राजा क्या करता है… घोटाला?

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सप्ताहांत अवकाश था तो बच्चों के साथ थोड़ा समय बिताने का मौका मिला। वैसे तो मैं इस छुट्टी के दिन का सदुपयोग मन भर सो लेने के लिए करना चाहता हूँ लेकिन बच्चों की दुनिया सामने हो तो बाकी सबकुछ भूल सा जाता है। सत्यार्थ अभी अपना पाँचवाँ जन्मदिन मनाने वाले हैं लेकिन उनका खाली समय जिस प्रकार के कम्प्यूटरी खेलों में बीतता है उसे देखकर मुझे रा.वन, जी.वन और ‘रोबोट’ फिल्म के वशीकरण और चिट्टी के सपने आने लगते हैं। मुझे कभी-कभी चिन्ता होने लगती है कि इस जमाने की हवा कहीं उनका बचपन जल्दी ही न छीन ले। छोटी सी उम्र में इतनी बड़ी-बड़ी हाई-टेक बातें निकलती हैं; ऐसे-ऐसे एक्शन होते हैं कि मैं चकरा जाता हूँ।

मेरी कोशिश होती है कि उनका ध्यान टीवी के कार्टून चैनेल्स और कम्प्यूटर के ऑनलाइन गेम्स की दुनिया से बाहर खींचकर कुछ पारंपरिक और देशज खेलों की ओर ले जाऊँ। लेकिन लूडो और साँप सीढ़ी के खेल उन्हें बोर करते हैं। अब ‘मोनॉपली’ और ‘प्लॉट-फोर’ में वे बड़ों-बड़ों को हराने का आनंद लेते हैं। इसमें वे अपने दादा जी के साथ-साथ मुझे भी मात दे चुके हैं। अब अपने से छः साल बड़ी दीदी के साथ उसके स्तर के खेल पूरी निपुणता से खेलते हैं। कम्प्यूटर पर रोज नया गेम सर्च कर लेते हैं और घंटों ‘की-बोर्ड’ के माध्यम से उछल-कूद, मार-धाड़, लुका-छिपी और निशानेबाजी करते रहते हैं। इसके नुकसान से बचाने के लिए घर में कम्प्यूटर का समय सीमित करने के लिए नियम बनाने पड़े हैं।

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इस शनिवार मैंने टीवी और कम्प्यूटर बन्द रखा। इन्हें अपने पास बुलाया और दुनिया भर की बातें करने की कोशिश की। स्कूल का हाल-चाल पूछा। क्लास टीचर मै’म कैसी लगती हैं, कैसा पढ़ाती हैं, यह भी पूछ लिया। लेकिन ये मायूस थे। इनकी दीदी अपनी दोस्त के घर चली गयी थी। वह दोस्त जो बीमारी में स्कूल नहीं जा सकी थी और उसका क्लास वर्क पिछड़ गया था। वागीशा उसी की मदद के लिए कुछ घंटे इनसे दूर चली गयी थी; और ये बुरी तरह से बोर हो रहे थे। जब मैंने दूसरों की मदद करने को अच्छा काम बताया और इन्हें यह सब समझ पाने में ‘समर्थ’ होने के लिए प्रशंसा की और बधाई दी तो ये खुश हो गये। फिर बोले- तो ये तो बताओ, मैं अकेले कौन सा खेल खेलूँ?

मैंने कहा- मोनोएक्टिंग करिए। एकल अभिनय। थोड़े संकेत में ही ये समझ गये। डबल बेड पर खड़ा होकर सबसे पहले हनुमान जी की तरह हवा में गदा भाँजने लगे। फिर रोबोट फिल्म के चिट्टी की तरह मशीनी चाल चलने लगे। एक-एक कदम की सटीक नकल देखकर मैं हैरत में पड़ गया। मैं उन्हें यह खेल थमाकर वहीं एक किनारे लेट गया। ये तल्लीन होकर विविध पात्रों की एक्टिंग करने लगे।

इसी शृंखला में एक पात्र राजा का आया जो अपने अनुचर से तमाम फरमाइशें कर रहा था; और अनुचर अपने ‘आका’ के हुक्म की तामील कर रहा था। प्रत्येक संवाद पर पात्र की स्थिति के अनुसार स्थान परिवर्तन हो रहा था। राजा एक काल्पनिक सिंहासन से बोल रहा था और अनुचर नीचे घुटना टेककर बैठे हुए।

-सिपाही…
-हुक्म मेरे आका…
-जाओ मिठाई ले आओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, बिस्कुट लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, सेब लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, मैगी लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, चॉकलेट लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, कुरकुरे लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, एप्पल लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, बनाना लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, किंडर-जॉय लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, ….

