी एकेडेमी में की जा रही है। इसी सिलसिले में मुझे उनकी कुछ पुस्तकों को देखने का अवसर मिला।

भारतीय दर्शन, संस्कृति और लोकसाहित्य के प्रखर अध्येता और अप्रतिम उपासक श्री मिश्रजी अपने बारे में एक स्थान पर गर्व से स्वयं बताते हैं; “…वैदिक सूक्तों के गरिमामय उद्गम से लेकर लोकगीतों के महासागर तक जिस अविच्छिन्न प्रवाह की उपलब्धि होती है, उस भारतीय भावधारा का मैं स्नातक हूँ।”

यूँ तो उन्होंने भाषा, साहित्य, संस्कृति और समाज पर केन्द्रित विपुल मात्रा में शोधपरक लेखन किया है और विविध विषयों पर लिखे उनके ललित निबन्ध सर्वत्र प्रशंसित हुए हैं, लेकिन मैं यहाँ भोजपुरी लोकसंस्कृति का परिचय कराती उनकी पुस्तक वाचिक कविता : भोजपुरी का जिक्र करना चाहूंगा। इस पुस्तक ने मुझे इस प्रकार बाँध लिया कि कई जरूरी काम छोड़कर मैने इसे आद्योपान्त पढ़ डाला। अब इस अद्‌भुत सुख को आपसे बाँटने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ।वाचिक कविता भोजपुरी

पुस्तक वाचिक कविता: भोजपुरी
संपादक विद्यानिवास मिश्र
प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ (लोकोदय ग्रन्थमाला-६४१)
पता १८, इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड
नई दिल्ली- ११००३२

इस पुस्तक की भूमिका में भोजपुरी माटी में पले-बढ़े श्री मिश्र जी ने लोकसाहित्य के शिल्प विधान पर एक गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। जिनकी रुचि इसमें है वे पुस्तक खोजकर जरूर पढ़ें। मैं तो इस पुस्तक से आपको सीधे भोजपुरी माटी की सुगन्ध बिखेरती कुछ पारम्परिक रचनाओं का रसपान कराना चाहता हूँ।

कजली

रुनझुन खोलऽ ना हो केवड़िया, हम बिदेसवा ज‍इबो ना

जो मोरे सँइया तुहु ज‍इबऽ बिदेसवा, तू बिदेसवा ज‍इबऽ ना

हमरा बाबा के बोला दऽ, हम न‍इहरवा ज‍इबो ना

जो मोरी धनिया तुहु ज‍इबू न‍इहरवा, तू न‍इहरवा ज‍इबू ना

जतना लागल बा रुप‍इया ततना देके ज‍इहऽ ना

जो मोरे सँइया तुहु लेबऽ रुप‍इया, तू रुपइया लेबऽ ना

ज‍इसन बाबा घरवा रहलीं त‍इसन क‍इके ज‍इहऽ ना

[“रुनझुन (प्रिया, पत्नी)! दरवाजा खोलो, अब मैं विदेश जाऊँगा।” “मेरे प्रियतम! यदि तुम विदेश जाओगे तो मेरे पिताजी को बुला दो। मैं मायके चली जाऊँगी” “मेरी धनिया! यदि तुम्हें मायके जाना है तो (तुमपर) जितना रुपया खर्च हुआ है वह देकर ही जाना” “मेरे पति! यदि तुम रुपया (वापस) लेना चाहते हो तो मुझे वैसा ही वापस बना दो जैसी मैं अपने बाबा के घर पर थी”]

बेटी-विवाह (कन्यादान)

कवन गरहनवा बाबा साँझे जे लागे, कवन गरहनवा भिनुसार

कवन गरहनवा बाबा मड़वनि लागे, कब होइहें उगरह तोमार

चन्दर गरहनवा बेटी साँझे जे लागे, सुरुज गरहनवा भिनुसार

धिया गरहनवा बेटी मड़वनि लागे, कबहूँ न उगरह हमार

र‍उरा जे बाटे बाबा हंसराज घोड़वा सोनवे गढ़ावल चारो गोड़

ऊहे घोड़‍उआ बाबा धिया दान करबऽ, तब होइहें उगरह तोहार

बाभन काँपेला, माँड़ो काँपेला, काँपेला नगर के लोग

गोदी बिटिउआ लेले काँपेलें कवन बाबा, अब होइहें उगरह हमार

कथि बिना बाबा हो हुमियो ना होइहें, कथि बिना ज‍उरी न होइ

कथि बिना बाबा हो जग अन्हियारा कथि बिना धरम न होइ

घिव बिना बेटी हो हुमियो ना हो‍इहें, दूध बिना ज‍उरी न होइ

एक पुतर बिना जग अन्हियारा, धिया बिना धरम न होइ

[“बाबा! कौन ग्रहण साँझ को लगता है, कौन ग्रहण सुबह, कौन ग्रहण (विवाह) मण्डप में लगता है, (जिससे) तुम्हारा उग्रह कब होगा ?” “बेटी!चन्द्र ग्रहण साँझ को, सूर्य ग्रहण सुबह और पुत्री-ग्रहण मण्डप में लगता है, (जिससे) मेरा उग्रह कभी नहीं होगा।” “बाबा! आपके पास हंसराज घोड़ा है जिसके चारो पैर सोने से मढ़े हुए हैं। उसी घोड़े को कन्यादान में दे दीजिए (तो) आपका उग्रह हो जाएगा।” ब्राह्मण काँपता है, मण्डप काँपता है, नगर के लोग काँपते हैं, बेटी को गोद में बिठाए बाबा काँपते हैं (क्या) अब मेरा उग्रह होगा!” “बाबा! किसके बिना होम नहीं हो सकेगा, किसके बिना खीर नहीं बन सकेगी, किसके बिना दुनिया अन्धेरी होती है और किसके बिना धर्मपालन नहीं हो सकता?” “बेटी! घी के बिना होम व दूध के बिना खीर सम्भव नहीं और पुत्र के बिना दुनिया अन्धेरी होती है और पुत्री के बिना धर्म का पालन नहीं हो सकता।”]

