औरतों को पूरा बदल देना चाहते हैं चेतन भगत

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[chetan%2520bhagat%255B4%255D.jpg]चेतन भगत ने अपने उपन्यासों से नौजवानों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है। एक बिन्दास, साहसी, स्पष्ट सोच रखने वाला और बातों का धनी नौजवान लेखक। सामाजिक मसलों पर खुली राय रखने के लिए उन्हें टीवी चैनेलों पर भी देखा जा सकता है और यत्र-तत्र अंग्रेजी अखबारों में भी। कुछ नया सोचने और पेश करने का सलीका उन्हें खूब आता है। हाल ही में महिला दिवस के मौके पर लिखे अपने एक छोटे से आलेख (ब्लॉग पोस्ट) में उन्होंने पहले तो वे बिन्दु गिनाये हैं जो महिलाओं के प्रति पुरुषों के व्यवहार में परिवर्तन की अपेक्षा करते हैं। इसे ईमानदारी से उन्होंने स्वीकार भी कर लिया; लेकिन उनकी चर्चा फिर कभी। यहाँ यह बताना है कि उस आलेख में उन्होंने यह सलाह दे डाली कि सभी महिलाओं को अपने भीतर निम्नलिखित पाँच मौलिक परिवर्तन करने की आवश्यकता है :

  1. दूसरी महिलाओं की अनावश्यक आलोचना करना बन्द करें। वे हमेशा दूसरी महिलाओं के बारे में अपना फैसला सुनाने को आतुर रहती हैं। यह फैसला प्रायः कठोर ही रहता है। वे अपने प्रति भी कठोर होती हैं लेकिन महिलाएं एक-दूसरे के प्रति तो कुछ ज्यादा ही कठोर होती हैं। खराब फिटिंग के पहनावे से लेकर बिगड़ गये पकवान तक। वे टिप्पणी करने से नहीं चूकतीं। भले ही वे जानती हैं कि कोई भी सर्वगुणसंपन्न नहीं होता।
  2. झूठा व्यवहार करना बन्द करें। महिलाओं में यह आम प्रवृत्ति होती है कि अगले को खुश करने के लिए, खासकर पुरुष-अहम्‌ को तुष्ट करने के लिए ऐसा कुछ करती हैं जो उन्हें खुद ही सही नहीं लगता। जैसे किसी बचकाने चुटकुले पर भी जबरदस्ती हँसना, बॉस द्वारा नाजायज काम सौंपने पर भी खुशी-खुशी स्वीकर कर लेना, किसी बड़बोले की आत्मश्लाघा को चुपचाप सुनते हुए उसे अपने से श्रेष्ठतर समझने देना। यह सब खुद के साथ अच्छा व्यवहार नहीं है।
  3. अपने संपत्ति संबंधी अधिकारों के लिए खड़ी हों। भारत में असंख्य महिलाएँ अपनी संपत्ति का अधिकार अपने भाइयों, पुत्रों या पतियों के हाथों लुटा देती हैं। इसके लिए उन्हें आगे बढ़कर अपना अधिकार प्रकट करना चाहिए।
  4. महत्वाकांक्षी बनें और बड़े सपनें देखें। भारत के सभी नौजवानों के सीने में एक आग होनी चाहिए। भारतीय समाज की जो संरचना है उसमें लड़कियों के लिए जो सपने देखे जाते हैं वे लड़कों से अलग हैं। लड़कियाँ उतनी महत्वाकांक्षा नहीं रख पातीं जितना लड़के। लड़कियों को खुद ही इस स्थिति को बदलना होगा।
  5. रिश्तों के नाटक में ज्यादा मत उलझें। रिश्ते बहुत जरूरी हैं, लेकिन इतने भी नहीं। एक अच्छी माँ होना, पत्नी होना, बहन होना, बेटी होना, दोस्त होना या एक अच्छी प्रेमिका होना बहुत ही महत्वपूर्ण है, लेकिन इन रिश्तों में पूरी तरह खो जाना ठीक नहीं है। आपके जिम्मे एक और रिश्ता है- स्वयं से। रिश्तों के नाम पर इतना त्याग न करें कि आप अपने आप का ही बलिदान कर दें।

यह पाँचो सदुपदेश देखने में बहुत आकर्षक हैं और फॉलो करने लायक हैं। मैं अपनी बेटी को जरूर सिखाऊंगा। लेकिन इसपर पाठकों की जो राय आयी है वह भी बहुत रोचक है और मंथन को प्रेरित करती है।

मुम्बई की स्निग्धा इन पाँचों का जवाब यूँ देती हैं :

  1. क्या मर्द हमारी आलोचना नहीं करते हैं। हमने यह उन्हीं से सीखा है।
  2. क्या आप कभी मर्दों की ओछी हरकतों के शिकार हुए हैं- ‘वाह क्या बॉडी है’ वाली मानसिकता के? इनसे बचने के लिए झूठा व्यवहार करना ही पड़ता है।
  3. संपत्ति के अधिकार के बारे में अब जागरुकता बढ़ रही है। लेकिन अभी कितनी ग्रामीण औरतें इसका नाम भी जानती हैं?
  4. अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए पैसा कहाँ से लाएँ। अच्छा, खुद कमाकर?
  5. रिश्ते ! हिलैरी क्लिंटन को भी पहले बिल क्लिंटन की पत्नी कहा जाता है और बाद में अमेरिका की विदेश मंत्री।

टिप्पणियाँ तो और भी करारी हैं लेकिन यहाँ केरल निवासी जी.पिल्लई की बातें संक्षेप में रखना चाहूँगा :

चेतन भगत ने अपने आलेख में एक गहरी समस्या के सतह को ही छुआ है। …पुरुष महिलाओं के साथ क्या करते हैं यह तो विचारणीय है ही, एक महिला दूसरी महिला के साथ क्या-क्या और कैसे-कैसे व्यवहार करती है यह भी सोचना होगा। …यह दुश्मनी गर्भ में कन्या भ्रूण के आते ही शुरू हो जाती है। भारत की कौन स्त्री बेटी के बजाय बेटा पैदा करना ज्यादा पसन्द नहीं करती होगी? …घर के भीतर रोज ही बेटे और बेटी में फर्क करने का काम उसकी माँ ही करती है। …कौन माँ अपने बेटे के लिए बड़ा दहेज पाने की कामना नहीं करती? …गोरी-चिट्टी और सुन्दर बहू किस माँ को नहीं चाहिए, भले ही उसका बेटा कुरूप और नकारा हो? इन सबके पीछे आपको एक धूर्त, निष्ठुर, स्वार्थी और लालची महिला दिखायी देगी जिसके मन में एक दूसरी ‘महिला’ के प्रति तनिक भी सहानुभूति नहीं है। …इसके लिए आपको दूर जाने की जरूरत नहीं है, अपने घर के भीतर ही झाँकिए, दिख जाएगा। …दहेज हत्या के मामले ही देख लीजिए। वास्तव में किसी भी औरत के जीवन में मिले कुल कष्टों में से जितने कष्ट दूसरी औरतों से मिलते हैं उतने मर्दों से नहीं।

इस बहस की लंबी सृंखला मूल आलेख में देखी जा सकती हैं। गंभीर बहस तो होती ही रहती है, होनी भी चाहिए। लेकिन मैं यहाँ अपनी बात माहौल को थोड़ा हल्का रखने की इच्छा से यूँ कहना चाहता हूँ :

पहली राय तो इनकी प्रकृति-प्रदत्त विशिष्टता (यू.एस.पी.) को ही तहस-नहस करने वाली है। क्या इसके बिना महिलाओं की अपनी दुनिया उतनी मजेदार रह जाएगी। टाइम-पास का इतना बढ़िया साधन उनके हाथ से छीन लेना थोड़ी ज्यादती नहीं है क्या? ऐसे तो निन्दारस का आनन्द ही विलुप्त हो जाएगा इस धराधाम से। पतिदेव के ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद जब कामवाली भी सब निपटाकर चली जाती है तो अकेले समय काटना कितना मुश्किल होता है! इस मुश्किल घड़ी में यही तो काम आता है। बालकनी से लटककर पड़ोसन से, या फोन पर अपनी दूर-दराज की दोस्त या बुआ-मौसी-दीदी से यह रसपान करने में घंटो का समय कम पड़ जाता है। सुनते हैं इसके बिना उनका खाना भी मुश्किल से पचता है।

झूठा व्यवहार मत कहिए इसे जी। यह तो दुनियादारी है। यह न करें तो क्या कदम-कदम पर आफ़त को न्यौता दें। रोज इन्हें एक से एक घामड़ और घोंचू भी मिलते हैं। उन्हें हल्का सा ‘फील-गुड’ करा देने से मैडम को सेफ़टी भी मिल जाती है और उस मूढ़ पर मन ही मन हँस लेने का मौका भी मिल जाता है। फालतू में बहादुरी दिखाने से तो टेंशन ही बढ़ता है।

संपत्ति के अधिकार ले तो लें लेकिन ससुराल और मायके को एक साथ सम्हालना कितना मुश्किल हो जाएगा। ऊपर से मायके से भाई-भाभी जो रोज हाल-चाल लेते हैं, कलेवा भेजते हैं, और अपने जीजाजी की दिल से जो आवभगत करते हैं वह सब बन्द न हो जाएगा। सावन का झूला झूलने और गृहस्थी के बोझ से थोड़ी राहत पाने वे किसके पास जाएंगी? बच्चों के लिए मामा-मामी का दुलार तो सपना हो जाएगा। दूसरी तरफ़ बुआ और फूफा जी तो फिल्मी खलनायक ही नजर आएंगे। जब बहन अपने भाई की जायदाद बाँट लेगी तो वह ससुराल में अपनी ननद को भी तो हिस्सा देगी। इस बाँट-बँटवार में हमारे रिश्ते तो बेमानी हो जाएंगे।

महत्वाकांक्षी बनने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन इसके लिए खुद ही मेहनत भी करना होगा। एक फॉर्म भरकर रजिस्ट्री करने भर के लिए भैया या पापा का मुँह ताकने से काम नहीं चलेगा। निडर होकर बाहर निकलना पड़ेगा, मम्मी का कंधा छोड़ना होगा और कड़ी प्रतिस्पर्धा के लिए वह सब करना होगा जो लड़के कर रहे हैं। आरक्षण का भरोसा नहीं अपने उद्यम का सहारा लेना होगा। इसके लिए कितनी लड़कियाँ तैयार हैं? मुझे लगता है – बहुत कम। जो तैयार हैं उन्हें सलाम। लेकिन ज्यादा संख्या उनकी है जो सिर्फ़ इसलिए पढ़ रही हैं कि पापा को उनकी शादी के लिए अच्छे लड़के मिल सकें।

रिश्ते नाटक की चीज नहीं हैं। इनके बिना व्यक्ति का अस्तित्व किस प्रकार परिभाषित होगा? मैंने उन लोगों को पागल होते देखा है जिन लोगों ने सामाजिक व पारिवारिक रिश्तों की कद्र नहीं की। कुछ समय तो साहस और उत्साह बना रहता है लेकिन बाद में एक साथी की तलाश शुरू हो जाती है जिसमें विफलता व्यक्तित्व को मुरझा देती है। एकला चलो का नारा इन रिश्तों के बाहर नहीं भीतर ही प्रस्फुटित होना श्रेयस्कर है। अन्य प्राणियों से मनुष्य भिन्न सिर्फ़ इसलिए है कि वह एक सामाजिक प्रामाणिक है। समाज का निर्माण ये रिश्ते ही करते हैं। इसमें महिलाएँ जानबूझकर उलझती नहीं हैं, बल्कि इनके बीच ही वे बड़ी होती हैं। रिश्तों का ख्याल महिलाएँ ज्यादा करती हैं तो इसके लिए उन्हें धन्यवाद दीजिए और उनका अधिक सम्मान करिए। हाँ, उन्हें इतनी जगह जरूर दीजिए कि वे अपने आप के साथ भी एक सुखी और गौरवशाली रिश्ता कायम कर सकें।

मैं तो ऐसा ही सोचता हूँ। आशा है आप अपने विचार यहाँ जरूर साझा करना चाहेंगे।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सोचने का नहीं, बस देखने का

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सोचने का नहीं, बस देखने काSmile

झमाझम बारिश के बीच दो दिन की सप्ताहान्त छुट्टी घर में कैद होकर कैसे मनाते? नेट पर देखा तो घर के सबसे नजदीक के वेव-मॉल में बोल बच्चन की कुछ टिकटें अभी भी बची हुई थीं। मैंने झटपट बुक-माई-शो के सहारे से सीट की लोकेशन चुनकर दो बजे का शो ऑनलाइन बुक किया और मोबाइल पर आए टिकट कन्फर्मेशन की मेसेज लेकर ठीक दो बजे खिड़की पर पहुँच गया। इन्टरनेट बुकिंग वालों की एक अलग खिड़की थी। शीशे के उस पार बैठी सुदर्शना ने मुस्कराकर मेसेज दे्खा और कार्ड से मिलान करने के बाद पहले से मेरे नाम का तैयार टिकट सरकाते हुए साथ में थैंक्यू की मुहर भी लगा दी। बगल की खिड़कियों पर इस शो के लिए हाउसफुल का डिस्‍प्‍ले लग चुका था और आगे की बुकिंग जारी थी।

फिल्म देखने का कार्यक्रम अब पहले से काफी लुभावना हो गया है। मैं तो फिल्म से ज्यादा फिल्म दे्खने वालों को दे्खकर खुश हो जाता हूँ। यहाँ आकर लगता है कि हमारे आसपास कोई सामाजिक या आर्थिक समस्या है ही नहीं। सबलोग बहुत खुशहाल, खाते-पीते घरों के दिखते हैं। मनोरम दृश्य होता है। बाहर की ऊमस और चिपचिपी गर्मी भी अन्दर घुसने नहीं पाती। अन्दर जाने की अनुमति केवल हँसते-मुस्कराते चेहरों और मोटे पर्स से फूली हुई जेबों को है। प्रवेश द्वार पर तैनात सुरक्षा कर्मी आपकी कमर में हाथ डालकर यह इत्मीनान कर लेते हैं कि आप अन्दर के मनोरंजन बाजार में जाने लायक तैयारी से आये हैं तभी अन्दर जाने देते हैं। बेचारों को बैग की तलाशी भी लेनी पड़ती है।