अब फरमाइशी सामग्री का नाम नहीं सूझ रहा था। इसलिए प्रवाह थमने लगा। मेरी भीतरी मुस्कान अब हँसी बनकर बाहर आने लगी थी। मैंने चुहल की- अरे राजा केवल खाता ही रहेगा कि कोई काम भी करेगा?

वे विस्मय छिपाते हुए पूरा आत्मविश्वास सहेजकर बोले- राजा क्या करता है? वह तो बस खाता-पीता और आराम ही करता है।

मैंने कहा- नहीं, ऐसी बात नहीं है। वह अपने राज्य में बड़े-बड़े काम करता है।

उन्होंने पूछा- राजा कौन से बड़े काम करता है?

मुझे मजाक सूझा, मैने कहा- ‘राजा’ बड़े-बड़े घोटाले करता है।

‘घोटाला’ शब्द उनके लिए बिल्कुल नया था। वे सोच में पड़ गये।

थोड़ी देर उधेड़-बुन करने के बाद  मुझसे ही पूछ लिया- डैडी, यह घोटाला कैसे किया जाता है?

अब झेंपने की बारी मेरी थी। कैसे समझाऊँ कि कैसे किया जाता है। वे घोटाला करने का अभिनय करने को उतावले थे। मेरी बात पकड़कर बैठ गये। “बताओ न डैडी….”

मैने समझाया- बेटा, जब देश का राजा जनता की मेहनत से कमाया हुआ पैसा हड़प लेता है और उसे जनता की भलाई के लिए खर्च नहीं करता है तो उसे घोटाला करना कहते हैं।

-हड़पने का मतलब क्या होता है?

-मतलब यह कि जो चीज अपनी नहीं है, दूसरे की है उसे जबरदस्ती ले लेना या चुरा लेना।

-अच्छा, तो अब मैं चला दूसरों का पैसा चुराने…

इसके बाद वे बिस्तर से कूदकर नीचे आये और एक काल्पनिक गठरी बगल में दबाए दौड़ते हुए बाहर भाग गये।

उफ़्फ़्‌, खेल-खेल में मैंने यह क्या सिखा दिया?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सत्यार्थ की माँ का मन कचोट रहा है…

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अभी अभी बच्चों को स्कूल छोड़ कर लौटा हूँ। बेटी वागीशा (कक्षा-५) के साथ आज से बेटे सत्यार्थ भी स्कूल जाने लगे हैं। वर्धा आकर २५ जून को स्कूल में नाम लिखाने के बाद से ही उन्हें पाँच जुलाई का बेसब्री से इन्तजार था। इन दस दिनों में रोज ही स्कूल की तैयारी होती। नया ड्रेस, टिफ़िन, वाटर बॉटल, स्कूल बैग, नयी किताबें, कापियाँ, जूते, मोजे, बो-टाई इत्यादि खरीदे जाने के लिए खुद ही बाजार गये। अपनी पसन्द से सारा सामान लिया। पूरी किट चढ़ाकर कई बार ड्रेस रिहर्सल कर डाला। दीदी को स्कूल के लिए ऑटो में बैठते हसरत भरी निगाहों से देखकर बार-बार “दीदी… बॉय… दीदी… बॉय…” करते रहे। ऑटो ओझल जाने के बाद पूछते, “डैडी पाँच जुलाई कब आएगी?”

06072010858  आखिर पाँच जुलाई आ ही गयी। जब मैं सुबह टहल कर साढ़े छः बजे लौटा तो जनाब पूरी तरह तैयार मिले। चहकते हुए पूछा, “ डैडी मैं कैसा लग रहा हूँ?”