इस पुस्तक में भोजपुरी लोकपरम्परा में रचे बसे अनेक विलक्षण गीतों को विविध श्रेणियों में बाँटकर सजोया गया है। इस विद्वान विभूति ने इन गीतों का अत्यन्त रसयुक्त और भावप्रवण हिन्दी अनुवाद भी कर दिया है जिससे भोजपुरी से अन्जान हिन्दी भाषी पाठक भी इसका रसास्वादन कर सकते हैं। श्रेणियों पर ध्यान दीजिए;

१.सुमिरल– मइया गीत, छठी मइया, पताती, संझा, बिरहा, सुमिरन की होली, सुमिरन का चैता, कजली, भजन, निरगुन, कन्हैया जागरण,

२.कहल- सोहर, खेलवना, नेवतन, सिन्दूर दान, सुहाग, जोग, झूमर, बहुरा गीत, हिन्डोला गीत, बेटी विदाई, जँतसार, मार्ग गीत, फगुई, कजली, होरी, बारहमासा, चैती, नेटुआ गीत, कँहार गीत, गोंड़ गीत,

३.बतियावल– जनेऊ, सोहर, कजली, बेटी विवाह, कन्यादान, विदाई, जँतसार, रोपनी गीत, सोहनी गीत, चइता

४.कथावल– सोहर, चैता, मार्गगीत, बारहमासा, कजरी, शिवविवाह, कलशगाँठ, बिरहा, रोपनी गीत,

इन श्रेणियों में जो अतुलित लोकरंग समाया हुआ है उसका रसास्वादन एक विलक्षण अनुभूति दे जाता है। पं.विद्यानिवास मिश्र जी की यह सुकृति अपनी माटी के प्रति अगाध श्रद्धा और सच्ची सेवाभावना और अपनी संकृति के प्रति उनकी निष्ठा की पुष्ट करती है।

सांस्कृतिक आदान प्रदान

vidyaniwas“…विलायती चीजों के आदान से मुझे विरोध नहीं है, बशर्ते कि  उतनी मात्रा में प्रदान करने की अपने में क्षमता भी हो। इस सिलसिले में मुझे काशी के एक व्युत्पन्न पंडित के बारे में सुनी कहानी याद आ रही है। उन पंडित के पास जर्मनी से कुछ विद्वान आये (शायद उन दिनों जो विद्वान संस्कृत सीखने आते थे, उनका घर जर्मनी ही मान लिया जाता था, खैर) और उनके पास टिक गये। स्वागत-सत्कार करते-करते पंडित जी को एक दिन सूझ आयी कि इन लोगों को भारतीय भोजन भारतीय ढंग से कराया जाये। सो वह इन्हें गंगा जी में नौका-विहार के लिए ले गये और गरमा-गरम कचालू बनवाकर भी लेते गये। नाव पर कचालू दोने में परसा गया, पंडित जी ने भर मुँह कचालू झोंक लिया, इसलिए उनकी देखादेखी जर्मन साहबों ने भी काफी कचालू एक साथ मुँह में डाला, और बस मुँह में जाने की देरी थी, लाल मिर्च का उनके संवेदनशील सुकंठ से संस्पर्श होते ही, वे नाच उठे और कोटपैंट डाले ही एकदम गंगा जी में कूद पडे। किसी तरह मल्लाहों ने उन्हें बचाया। पर इसके बाद उनका ‘अदर्शनं लोपः’ हो गया।”

दूसरे लोगों ने पंडित जी को ऐसी अभद्रता के लिए भलाबुरा कहा तो उधर से जवाब मिला, “…इन लोगें ने हमें अंडा-शराब जैसी महँगी और निशिद्ध चीजें खानी सिखलायीं तो ठीक और मैंने शुद्ध चरपरे भारतीय भोजन की दीक्षा एक दिन इन लोगों को देने की कोशिश की तो मैं अभद्र हो गया ?’’

…परन्तु मैं साहित्य में ऐसे आदान-प्रदान का पक्षपाती नहीं हूँ। सूफियों और वेदान्तियों के जैसे आदान-प्रदान का मैं स्वागत करने को तैयार हूँ, नहीं तो अपनी बपौती बची रहे, यही बहुत है।

विद्यानिवास मिश्र- ‘चितवन की छाँह’ में

यदि आपने पसन्द किया तो कुछ और रचनाएं आगे की कड़ियों में प्रस्तुत कर सकता हूँ।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

प्रकृति ने औरतों के साथ क्या कम हिंसा की है…?

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हाल ही में ऋषभ देव शर्मा जी की कविता ‘औरतें औरतें नहीं हैं’ ब्लॉगजगत में चर्चा का केन्द्र बनी। इसे मैने सर्व प्रथम ‘हिन्दी भारत’ समूह पर पढ़ा था। बाद में डॉ.कविता वाचक्नवी ने इसे चिठ्ठा चर्चा पर अपनी पसन्द के रूप में प्रस्तुत किया। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस (८ मार्च) के अवसर पर स्त्री विमर्श से सम्बन्धित चिठ्ठों की चर्चा के अन्त में यह कविता दी गयी और इसी कविता की एक पंक्ति को चर्चा का शीर्षक  बना दिया गया। इस शीर्षक ने कुछ पाठकों को आहत भी किया।

स्त्री जाति के प्रति जिस हिंसा का चित्रण इस कविता में किया गया है वह रोंगटे खड़ा कर देने वाला है। युद्ध की एक विभीषिका विजित राष्ट्र के पकड़े गये सैनिकों, नागरिकों, मर्दों और औरतों के साथ की जाने वाली कठोर और अमानवीय यातना के रूप में देखी जाती है। विजेता सैनिकों में उठने वाली क्रूर हिंसा की भावना का शिकार सबसे अधिक औरतों को होना पड़ता है। इसका कारण कदाचित्‌ उनका औरत होना ही है। बल्कि और स्पष्ट कहें तो उनका मादा शरीर होना है। जो पुरुष ऐसी जंगली पाशविकता की विवेकहीन कुत्सा के वशीभूत होकर इस प्रकार से हिंस्र हो उठता है वह स्वयं मानव होने के बजाय एक नर पशु से अधिक कुछ भी नहीं होता। मेरा मानना है कि जिसके भीतर मनुष्यता का लेशमात्र भी शेष है वह इस प्रकार के पैशाचिक कृत्य नही कर सकता। इस कविता में ऐसे ही नर-पिशाचों की कुत्सित भावना का चित्रण किया गया है।