मेरी पत्नी को जब महिलाओं वाले तलाशी घेरे से बाहर आने में देर होने लगी तो मैंने बाहर से दरियाफ़्त की। पता चला कि उनके हैंडबैग से आपत्तिजनक सामग्री प्राप्त हुई है जिसे बाहर छोड़ने का निर्देश दिया जा रहा था। मुझे हैरत हुई। पता चला कि उन्होंने घर से चलते समय एक चिप्स का पैकेट और कुछ चाकलेट रख लिये थे। बाहर से लायी हुई कोई भी खाद्य सामग्री अन्दर ‘एलाउड’ नहीं थी। अन्ततः थोड़ी बहस के बाद महिला गार्ड को चिप्स का पैकेट सौंपकर, चॉकलेट का रैपर खोलकर उसे वहीं खाने का उपक्रम करती और गार्ड व प्रबन्धन को कोसती हुई श्रीमती जी निकल आयी। अन्दर आते ही मामला साफ हो गया जहाँ तीनगुने दाम पर बिकने वाले कोल्ड ड्रिंक्स, पॉपकार्न और अन्य फास्ट फूड के स्टॉल लगे हुए थे। वहाँ लम्बी कतारें भी लगी हुई थीं। बेतहाशा ऊँचा दाम चुकाकर बड़ी-बड़ी ट्रे में सामान उठाकर ले जाते लोगों को देखकर हमें कोई हीनताबोध हो इससे पहले ही हम बिना किसी से पूछे सीधे अपनी सीट तक पहुँच गये। यूँ कि हम पूरे हाल का नक्शा और अपनी सीट कम्प्यूटर स्क्रीन पर पहले ही देख चुके थे।

Bol-Bachchanफिल्म शुरू हुई। संगीत का शोर बहुत ऊँचा था। इतना कि बगल वाले से बात करना मुश्किल। अमिताभ बच्चन जी को धन्यवाद ज्ञापित करने वाले लिखित इन्ट्रो के बाद शीर्षक गीत शुरू हो गया। धूम-धड़ाके से भरपूर गीत में अमिताभ बच्चन के साथ अभिषेक और अजय देवगन जोर-जोर से नाच रहे थे। सदी के महानायक के इर्द-गिर्द कमनीय काया लिए लड़कियों और लड़कों की कतारें झूमती रही। सभी लगभग विक्षिप्त होकर बच्चन के बोल में डूब-उतरा रहे थे। हिमेश रेशमिया के कान-फाड़ू संगीत में लिपटा आइटम गीत समाप्त हो्ते ही बड़े बच्चन ने बता दिया कि वे इस फिल्म में हैं नहीं, केवल उनका नाम भर है।

इसके बाद कहानी दिल्ली के रंगीन माहौल से निकलकर सरपट भागती हुई राजस्थान के रणकपुर के संगीन माहौल में दाखिल हो गयी। राजा पृथ्वीराज सिंह अपने गाँव के बहुत खूँखार किन्तु अच्छे मालिक थे। पहलवानी करना और भयंकर अंग्रेजी बोलना उसका शौक था। झूठ से सख्त नफ़रत थी उन्हें। इतनी की केवल निन्यानबे रूपये का हिसाब गड़बड़ करने वाले अपने सुपरवाइजर को उन्होंने खदेड़-खदेड़कर मारा और लहूलुहान कर दिया। उसके बाद उनके दयालु हृदय ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया और ‘फाइवस्टार’स्तर की चिकित्सीय सुविधा दिलवायी। ऐसे सत्यव्रती को पूरी फिल्म मे एक नाटक मंडली ने एक के बाद एक जबरदस्त झूठ बोलकर बेवकूफ़ बनाये रखा और राजा पृथ्वीराज अपनी ग्राम्य-रियासत का भार ढोते हुए झूठ के किले पर अपनी सच्चाई और दयालुता का झंडा फहराते रहे। जिसने पुरानी गोलमाल देख रखी है उसे फिल्म में आगे आने वाले सभी दृश्य पहले से ही पता लग जाते हैं क्योंकि निर्देशक ने पूरा सिक्‍वेन्स एकमुश्त कट-पेस्ट कर दिया है। वहाँ राम प्रसाद और लक्षमण प्रसाद थे तो यहाँ अभिषेक बच्चन और अब्बास अली हैं जिन्हें देखने पर केवल मूँछों का अन्तर है। यहाँ भी माता जी को एक बार घर में भीतर आने के लिए बाथरूम की खिड़की लांघनी पड़ी है। अलबत्ता एक माँ का जुगाड़ करने के चक्कर में पूरी नाटक मंडली लग जाती है और अन्ततः तीन-तीन माताएँ एक साथ नमूदार हो जाती हैं। इसके बावजूद राजा पृथ्वीराज बेवकूफ़ बन जाते हैं क्योंकि ऐसा मान लिया गया है कि उनके पास प्रयोग करने के लिए अक्‍ल है ही नहीं।

निर्देशक ने दर्शकों के बारे में भी यही धारणा बना रखी है कि दर्शक आएंगे और जो आँख के सामने आएगा उसे सच मानेंगे और जो कान से सुनायी देगा उसपर तालियाँ पीटेंगे और खुलकर हसेंगे। इसलिए इस फिल्म को देखते समय यदि किसी ने तार्किक दृष्टि से सोचने की गलती की और दृश्यों के रसास्वादन में अपनी बुद्धि का हस्तक्षेप होने दिया तो उसे सिर पीट लेना पड़ेगा। बेहतर है कि चिप्स और चाकलेट की तरह अपनी तर्कणा को भी घर छोड़कर जाइए और वहाँ सजी हुई रंगीनी और लाफ्टर शो के कलाकारों की पंचलाइनों का त्वरित और तत्क्षण आस्वादन कीजिए। द्विअर्थी संवादों पर बगलें मत झांकिए बल्कि उस फूहड़ हास्य पर किलकारी मारती जनता के टेस्ट का समादर करते हुए उसमें शामिल हो जाइए और खुद भी हँसी खनकाइए। अर्चना पूरन सिंह की भद्दी और कामुक अदा पर यदि आपको जुगुप्सा हो रही है तो उसपर सिसकारी मारती अगली पंक्ति से सीख लीजिए कि कैसे टिकट का पैसा वसूल किया जाता है।

इस पूरे माहौल में प्राची देसाई की मासूम और शान्त छवि एक अलग प्रभाव छोड़ने में सफल हुई। बात-बात पर ठकाका लगाने वाले दर्शक इस सफलतम टीवी कलाकार की सिल्वर स्क्रीन पर अभिनीत सादगी और गरिमापूर्ण व्यक्तित्व के कन्ट्रास्ट को इस फिल्म की थीम के मद्देनजर कैसे स्वीकार करेंगे यह देखना होगा। पृथ्वीराज की अंग्रेजों से भी अच्छी अंग्रेजी का आनंद लेने के लिए आपको थोड़ा उदार होना पड़ेगा। वाकई होकर देखिए, बहुत मजा आएगा। पेट में बल पड़ जाएंगे।

कुल मिलाकर यह फिल्म सोचने के लिए कुछ नहीं छोड़ती इसलिए ऐसा कु्छ करने की जहमत उठाना ठीक नहीं। अपनी गृहस्थी की चिन्ताओं को कुछ समय के लिए विराम देकर दो घंटे का विशुद्ध मनोरंजन कीजिए और इंटरवल में अपनी रुचि के अनुसार बाहर सजे स्टॉल पर लाइन लगाकर या बिना लगाये खुशहाल भारतीय समाज का दर्शन कीजिए। हमने भी खूब मस्ती की। बाहर आने पर रिमझिम बारिश का आनन्द दोगुना हो गया था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 
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मेरा मन क्यूँ छला गया…?

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लो अक्टूबर चला गया

मेरा मन क्यूँ छला गया

 

सोचा भ्रष्टाचार मिटेगा सब खुशहाल बनेंगे अब

अन्ना जी की राह पकड़कर मालामाल बनेंगे सब

काला धन वापस आएगा, रामदेव जी बाटेंगे

अति गरीब पिछड़े जन भी अब धन की चाँदी काटेंगे

लेकिन था सब दिवास्वप्‍न जो पलक झपकते टला गया

मेरा मन फिर छला गया।

 

गाँव गया था घर-घर मिलने काका, चाचा, ताई से

बड़की माई, बुढ़िया काकी, भाई से भौजाई से

और दशहरे के मेले में दंगल का भी रेला था

लेकिन जनसमूह के बीच खड़ा मैं निपट अकेला था

ईर्श्या, द्वेष, कमीनेपन के बीच कदम ना चला गया

मेरा मन फिर छला गया

 

एक पड़ोसी के घर देखा एक वृद्ध जी लेटे थे

तन पर मैली धोती के संग विपदा बड़ी लपेटे थे

निःसंतान मर चुकी पत्नी अनुजपुत्रगण ताड़ दिए

जर जमीन सब छीनबाँटकर इनको जिन्दा गाड़ दिए

दीन-हीन थे, शरणागत थे,  सूखा आँसू जला गया

मेरा मन फिर छला गया

 

मन की पीड़ा दुबक गयी फिर घर परिवार सजाने में

जन्मदिवस निज गृहिणी का था खुश हो गये मनाने में

घर के बच्चे हैप्पी-हैप्पी बर्डे बर्डॆ गाते थे

केक, मिठाई, गिफ़्ट, डांस, गाना गाते, चिल्लाते थे

सबको था आनंद प्रचुर, हाँ बटुए से कुछ गला गया

मेरा मन बस छला गया

 

सोच रहा था तिहवारी मौसम में खूब मजे हैं जी

विजयादशमी, दीपपर्व पर घर-बाजार सजे हैं जी

शहर लखनऊ की तहजीबी सुबह शाम भी भली बहुत

फिर भी मन के कोने में क्यूँ रही उदासी पली बहुत

ओहो, मनभावन दरबारी राग गव‍इया चला गया

मेरा मन फिर छला गया।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

रेलवे की जुगाड़ सुविधा…

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समय: प्रातःकाल 6:30 बजे

स्थान: बर्थ सं.18 – A1, पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस

इस पोस्ट को लिखने का तात्कालिक कारण तो इस ए.सी. कोच का वह ट्वॉएलेट है जिससे निकलकर मैं अभी-अभी आ रहा हूँ और जिसके दरवाजे पर लिखा है- ‘पाश्चात्य शैली’। लेकिन उसकी चर्चा से पहले बात वहाँ से शुरू करूँगा जहाँ पिछली पोस्ट में छोड़ रखा था।

आप जान चुके हैं कि वर्धा से कार में इलाहाबाद के लिए चला था तो एक चौथाई रास्ता टायर की तलाश में बीता। जबलपुर में टायर मिला तो साथ में एक पोस्ट भी अवतरित हो ली। आगे की राह भी आसान न थी। रीवा से इलाहाबाद की ओर जाने वाला नेशनल हाई-वे पिछले सालों से ही टूटा हुआ है। अब इसकी मरम्मत का काम हो रहा है। नतीज़तन पूरी सड़क बलुआ पत्थर, पथरीली मिट्टी और बेतरतीब गढ्ढों का समुच्चय बनी हुई है। पिछले साल इसी रास्ते से वर्धा जाते समय मुझे करीब चालीस किमी. की दूरी पार करने में ढाई घंटे लग गये थे। इसलिए इस बार मैं सावधान था।

मैंने अपने एक मित्र से वैकल्पिक रास्ता पूछ लिया था जो रीवा से सिरमौर की ओर जाता था; और काफी घूमने-फिरने के बाद रीवा-इलाहाबाद मार्ग पर करीब साठ किमी आगे कटरा नामक बाजार में आकर मिल जाता था। रीवा से सिरमौर तक चिकनी-चुपड़ी सड़क पर चलने के बाद हमें देहाती सड़क मिली जो क्यौटी होते हुए कटरा तक जाती थी। हमें दर्जनों बार रुक-रुककर लोगों से आगे की दिशा पूछनी पड़ी। एक गाँव के बाहर तिराहे पर भ्रम पैदा हो गया जिसे दूर करने के लिए हमें पीछे लौटकर गाँव के भीतर जाना पड़ा। अँधेरा हो चुका था। कोई आदमी बाहर नहीं दिखा। एक घर के सामने गाड़ी रोककर ड्राइवर रास्ता पूछने के लिए उस दरवाजे पर गया। दो मिनट के भीतर कई घरों के आदमी हाथ में टॉर्च लिए गाड़ी के पास इकठ्ठा हो गये। फिर हमें रास्ता बताने वालों की होड़ लग गयी। कम उम्र वालों को चुप कराकर एक बुजुर्गवार ने हमें तफ़्सील से पूरा रास्ता समझा दिया। उनके भीतर हमारी मदद का ऐसा जज़्बा था कि यदि हम चाहते तो वे हमारे साथ हाइ-वे तक चले आते।

खैर, आगे का करीब चालीस किमी. का सर्पाकार देहाती रास्ता प्रायः गढ्ढामुक्त था। रात का समय था इसलिए इक्का-दुक्का सवारी ही सामने से आती मिली। सड़क इतनी पतली थी कि किसी दुपहिया सवारी को पार करने के लिए भी किसी एक को सड़क छोड़ने की नौबत आ जाती। जब हम हाइ-वे पर निकल कर आ गये तो वही क्षत-विक्षत धूल-मिट्टी से अटी पड़ी सड़क सामने थी। उफ़्‌… हम हिचकोले खाते आगे बढ़ते जा रहे थे और सोचते जा रहे थे कि शायद हमारा वैकल्पिक रास्ते का चुनाव काम नहीं आया। खराब सड़क तो फिर भी मिल गयी। हमने कटरा बाजार में गाड़ी रुकवायी। सड़क किनारे दो किशोर आपस में तल्लीनता से बात कर रहे थे। उनमें से एक साइकिल पर था। जमीन से पैर टिकाए। दूसरा मोबाइल पर कमेंट्री सुन रहा था और अपने साथी को बता रहा था।

मैंने पूछा- भाई, यह बताओ यह सड़क अभी कितनी दूर तक ऐसे ही खराब है?