“बहुत स्मार्ट लग रहे हो बेटा…” मैने प्रत्याशित उत्तर दिया। फिर हमेशा की तरह दायाँ गाल मेरी ओर पप्पी के लिए प्रस्तुत हो गया…।

“सुनते हैं जी, आज ऑटो वाले को मना कर दीजिएगा। पहला दिन है, हम दोनो बाबू को छोड़ने चलेंगे…”

“हाँ भाई, मैं बाहर बैठकर उसी का इन्तजार कर रहा हूँ” अपने तय समय पर राजू पाटिल (ऑटोवाला) नहीं आया। थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के बाद मैने फोन लगाकर पूछा कि उसे वागीशा ने आज न आने के लिए तो नहीं कहा था। उसने बताया कि नहीं, आज तो वह भारत बन्द के कारण नहीं आ रहा है। आज सम्भावित तोड़-फोड़ और दंगे फसाद के डर से प्रायः सभी स्कूल कॉलेज अघोषित छुट्टी मना रहे हैं। उसने हिदायत देते हुए कहा, “तुम भी आज कहीं मत निकलना सर जी”

फोन पर मेरी बात सत्यार्थ जी सुन रहे थे और उन्हें यह बिना बताये पता चल गया कि आज स्कूल नहीं जाना है। उनका चेहरा ऐसे लटक गया जैसे नेता जी विश्वास मत हार गये हों। 05072010839फूल कर कुप्पा हो गये। बोले कि हम आज दिनभर यही ड्रेस पहने रहेंगे। मैने समझाया कि ऐसे तो ड्रेस गन्दी हो जाएगी। फिर कल क्या पहन कर स्कूल जाएंगे? बात उनकी समझ में तो आ गयी लेकिन चेहरे पर मायूसी अभी भी डेरा डाले बैठी थी। 05072010846मैने जब यह वादा किया कि शाम को गांधी हिल पर घुमाने ले चलेंगे तब महाशय का मूड कुछ ठीक हो सका। उनका पूरा दिन  भारत बन्द को कोसते बीता। हम भी गिरिजेश भैया की पोस्ट पढ़ने के बाद उसी मूड में थे। शाम को गांधी हिल्स पर घुमाने का कार्यक्रम हुआ। दोनो बच्चे सूखे ठिगने पहाड़ की चोटी पर बने पार्क में उछलते कूदते रहे। फिर सुबह की प्रतीक्षा में ही रात बेचैनी से गुजरी।

आज छः जुलाई की सुबह सबकुछ ठीक-ठाक रहा। पूरे उत्साह और आनन्द से लबरेज मास्टर सत्यार्थ तैयार हुए। पूरी किट में फिट होकर अपनी मम्मी की अंगुली थाम चल पड़े स्कूल की ओर। मन में खुशी और चेहरे पर मन्द-मन्द मुस्कान हमें भी बहुत भा रही थी। स्कूल के गेट पर पहुँचकर खुशी दोगुनी हो गयी। तमाम बच्चे अपनी-अपनी सवारी से उतरकर भीतर जा रहे थे। नर्सरी के बच्चों का पहला दिन था इसलिए सबके माता-पिता या अभिभावक छोड़ने आए थे।

कन्धे में बस्ता लटकाए चलते हुए थोड़ी कठिनाई हुई। लेकिन माता ने सहयोग में बस्ता हाथ में लेना चाहा तो मना कर दिया। प्रसन्न और शान्त चित्त होकर अपनी कक्षा में पहुँचे। हम भी साथ-साथ थे।

दीदी के साथ खेलने का अब और मौका...  DSC03178   
 मेरा पहला स्कूल- एलफॉन्सा मैं खुश हूँ डैडी...

वहाँ पहुँचकर जो नजारा दिखा उसने हमें डरा दिया। अनेक बच्चे जोर-जोर से रो रहे थे। हमने सिस्टर के हाथ में इन्हें सौंप दिया। इन्हें एक कुर्सी पर बिठा दिया गया। चेहरे पर मुस्कान बनाये रखने की कोशिश कमजोर होती जा रही थी। फिर भी मम्मी डैडी के सामने हिम्मत दिखाते रहे। मैने इशारे से इनकी मम्मी को बाहर निकलने को कहा। पूरे हाल में करुण क्रन्दन का शोर व्याप्त था। किसी की बात सुनायी नहीं दे रही थी।ये सब रो क्यों रहे हैं डैडी...

इनके ठीक बगल में एक बच्चा अपने अभिभावक को पकड़कर खींच रहा था। जोर जोर से उसे चिल्लाते देखकर सत्यार्थ की हिम्मत भी जवाब दे गयी। इनका सुबकना शुरू हुआ तो हम भागकर बाहर आ गये। सिस्टर ने सबको बाहर निकलने का अनुरोध किया। कुछ माताएं भी टेसुए बहा रहीं थीं। खिड़की से झांककर देखा तो जनाब मुँह ढ़ककर सुबक रहे थे। मैने तेज कदमों से बाहर आ जाने का प्रयास किया। इनकी मम्मी को भी खींचकर साथ ले आया।