सभ्यता के विकास की कहानी हमारे लिए भौतिक सुख साधनों की खोज और अविष्कारों से अधिक हमारी पाशविकता पर विवेकशीलता के विजय की कहानी है। यह मनुष्य द्वारा जंगली जीवन से बाहर आकर मत्स्य न्याय की आदिम प्रणाली का त्याग करके उच्च मानवीय मूल्यों पर आधारित समाज विकसित करने की कहानी है। यह एक ऐसे सामाजिक जीवन को अपनाने की कहानी है जहाँ शक्ति पर बुद्धि और विवेक का नियन्त्रण हो। जहाँ जीव मात्र की अस्मिता को उसकी शारीरिक शक्ति के आधार पर नहीं बल्कि उसके द्वारा मानव समाज को किये गये योगदान के महत्व को आधार बना कर परिभाषित किया जाय। जहाँ हम वसुन्धरा को वीर-भोग्या नहीं बल्कि जननी-जन्मभूमि मानकर आदर करें। जहाँ हम नारी को भोग की वस्तु के बजाय सृजन और उत्पत्ति की अधिष्ठात्री माने और उसे उसी के अनुरूप प्रतिष्ठित करें।

यदि हम अपने मन और बुद्धि को इस दृष्टिकोण से संचालित नहीं कर पाते हैं तो यह हमें उसी पाशविकता की ओर धकेल देगा जहाँ निर्बल को सबल के हाथों दमित होते रहने का  दुष्चक्र झेलना पड़ता है। वहाँ क्या पुरुष और क्या नारी? केवल ‘शक्तिशाली’ और ‘कमजोर’ की पहचान रह जाती है। इस जंगली व्यवस्था में नर की अपेक्षा नारी को कमजोर पाया जाता है और इसी लिए उसे पीड़िता के रूप में जीना-मरना पड़ता है।

आपने देखा होगा कि यदि बन्दरों के झुण्ड में अनेक नर वानर हों तो वे आपस में भी हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। मादा वानर पर आधिपत्य के लिए अधिक शक्तिशाली नर कमजोर नर को भी अपनी हिंसा का शिकार उसी प्रकार बनाता है जिस प्रकार वह मादा को अपनी शक्ति से वश में करने के लिए हिंसा का भय दिखाता है। यह बात दीगर है कि बन्दरों में भी मादा को रिझाने के लिए मनुष्यों की भाँति ही दूसरे करतब दिखाने की प्रवृत्ति भी पायी जाती है। कदाचित्‌ इसलिए कि कोमल प्रेम का अवदान बलप्रयोग से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

हम अपने समाज में जो हिंसा और उत्पीड़न देखते हैं उसके पीछे वही पाशविकता काम करती है जो हमारे आदिम जीवन से अबतक हमारे भीतर जमी हुई है। सभ्यता की सीढ़ियाँ चढते हुए हम आगे तो बढ़ते आये हैं लेकिन इस सतत प्रक्रिया में अभी बहुत लम्बा रास्ता तय करना बाकी है। बल्कि सम्पूर्ण मानव प्रजाति के अलग-अलग हिस्सों ने अलग-अलग दूरी तय की है। तभी तो हमारे समाज में सभ्यता के स्तर को भी ‘कम’ या ‘ज्यादा’ के रूप में आँकने की जरूरत पड़ती है। जिस समाज में स्वतंत्रता, समानता और न्याय के मूल्य जिस मात्रा में प्रतिष्ठित हैं वह समाज उसी अनुपात में सभ्य माना जाता है।

औरत को प्रकृति ने कोमल और सहनशील बनाया है क्यों कि उसकी कोंख में एक जीव की रचना होती है। उसे वात्सल्य का स्निग्ध स्पर्श देना और स्वयं कष्ट सहकर उस नन्हें जीव को सकुशल इस धरती पर उतारना होता है।

जीवोत्पत्ति की सक्रिय वाहक बनने की प्रक्रिया स्त्री को अनेक शारीरिक कष्ट और मानसिक तनाव देती है। यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही उसके शरीर से रक्तश्राव का प्राकृतिक चक्र शुरू हो जाता है और इसके प्रारम्भ होते ही तमाम हार्मोन्स उसकी मनोदशा को तनाव ग्रस्त करते जाते हैं। इस अतिरिक्त जिम्मेदारी के साथ जीना उसे सीखना ही पड़ता है। वह इसे प्रकृति का अनुपम वरदान मानकर  इसमें सुख ढूँढ लेती है। रितु क्रिया को लेकर अनेक धार्मिक और पारिवारिक रूढ़ियाँ स्त्री को हीन दशा में पहुँचाने का काम करती हैं। कहीं कहीं इस अवस्था में उसे अछूत बना दिया जाता है। घर के किसी एकान्त कोने में अस्पृश्य बनकर पड़े रहना उसकी नियति होती है। घर की दूसरी महिलाएं ही उसकी इस दशा को लेकर एक बेतुकी आचार संहिता बना डालती हैं। आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक जानकारी के अभाव में यह सजा किसी भी औरत को भोगनी पड़ जाती है।

तरुणाई आते ही शरीर में होने वाले बड़े बदलाव के दर्द को महसूस करती, अपने आस पास की नर आँखों से अपने यौवन को ढकती छुपाती और बचपन की उछल कूद को अपने दुपट्टे में बाँधती हुई लड़की अपने समवयस्क लड़कों की तेज होती रफ़्तार से काफी पीछे छूट जाती है। लड़के जहाँ अपनी शारीरिक शक्ति का विस्तार करते हैं वहीं लड़कियों को परिमार्जन का पाठ पढ़ना पड़ता है।