लड़का मुस्कराया- “अंकल जी, अब तो आप ‘कढ़’ आये हैं। पाँच सौ मीटर के बाद तो क्या पूछना। गाड़ी हवा की तरह चलेगी।” उसने अपने दोनो हाथों को हवा में ऐसे लहराया जैसे पानी में मछली के तैरने का प्रदर्शन कर रहा हो। जब हमने बताया कि हम हाई-वे से होकर नहीं आ रहे हैं बल्कि सिरमौर होकर आ रहे हैं तो उसने हमें शाबासी दी और बुद्धिमान बता दिया। बोला- जो लोग हाई-वे से आ रहे हैं उनकी गाड़ी लाल हो जाती है। गेरुए मिट्टी-पत्थर की धूल से। आप अपनी कार  ‘चीन्ह’  नहीं पाते। हमें समझ में आ गया कि आगे का रास्ता बन चुका है। हम खुश हो लिए और आगे चल दिए। इलाहाबाद तक कोई व्यवधान नही हुआ।

इलाहाबाद में सरकारी काम निपटाने के अलावा अनेक लोगों से मिलने का सुख मिला। आदरणीय ज्ञानदत्त पांडेय जी के घर गया। श्रद्धेया रीता भाभी के दर्शन हुए। सपरिवार वर्धा जाकर नौकरी करने के हानि-लाभ पर चर्चा हुई। गुरुदेव के स्वास्थ्य की जानकारी मिली। लम्बे समय तक चिकित्सकीय निगरानी में रहने और लगातार दवाएँ लेते रहने की मजबूरी चेहरे पर स्थिर भाव के रूप में झलक रही थी। वे इस बार कुछ ज्यादा ही गम्भीर दिखे।

प्रयाग में मेरे पूर्व कार्यस्थल-कोषागार से जुड़े जितने भी अधिकारी-कर्मचारी और इष्टमित्र मिले उन सबका मत यही था कि मुझे अपना प्रदेश और इलाहाबाद छोड़कर बाहर नहीं जाना चाहिए था। इस विषय पर फिर कभी चर्चा होगी।

वर्धा वापस लौटने का कार्यक्रम रेलगाड़ी से बना। दिन भर मंगल-व्रत का फलाहार लेने के बाद शाम को एक मित्र की गृहिणी के हाथ की बनी रोटी और दही से व्रत का समाहार करके मैं स्टेशन आ गया। अनामिका प्रकाशन के विनोद शुक्ल और वचन पत्रिका के संपादक प्रकाश त्रिपाठी गाड़ी तक विदा करने आये। उन्हें हार्दिक धन्यवाद देकर हम विदा हुए। रात में अच्छी नींद आयी।

आज सुबह जब हम ‘पाश्चात्य शैली’ के शौचालय में गये तो वहाँ का अद्‌भुत नजारा देखकर मुस्कराए बिना न रह सके। साथ ही पछताने लगे कि काश कैमरा साथ होता। फिलहाल ट्वॉएलेट की देखभाल करने वालों के बुद्धि-कौशल और गरीबी में भी काम चला लेने की भारतीय प्रतिभा का नमूना पेश करते इस ए.सी. कोच के पश्चिमी बनावट वाले शौचालय की कुछ तस्वीरें मैंने अपने मोबाइल से ही खींच डाली हैं। खास आपके लिए। देखिए न…

IMG0069A भारत की एक बड़ी आबादी जैसे स्थानों पर शौच आदि से निवृत्त होती है उससे बेहतर सफाई है यहाँ। यह दीगर बात है कि सीट को ट्‍वाएलेट पेपर से अपने हाथों साफ़ करने के बाद फोटो लेने का विचार आया।
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IMG0070A ट्‍वाएलेट पेपर …? पूरा बंडल उपलब्ध है जी। भले ही इसे रखे जाने का मूल बक्सा बेकार हो गया है लेकिन ठेकेदार ने इसे पॉलीथीन से बाँधकर वहीं लटका छोड़ा है। इसे प्रयोगार्थ निकालने के लिए थोड़ी ही मशक्कत करनी पड़ी।
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IMG0061A हाथ धुलने के लिए पेपर सोप रखने की कोई जरूरत नहीं। रेलवे द्वारा लिक्विड सोप की सुविधा गारंटीड है। इसे रखने की डिबिया अपने स्थान से उखड़ गयी तो भी कोई बात नहीं।  ‘रेलनीर’  की बोतल तो है। साबुन भरकर बेसिन के बगल में ही लटका रखा है। जी भर इस्तेमाल करें।
Smile
IMG0062A ट्‍वाएलेट पेपर रोल को पॉलीथीन से बाँध कर रखने का काम बहुत बुद्धिमानी से किया गया है। स्टील फ्रेम में न होने के बावजूद यह नाचता भी है और थोड़ी  मेहनत करने पर टुकड़ों में निकल भी आता है। मनोरंजक भी है और स्किल टेस्टिंग भी…
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IMG0068A येजो चमक रहे हैं उनमें एक स्टील का जग है, पानी की टोटी है, और स्वयं पानी है जो नीचे जमा है। जो नहीं चमक रही है वह लोहे की जंजीर है जिससे जग बँधा हुआ है। कौन जाने यह कीमती जग किसी को भा जाय और दूसरे यात्रियों को परेशानी उठानी पड़े। इसीलिए बाँध के डाल दिया होगा।
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IMG0066A यदि आप पेपर का प्रयोग नहीं कर पाते और संयोग से टंकी का पानी खत्म होने के बाद आपकी बारी आयी तो क्या करेंगे? चिंता मत करिए…। एक बोतल एक्स्ट्रा पानी भी में डाल दिया गया है उधर कोने में…
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रेल  हमारी सुविधाओं का कितना
ख्याल रखती है

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

स्वस्थ और ईमानदार मीडिया मात्र खुशफ़हमी : विभूति नारायण राय

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साबुन की फैक्ट्री चलाने वाली मानसिकता छोड़नी होगी अखबार के मालिकों को…

पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि कैसे एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने अखबार की दुनिया की कथित ‘सच्चाई’ बताते हुए अखबार पढ़ने वालों की प्रतिबद्धता और पत्रकार बिरादरी की शक्तियों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिये थे। उनके बाद हिंदी साहित्य की दुनिया के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर प्रो. गंगा प्रसाद विमल बोलने आये। उन्होंने बिना लाग-लपेट के अखबार मालिकों और संपादकों पर हमला बोल दिया। बोले- आज हमारे बीच अखबारों की संख्या और प्रसार में बहुत वृद्धि हो गयी है लेकिन अखबारों ने आम पाठक की चिंता करना छोड़ दिया है। उन्होंने अपने वक्तव्य में मीडिया जगत पर तीन गम्भीर आरोप लगाये-

  1. अत्यल्प को छोड़कर अधिकांश संपादक बिचौलिए की भूमिका निभा रहे हैं।
  2. अंग्रेजी अखबारों ने भारतीय भाषा के अखबारों के साथ घोर दुष्कृत्य किया है।
  3. एक आम पत्रकार के लिए ‘प्रोफ़ेशनलिज़्म’ का सीधा अर्थ है अपने मालिक के लिए पैसा खींचना।

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि आजकल मनुष्यता का सवाल कहीं नहीं उठाया जा रहा है। एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ क्या व्यवहार होना चाहिए इसपर कुछ उच्‍च आदर्शात्मक (lofty) किस्म की बातें प्राथमिक स्तर की स्कूली किताबों में भले ही मिल जाय लेकिन अखबारों और दूसरी मीडिया से यह गायब हो गयी हैं। आजकल ऊँची तनख्वाह पर काम करने वाले बड़े पत्रकार अपने मालिक के ‘टटके गुलाम’ हो गये हैं। व्यावसायिक हित सर्वोपरि हो गया है। भारत की सांस्कृतिक विरासत को समझना, इसे मिटाने के वैश्विक षड़यंत्र को पहचानना और उसे निष्फल करने के लिए देश को तैयार करने की जिम्मेदारी मीडिया में बैठे बुद्धिजीवियों की है; लेकिन इनके बीच ऐसे लोग घुसे हुए हैं जिनका एजेंडा ही अलग है। आज मीडिया को बाहर से कम चुनौतियाँ दरपेश हैं। भीतर के लोगों से ही खतरा है जिनसे लड़ना जरूरी हो गया है।

इनके बाद बोलने की बारी सत्र की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय की थी। उनके बोलने से पहले श्रोताओं को पूर्व वक्ताओं से प्रश्न करने का अवसर दिया गया। अनेक छात्र तो जैसे इसी पल का इंतजार कर रहे थे। प्रश्नों की झड़ी लग गयी। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ  की ऐसी रूपरेखा की कल्पना कदाचित्‌ आदर्श पत्रकारिता का स्वप्न पाल रहे विद्यार्थियों ने नहीं की होगी। मुनाफ़ा कमाने के हिमायती प्रबंध संपादक को अपनी स्थिति स्पष्ट करने दुबारा आना पड़ा। भारतीय समाज में व्याप्त अन्याय और शोषण के विरुद्ध आम जनता को न्याय दिलाने और उसके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने के माध्यम के रूप में इन समाचार माध्यमों की जवाबदेही के प्रश्नों का उनके पास फिर भी कोई जवाब नहीं था। प्रश्नों का शोर जब थमने का नाम नहीं ले रहा था तब कुलपति जी ने माइक सँभाला।VNRai-last-words

बोले- पूर्व के एक वक्ता की यह धारणा कि चालीस पेज़ के अखबार के लिए दो रूपये देने वाले पाठक कोई हक नहीं रखता सर्वथा ग़लत  है। अखबार मालिक ने अपनी पूँजी जरूर लगा रखी है लेकिन पाठक के stakes अखबार वालों से ज्यादा हैं। उसका पूरा जीवन ही दाँव पर लगा है। वह ज्यादा बड़ा जोखिम उठा रहा है। मार्क ट्वेन को उद्धरित करते हुए उन्होंने कहा- “If you don’t read newspapers, you are uninformed; but if you read newspapers you are misinformed’’

आज जिस ठसक के साथ अखबार के पूँजीपति मालिक के मुनाफ़े के हक में दलील दी जा रही है वह कभी शर्म की बात मानी जाती थी। कोई संपादक या दूसरे बुद्धिजीवी ऐसी बात कहते झेंपते थे। लेकिन अब समय बदल गया है। यह बिडम्बना ही है कि आम जनता में ही दोष निकाले जा रहे हैं। यह वैसा ही है जैसा ब्रेख्त ने कहा था कि राजा अब बदला नहीं जा सकता इसलिए अब प्रजा को ही बदल देना होगा। यह स्थिति कतई ठीक नहीं है। जनता के प्रति अखबार की जिम्मेदारी उस प्रकार की नहीं है जैसी किसी फैक्ट्री मालिक की अपने उत्पाद के ग्राहकों के प्रति।

उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करने के लिए प्रसिद्ध संपादक स्व.राजेंद्र माथुर जी के साथ अपनी एक बहस का हवाला दिया। वृंदावन में आयोजित एक गोष्ठी में राजेन्द्र माथुर जी ने कुछ ऐसे ही विचार रखते हुए कहा था कि एक स्टील कारखाना लगाने वाला उद्योगपति अथवा साबुन की फैक्ट्री चलाने वाला मालिक अपने निवेश पर लाभ कमाने के लिए स्वतंत्र है; लेकिन अखबार निकालने के लिए करोड़ो खर्च करने वाला हमारा मालिक यदि कुछ मुनाफ़ा कमाना चाहता है तो आपको यह बुरा क्यों लगता है? उस समय (1980 के दशक) की परिस्थितियों को देखते हुए यह बड़ा ही साहसिक वक्तव्य था। उनकी इस बात का विरोध उस समय भी हुआ था और आज भी इस तरह की सोच को नकारा जाना चाहिए।

कुलपति जी ने बताया कि स्टील या साबुन का कारखाना चलाने की तुलना में अखबार निकालना एकदम अलग किस्म का कार्य है। यदि किसी कारणवश स्टील या साबुन की फैक्ट्री बंद होने की नौबत आ जाय तो उससे आम जनता आंदोलन नहीं करती। लेकिन अखबार पर यदि किसी तरह की पाबंदी लगती है तो जनता सड़कों पर उतर आती है। राजीव गांधी के जमाने में सेंसरशिप कानून लगाने की कोशिश हुई तो पूरे देश में उबाल आ गया था। मीडिया को जो शक्तियाँ मिली हुई हैं वह इसी पाठक ने दी हैं। दो रूपये में अखबार देकर आप न तो एहसान कर रहे हैं और न ही घाटे में है। आप करोड़ों के विज्ञापन इसी जनता के कारण पाते हैं।

बाद के सत्रों में साधना चैनल प्रमुख व ब्रॉडकास्टिंग एडीटर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी एन.के.सिंह, आईबीएन के वरिष्‍ठ संवाददाता अनन्‍त विजय, दैनिक भास्‍कर के समूह संपादक प्रकाश दूबे, लोकमत समाचार- नागपुर के संपादक गिरीश मिश्र, सुपसिद्ध न्यूज एंकर और स्‍तंभकार पुण्‍य प्रसून वाजपेयी, हिंदुस्तान टाइम्स के प्रदीप सौरभ इत्यादि ने विस्तार से प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की वस्तुनिष्ठता, सामाजिक सरोकार और जिम्मेदारियों को समझने के बारे में सुंदर वक्तव्य दिये।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल और विभूतिनारायण राय द्वारा लगाये गये आरोपों (बिचौलियापन व भ्रष्ट आचरण) पर अनंत विजय ने गम्भीर आपत्ति दर्ज़ करते हुए कहा कि हमारे बारे में इस प्रकार का सामूहिक आरोप लगाने के पहले  आपको सबूत जुटाना चाहिए। आप एक जिम्मेदार पद पर रहते हुए जब भी कुछ कहते हैं तो पूरा देश उसपर ध्यान देता है और अपनी राय बनाता है।

उक्त आपत्ति का जवाब देते हुए कुलपति जी ने अपनी पूरी बात दुहराते हुए अंत में कहा कि इस समय जब हमारे समाज के सभी अंग भ्रष्टाचार की सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं, मैं अपनी उस मूर्खता को कोस रहा हूँ जो एक स्वस्थ और ईमानदार मीडिया की इच्छा रखती है। लेकिन यदि हमने आशावाद नहीं बनाये रखा तो जल्दी ही हम cynical state में चले जाएंगे।

 

इस कार्यक्रम से संबंधित कुछ और रिपोर्टें यहाँ और यहाँ हैं।

Infotainment के दौर में भी नैतिक मूल्यों को बचाये रखना और जीवन से इनके जुड़ाव को रेखांकित करना एक सजग संपादक की जिम्मेदारी है।

प्रो.राम मोहन पाठक, वाराणसी

लोकतंत्र के सारे स्तंभ धराशायी हो रहे हैं, मीडिया भी। पत्रकारों को अपना कैनवास बड़ा करना होगा और विश्वसनीयता (credibility) बनाये रखनी होगी।

पुण्य प्रसून वाजपेयी- ZEE News

द्रौपदी के चीर हरण के समय भीष्म की भाँति यदि आज की मीडिया खामोश रह गयी तो लोकतंत्र की वेदी पर दुबारा महाभारत होगा।

गिरीश मिश्र, संपादक-लोकमत समाचार

ज्यादातर संपादक आजकल मालिक के लिए बिचौलिये की भूमिका निभा रहे हैं। पत्रकार का प्रोफ़ेशनलिज़्म मालिक के लिए पैसा खींचना हो गया है।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल, जे.एन.यू. (से.नि.)