कोमल पौध (नर्सरी) शिक्षा की DSC03181

बाहर कुछ बच्चे अकेले ही कक्षा की ओर चले जा रहे थे। शायद के.जी. के रहे हों। उनकी पीठ पर बैग और हाथ में टिफिन व बॉतल की टोकरी देककर तुरत ख़याल आया कि बाबू के बैग में ही टिफ़िन रखने और गले में बॉटल लटकाने से उसे असुविधा हो रही थी। हम भी ऐसी टोकरी खरीद कर लाएंगे यह हमने मन ही मन तय कर डाला।

वापस आकर गाड़ी में बैठे तो ये बोल पड़ीं-“ऐ जी…”

इसी समय मैने भी कुछ कहने को मुँह खोला, “सुनती हो…”

एक ही साथ हम दोनो कुछ कहना चाहते थे। फिर दोनो रुक गये। मैने पहला अवसर उन्हें दिया। बोली, “मेरे मन में…”

“…कुछ कचोट रहा है न?” मैने वाक्य पूरा किया।

“हाँ, ….आप भी यही सोच रहे है क्या?”

मैं कुछ कह नहीं सका। बस चुपचाप गाड़ी चलाता हुआ घर वापस आ गया हूँ।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ग्यारह साल पूरे…

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लगता है कल ही की बात है

जब हम थे कुआँरे

निपट बेचारे

फिर बारात सजाकर

गये थे दूल्हा बने

सबने नाच-नाच कर जश्न मनाया

ससुरालियों ने हमें खूब बनाया

लेकिन हमें खूब भाया

रचना से सृजन

सुनहरा दौर शुरू हुआ

पहले बेटी, फिर बेटा

वागीशा, सत्यार्थ

उसके बाद सत्यार्थमित्र

फिर उसका पुस्तक प्रकाशन

देखते ही देखते

मैं तो सर्जक हो चला

अचानक नहीं, शनै: शनै:

आज ग्यारह साल पूरे हो गये

Copy of 30042010689बेटे को कुछ नहीं चाहिए

बस आइसक्रीम

माँ के हाथों

बेटी अपने में मगन

छूना चाहे गगन

सब कुछ अच्छा सा

और क्या?

सबने स्नेह बरसाया

ईश्वर तेरा धन्यवाद

(सिद्धार्थ)

 

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घुस पैठी थकान…

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इतवार का बिहान

सिर तक रजाई लिए तान

घर में की खटपट से बन्द किए कान

आंगन में धूप रही नाच

छोटू ककहरा किताब रहा बाँच

फिर भी न आलस पर आने दी आँच

कुंजीपट खूँटी पर टांग

धत्‌ कुर्सी कर्मठता का स्वांग

दफ़्तर में अनसुनी है छुट्टी की मांग

कूड़े का ढेर

फाइल में फैला अंधेर

चिट्ठों में आँख मीच रहे उटकेर

आफ़त में जान

भला है बन बैठो अन्जान

देह नहीं मन में घुस पैठी थकान

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

छः दिसम्बर का वार्षिक रुदन और मुकाबला बेशर्मी का…

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अयोध्या का एक अर्थ ‘जहाँ युद्ध न हो’ पढ़ा था। लेकिन जब भी छः दिसम्बर की तारीख आती है मीडिया में तलवारें निकल आती हैं। उस त्रासद घटना का विश्लेषण करने के लिए बड़े-बड़े विद्वान, विचारक और राजनेता पत्रकारों द्वारा बुला लिए जाते हैं और टीवी पर पैनेल चर्चा शुरू हो जाती है। हर साल वही बातें दुहरायी जाती हैं। भाजपा, कांग्रेस, व समाजवादी पार्टी के नेता आते हैं और अपनी पार्टी लाइन के अनुसार बातें करके चले जाते हैं। कोई अपनी पाटी लाइन से टस से मस नहीं होना चाहता। उनके सभी तर्क एक दूसरे के लिए बेमानी हो जाते हैं।

लेकिन आश्चर्य होता है जब लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में अपनी पीठ ठोंकने वाले ‘ऐंकर’ भी एक खास विचारधारा के पोषण के लिए हमलावर हो उठते हैं। जिस प्रतिभागी की बातें इनसे मेल नहीं खाती उसको टोक-टोककर बोलने ही नहीं देते, केवल आरोपित करते जाते हैं लेकिन जो पार्टी लाइन इन्हे अपने अनुकूल लगती है उसके प्रतिनिधि को अपनी बात रखने के लिए प्रॉम्प्ट करते रहते हैं। यह सब इतनी निर्लज्जता और आक्रामक अन्दाज में होता है कि देखकर इस पत्रकार बिरादरी से भी अरुचि होने लगी है।