जीवन में आने वाले पुरुष के साथ संसर्ग का प्रथम अनुभव भी कम कष्टदायक नहीं होता। आदमी जब अपने पुरुषत्व के प्रथम संधान का डंका पीट रहा होता है तब औरत बिना कोई शिकायत किए एक और रक्तश्राव को सम्हाल रही होती है। ऐसे रास्ते तलाश रही होती है कि दोनो के बीच प्रेम के उत्कर्ष का सुख सहज रूप में प्राप्त हो सके। पुरुष जहाँ एक भोक्ता का सिंहनाद कर रहा होता है, वहीं स्त्री शर्माती सकुचाती भोग्या बनकर ही तृप्ति का भाव ढूँढती है।

स्त्री देह में एक जीव का बीजारोपण शारीरिक और मानसिक तकलीफों का एक लम्बा सिलसिला लेकर आता है। इस पूरी प्रक्रिया में कभी कभी तो जान पर बन आती है। लेकिन सामान्य स्थितियों में भी अनेक हार्मोन्स के घटने बढ़ने से शुरुआती तीन-चार महीने मितली, उल्टी और चक्कर आने के बीच ही कटते हैं। बहुत अच्छी देखभाल के बावजूद ये कष्ट प्रायः अपरिहार्य हैं। जहाँ किसी अनुभवी महिला द्वारा देखभाल की सुविधा उपलब्ध नहीं है वहाँ समस्या गम्भीर हो जाती है।

जब हम किसी कष्ट को बड़ा और असह्य बताना चाहते हैं तो उसकी तुलना ‘प्रसव वेदना’ से करते हैं। लेकिन उसका क्या कीजिए जिसे प्रकृति ने ही इस वेदना का पात्र बना रखा  है। कोई पुरुष दुःख बाँटने की चाहे जितनी कोशिश कर ले, यह कष्ट सहन करने का भार औरत के ही हिस्से में रहेगा। अत्यन्त पीड़ादायी प्रसव के बाद महीनों चलने वाला रक्त श्राव हो या नवजात के साथ रात-दिन जाकर उसकी सफाई-दफाई करने और स्तनपान कराने का क्रम हो, ये सभी कष्ट अपरिहार्य हैं। इन्हें स्त्री प्रकृति का वरदान मानकर गौरव का अनुभव भले ही करती है और इससे कष्ट के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन भी हो जाता होगा, लेकिन कष्ट की मात्रा कम नहीं होती।

ऊपर मैने जो कष्ट गिनाए हैं वो तब हैं जब स्त्री को भले लोगों के बीच सहानुभूति और संवेदना मिलने के बावजूद उठाने पड़ते हैं। अब इसमें यदि समाज के हम नर-नारी अपनी नासमझी, पिछड़ेपन, ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, काम, क्रोध, मद, लोभ, उन्माद, महत्वाकांक्षा, आदि विकारों के वशीभूत होकर किसी स्त्री को अन्य प्रकार से भी कष्ट देते हैं तो इससे बड़ी विडम्बना कुछ नहीं हो सकती है।

मुझे ऐसा लगता है कि प्रकृति ने स्त्री के लिए जैसी जिम्मेदारी दे रखी है उसे ठीक से निभाने के लिए उसने पुरुष को भी अनेक विशिष्ट योग्यताएं दे रखी हैं। शारीरिक ताकत, युद्ध कौशल, शक्तिप्रदर्शन, निर्भीकता, मानसिक कठोरता, स्नेहशीलता, अभिभावकत्व, और विपरीत परिस्थितियों में भी दृढ़्ता पूर्वक संघर्ष करने की क्षमता प्रायः इनमें अधिक पायी जाती है। लेकिन यह भी सत्य है कि पुरुषों के भीतर पाये जाने वाले ये गुण स्त्रैण विशिष्टताओं की भाँति अनन्य नहीं हैं बल्कि ये स्त्रियों में भी न्यूनाधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

ऐसी हालत को देखते हुए एक सभ्य समाज में स्त्री के प्रति किए जाने वाले व्यवहार में प्रकृतिप्रदत्त इस पीड़ा को कम करने के लिए भावनात्मक सम्वेदना, सहानुभूति और कार्यात्मक सहयोग देना अनिवार्य है। उसकी कठिनाई को उसके प्रति सहृदयता, संरक्षण और सामाजिक सुरक्षा देकर कम किया जा सकता है। समाज में उसकी प्रास्थिति को सृजन और उत्पत्ति के आधार के रूप में गरिमा प्रदान की जानी चाहिए, उसे एक जननी के रूप में समादृत और महिमा मण्डित किया जाना चाहिए, जीवन संगिनी और अर्धांगिनी के रूप में बराबरी के अधिकार का सम्मान देना चाहिए और सबसे बढ़कर एक व्यक्ति के रूप में उसके वहुमुखी विकास की परिस्थितियाँ पैदा करनी चाहिए।

इसके विपरीत यदि हम किसी औरत की कमजोरी का लाभ उठाते हुए उसका शारीरिक, मानसिक वाचिक अथवा अन्य प्रकार से शोषण करते हैं तो निश्चित रूप से हम सभ्यता के सोपान पर बहुत नीचे खड़े हुए हैं।

आजकल स्त्री विमर्श के नाम पर कुछ नारीवादी लेखिकाओं द्वारा कुछेक उदाहरणों द्वारा पूरी पुरुष जाति को एक समान स्त्री-शोषक और महिला अधिकारों पर कुठाराघात करने वाला घोषित किया जा रहा है और सभी स्त्रियों को शोषित और दलित श्रेणी में रखने का रुदन फैलाया जा रहा है। इनके द्वारा पुरुषवर्ग को गाली देकर और महिलाओं में उनके प्रति नफ़रत व विरोध की भावना भरकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जा रही है। यह सिर्फ़ उग्र प्रतिक्रियावादी पुरुषविरोधवाद होकर रह गया है। यह प्रवृत्ति न सिर्फ़ विवेकहीनता का परिचय देती है बल्कि नारी आन्दोलन को गलत धरातल पर ले जाती है।