सबको समान रूप से आरोपित करना ग़लत है। मीडिया में अच्छे लोग भी काम कर रहे हैं। टीआरपी के आँकड़े दोषपूर्ण हैं। लाइसेंसिंग प्रक्रिया में सुधार जरूरी।

अनंत विजय- आई.बी.एन.

अब क्षेत्रीय अखबार की परिभाषा बदल रही है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने भाषाई अखबारों का बड़ा नुकसान किया है। मत्स्य न्याय का वातावरण बन गया है।

प्रदीप सौरभ- मीडिया समीक्षक, स्वतंत्र पत्रकार नयी दिल्ली

मीडिया का स्वरूप तकनीक ने बदल दिया है। अब इसकी पहुँच और रफ़्तार दोनो बढ़ चुकी है। हमें इसके साथ तालमेल बिठाना होगा।

प्रो.प्रदीप माथुर, IIMC, N.Delhi

मिशनरी पत्रकारिता का स्थान कमीशनरी पत्रकारिता ने ले लिया है। क्षेत्रीय पत्रकारों से लोग वैसे ही डरते हैं जैसे पुलिस से।

राजकिशोर, स्तम्भकार व राइटर इन रेजीडेंस, वर्धा वि.वि.

संपादक नामक संस्था का क्षरण हो रहा है। अब व्यावसायिक मालिक की महत्ता बढ़ गयी है। पत्रकारों को पैसा अधिक मिल रहा है लेकिन आजादी छिन गयी है।

शीतला सिंह- जनमोर्चा, फैज़ाबाद 

(compulsive corruption) भ्रष्टाचार अब मजबूरी भी हो गयी है। न केवल सरकारी क्षेत्र में बल्कि मिडिया जगत में भी।

सोमनाथ पाटील- सकाळ, पुणे

स्थानीय जरूरतों के हिसाब से मीडिया को अपना स्वरूप बदलना होगा। भविष्य का मीडिया ‘कम्यूनिटी रेडियो’ होगा। इसमें मालिकाना नियंत्रण स्थानीय समूह का ही होगा।

डॉ.गिरिजा शंकर शर्मा, आगरा

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

क्या अखबार का पाठक चिरकुट है…?

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राष्ट्रीय संगोष्ठी में बहस का मुद्दा बना एक प्रबंध संपादक का बयान

देश की प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे थे। विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले प्रोफ़ेसर, बड़े अखबारों के संपादक और न्यूज चैनेल्स के एंकर सिर जोड़कर वर्धा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों और अकादमिकों को मीडिया की असली दुनिया से परिचित करा रहे थे। मिशनरी पत्रकारिता पर बहस चल रही थी। मीडिया द्वारा मिशन छोड़कर व्यावसायिकता की ओर मुड़ जाने पर चिंता व्यक्त की जा रही थी। मीडिया और राडिया के अंतर्सम्बन्ध खंगाले जा रहे थे। तभी एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने यह मंतव्य रखा कि जब एक साबुन की टिकिया के लिए लोग अपना अखबार बदल देते हैं तो उनसे प्रतिबद्धता की उम्मीद क्या की जाय। दो-ढाई रूपये देकर क्या उन्होंने अखबार के मालिक को खरीद लिया है जो उससे मिशन और नैतिकता की अपेक्षा करते हैं?

पाठकों को उक्त प्रकार से चिरकुट बताने से पहले उन्होंने पत्रकारों को भी उनकी औकात बताने की कोशिश की। बोले- आप इस भ्रम में मत रहिएगा कि यह राज-काज आपके भरोसे चल रहा है। आपकी स्थिति उस छिपकली जैसी है जो छत से चिपककर यह भ्रम पाल बैठी है कि इसे उसी ने रोक रखा है; या हाथी की पीठ पर बैठी उस मक्खी की तरह है जो उसे छोड़कर अकेले जंगल में इसलिए नहीं जाने देती कि उसके बिना इसकी (हाथी की) रक्षा नहीं हो सकेगी।

उनके पहले के वक्ताओं ने “मिशनरी पत्रकारिता- संदर्भ और प्रासंगिकता” नामक विषय पर बोलते हुए देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार, माफ़ियागीरी, घोटालों, इत्यादि के परिप्रेक्ष्य में मीडिया की भूमिका पर अनेक सुंदर व्याख्यान दिए थे और भविष्य के मीडियाकर्मियों को उनकी बढ़ती जिम्मेदारियों का बोध कराने का प्रयास किया था। चहुँओर निराशा के घने बादलों के बीच आशा का एक मात्र सूरज समाज के चौथे स्तंभ को बताया गया था। तब प्रबंध सम्पादक जी ने अपनी बात की शुरुआत एक रोचक कहानी से की थी-

बताने लगे- एक वृद्ध मौलवी लैंप पोस्ट के नीचे सड़क पर बहुत देर से कुछ ढूँढ रहा था।  एक नौजवान को उसकी परेशानी देखी नहीं गयी। सहायता करने की गर्ज़ से पूछा- बाबा क्या खोज रहे हो?

“बेटा, मैं अपनी टोपी सी रहा था, अचानक सुई हाथ से गिर गयी। वही ढूँढ रहा हूँ लेकिन मिल नहीं रही है” मौलवी ने तफ़सील से बताया।

“अच्छा बताइए टोपी कहाँ सिल रहे थे और सूई ठीक कहाँ गिरी? मैं खोजता हूँ।” युवक ने सहानुभूति दिखायी।

“बेटा सुई तो मस्ज़िद में गिरी थी लेकिन वहाँ बहुत अंधेरा है इसलिए यहाँ रोशनी में ढूँढ रहा हूँ।”

हाल में ठहाका लगना तय था ही। तालियाँ थमीं तो उक्त वक्ता ने बताया कि आज यहाँ की चर्चा भी कुछ इसी प्रकार की हो रही है। समस्या की असली जड़ जहाँ है उसे कोई नहीं देखना चाहता। सबका समाधान मीडिया से कराना चाहता है। देश की सरकारें भ्रष्ट है, संसद अपना काम नहीं कर पा रही। न्यायालय भी संदेह से परे नहीं रह गये हैं। उद्योगपति तेजी से अपना पैसा बढ़ा रहे हैं। गुप्त गठबंधन हो रहे हैं। हर आदमी लाभ कमाने के उद्यम में लगा है, लेकिन मीडिया को नैतिकता और मिशन का पाठ पढ़ाया जाता है। जब हम मीडिया में प्रोफ़ेशनलिज़्म की बात करते हैं तो इसे गाली समझा जाता है। आजादी से पहले अखबारों ने एक मिशन के साथ काम किया था- देश को गुलामी से मुक्त कराने का मिशन। लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है। आज यह अन्य प्रोफेशन्स की तरह एक पेशा के रूप में क्यों नहीं पहचाना जाना चाहिए? अख़बार या टीवी चैनेल का जो मालिक करोड़ो रुपये का पूँजी निवेश करता है उसे लाभ कमाने के बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए? मात्र दो रूपये में चालीस पृष्ठ का अखबार आपके दरवाजे पर पहुँचाने का प्रबंध करने वाला अखबार मालिक आपके बारे में कितना सोचे जब आप दो रुपये की साबुन की टिकिया पाने के लिए अपना वर्षों पुराना अखबार बदल देते हैं। आपकी कोई प्रतिबद्धता नहीं है तो अखबार चलाने वालों से आप क्या अपेक्षा रखते हैं?

उन्होंने अखबार पहुँचाने वाले हॉकर के प्रति पाठकों के रूखे व्यवहार का वर्णन भी किया कि कैसे वह विपरीत मौसम में भी सुबह छः बजे घर पर अखबार पहुँचाता है और कभी देर हो जाने पर सुबह की चाय का स्वाद खराब कर देने का दोषी बन जाता है। बिना नागा किए तीस दिन अखबार देने के बाद जब वह पैसा लेने पहुँचता है तो महानुभावों को  ‘आज नहीं कल’ का जवाब देते देर नहीं लगती। “ऐसे लोग जब बिना जाने समझे अखबार के मालिक, अखबार के सम्पादक और अखबार के रिपोर्टर पर आरोप लगाते हैं तो मुझे आपत्ति होती है।”

कोई भी व्यवसाय जब प्रारम्भ किया जाता है तो उसकी प्रगति का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। लाभ कमाना एक सर्वमान्य लक्ष्य है। उसके लिए जरूरी उपाय तलाशे जाते हैं और उन्हें अपनाया जाता है। स्वतंत्रता मिलने के बाद पत्रकारिता भी किसी अन्य  व्यवसाय की तरह कुछ लक्ष्यों की पूर्ति के उद्देश्य से आगे बढ़ी। समय के साथ तालमेल बिठा कर चलने वाले सफल हुए। यह कार्य आज भी एक मिशन बना हुआ है, लेकिन इसका स्वरूप बदल गया है। आज पत्रकारिता ‘स्वांतः सुखाय’ नहीं है।

धारा प्रवाह बोलते हुए उन्होंने एक-दो और चुटकुले और आख्यान सुनाये और बोले- यह अजीब स्थिति है कि प्रायः सभी पत्रकार अपने प्रबंधन को कोसते रहते हैं। उनके अनैतिक कार्यों और शोषक प्रवृत्तियों का रोना रोते हैं। लेकिन वे ही जब स्वयं प्रबंधक अर्थात्‌ मालिक बन जाते हैं तो वे सारी मिशनरी बातें हवा हो जाती हैं और वे सभी बुराइयाँ अपना लेते हैं जिन्हें कोसते इनका समय बीता है। फिर उन्होंने जोड़ा कि इन सारी बातों के बावजूद आज भी जब देशहित का मुद्दा उठता है तो देश की पूरी मीडिया एकजुट होकर आवाज उठाती है। उन्होंने इसके कई उदाहरण भी गिना डाले।

अपने को एक अदना सा पत्रकार बताते हुए उन्होंने ‘छोटे-छोटे प्रयासों का महत्व’ रेखांकित करने के लिए उस गिलहरी की कथा सुनायी जिसने समुद्र पर रामसेतु के निर्माण की प्रक्रिया में योगदान कर्ताओं की सूची में अपना नाम लिखाने के लिए बार-बार तट पर लोटपोट कर शरीर में रेत बटोरने और पुल पर जाकर शरीर झाड़ देने का उद्यम किया था। ताकि भविष्य में इतिहास लिखने वाले यह न लिखें कि जब सारा  बानर समाज पुल बना रहा था तो वहाँ मौजूद एक गिलहरी कुछ नहीं कर रही थी। अस्तु कुछ न कुछ यथा सामर्थ्य करते रहना चाहिए। इसके बाद उन्होंने एक जोरदार वीररस की कविता सुनायी। मैं एक ही पंक्ति नोट कर पाया क्योंकि उन्होंने दुहराया नहीं था। हाल को गुँजाने वाली तालियाँ बजीं और अगले वक्ता बुलाये गये।

यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन जब प्रश्न-उत्तर का दौर चला तो प्रबंध-संपादक महोदय को उठकर सफाई देनी पड़ी। छात्र श्रोताओं के तीखे प्रहार वाकई बेचैन करने वाले थे। अंततः कुलपति जी को अध्यक्षीय भाषण में इस मसले पर अंतिम बात कहनी पड़ी। वह बहुत ही मार्मिक और सजग करने वाली बात थी। लेकिन उसकी चर्चा अगली कड़ी में। अभी तो आप उस वीररस की कविता का आनंद लेते हुए इस ‘चिरकुटई के आरोप’ का जवाब दीजिए।

गूगल महराज ने उस एक लाइन का ‘जामन’ लेकर पल भर में अपने क्षीर सागर के भंडार से पूरी कविता की दही परोस कर रख दी।

वह लाइन थी-

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में

इस लंबी कविता के मूल कवि हैं डॉ. हरिओम पवार। इसके आगे पीछे की कुछ और लाइनें यहाँ आपके लिए। पूरी कविता यहाँ है।

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का
कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का
एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है
अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है

जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो
चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो
हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो
गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में
हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं
डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं

जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं
तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की
हमने बूढ़े जे.पी. के आँसू की भी नीलामी की
परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था
भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था

अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर
कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर
अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर
शोकसभाएं कहाँ हुई हैं मजदूरों की लाशों पर

निर्धनता का खेल देखिये कालाहांडी में जाकर
बेच रही है माँ बेटी को भूख प्यास से अकुलाकर
यहाँ बचपना और जवानी गम में रोज बुढ़ाती हैं
माँ , बेटे की लाशों पर आँचल का कफ़न उढाती है

जब तक बंद तिजोरी में मेहनतकश की आजादी है
तब तक हम हर सिंहासन को अपराधी बतलायेंगे
बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

दास्ताने स्कूटर… बहुत कठिन है डगर।

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पिछली कड़ी में आपने पढ़ा…

…तभी एक हँसमुख डॉक्टर साहब ने मुस्कराते हुए कहा- “मुझे इसका बहुत अच्छा अनुभव है। आपकी समस्या का जो पक्का समाधान है वह मैं बताता हूँ…। ऐसा कीजिए इसे जल्दी से जल्दी बेंच दीजिए…। जो भी दो-तीन हजार मिल जाय उसे लेकर खुश हो जाइए और मेरी तरह शेल्फ़-स्टार्ट वाली स्कूटी ले लीजिए…” वहाँ उपस्थित सभी लोग ठठाकर हँस पड़े, इनका चेहरा उतर गया और मेरे पहियों के नीचे से जमीन खिसक गयी…।

अब आगे…

लेकिन इन्होंने धैर्य नहीं खोया। बोले- “बेंचने का तो मैंने कभी सोचा ही नहीं; अधिक से अधिक मैं इसे वापस उत्तर प्रदेश भेज दूंगा। वहाँ पर इसके स्पेयर पार्ट्स मिल जाएंगे। …आपलोग बस इतना कन्फ़र्म कर दीजिए कि उद्योगपति जमनालालाल बजाज के मूलस्थान वर्धा में बजाज स्कूटर का एक भी मिस्त्री नहीं है। दीपक तले अंधेरा की इस मिसाल को मैं पूरी दुनिया को बता लूँगा उसके बाद ही हार मानूंगा।” इतना सुनने के बाद वहाँ के डिप्टी स्पोर्ट्स ऑफीसर ने कहा कि आप घबराइए नहीं; मैं आपको एक एक्सपर्ट के पास ले चलता हूँ। मेरे मुहल्ले में रहता है। इन्होंने मुझे उनकी बाइक के पीछे लगा दिया। कई चौराहों, तिराहों और अंधे मोड़ों को पार करते हुए, मोटी-पतली गलियों से गुजरते हुए हम अंततः एक मिस्त्री के दरवाजे पर जा पहुँचे। सुबह आठ बजे का वक्त था और उसके छोटे से अहाते से लेकर बाहर सड़क तक पंद्रह-बीस मोटरसाइकिलें आड़े-तिरछे खड़ी हुईं थीं। इन्होंने उचक-उचक कर देखा, उस भीड़ में एक भी स्कूटर नहीं दिखा।

‘नितिन मिस्त्री’ ने अभी काम शुरू नहीं किया था। ये सभी गाड़ियाँ पिछले दिन इलाज के लिए भर्ती हुईं थीं। उस भीड़ की ओर देखते हुए स्पोर्ट्स ऑफीसर ने भावपूर्ण मुस्कान बिखेरी। मानो कह रहे हों- “देखा, कितना बड़ा मिस्त्री है… गाड़ियों की लाइन लगी है। एक दिन जमा करो तो दूसरे-तीसरे दिन नम्बर लगता है”

मुझे उस मुस्कान में कोई आशा की किरण नहीं दिखी। यदि बोल पाता तो मैं कहता- “हाँ देख रहा हूँ… कितना चिरकुट मिस्त्री है। आठ-गुणा-आठ फुट के कमरे में तीन-चार बच्चो और पत्नी के साथ रह रहा है और साथ में शायद एक छोटा भाई भी है। इतनी ही कमाई होती तो एक बड़ा गैरेज न बना लेता…!! काम अधिक है तो असिस्टेंट रख लेता, स्टाफ़ बढ़ा लेता…!!!”  दर‌असल मुझे वहाँ ‘प्रोफ़ेसनलिज़्म’ का घोर अभाव दिखायी दे रहा था।

स्पोर्ट्स ऑफीसर ने नितिन मिस्त्री को बुलाया जो ब्रश करते हुए बाहर निकला। आपस में दोनो ने मराठी में कुछ बात की। वे शायद हम नये ग्राहकों का परिचय बता रहे थे। कुछ देर बाद मिस्त्री मेरे मालिक से मुखातिब हुआ, “सर जी, हम इसको देख तो लेंगा लेकिन इसमें कोई स्पेयर पार्ट ‘लगेंगा’ तो यहाँ नहीं मिल ‘पायेंगा’।  नागपुर से आपको मँगाना पड़ेंगा…” हमें इस बात की उम्मीद तो पहले से ही थी इसलिए उसके बाद तय यह हुआ कि मिस्त्री मेरी जनरल सर्विसिंग करेगा। मेरी हेड लाइट का स्विच जाम हो गया है उसकी ऑयलिंग-ग्रीसिंग करेगा, पुरानी हो चुकी बैटरी बदल देगा ताकि हॉर्न और लाइट तेज हो सके, लेकिन ‘चोक-वायर’ की समस्या ठीक होने की गारंटी नहीं होगी। कोई जुगाड़ आजमाने की कोशिश करेगा लेकिन सफलता की संभावना क्षीण ही है। इन्होंने जब संभावित समय पूछा तो मध्यस्थ महोदय के दबाव में उसने मुझे ‘अगले दिन भर्ती कर लेने’ पर सहमति दे दी।

अगले दिन स्टेडियम से हम दुबारा उसकी दुकान पर पहुँचे। मिस्त्री ने इन्हें घर तक छोड़ा और मुझे वापस अपने घर/दुकान/गैरेज पर ले जाकर खड़ा कर दिया। मैं दिन भर दूसरी बाइक्स का आना-जाना देखता रहा। मिस्त्री वास्तव में बहुत बिजी था। उसकी मेहनत की तुलना में उसका मेहनताना बहुत कम था। ज्यादातर ग्राहक उसके परिचित टाइप थे जो छोटी-मोटी गड़बड़ियाँ मुफ़्त में ठीक कराने की फिराक में लगे रहते थे। पिछले दिन से भर्ती गाड़ियाँ एक-एक कर जाती रहीं और शाम तक उतनी दूसरी गाड़ियाँ आकर जमा हो गयीं। मेरी पैरवी करने वाला कोई नहीं था, इसलिए मुझे शाम होने तक उसने हाथ नहीं लगाया। शाम को छः बजे मेरे मालिक का फोन आया कि काम पूरा हो गया हो तो मुझे लेने आ जाँय। ऑफिस से छूटते वक्त इन्होंने फोन किया होगा। इधर से मिस्त्री ने जवाब दिया कि अभी थोड़ा काम बाकी रह गया है। एकाध घंटे बाद हो पाएगा। फोन पर मिस्त्री के हाव-भाव से लगा कि वे इस समय मुझे लेने नहीं आ रहे हैं, क्योंकि उसने उस फोन के बाद भी मुझे छुआ नहीं था।

अगले दिन सुबह आठ बजे ये स्टेडियम से खेलकर कार से गैरेज पर  आये तो मेरी बारी आ चुकी थी। हेडलाइट का स्विच ठीक हो चुका था लेकिन असली समस्या जस की तस थी। मिस्त्री ने उन्हें बताया कि स्कूटर के लिए ‘ओरिजिनल बैटरी’ कल मिल नहीं पायी थी। आज मँगाया है। शाम तक मैं चोक का भी कुछ कर दूँगा। ये चले गये तो उसने दूसरी गाड़ियों का काम शुरू कर दिया। आखिरकार दोपहर बाद बैटरी बदली गयी। शाम को ये आये तो मिस्त्री ने चोक की समस्या न ठीक कर पाने के कई कारण गिनाने शुरू किए। इन्होंने उससे पारिश्रमिक पूछकर डेढ़ हजार रूपये थमाए और मुझे लेकर घर आ गये।

अगले दिन से इन्होंने चोक वायर की खोज शुरू की। इनके एक मित्र इलाहाबाद से वर्धा आने वाले थे। उनसे इन्होंने कहा कि बजाज-लीजेंड में जितने किस्म के ‘वायर’ लगते हों सभी वहाँ से लेते आयें। एक सप्ताह बाद क्लच-वायर, एक्सीलरेटर-वायर और चोक वायर इलाहाबाद से वर्धा की यात्रा करके आ गये। अगले दिन चोक वायर के साथ मुझे नितिन के गैरेज़ भेजा गया। एक बार फिर चौबीस घंटे की प्रतीक्षा के बाद नम्बर आया। लेकिन दुर्भाग्य के क्षण अभी समाप्त नहीं हुए थे…Sad smile

पुराना केबल निकालकर नया केबल डालने में उसके पसीने छूट गये। अंततः उसने हार मान ली। फोन करके इसने बता दिया कि इलाहाबाद से मँगाया हुआ चोक-वायर इस मॉडल का नहीं हैं इसलिए नहीं लग सकता। फिर एक विचित्र जुगाड़ लगाने का काम शुरू हुआ। चोक वायर के दोनो सिरों पर घुंडियाँ होती हैं। एक सिरा दाहिनी हैंडिल के पास बने लीवर के खाँचे में फिट होता है और दूसरा सिरा कार्ब्यूरेटर में जाता है जहाँ एक स्प्रिंग के साथ जोड़कर इसे खास तरीके से फिट किया जाता है। नितिन मिस्त्री ने एक पुराने तार के घुंडी वाले सिरे को नीचे कार्ब्यूरेटर में तो फिट कर दिया लेकिन दूसरे सिरे को उसके सही रूट से हैंडिल तक ले जाने के बजाय सीट के नीचे से दाहिनी ओर बाहर निकाल दिया और उसमें एक छल्ला बना दिया। इस प्रकार चोक लेने के लिए सीट के नीचे छिपे छल्ले को बाहर निकालकर उसमें उंगली फसाते हुए जोर से खींचना होता था और फिर इसी स्थिति में किक मारना होता था।

जुगाड़ वाला चोक लगवाकर हम घर आये। लेकिन इसमें एक बड़ी खामी रह गयी थी। छल्ला पकड़कर जोर से खींचने पर चोक लेने की प्रक्रिया तो पूरी हो गयी लेकिन छोड़ने पर तार ठीक से वापस नहीं हो पा रहा था। नतीजा यह हुआ कि एक बार चोक में ही तार अटका रह गया और मेरे मालिक मुझे चोक में ही हाँकते रहे। अलस्सुबह जब पहली किक में ही मैं भरभराकर स्टार्ट हो गया तो इन्हें कुछ संदेह तो हुआ लेकिन एक दो बार उस तार की पूँछ उल्टा घुसेड़ने के अलावा ये कुछ न कर सके। इनका संदेह यकीन में तब बदला जब मेरी टंकी का पेट्रोल सम्भावित समय से बहुत पहले ही खत्म हो गया। मुझे एक बार फिर उसी नितिन के पास जाना पड़ा। उसने ढ‌क्‌कन खोलकर फँसा हुआ तार छुड़ा दिया और तार को ‘आहिस्ता खींचने’ की ट्रेनिंग देकर चलता कर दिया।

अब दो-चार दिन के अभ्यास से काम आसान होता गया और जुगाड़ चल निकला। लेकिन एक दूसरी समस्या तैयार खड़ी थी।  अचानक क्लच वायर की घुंडी भी तीन-चार साल की सेवा देकर चल बसी। गनीमत थी कि यह दुर्घटना घर पर ही हुई, इसलिए मुझे ठेलकर चलाने की जरुरत नहीं पड़ी। वैसे तो नया क्लच वायर डालने में पाँच से दस मिनट ही लगते हैं लेकिन मिस्त्री की तलाश में ही तीन दिन लग गये। मुझको बिना क्लच के स्टार्ट करके दुकान तक ले जाना संभव नहीं था। इन्होंने नितिन मिस्त्री को फोन मिलाया तो उसने असमर्थता जताते हुए ‘ऑउट ऑफ़ स्टेशन’ होने की बात बतायी। दूसरी कई दुकानों पर संपर्क किया गया तो सबने कहा कि दुकान छोड़कर नहीं जाएंगे। गाड़ी यहीं लाइए, यह भी कि गाड़ी देखकर ही बता पाएंगे कि काम हो पाएगा कि नहीं। रोज़ शाम को ये घर आते और अपनी असफलता की कहानी मालकिन को सुनाते। मैं  उत्सुकता पूर्वक रोज किसी मिस्त्री की प्रतीक्षा करता रहा।

अंततः इन्होंने विश्वविद्यालय के इंजीनियर साहब को, जो यहाँ का स्थानीय निवासी ही हैं, मेरी समस्या बताकर एक मिस्त्री का जुगाड़ करने का अनुरोध किया। उन्होंने विश्वास दिलाया कि बहुत जल्द मेरा काम हो जाएगा। दो-दिन और बीते तब अचानक इनके ऑफ़िस का एक कर्मचारी एक मिस्त्री को लेकर आया और उसने दस मिनट में एक क्लच वायर फिट कर दिया। इलाहाबाद से आया क्लच-वायर का केबल पड़ा रह गया। इन्होंने उस मिस्त्री से अनुरोध किया कि यदि हो सके तो चोक वायर को उसके सही स्थान पर फिट कर दो। इसपर उसने कहा कि किसी दिन फुर्सत से गाड़ी दुकान पर भेज दीजिएगा। ठीक करा दूँगा।

अगले इतवार को इन्होंने स्वयं उसकी दुकान पर जाकर चोक वायर डलवाने का निश्चय किया। लेकिन जब इन्होंने मोबाइल पर आने की अनुमति माँगी तो उसने टरकाते हुए कहा कि आज वह मिस्त्री आया ही नहीं है जो इस काम का एक्सपर्ट है।

इतना सुनने के बाद कोई भी झुँझलाकर सिर पीट लेता। लेकिन दाद देनी पड़ेगी इनके धैर्य की और काम पूरा कराने की जिद्दी धुन की। ये चोक वायर की केबिल डिक्की में डाल मुझे लेकर शहर की ओर निकल पड़े। पूछते-पू्छते बजाज कंपनी की अधिकृत वर्कशॉप पर जा पहुँचे। वही वर्कशॉप जहाँ से बहुत पहले मुझे बैरंग लौटाया जा चुका था। उसबार इनके चपरासी ने मुझे वहाँ ले जाकर सर्विसिंग कराने की असफल कोशिश की थी। तब किसी मिस्त्री ने मुझे घास नहीं डाली थी। कहते थे कि इस शहर में यह गाड़ी है ही नहीं इसलिए हम इसका स्पेयर पार्ट नहीं रखते। कंपनी के नियमों के अनुसार हम बाहर से मँगाकर कोई स्पेयरपार्ट डाल भी नहीं सकते।

इस बार भी यही टका सा जवाब इन्हें मिला। लेकिन इन्होंने मैनेजर से बहस करनी शुरू की। बोले- यदि बजाज कंपनी ने मुझे यह स्कूटर बेचा है और आपको सर्विस सेंटर चलाने का लाइसेंस दिया है तो आपको इसे ठीक करना ही चाहिए…। यह कैसे होगा यह आप जानिए, लेकिन आप बिना सर्विस दिए लौटा नहीं सकते…। मैं इसके लिए ‘राहुल बजाज’ को भी एप्रोच कर सकता हूँ…। आपकी कम्पलेंण्ट करके कुछ नुकसान तो करा ही सकता हूँ। आप अपने उत्तरदायित्व से भाग नहीं सकते… कुछ तो संवेदनशील होना सीखिए आप लोग…  आदि-आदि। मैनेजर भौचक होकर देख रहा था। …फिर इनका पूरा परिचय पूछने लगा।