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हमें कोशिश करनी चाहिए कि सामाजिक शिक्षा के आधुनिक माध्यमों से स्त्री-पुरुष की भिन्न प्रास्थितियों को समझाते हुए उनके बीच उच्च मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु मिल-बैठकर विचार-विमर्श करें और कन्धे से कन्धा मिलाकर साझे प्रयास से एक प्रगतिशील समतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में आशावादी होकर काम करें।

आइए हम खुद से पूछें कि प्रकृति ने औरतों के साथ क्या कम हिंसा की है जो हम इस क्रूरता को तोड़्ना नहीं चाहते…? यदि तोड़ना चाहते है तो सच्ची सभ्यता की राह पर आगे क्यों नहीं बढ़ते…?

(सिद्धार्थ)

गुलदस्ते के बहाने… एक स्त्री विमर्श

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 iindin woman

यह बात तो मुझे भी खटकती रही है। जब भी मैने किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि को गुलदस्ता भेंट करने के लिए किसी स्त्री-पात्र की ‘खोज’ करते आयोजकों को देखा तो मन खिन्न हो गया। क्या गुलदस्ता पेश करने का आइटम इतना जरूरी है कि मुख्य कार्यक्रम का समय काटकर भी बड़े जतन से इसे अन्जाम देने की व्यवस्था की जाती है। कभी कभी तो बाहरी कलाकारों की ‘आउटसोर्सिंग’ तक की जाती है। यद्यपि माननीय मन्त्री जी या कोई वी.आई.पी. शायद ही गुलदस्ता देने वाले अपरिचित चेहरे पर ध्यान देने की फुरसत में होते होंगे। गुलदस्ता भी क्षणभर में उनके पी.ए. के हाथों से होता हुआ अर्दली और फिर ड्राइवर के पास विराम पाता है। लेकिन इस चारण प्रथा के क्या कहने?

इस निहायत गैर जरूरी प्रथा को अस्वीकार्य बताते हुए सुजाता जी ने चोखेर बाली पर एक पोस्ट लिखी है। शुरुआती बात एकदम दुरुस्त है लेकिन इस एक बात के अलावा जो दूसरी बातें लिखीं गयी हैं, और उनपर जो प्रतिक्रियाएं आयी हैं, उन्हें पढ़ने के बाद मन में कुछ खटास आ गयी है। मेरा मन कुछ और सोच रहा है…।

मैंने पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक छोटे से कस्बे के एक सरस्वती शिशु मन्दिर से प्रारम्भिक शिक्षा पायी है। भारतीय संस्कृति और संस्कारों पर आधारित शिक्षा देने का छोटा सा प्रयास वहाँ होता था। विद्यालय के आचार्य (पुरुष और महिला ) हमें राष्ट्रीय पर्वों पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी कराते थे। इसके अतिरिक्त वसन्त पंचमी पर हम वार्षिक शिविर में तीन दिन और दो रातें विद्यालय प्रांगण में ही सामूहिक निवास करते हुए विविध पाठ्येतर क्रियाकलापों में सहभागी होते थे। वहाँ हम एक दूसरे को भैया-बहन सम्बोधित करते थे। हमने वहाँ गुलदस्ता भेंट कार्यक्रम नहीं देखा। मुख्य अतिथि के आने पर लड़कियों द्वारा सरस्वती वन्दना व स्वागत गीत, लड़कों द्वारा सलामी और स्वागत गान, लड़के-लड़कियों द्वारा सामूहिक गायन व नृत्य, नाटक, एकांकी, देशगान। मुख्य अतिथि का शिक्षकों द्वारा माल्यार्पण। इस सबके बीच ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी लड़की या शिक्षिका को उसकी गरिमा को ठेस लगाने वाला कोई कार्य सौंपा गया हो।

02-Air Hostessमेरा मानना है कि भारतीय परम्परा और संस्कृति के बारे में जानना हो तो महानगरों की लकदक दुनिया से निकल कर छोटे कस्बों और गाँवों की ओर जाना चाहिए। जहाँ पाश्चात्य शैली की भौतिकवादी हवा अभी नहीं पहुँच सकी है। वहाँ की औरतें भी अतिथि सत्कार करती हैं लेकिन गुलदस्ता थमाकर नहीं। अतिथि से पर्दा रखकर वे उसके खाने-पीने के लिए अच्छे पकवान बनाती हैं, खिलाते समय एक ओट लेकर पारम्परिक व विनोदपूर्ण गीत (गारी) भी गाती हैं। बच्चों के माध्यम से बात-चीत भी कर लेती हैं। घर परिवार में स्त्री-पुरुष के बीच का सम्बन्ध केवल पति-पत्नी का नहीं होता। भाई-बहन, बुआ-भतीजा, चाचा-भतीजी, बाप-बेटी, ससुर-बहू, जेठ-अनुजवधू, देवर-भाभी, जीजा-साली, सलहज-ननदोई, आदि अनेक रिश्तो का निर्वाह उनकी विशिष्टताओं के साथ पूरी गरिमा और बड़प्पन से होता है। मालिक-नौकरानी, या मालकिन-नौकर का सम्बन्ध भी एक मर्यादा में परिभाषित होता है।

आजकल भी जहाँ थोड़े सभ्य और समझदार लोग होते हैं वहाँ स्वागत कार्यक्रम में अतिथि का माल्यार्पण जरूर किया जाता है। लेकिन माला पहनाने का कार्य कभी भी विपरीत लिंग के व्यक्ति द्वारा नहीं किया जाता है। किसी पुरुष को महिला द्वारा या किसी महिला को पुरुष द्वारा माला पहनाने का सिर्फ़ एक ही स्थापित सन्दर्भ और प्रसंग भारतवर्ष में मान्यता प्राप्त है। वह है वैवाहिक अवसर जहाँ स्त्री-पुरुष एक दूसरे का वरण कर रहे होते हैं। इसके अतिरिक्त किसी परपुरुष या परस्त्री को फूलों की भेंट देना हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। प्रेमी जोड़े भी आपस में इसका आदान-प्रदान एक हद तक सामाजिक स्वीकृति के बाद करने लगे हैं।