एक मिस्त्री ने इनको किनारे ले जाकर प्रस्ताव रखा कि सामने जो प्राइवेट मिस्त्री ने दुकान खोल रखी है वह स्कूटर का स्पेशलिस्ट  है। मैं उससे बोल देता हूँ कि आपका चोक वायर डाल दे। लेकिन इन्होंने ठान लिया था कि काम यहीं से कराकर जाना है। अब और भटकने को तैयार नहीं थे ये। इनकी मंशा भाँपकर वहाँ सबने आपस में बात की और भीतर काम कर रहे एक मिस्त्री को बुलाया गया। उस मिस्त्री ने मुझे देखकर पहचान लिया। उसी ने पिछली बार मुझे छू-छाकर छोड़ दिया था। लेकिन इस बार उसे मैनेजर द्वारा समझाया गया कि काम करना ही है, चाहे जैसे हो। जनार्दन मिस्त्री ने बेमन से तैयार होते हुए आखिरी दाँव चला। साहब जी, इसे छोड़कर जाना पड़ेगा। तीन-चार घण्टे लगेंगे। न हो तो कल सुबह लेकर आ जाओ।

लेकिन ये टस से मस न हुए। बोले- आज मेरी छुट्टी है। मैं पूरा दिन यहीं बैठने को तैयार हूँ। बस अब आगे के लिए नहीं टाल सकता। देखते-देखते सभी मिस्त्री वहाँ से चले गये, एक आदमी दुकान का शटर गिराने लगा। इन्होंने पूछा तो बताया गया कि लंच ब्रेक हो गया है अब तीन बजे से काम शुरू होगा। ये अड़े रहे कि मैं काम पूरा कराकर ही जाऊँगा, आपलोग लंच करके आइए। इसपर उस मिस्त्री ने मुझे स्टैंड से उतारा और भीतर की ओर लेकर चला गया। इनको पिछले दरवाजे से आने के लिए कह दिया।

जब ये पिछले दरवाजे से भीतरी अहाते में पहुँचे तो जनार्दन मिस्त्री अपना टिफिन समाप्त करने वाला था। हाथ धोकर उसने मेरी डिक्की से केबल निकाला, दोनो सिरों की घुंडियों का मुआइना किया और इंजन का ढक्कन उतारकर पुरानी केबल के उपरी सिरे से नयी केबल का निचला सिरा एक पतले तार से बाँध दिया। फिर पुरानी केबल के निचले सिरे को धीरे-धीरे खींचकर बाहर निकालने लगा। इस प्रकार दो-तीन मिनट में ही पुरानी केबल का स्थान नयी केबल ने ले लिया। केबल के भीतर दौड़ रहे चोक-वायर के दोनो सिरों को उनके जायज स्थानों में फिट करने में पाँच मिनट और लगे। इस प्रकार पूरा काम पंद्रह मिनट का ही निकला।

मेरे मालिक इस टुच्चे से काम पर इतना समय और दौड़-धूप करने के बाद मन ही मन कुढ़ तो रहे ही थे लेकिन अंततः मिली अपनी सफलता पर प्रसन्न भी हो गये थे। इन्होंने उस मिस्त्री को पचास रूपये देने का मन बनाया था, लेकिन देने से पहले आदतन उससे ही पूछ लिया। पहले तो उसने संकोच किया लेकिन जब इन्होंने कहा कि ‘काम मेरे मनमाफ़िक और दाम तुम्हारी इच्छानुसार’ तो उसने अपनी फीस माँगी- 20/- रूपये।

प्रस्तुति : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

पढ़ना, पढ़वाना और लिखना साथ-साथ…

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wife-scoldआजकल मुझे डाँटने वालों की फ़ेहरिश्त लम्बी होती जा रही है। प्रदेश सरकार की नौकरी से छुट्टी लेकर घर से हजार किलोमीटर दूर आ गया और केंद्रीय विश्वविद्यालय में काम शुरू किया तो माता-पिता ही नाराज हो गये। भाई-बंधु, दोस्त-मित्र और रिश्तेदार भी फोन पर ताने मारने लगे कि क्या मिलेगा यहाँ जो वहाँ नहीं था। ऊल-जलूल मुद्दों को लेकर सुर्खियों में छाये रहने वाले एक विश्वविद्यालय से जुड़कर ऐसा क्या ‘व्यक्तित्व विकास’ कर लोगे?

बच्चे और पत्नी तो जैसे एक बियाबान जंगल में फँस जाने का कष्ट महसूस करने लगे हैं। …ना कोई पड़ोस, ना कोई रिश्तेदार और ना कोई घूमने –फिरने लायक सहज सुलभ स्थान। …कहीं जाना हो तो दूरी इतनी अधिक की कार से नहीं जा सकते। रेलगाड़ी में टिकट डेढ़-दो महीना पहले बुक कराने पर भी कन्फ़र्म नहीं मिलता। शादी-ब्याह के निमंत्रण धरे रह जाते हैं और सफाई देने को शब्द नहीं मिलते। किसने कहा था आपसे यह वनवास मोल लेने को..?

लेकिन मैं खुद को समझाता रहता हूँ। प्रदेश सरकार की नौकरी में ही क्या क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़ थी। दिनभर बैल की तरह जुते रहो। चोरी, बेईमानी, मक्कारी, धुर्तता धूर्तता, शोषण, अनाचार, अक्षमता, लापरवाही, संत्राष संत्रास, दुख, विपत्ति, कलुष, अत्याचार, बेचारगी, असहायता इत्यादि के असंख्य उदाहरण  आँखों के सामने गुजरते रहते और हम असहाय से उन्हें देखते रहते। सिस्टम का अंग होकर भी बहुत कुछ न कर पाने का मलाल सालता रहता और मन उद्विग्न हो उठता। बहुत हुआ तो सत्यार्थमित्र  के इन पृष्ठों पर अपने मन की बात पोस्ट कर दी। लेकिन उसमें भी यह सावधानी बरतनी होती कि सिस्टम के आकाओं को कुछ बुरा न लग जाय; नहीं तो लेने के देने पड़ जाँय। कम से कम यहाँ वह सब आँखों से ओझल तो हो गया है। यहाँ आकर शांति से अपने मन का काम करने का अवसर तो है।

हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में जो कुछ भी अच्छा लिखा गया है; अर्थात्  क्लासिक साहित्य के स्थापित रचनाकारों की लेखनी से निसृत शब्दों का अनमोल खजाना, उसे हिंदीसमय[डॉट]कॉम पर अपलोड करने का जो सुख मुझे यहाँ मिल रहा है वह पहले कहाँ सुलभ था। प्रिंट में उपलब्ध उत्कृष्ट सामग्री को यूनीकोड में बदलकर इंटरनेट पर पठनीय रूप रंग में परोसने की प्रक्रिया में उन्हें पढ़कर जो नैसर्गिक सुख अपने मन-मस्तिष्क को मिलता है वह  पहले कहाँ था?

कबीर ग्रंथावली के समस्त दोहे और पद अपलोड हुए तो इनके भक्तिरस और दर्शन में डूबने के साथ-साथ इसके संपादक डॉ. श्याम सुंदर दास की लिखी प्रस्तावना से भक्तिकाल के संबंध में बहुत कुछ जानने को मिला-

“…कबीर के जन्म के समय हिंदू जाति की यही दशा हो रही थी। वह समय और परिस्थिति अनीश्वरवाद के लिए बहुत ही अनुकूल थी, यदि उसकी लहर चल पड़ती तो उसे रोकना बहुत ही कठिन हो जाता। परंतु कबीर ने बड़े ही कौशल से इस अवसर से लाभ उठाकर जनता को भक्तिमार्ग की ओर प्रवृत्त किया और भक्तिभाव का प्रचार किया। प्रत्येक प्रकार की भक्ति के लिए जनता इस समय तैयार नहीं थी।

मूर्तियों की अशक्तता वि.सं. 1081 में बड़ी स्पष्टता से प्रगट हो चुकी थी जब कि मुहम्मद गजनवी ने आत्मरक्षा से विरत, हाथ पर हाथ रखकर बैठे हुए श्रद्धालुओं को देखते-देखते सोमनाथ का मंदिर नष्ट करके उनमें से हजारों को तलवार के घाट उतारा था। गजेंद्र की एक ही टेर सुनकर दौड़ आने वाले और ग्राह से उसकी रक्षा करने वाले सगुण भगवान जनता के घोर संकटकाल में भी उसकी रक्षा के लिए आते हुए न दिखाई दिए। अतएव उनकी ओर जनता को सहसा प्रवृत्त कर सकना असंभव था। पंढरपुर के भक्तशिरोमणि नामदेव की सगुण भक्ति जनता को आकृष्ट न कर सकी, लोगों ने उनका वैसा अनुकरण न किया जैसा आगे चलकर कबीर का किया; और अंत में उन्हें भी ज्ञानाश्रित निर्गुण भक्ति की ओर झुकना पड़ा।…”

मोहन राकेश का लिखा पहले बहुत कम पढ़ पाया था लेकिन जब उनकी रचनाओं का संचयन (कहानी, डायरी, यात्रा-वृत्त, उपन्यास, निबंध आदि) अपलोड करना हुआ तो बीच-बीच में काम रोककर उनकी शब्दों की सहज जादूगरी में डूबता चला जाता था। एक बानगी देखिए-

“पत्रिका के कार्यालय में हम चार सहायक सम्पादक थे। एक ही बड़े से कमरे में पार्टीशन के एक तरफ़ प्रधान सम्पादक बाल भास्कर बैठता था और दूसरी तरफ़ हम चार सहायक सम्पादक बैठते थे। हम चारों में भी एक प्रधान था जिसे वहाँ काम करते चार साल हो चुके थे। एक ही लम्बी डेस्क के साथ चार कुरसियों पर हम लोग बैठते थे। छोटे प्रधान की कुरसी डेस्क के सिरे पर खिडक़ी के पास थी और हम तीनों की कुरसियाँ उसके बाद वेतन के क्रम से लगी थीं। छोटे प्रधान उर्फ बड़े सहायक सुरेश का वेतन दो सौ रुपये था। उसके बाद लक्ष्मीनारायण था जिसे पौने दो सौ मिलते थे। तीसरे नम्बर पर मेरी एक सौ साठ वाली कुरसी थी और चौथे नम्बर पर डेढ़ सौ वाली कुरसी पर मनोहर बत्रा बैठता था। छोटा प्रधान सबसे ज़्यादा काम करता था, क्योंकि प्रूफ़ देखने के अलावा उसे हम सब पर नज़र भी रखनी होती थी और जब सम्पादक के कमरे में घंटी बजती, तो उठकर आदेश लेने के लिए भी उसी को जाना होता था। वह दुबला-पतला हड्डियों के ढाँचे जैसा आदमी था, जिसे देखकर यह अन्देशा होता था कि बार-बार उठने-बैठने में उसकी टाँगें न चटक जाएँ। सम्पादक को हममें से किसी से भी बात करनी होती, तो पहले उसी की बुलाहट होती थी और वह वापस आकर कारखाने के फ़ोरमैन की तरह हमें आदेश देता था, “नम्बर तीन, उधर जाओ। साहब याद कर रहे हैं।” एक बार बत्रा ने उससे कह दिया कि वह साहब के लिए चपरासी का काम क्यों करता है, तो वह सप्ताह-भर बत्रा से अपने प्रूफ़ दिखाता रहा था।”

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हुए देश के विभाजन के ऊपर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में बहुत सी मार्मिक कहानियाँ लिखी गयी हैं। इनका हिंदी में अनूदित संचयन भी हिंदी-समय पर उपलब्ध है। इन कहानियों को पढ़कर हम सहसा उस दौर में पहुँच जाते हैं जिसने आज की अनेक राष्ट्रीय समस्याओं को जन्म दिया है। किसी भी साहित्य प्रेमी या समाज के अध्येता के लिए इन ८६ कहानियों से दो-चार होना उपयोगी ही नहीं अपितु अनिवार्य हैं।

अज्ञेय जी का एक लेख ‘सन्नाटा’ नाम से इंटर के कोर्स में पढ़ रखा था। ‘शेखर एक जीवनी’ और ‘नदी के द्वीप’ जैसे उपन्यास यूनिवर्सिटी के समय में पढ़ रखे थे लेकिन अभी जब उनके विशाल रचना संसार से परिचित हुआ और विविध विधाओं में उनके लेखन को अपलोड करते हुए दुरूह विषयों पर उनकी गहरी समझ और सटीक भाषा से प्रभावित हुआ तो लगा कि सब काम छोड़कर उन्हें ही समग्रता से पढ़ लिया जाय तो जीवन सफल हो जाय। मेरी बात मानने के लिए उनका संक्षिप्त जीवन वृत्त ही पढ़ लेना पर्याप्त होगा। दो-चार दिनों के भीतर सम्पूर्ण सामग्री हिंदी-समय पर होगी।

और हाँ,  अमीर खुसरों की मुकरियाँ पढ़कर और सुनाकर जो मुस्कान फैलती है उसका लोभसंवरण किया ही नहीं जा सकता। अब कहाँ तक गिनाऊँ। बहुत बड़ा भंडार है जी…।

इन सब सामग्रियों के बीच डूबकर मुझे इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि सत्यार्थमित्र पर अंतिम पोस्ट डाले हुए तीन सप्ताह निकल चुके हैं और हिंदी ब्लॉग जगत में विचरण का मेरा प्रिय कार्य प्रायः बंद हो चला है। मेरी तंद्रा आज तब टूटी जब घर में ही डाँट-सी सुननी पड़ी।

“आप को क्या हो गया है जी…? देख रही हूँ कि आपने आजकल पोस्ट लिखना बंद ही कर दिया है। जिस ब्लॉगरी के कारण आप सबकुछ छोड़कर यहाँ आये वही भूल गये हैं। यह दिनभर दूसरों के पुराने लिखे में आँख फोड़ने से कोई मेडल नहीं मिलने वाला है। आपकी पहचान हिंदी ब्लॉगजगत से है। उसे छोड़कर आप ‘फ्रंटपेज’ खोले बैठे हैं। कौन जानता है कि आप यह सब कर रहे हैं? कोई क्रेडिट नहीं मिलने वाली।… यही चलता रहा तो …न घर के रहेंगे न घाट के”

मैंने यह समझाने की कोशिश की मैं इस घिसे-पिटे मुहावरे का ‘पात्र’ नहीं हूँ। अब तो कोई धोबी भी इसे नहीं पालता। बल्कि विद्यार्थी जीवन में पहले जो कुछ नहीं पढ़ पाया था उसे पढ़ रहा हूँ और दूसरों को पढ़वाने का उपक्रम भी कर रहा हूँ। इसी काम के लिए मुझे तनख्वाह मिलती है। वैसे भी नेट पर अपना लिखा कूड़ा पढ़वाने से बेहतर है कि दूसरे उत्कृष्ट जनों का लिखा श्रेष्ठ साहित्य नेट पर उपलब्ध कराऊँ।

“तो आपको यह नौकरी करने से कौन मना कर रहा है। इस ‘पुनीत कार्य’ को अपने ऑफिस तक ही रखिए। छुट्टी के दिन घर पर भी वही जोतते रहेंगे तो कुछ दिन में पागल हो जाएंगे। …और आपके दिमाग में जो कूड़ा ही भरा है तो उसे बाहर निकाल देना ही श्रेयस्कर है। उसी ने आपको यहाँ ला पटका है। आप अपनी पहचान खो देने के रास्ते पर क्यों बढ़ रहे हैं।”

मैने सोचा पूछ लूँ कि अपने ब्लॉग पर क्यों कई महीने बाद कल एक पोस्ट डाल पायी हो लेकिन चुप लगा गया। कारण यह था कि उनकी बातें कहीं न कहीं मुझे अंदर से सही लग रही थीं। अपनी आशंका दूर करने के लिए मैंने कुछ ब्लॉगर मित्रों से बात की तो सबने यही कहा कि कुछ न कुछ लिखते रहना तो अनिवार्य ही है। इसी से मन को शांति मिल सकती है।

अब मेरी दुविधा कुछ मिट चली है। अब काम का बँटवारा करूंगा। घर पर ब्लॉगरी और ऑफिस में हिंदी-समय पर अपलोडिंग। काम के घंटे निर्धारित करने होंगे। हिंदी साहित्य का क्षेत्र इतना विस्तृत तो है ही कि इसे कुछ दिनों के ताबड़तोड़ प्रयास से पार नहीं किया जा सकता। स्थिर गति से लम्बे समय तक लगना होगा इसलिए इस काम में रोचकता बनाये रखना जरूरी है। सिर पर लगातार लादे रखने से कहीं यह बोझ न बन जाय। अब होगा पढ़ना-पढ़वाना और लिखना साथ-साथ।

लीजिए इस राम कहानी में एक पोस्ट निकल आयी। अब ठेल ही देता हूँ…!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

प्रयाग का पाठ वर्धा में काम आया… शुक्रिया।

42 टिप्पणियाँ

 

वर्धा में जो कुछ हुआ वह आप ब्लॉगजगत की रिपोर्टों से जान चुके हैं। मैं भी अपने ब्लॉगर अतिथियों को विदा करने के बाद लगातार उनकी पोस्टें ही पढ़ रहा हूँ। उनकी स्नेहिल भाव-धारा में डूब-उतरा रहा हूँ। कृतज्ञता ज्ञापन के लिए शब्दों की मेरी झोली रिक्त हो चुकी है। मेरे लिए जैसी सद्‍भावनापूर्ण टिप्पणियाँ और उत्साहवर्द्धक बातें लिखीं गयी हैं उसके बाद तो मन में नयी ऊर्जा का संचार हो गया है। लगता है कि मौका मिले तो बार-बार उन अविस्मरणीय क्षणों को जीवन में उतारना चाहूँगा।

बीच-बीच में एक-दो महानुभावों की टिप्पणियाँ देखकर मन विचलित होता है तो पिछले साल के इलाहाबाद महासम्मेलन की याद ताजा कर अपना आत्मविश्वास मजबूत कर लेता हूँ।

पहला सम्मेलन विश्वविद्यालय के वर्धा मुख्यालय से दूर इलाहाबाद में था, यहाँ जैसा संसाधन व ‘लॉजिस्टिक सपोर्ट’ वहाँ उपलब्ध न था, अनुभव की कमी थी और ब्लॉग जगत का स्वभाव प्रायः अपरिचित था। लेकिन वहाँ भी जमावड़ा अच्छा हुआ था। खूब सार्थक बहस हुई। गरमा-गरमी भी हुई। एक जीवंत गोष्ठी का सफलता पूर्वक समापन कराकर जब हम घर लौटे तो अंतर्जाल पर हमारे प्रयत्नों को तार-तार करती कुछ पोस्टें हमारा स्वागत (काले झंडे से) करती मिलीं। हमने धैर्य से सबकुछ पढ़ा। …इसे बुलाया, उसे छोड़ दिया, इन्हें ये मिला, उन्हें वो नहीं मिला, यहाँ ये कमी वहाँ वो कमी। पब्लिक का पैसा बहा दिया गया,  …पारदर्शिता नहीं बरती गयी, आदि-आदि।

इन सब के बीच मेरा सौभाग्य यह रहा कि उस समय भी नकारात्मक आलोचनाओं से अधिक मात्रा में सम्मेलन की सकारात्मक बातों ने अन्तर्जाल पर स्थान बनाया। दुनिया को सही तस्वीर का पता चल गया। अंततः मेरा विश्वास पक्का हो गया कि हिंदी ब्लॉगिंग को प्रत्येक पढ़े-लिखे व्यक्ति से जोड़ने और इस अनूठे माध्यम की स्वतंत्रता और सहजता से सबको परिचित कराने के लिए इस आभासी दुनिया के स्थापित हस्ताक्षरों को सेमिनारों, गोष्ठियों व सम्मेलनों के माध्यम से एक दूसरे से व अन्य विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों से मिलने-मिलाने का सिलसिला चलते रहना चाहिए।

मैंने वर्धा में संपन्न इस कार्यक्रम की तैयारी के समय आदरणीय अरविंद जी द्वारा वर्ष पर्यन्त दी गयी सलाह के आधार पर कुछ मोटी-मोटी बातें नोट करके रख ली थीं लेकिन ऐन वक्त पर वह नोट ही गायब हो गया। अब जैसा कि सभी लोग कार्यक्रम को सफल बता रहे हैं तो स्मृति के आधार पर उन बातों को लिखने की कोशिश करता हूँ –

  1. आमंत्रितों की सूची अपने निजी संपर्क के आधार पर नहीं बल्कि ऐसी रीति से तैयार की जाय जिसमें इस माध्यम से गंभीरता पूर्वक जुड़ने वाले प्रत्येक ब्लॉगर को अपनी पहल पर यहाँ आने का मौका मिल सके।
  2. बजट की सीमा के अनुसार अतिथियों की जो भी सीमा तय हो उसको पूरा करने के लिए ‘प्रथम आगत-प्रथम स्वागत’ का नियम अपनाया जाय।
  3. आमंत्रित अतिथियों के लिए समान शिष्टाचार व उपलब्धता के आलोक में यथासम्भव समान संसाधन व सुविधाएँ उपलब्ध कराये जाय।
  4. सभाकक्ष में समय-प्रबंधन के उद्देश्य से बोलने वालों की संख्या नियंत्रित करने के लिए समूह-चर्चा की विधि अपनायी जाय जिसमें अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करने के लिए छोटे-छोटे समूह बनाकर गहनता से अलग-अलग चर्चा करा ली जाय और समूह के निष्कर्षों को उनके द्वारा नामित प्रतिनिधि द्वारा सभाकक्ष में प्रस्तुत किया जाय।
  5. अतिथियों के आवागमन, सुबह की चाय, नाश्ता, भोजन व शयन को निर्बाध बनाने के लिए अलग-अलग कर्मचारियों की लिखित ड्यूटी लगाकर उनका अनुश्रवण किया जाय।
  6. सभाकक्ष में परिचय-पत्र, कलम-कागज, कम्प्यूटर, इंटरनेट, माइक, ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग, फोटोग्राफी, प्रेस-रिपोर्ट इत्यादि की जिम्मेदारी दूसरे कुशल विशेषज्ञों के हाथ में दे दिया जाय।
  7. प्रत्येक सत्र में संपन्न कराये जाने वाले कार्यक्रम की रूपरेखा पहले ही तय कर ली जाय और उसका समयबद्ध अनुपालन प्रत्येक दशा में किया जाय।
  8. किसी भी ब्लॉगर को अपने मन से बक-बक करने की इजाजत न दी जाय। विषय से इतर न कुछ कहने दिया जाय और न ही कुछ करने दिया जाय। इधर-उधर घूमने और टंकी इत्यादि खोजने का मौका तो कतई नहीं।:)

इस प्रकार सारे काम दूसरों के सुपुर्द कर मैने अपना कैमरा उठाया और एक विचित्र संयोजक बनकर अनूप जी को एक बार फिर शिकायत का मौका देता हुआ गेस्ट हाउस पहुँच गया। शिकायत यह कि मैं एक संयोजक की तरह परेशान हाल, सिर खुजाता हुआ और बेचैनी से टहलता हुआ क्यों नहीं दिखायी दे रहा था।

जब पंचों की यही राय है कि संगोष्ठी सफल रही तो मैं यह क्यों बताऊँ कि ऊपर गिनाये गये किसी भी बिन्दु का अनुपालन ठीक-ठीक नहीं हो पाया? साथ ही कुछ दूसरी कमियाँ भी अपना मुँह लटकाये इधर-उधर ताकती रहीं तो उन्हें चर्चा का विषय मैं क्यों बनाऊँ? …लेकिन एक भारी समस्या है। यह बात लिखकर मैं आफ़त मोल ले रहा हूँ। शुचिता और पारदर्शिता के रखवाले मुझे जीने नहीं देंगे। यदि कमियाँ थीं तो उन्हें सामने आना चाहिए। अनूप जी ने यह कई बार कहा कि सिद्धार्थ अपना नमक खिला-खिलाकर लोगों को सेट कर रहा है। तो क्या मानूँ कि नमक अपना असर कर रहा है? छी-छी मैं भी कैसा अहमक  हूँ… अनूप जी की बात पर जा रहा हूँ जो खुले आम यह कहते हुए पाये गये कि आओ एक दूसरे की झूठी तारीफ़ें करें…।

तो मित्रों, मैं पूरे होशो-हवाश में पारदर्शिता के तकाजे से यह बताना चाहता हूँ कि ऊपर तय की गयी पॉलिसी शुरुआत से ही फेल होती रही, और मैं अपने को जबरिया पास करता रहा। उद्‍घाटन सत्र में ही अनूप जी ने स्पष्ट भी कर दिया कि सिद्धार्थ के ‘साहस’ की दाद देनी पड़ेगी कि इलाहाबाद सम्मेलन पर इतनी गालियाँ खाने के बाद भी साल भर के भीतर ही फिर से सबको दुबारा बुला लिया। इस कथन को भी मैने सकारात्मक मान लिया है जबकि आप इसका अर्थ समझ ही रहे होंगे। बहरहाल ऊपर गिनाये गये नियमों पर बिंदुवार आख्या निम्नवत है:

  1. मैने अपने ब्लॉग सत्यार्थमित्र व विश्वविद्यालय की दोनो साइट्स पर यह सूचना पोस्ट कर दी कि अमुक तिथियों को संगोष्ठी होगी। उसमें जो भी सज्जन शामिल होना चाहें वे ‘ब्लॉगिंग इथिक्स’ की थीम पर एक आलेख लिखकर उसे अपनी प्रविष्टि के रूप में हमें भेजें। चयनित होने पर उन्हें प्रतिभाग हेतु आमंत्रण पत्र भेजा जाएगा। कार्यशाला में प्रशिक्षण प्राप्त करने के इच्छुक अभ्यर्थियों से  निर्धारित प्रारूप पर आवेदन/पंजीकरण प्रपत्र भरने का अनुरोध किया गया था। सुरेश चिपलूनकर जी के एक टिप्पणी रूपी प्रश्न के जवाब में ‘प्रतिभागी’ और ‘अभ्यर्थी’ का अंतर भी बताया गया। इस सूचना के आधार पर जिस किसी ने अपनी प्रविष्टि भेजी उसको आमंत्रण पत्र भेज दिए गये। कोई आलेख अस्वीकृत नहीं हुआ। लेकिन हमारी उम्मीद के उलट यह संख्या बहुत कम थी। इस खुले आमंत्रण से संख्या पूरी न होते देखकर हमें सामूहिक चर्चा से कुछ नाम तय करने पड़े। करीब पचास बड़े और अनुभवी ब्लॉगर्स से संपर्क किया गया। इनमें से अनेक अपनी निजी व्यस्तता के कारण असमर्थता व्यक्त करते गये। अंततः करीब पैतीस लोगों ने आने की सहमति जतायी। अंतिम क्षण तक आकस्मिक कारणों से लोगों की यात्राएँ रद्द होती रहीं। प्रमुख कारणों में स्वयं अथवा किसी परिजन की तबियत खराब होना, अथवा नौकरी से छुट्टी न मिल पाना रहा। इस प्रकार हमने अवसर सबको दिया लेकिन उसे लपक लेने का ख्याल कम ही लोगों के मन में आया। जो आ गये उन्हें ही पाकर हम धन्य हो गये। जिन्होंने न बुलाने का स्पष्टीकरण मांगा उन्होंने अपनी भाषा और शैली से जतला भी दिया कि उन्हें न बुलाकार इस कार्यक्रम का कोई नुकसान नहीं हुआ।
  2. अंतिम समय तक लोगों के नाम कटते रहे इसलिए दूसरे नियम के पालन की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। जिसने भी चाहा उसे आने दिया गया। हम सभी आने वालों से उनके आलेख अंतिम समय तक माँगते रहे। जिन्हें नहीं देना था उन्होंने नहीं ही दिया। कुछ लोगों का ‘न आना’ तय था लेकिन उन्होंने आलेख पाबंदी से भेज दिया। इसमें इस बात की पुष्टि हुई कि ब्लॉगर अपने मन का राजा है। जब मूड होगा तभी लिखेगा। किसी के कहने से नहीं।
  3. संसाधनों-सुविधाओं की समानता के बजाय उनकी उपलब्धता ने तीसरे नियम को ज्यादा प्रभावित किया। ए.सी.-नॉन-ए.सी., उत्तर-दक्षिण, ऊपर-नीचे, सिंगल-डबल इत्यादि मानकों के कमरों की उपलब्धता सीमित थी इसलिए जिसे जैसा बन पड़ा उसे वैसा टिका दिया गया। लेकिन सौभाग्य से इस बार कोई ब्लॉगर ऐसा नहीं निकला जो इन बातों की तुलना करके अपना दिन खराब करे। सबने हमारी वाह-वाह की और हम सच्ची में खुश होते रहे।
  4. समूहों का गठन भी हुआ, चर्चा भी हुई और प्रतिनिधियों का प्रस्तुतिकरण भी हुआ। लेकिन इस चक्कर में कई अच्छे वक्ता बोलने से रह गये। तकनीकी रूप से उनके विचार उनके समूह प्रतिनिधि ने व्यक्त कर दिए, लेकिन कलकत्ता से आये प्रियंकर जी, मुम्बई से आयी अनीता जी, रायपुर से आये संजीत जी अपने समूह के बाहर बोलने का मौका ही नहीं पा सके। इनको सुनना निश्चित रूप से बहुत लाभकारी होता, लेकिन समय-प्रबंधन की नयी तकनीक के आगे यह नुकसान हो गया।
  5. पाँचवें नियम के आलोक में ड्य़ूटी तो लगा दी गयी लेकिन कर्मचारियों ने यदि कोई ढिलाई बरती होगी तो उसका पता नहीं चल पाया। हमारे अतिथि इतने अच्छे थे कि उन्होंने मुझे खुश देखने के लिए किसी कमी की ओर इशारा ही नहीं किया। खुद आगे बढ़कर चाय माँगकर पीते रहे और लाइव रिपोर्ट में हमारा नाम रौशन करते रहे। एक बाथरूम में पानी ही नहीं आ रहा था। अविनाश जी गमछा कन्धे पर डालकर दूसरे ब्लॉगर के बाथरूम में हो लिए। किसी कर्मचारी ने एक दिन पहले टंकी का ओवरफ़्लो रोकने के उद्देश्य से गेटवाल की चकरी बंद करने के बाद उसे दुबारा खोलना जरूरी नहीं समझा था। पहले दिन रात के दस बजे ‘आल-आउट’ का जुगाड़ हो सका लेकिन सुनते हैं कि मच्छरों ने पहले ही अपना प्लान पोस्टपोन कर दिया था।
  6. सभाकक्ष में लॉजिस्टिक सपोर्ट निश्चित ही अच्छा रहा होगा लेकिन इसका प्रमुख कारण यह है कि उसमें मेरा कोई हाथ नहीं था। विश्वविद्यालय के कर्मचारियों, पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों व तकनीकी विशेषज्ञों ने कोई कसर नहीं रखी। जिससे काम बिगड़ने का डर था वह अपने निजी कैमरे से ब्लॉगर्स की फोटो खींचने में व्यस्त था। बाद में पता चला कि कैमरे की सेटिंग ऐसी हो रखी थी कि सभी तस्वीरें सबसे कम (AVG) क्वालिटी की ही आ सकीं। केवल नेट पर चढ़ाने लायक।:(
  7. कार्यक्रम की रूपरेखा ऐसी तय हुई कि पहले सत्र को छोड़कर बाकी सत्रों में मंच पर कुर्सियाँ खाली ही रह गयीं। प्रत्येक सत्र के लिए औपचारिक अध्यक्ष और वार्ताकार तय कर मंच पर नहीं बैठाये गये। ब्लॉगर्स मंच के सामने लगी दर्शक-दीर्घा की कुर्सियों पर ही आसीन रहे और पवन दुग्गल को छोड़कर शेष वक्ता नीचे से सीधे पोडियम पर आते रहे। बाद में श्रीमती रचना त्रिपाठी ने बताया कि मंच खाली-खाली लग रहा था। लेकिन कार्यक्रम के दौरान किसी ने इस ओर इशारा नहीं किया। वहाँ उपस्थित कुलपति जी ने भी नहीं। बाद में उन्होंने बताया कि आप संचालक कम और हेडमास्टर ज्यादा लग रहे थे। ईल्ल्यौ… 😦
  8. यदि यशवंत जी की भड़ास का अपवाद जबरिया निकाल दें तो विषय से हटकर बिना इजाजत बोलने वालों को मौका न देने का नतीजा यह हुआ कि चर्चा घूम-फिरकर इसी मुद्दे पर केंद्रित रही कि ब्लॉग लिखने वाले किसी आचार-संहिता के बारे में न सोचें तो ही ठीक है। किसी ने सामान्य सामाजिक नियमों को पर्याप्त बताया तो किसी ने स्व- नियंत्रण की बात की, कोई संहिता को गोली मारने के लिए ललकार रहा था तो कोई साइबर कानून की सीमाएँ बता रहा था। कुलपति जी ने भी अपनी लक्ष्मण रेखा खुद खींचने की ही सलाह दी। कुछ लोगों ने ब्लॉगर के उचित आचरण गिनाये तो किसी ने इसे उद्यमिता के परिप्रेक्ष्य में जोड़ते हुए यह कहा कि जो जिम्मेदार नहीं बनेगा वह यहाँ ज्यादा दिन नहीं टिकेगा। लफ़्फ़ाजी और घटिया प्रपंच की मार्केटिंग बहुत दिनों तक नहीं चलने वाली है। ब्लॉगरों को थोड़ा घूमने का मौका क्या दिया वे बस लेकर गांधी जी के आश्रम के बाद विनोबा जी के द्वार तक चले गये। वहाँ पवनार नदी की उजली धारा देखकर उसमें कुछ लोग कूदने को उतारू थे। लेकिन जिस विधाता ने गोष्ठी की सफलता  का वरदान दे रखा था उसी ने उन लोगों को कूदने से रोक लिया और सभी सकुशल ठीक समय से सभाकक्ष तक लौट आये। 

कहीं यह निष्कर्ष निकाला गया है कि “और जो कुछ भी हुआ हो मगर प्रवर्तित विषय ही भलीभांति विवेचित नहीं हो सका सारी रिपोर्टें यही बताती हैं ……बस छिछला सा निर्वाह …..बस जुमले दागे गए …..” हजार किलोमीटर दूर पंचायत चुनाव कराते हुए भी इतना गहरा अध्ययन करके तुरत-फुरत निष्कर्ष प्रस्तुत करने की क्षमता वाला कोई दूसरा ब्लॉगर यहाँ था ही नहीं जो गहराई तक निर्वाह कर सके और जुमलों से बाहर निकल सके। पवन दुग्गल भी वह गहराई नहीं पा सके। हैरत है कि फिर भी चारो ओर जय-जयकार मची है इस संगोष्ठी की। मन चकरा रहा है।

मुझे तो लग रहा था कि निम्न चार विषयों पर उनके समूहों द्वारा जो चर्चा की गयी वह गहन भी थी और सार्थक भी लेकिन कदाचित्‌ इसका संदेश सभाकक्ष के बाहर अंतर्जाल पर पूरा नहीं गया।

१- ब्लॉगिंग में नैतिकता व सभ्याचरण (etiquettes)

श्री सुरेश चिपलूनकर, श्री विवेक सिंह, श्री संजीत त्रिपाठी, डॉ.महेश सिन्हा, डॉ. (श्रीमती) अजित गुप्ता,

२- हिंदी ब्लॉग और उद्यमिता (व्यावसायिकता)

श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी, श्री शैलेश भारतवासी, श्री संजय वेंगाणी, श्री अविनाश वाचस्पति, श्री अशोक कुमार मिश्र, श्रीमती रचना त्रिपाठी, श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, श्री विनोद शुक्ल

३-आचार संहिता क्यों व किसके लिए?

श्री रवीन्द्र प्रभात, श्रीमती अनिता कुमार, श्री प्रवीण पांडेय, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, डॉ कविता वाचक्नवी, डॉ. प्रियंकर पालीवाल

४- हिंदी ब्लॉग और सामाजिक सरोकार

-श्री जय कुमार झा, श्री यशवंत सिंह, श्री अनूप शुक्ल, श्री जाकिर अली रजनीश, सुश्री गायत्री शर्मा

अब समूह के प्रतिनिधि अपनी लाज रखने के लिए पूरी बात अपने ब्लॉग पर लिखकर सबको लिंक भेजें तब शायद बात बने। 

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि मेरी लाख न्यूनताओं के बावजूद ईश्वर ने मुझसे एक जानदार, शानदार और अविस्मरणीय कार्यक्रम करा दिया तो यह निश्चित रूप से मेरे पूर्व जन्म के सद‌कर्मों का पल रहा होगा जिससे मुझे इस बार अत्यंत सुलझे हुए और सकारात्मक दृ्ष्टि के सम्मानित ब्लॉगर्स के साथ संगोष्ठी के आयोजन का सुअवसर मिला। कुलपति श्री विभूति नारायण राय जी ने बड़ी सहजता से पूरे कार्यक्रम के दौरान मेरी गलतियों को नजर अंदाज कर मेरा हौसला बढ़ाये रखा, पूरा विश्वविद्यालय परिवार मुझे हर प्रकार से सहयोग करता रहा, और ब्लॉगजगत में मेरे शुभेच्छुओं की दुआओं ने ऐसा रंग दिखाया कि कुछ खल शक्तियाँ अपने आप किनारे हो गयीं वर्ना बुलावा तो सबके लिए था। इसे भाग्य न मानूँ तो क्या?

एक बात जरूर कहूँगा कि प्रयाग के सम्मेलन से जो सीखा था वह वर्धा में काम आया। यहाँ भी अपनी गलतियों से कुछ सीखने को मिला है। निश्चित ही वे आगे मार्गदर्शन करेंगी।

शेष बातें जानने के लिए इन लिंक्स पर जाना उपयोगी होगा-

  1. कई अनुत्तरित प्रश्नों को छोड़ गयी वर्धा में आयोजित संगोष्ठी (रवीन्द्र प्रभात)
  2. कैमरे में कैद वर्धा में आयोजित संगोष्ठी की सच्चाई (रवीन्द्र प्रभात)
  3. अविस्मरणीय रहा वर्धा में आयोजित संगोष्ठी का दूसरा दिन (रवीन्द्र प्रभात)
  4. वर्धा में केवल विचार मंथन ही नहीं मस्ती की पाठशाला भी (रवीन्द्र प्रभात)
  5. हिन्दी ब्लॉगिंग पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला और संगोष्ठी पूरी भव्यता के साथ संपन्न (रवीन्द्र प्रभात)
  6. वर्धा सम्मेलन: कुछ खट्टा कुछ मीठा (जाकिर अली रजनीश)
  7. वर्धा यात्रा ने बना दिया गाय, वर्ना आदमी तो हम भी थे काम के.(अनीता कुमार)
  8. बर्धा ब्लॉगर सम्मेलन की रिपोर्ट “जरा हटके” (सुरेश चिपलूनकर)
  9. स्वतंत्र वार्ता हैदराबाद: ब्लॉगरों को अपनी लक्ष्मण रेखा खुद बनानी पड़ेगी- विभूति नारायण राय
  10. वी.एन.राय, ब्लॉगिंग और मेरी वर्धा यात्रा (भड़ास पर यशवंत)
  11. वर्धा की शानदार तस्वीरें (पिकासा पर सुरेश चिपलूनकर)
  12. वर्धा में दो दिवसीय राष्‍ट्रीय कार्यशाला एवं संगोष्‍ठी संपन्न (डॉ.कविता वाचक्नवी)
  13. वर्धा ब्लॉगर मिलन से वापसी, बाल बाल बचे (डॉ. महेश सिन्हा)
  14. ब्लोगिंग के जरिये गणतंत्र को आगे बढाने का एक अभूतपूर्व आयोजन का सार्थक प्रयास..(जय कुमार झा)
  15. ब्लोगर संगोष्ठी वर्धा चित्रों क़ी नजर से ..(जय कुमार झा)
  16. वर्धा संगोष्ठी और कुछ अभूतपूर्व अनुभव व मुलाकातें ….(जय कुमार झा)
  17. ब्लोगिंग का उपयोग सामाजिक सरोकार तथा मानवीय मूल्यों को सार्थकता क़ी ओर ले जाने केलिए किये जाने क़ी संभावनाएं बढ़ गयी है …..(जय कुमार झा)
  18. वर्धा में मिले ब्लॉगर (विवेक सिंह)
  19. वर्धा के गलियारों से (कुछ झूठ कुछ सच ) (विवेक सिंह)
  20. "ब्‍लोगिंग की कार्यशाला – अभी छाछ को बिलौना बाकी है – डॉ. (श्रीमती)अजित गुप्‍ता
  21. वर्धा सम्‍मेलन की तीन अविस्‍मरणीय बातें (संजय बेंगाणी)
  22. साला न कहें भाई साहब कहें चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  23. ब्लॉगिंग सबसे कम पाखंड वाली विधा है चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  24. ब्लॉगिंग की आचार संहिता की बात खामख्याली है चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  25. वर्धा में भाषण जारी चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  26. वर्धा में ब्लागर सम्मेलन चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  27. नदी उदास नहीं थी  (डॉ. कविता वाचक्नवी)
  28. गांधी जी सफलतम ब्लॉगर हुए होते : वर्धा आयोजन का भरत वाक्य  (डॉ.ऋषभदेव शर्मा)
  29. "वर्धति सर्वम् स वर्धा – 1 (प्रवीण पांडेय)
  30. वर्धा ब्लोगर संगोष्ठी के पर्दे के पीछे के असल हीरो … (जय कुमार झा)
  31. वर्धा संगोष्ठी में उपस्थित थे गांधी, निराला, शमशेर और अज्ञेय भी … (रवीन्द्र प्रभात)
  32. हिंदी ब्लॉगिंग-आचार संहिता-देश के ब्लॉगर और कुछ बातें, एक रपट जैसा कुछ (संजीत त्रिपाठी)
  33. महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय,वर्धा से लौटकर …. हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की एक महारैली का आयोजन देश की राजधानी दिल्‍ली के इंडिया गेट पर करें (अविनाश वाचस्पति)
  34. ब्‍लागिंग में आना और कार्यशाला में पहचाना एक-दूसरे को डॉ.(श्रीमती) अजित गुप्ता
  35. तनिक रुको भाई, आ रहे हैं बताते हैं बताते हैं (अनीता कुमार)
  36. महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में… (गायत्री शर्मा)
  37. वर्धा और बिरयानी घर (राम त्यागी)
  38. वर्धा से आप लोग क्यों चले गये… ? (मास्टर सत्यार्थ)
  39. …अथ वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन कथा (अनूप शुक्ल)
  40. वर्धा – कंचन मृग जैसा वाई-फ़ाई (अनूप शुक्ल)

अभी इतना ही। कुछ लिंक्स छूट गये हों तो टिप्पणियों के माध्यम से या मेल से बताएँ। (हम कोशिश करेंगे कि इस सूची को समय-समय पर आगे बढ़ाते रहें)

    (सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 

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