तो फिर किसी अतिथि पुरुष के लिए नारी पात्र के हाथ में यह गुलदस्ता कहाँ से आया। मेरा मानना है कि यह फैशन उसी पश्चिमी सभ्यता से आयातित है जो कथित रूप से मनुष्य की स्वतन्त्रता, समानता और न्याय का स्वयंभू अलम्बरदार है। जहाँ पिता-पु्त्री, माँ-बेटा और भाई-बहन के अतिरिक्त स्त्री-पुरुष के बीच सभी रिश्ते लैंगिक सन्दर्भ में समान रूप से देखे जाते हैं। दो विपरीत लिंग के व्यक्तियों के बीच होने वाला स्वाभाविक आकर्षण वहाँ की व्यवहार संहिता (etiquettes) को निरूपित करता है। शायद वहाँ इसको बहुत बुरा नहीं माना जाता है। नारी देह के आकर्षण को भुनाने की रीति वहाँ स्थापित और जगविदित है। यदि प्रस्तोता उसमें सहज है तो उसके स्निग्ध स्पर्श और कोमल वाणी से किसे आपत्ति हो सकती है। आप यह तो मानेंगे ही कि सहजता कभी आरोपित नहीं की जा सकती।

बड़े-बड़े जलसों में स्वागत-सत्कार, मेहमानों  की सेवा, पुरस्कार का थाल सजाकर लाने-लेजाने और बिना बात मुस्कराने के लिए भाड़े पर कमनीय काया की धनी नवयौवनाओं की भर्ती जलसा-प्रबन्धकों  (event managers) द्वारा की जाती है। यह सब पश्चिम से ही इधर आया है। गुलदस्ता थमाने कि नौटंकी वहीं से आयातित है। लेकिन वहाँ इस विमर्श पर कान देने वाला कोई नहीं है।

विमान परिचारिका, फैशन व विज्ञापन मॉडेल्स, फिल्मी कलाकार, सौन्दर्य प्रतियोगिताएं, टीवी और इंटरनेट चैनेल्स तथा चमकीली रंगीन पत्र-पत्रिकाओं में अपना कैरियर तलाश करती लड़कियों का यू.एस.पी. क्या है? …एक पेश करने लायक व्यक्तित्व ( a presentable personality) या कुछ और? [कुछ लोग इसे ‘दिखाने लायक शरीर’ पढ़ और समझ लें तो मुझे उनकी सोच पर दया ही आएगी।] इन क्षेत्रों में लड़कों के साथ लड़कियों की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं होती। जबकि ये सारे कार्य लड़के भी कर सकते हैं। कहीं कहीं तो अघोषित रूप से शत-प्रतिशत आरक्षण लड़कियों के लिए ही है। जहाँ प्रतिस्पर्धा ही नहीं होती। लेकिन मैने इसे लेकर कहीं असन्तोष का स्वर नहीं सुना।

तो क्या अब स्त्री-विमर्श की नयी विचारभूमि इन सौन्दर्य और आकर्षक व्यक्तित्व पर आधारित व्यवसायों पर ताला लगवाने के उपाय ढूँढेगी? क्या यह मान लिया जाय कि यह सब स्त्री की गरिमा के विरुद्ध है क्योंकि इससे पुरुष आनन्द और सुख प्राप्त करते हैं। क्या यह निष्कर्ष भी निकाला जाय कि ऐसी लड़कियों को देखने वाला पुरुष उसे पत्नी या माशूका के रूप में कल्पित करता है? छिः…। कम से कम मैं ऐसा मानने को तैयार नहीं हूँ।

मुझे हैरानी है कि लेखनी की स्वतन्त्रता का ऐसा दुरुपयोग इस ब्लॉगजगत में हो रहा है। हम किस दिशा में जा रहे हैं?

और अन्त में…

मेरी पिछली पोस्ट में प्रकाशित कहानी की लेखिका श्रीमती रागिनी शुक्ला ने अपनी प्रतिक्रिया चिठ्ठी लिखकर भेंजी है। उन्हें हार्दिक धन्यवाद देते हुए पत्र यहाँ आपके लिए प्रस्तुत है:

LETTER BHABHI JI सिद्धार्थ जी, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने अपने ब्लॉग के माध्यम से पाठकों से मेरा परिचय करवाया। और आज ‘दुलारी’ की कहानी आपके ही द्वारा सभी तक पहुँची। सही मायने में दुलारी की डोली को आपने ही सजाया है। दुलारी की कहानी पिछले आठ सालों से घर के कोने में पड़ी धूल फाँक रही थी। यह कहानी पहले भी कई पत्रिकाओं में मैंने भेजी थी और सभी ने इसे कूड़ेदान में ही स्थान दिया। लेकिन आपने अपने ब्लॉग के माध्यम से इसे सम्मान दिया। आज दुलारी हमारे बीच नहीं है, लेकिन आपके माध्यम से वह फिर जीवित हो गयी है।

हमारे जैसे बहुत से लोग होंगे जो दुलारी जैसी न जाने कितनी कहानियाँ लिख कर अपने मन के भावों को शब्दों में पिरोए होंगे लेकिन सही माध्यम न मिलने के कारण वह पाठकों तक नहीं पहुँच पाती, और अपने मन की भावनाओं को कागज में लिखकर किसी कोने में डाल देते हैं। इसलिए मेरी भगवान से प्रार्थना है कि जो लोग किसी की पीड़ा को जानते हों और उसे लिखते हों तो उन्हें भी आपके जैसा माध्यम मिले जिससे उन्हें और लिखने की प्रेरणा मिल सके। और जैसे मेरी दुलारी की, उसी तरह सभी की भावनाओं की डोली सजे।

                        -रागिनी शुक्ला

दुलारी के बहाने एक अतिथि पोस्ट…!

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सत्यार्थमित्र की अकिंचन शुरुआत करते समय मैने यह तो जरूर सोचा था कि अपने मन के भीतर उठने वाले विचारों को शब्दों में ढालकर यहाँ पिरोता रहूंगा लेकिन तब मैने यह कल्पना भी नहीं की थी कि मेरा यह अहर्निश अनुष्ठान मेरे आसपास की प्रतिभाओं के उनकी घर गृहस्थी में पूरी तरह से रमे हुए मन को भी इधर खींच लाएगा और इस हल्की सी डोर को पकड़कर वे नयी ऊँचाई छूने की ओर बढ़ चलेंगी। इन पन्नों पर श्रीमती रचना त्रिपाठी ने जो लिखा उसे आपकी सराहना मिली। बालमन की कविताओं ने भी आपका ध्यान खींचा। उनकी लिखी सत्यकथा ‘एक है हिरमतिया’ को बार-बार पढ़कर भी मैं नहीं अघाता। इन पोस्टों की मौलिकता को अक्षुण्ण रखते हुए हल्के-फुल्के संपादन से इन्हें आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए मुझे एक अलग तरह का सन्तोष मिलता है।

इसी क्रम में आज एक और विशुद्ध गृहिणी की कलम से निकली रचना आपको पढ़वा रहा हूँ। इस सत्यकथा की पात्र से भी मैं स्वयं मिल चुका हूँ। अपनी ससुराल में।  यह कथा पढ़कर मेरे सामने ताजा हो गयी हैं उसके चेहरे पर मकड़ी का जाल बन चुकी असंख्य झुर्रियाँ, फिर भी उम्र का सही अनुमान लगाना मुश्किल…। किसी वामन महिला को मैने इससे पहले देखा जो नहीं था। उसके मुँह से कभी कोई शब्द मैंने सुना ही नहीं। बिल्कुल शान्त और स्थिर…। …अरे दुलारी की कथा तो मैंने ही सुनाना शुरू कर दिया।

लीजिए, मूल लेखिका श्रीमती रागिनी शुक्ला की कलम से निसृत यह कथा पेश है मूल रूप में-

दुलारी

बैशाख मास की दोपहर की धूप…। ऐसा लग रहा था जैसे सूखी लकड़ियों की आग जल रही हो, हवा भी आग की लपट लेकर आ रही हो, जरा सा बाहर निकलने पर पूरा शरीर झुलस जाता था, इस मास की गर्मी से सभी त्रस्त हैं, सुबह से ही तेज हवाएं चलनी शुरू हो जाती , ऐसा लगता कि पत्तों के आपस में टकराने पर आग लग जाएगी।

गाँव के सभी बच्चे-जवान-बूढे घर छोड़कर सुबह से ही बागीचे में चले जाते, शायद पेड़ के साये में थोड़ी राहत मिलती है, गाँव में एक घर है जिसे बाबा के घर के नाम से जाना जाता है, वहां पर घर की ‘दादी’ गाँव के हर घर के सुख-दुःख का ध्यान रखती। आज दोपहर के एक बज गये थे। दादी की आखों में नींद नही आ रही, वह परेशान थीं क्योंकि दुलारी खाना लेने नहीं आई थी, बहादुर से दुलारी को बुलाने के लिये कहती हैं, बहादुर बताता है, “मैं वहीं से आ रहा हूँ, दुलारी घर पर नहीं है, दादी परेशान हो जाती है, इतनी गर्मी है, दुलारी कहाँ गयी होगी ?

दुलारी को कोई न कोई हमेशा परेशान करता रहता है, हर कोई उससे मजाक करता रहता है, प्रकृति के आगे सभी नतमस्तक हैं। किसी को बौना बना दे तो क्या कर सकते हैं। लेकिन दुलारी के साथ यह एक क्रूर मजाक से कम नहीं। आज भी महिलाएं उसके सिन्दूर और बिन्दी को देखकर हँसी करती हैं, “का दुलारी फ़ुआ, आज फ़ूफ़ा आवताने का?” दुलारी मन ही मन बुदबुदाती हुई आगे बढ जाती।

फिर भी उसका मन हार मानने को तैयार नहीं। आज अस्सी साल की उम्र में भी दुलारी की मांग का सिन्दूर और माथे की बिन्दिया कभी हल्की नहीं हुई। दो भाइयों के बीच अकेली बहन थी …दुलारी। माँ-बाप ने उसकी शादी बचपन में ही बड़े अरमानों से की थी, सात साल पर गौना तय हुआ था। लेकिन ईश्वर के आगे किसी की नहीं चलती। गौना होने से पहले ही दुलारी के सिर से उसके माँ-बाप का साया उठ गया, और भगवान भी जैसे दुलारी को भूल ही गया था। प्रकृति के पोषण का अजस्र श्रोत जैसे दुलारी के लिए सूख सा गया। उसका कद छःसाल के बच्चे के बराबर ही रह गया। लड़के वाले उस वामन बालिका को विदा कराने ही नहीं आए।

आज सत्तर साल की दुलारी अपने दोनो भाईयों की अपेक्षा बहुत ही स्वाभिमानी है, आज भी गरीब होने के बावजूद अपनी मेहनत से अपना पेट पाल रही है। जबकि उसके दोनों भाई खेती-बारी बेंचकर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। दुलारी अपने छ्प्पर के घर में संतुष्ट रहती। उसने बकरी पाल रखी थी। अक्सर देखा जाता कि दुलारी अपनी बकरी से कुछ-कुछ बातें करती रहती, शायद अपने दु:ख-सुख कहती। वह बकरी उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी। क्योंकि वह कभी भी उसकी हँसी नहीं उड़ाती, और दुलारी की एक आवाज पाकर वह दौड़ी उसके पास चली आती थी। दुलारी अपनी बकरी की देखभाल बिल्कुल अपने बच्चों की तरह करती रहती, गर्मियों में नियमित स्नान कराती। जाड़े के दिनों मे उसके लिये कपड़े और बिस्तर बनाती।

रोज सुबह पाँच बजते ही दुलारी बाबा के घर जाती और बिना कहे ही, झाड़ू उठाती और धीरे-धीरे पूरे घर में झाड़ू लगाती। बाबा के घर का हर सदस्य दुलारी का बड़ा ही सम्मान करता, किसी दिन अगर दुलारी नहीं आती तो उसका हाल-चाल लेने दादी किसी को जरूर भेज देती। सुबह का खाना दुलारी बाबा के घर से ले जाती, और अपनी बकरी के साथ मिलकर खाती। शाम का खाना दादी उसके घर भेंज देती।

दुलारी को भी बाबा के घर से बहुत ही प्रेम था, जब भी बाबा के घर में कोई नन्हा मेहमान आता तो दुलारी अपने हाथों से बनी हुई मूँज की छोटी सी टोकरी लाना नहीं भूलती। दर्जी की दुकान से बेकार कपड़ों की कतरन लाती, घोड़ा-हाथी-बन्दर बनाती और बच्चे को उपहार देती। दुलारी का यह उपहार बाबा के घर के हर शिशु को मिलता रहा।

…लेकिन ग्रामीण समाज दुलारी के साथ उतना उदार नहीं था। उस दिन दादी दुलारी का काफ़ी देर तक इंतजार करती रहीं। दादी ने बहादुर को उसकी झोपड़ी पर भेजा तो पता चला कि वह कुछ विशेष तैयारियों में जुटी है। अपने घर को गाय के गोबर से लीप-पोत कर साफ कर रही थी। कुछ औरतें दुलारी को मेंहदी लगाने की तैयारी में जुटी थीं। उसकी बकरी भी आज बेच दी गई थी। लेकिन अपनी प्यारी बकरी को बेंचकर भी दुलारी बहुत प्रसन्न नजर आ रही थी। बकरी को बेचनें से जो पैसे मिले थे उससे दुलारी के लिये धोती और पायल मंगाई गई थी। उसके दरवाजे पर पीली धोती सुखाई जा रही थी और दुलारी मन ही मन बहुत खुश थी कि इस बार की ‘लगन’ में हमारी भी विदाई होने वाली है। ससुराल जाने का उत्साह हिलोरें ले रहा था।

दिन भर गांव की औरतें भोली-भाली दुलारी को सजा-सवाँर कर शादी-विवाह का गीत गाती रहीं और अपना मनोरंजन करती रहीं। शाम होते ही हंसी का ठहाका लगाकर सभी अपने-अपने घर चलती बनीं। आज दुलारी को भूख प्यास तो लग ही नहीं रही थी। शाम से ही ‘पियरी’ पहने, हाथों में चूड़ियाँ डाले, माथे पर बिन्दी लगाए, मांग मे सिन्दूर भरकर, रंगे हुए पैरो में छम-छम करते घुँघरू वाली पायल पहने, रात भर अपनी झोपड़ी में बैठी रही। नए घर में जाने के इंतजार में सुबह होने तक दरवाजे पर दीपक जलाये किसी का इंतजार करती रही। सुबह होने तक उसे यह भान नही था कि उसके साथ मजाक किया गया है।

तब से दुलारी पूरे गाँव में चर्चा का विषय बन गयी। हर कोई उसकी झोपड़ी में जरूर झाँक आता। कुछ मनबढ़ किस्म की औरतों के नाते उसकी बकरी भी चली गई, जिससे वह अपना सुख-दुख बाँटती थी। अब दुलारी किसी के घर नहीं आती-जाती थी। दादी उसके लिये सुबह-शाम खाना भिंजवा देतीं। दुलारी सुबह होते ही बागीचे में निकल जाती। तिराहे से बागीचे की ओर आने वाली सड़क पर बैठकर टकटकी लगाये देखती रहती, ऐसा लगता जैसे उसके सपनों का राजकुमार आनेवाला हो। रोज का यही क्रम है…।

आज दुलारी ८० साल की हो चुकी है। उसको अभी भी चार कंधों की डोली का इंतजार है। …दुलारी के लिए डोली तो एक दिन जरूर आएगी। लेकिन शायद दुलारी उसे अपनी आँखों से देख न पाये। …वह डोली चढ़कर ही सबसे विदा लेगी लेकिन उसे कन्धा देने वाले कोई और ही होंगे। शायद यहाँ से विदा होकर ही उसके सपनों का साथी उसे मिल सकेगा।

-(श्रीमती) रागिनी शुक्ला

यह सप्ताह बहुत व्यस्त रहा। ब्लॉगरी की आभासी दुनिया मेरे लिए सजीव हो उठी थी। हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने कविता वाचक्नवी जी की पुस्तक प्रकाशित कर उसका लोकार्पण कराया। इलाहाबाद में उन्हें पाकर मैने लगे हाथों गुरुदेव ज्ञानदत्त जी के घर का दरवाजा खटखटा लिया। आन्ध्र प्रदेश से कई डिब्बों में भर कर लायी गयी स्वादिष्ट चन्द्रकला के साथ रीता भाभीजी के हाथ के बने ढोकले और फोन पर उपस्थित अनूप जी फुरसतिया के चटाखेदार गोलगप्पों का आनन्द लिया गया। स्त्री-विमर्श की चर्चा भी हुई…। लेकिन जो ‘घाघ’ था उसने अपने पत्ते नहीं खोले। 🙂

मेरे मोबाइल का कैमरा यहाँ भी ड्यूटी पर था-

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(१)नन्हे सत्यार्थ को फोटू खिंचाना खूब भाता है। सो सबसे पहले दीदी के साथ ऑण्टी के बगल में। (२) रचना और रीता भाभीजी के बीच में कविता जी (३) गुरुदेव के साथ

मैं इधर हूँ- कैमरे के पीछे।

(सिद्धार्थ)

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