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छः दिसम्बर की पूर्व संध्या पर एन.डी.टी.वी. के कार्यक्रम ‘मुकाबला’ और ‘चक्रव्यूह’ में यही सब देखने को मिला। लोकप्रिय कार्यक्रम मुकाबला के ऐंकर दिबांग ने भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर से प्रश्न तो खूब किए लेकिन उनका उत्तर सुनने का धैर्य उनके पास नही था। वहीं समाजवादी पार्टी के मोहन सिंह को तफ़सील से यह बताने का अवसर दिया कि ‘भारत में भले ही हिन्दुओं की अक्सरियत है लेकिन यदि देश ‘डिस्टर्ब’ हुआ तो सबसे ज्यादा नुकसान हिन्दुओं का ही होगा। इसलिए हमें ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जिससे देश में मुसलमानों को तकलीफ़ हो और माहौल खराब हो जाय।’ यह भी कि बाबरी मस्जिद की साजिश घटित होने के बाद जो मुम्बई में और अन्य स्थानों पर आतंकी हमले हुए उसके दोषियों को सजा हो गयी। फाँसी और आजीवन कारावास मिल गया। लेकिन बाबरी मस्जिद के गुनाहगारों को आजतक सजा नहीं दी जा सकी। उनके इस कष्ट को दिबांग ने भी भरपूर समर्थन देते हुए सुर में सुर मिलाया।

कांग्रेस के प्रतिनिधि श्रीप्रकाश जायसवाल वीडियोलाइन पर थे। उनसे दिबांग ने कहा कि आप प्रकाश जावड़ेकर से पूछिए कि वे मस्जिद गिराये जाने के गुनहगार हैं कि नहीं। इसपर जायसवाल को प्रश्न नहीं सूझा। बोले- हम क्या पूछें, दुनिया जानती है इनकी करतूतें। प्रकाश जावड़ेकर ने कहा- मेरे पास प्रश्न हैं उसका उत्तर आप लोग दीजिए… ६ दिसम्बर १९९२ क्या अचानक चला आया था? १९४८ में रामलला की मूर्तियों की स्थापना किसने करायी…१९८६ में जो ताला खोला गया था वह मन्दिर का था कि मस्जिद का, …१९८९ में शिलान्यास मन्दिर का हुआ था कि मस्जिद का …इन सारे कार्यों के समय किसकी सरकार थी?  प्रश्न और भी रहे होंगे लेकिन दिबांग ने हाथ उठाकर उन्हें बिल्कुल चुप करा दिया और किसी प्रतिभागी से उन सवालों का जवाब देने को भी नहीं कहा।

बात उस ‘साजिश’ पर होने लगी जो ‘संघियों ने मस्जिद को गिराने के लिए’ रची थी। कांग्रेस, सपा और दिबांग चिल्ला चिल्लाकर इसे एक साजिश करार दे रहे थे । कल्याण ने शपथपत्र देकर आश्वस्त किया था कि मस्जिद सुरक्षित रहेगी, लेकिन उन्होंने साजिश रचकर मस्जिद ढहा दी। पूरा ‘संघ परिवार’ इस झूठ-फरेब की साजिश में शामिल था। श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि मुख्यमन्त्री के शपथपत्र पर यकीन करना हमारा कर्तव्य था। भाजपा इसे लाखों श्रद्धालुओं की स्वतःस्फूर्त भावना का प्रस्फुटन बता रही थी। उमा भारती भी वीडियोलाइन पर अवतरित हुईं और साजिश की थियरी को सिरे से नकारते हुए बोलीं कि गान्धी जी कहते थे कि पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा। लेकिन वे जिन्दा रहे और पाकिस्तान बन गया। इसका मतलब यह तो नहीं कि वे पाकिस्तान बनाने की साजिश कर रहे थे।

पैनेल में एक पूर्व केबिनेट सचिव सुब्रमण्यम साहब भी थे। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट को उन्होंने लगभग कूड़ा ही बता डाला। बल्कि जाँच आयोग अधिनियम में संशोधन करके केवल कार्यरत न्यायाधीशों का ही आयोग गठित करने का सुझाव दे दिया। उनका आशय शायद यह था कि सेवा निवृत्त न्यायाधीश समय और सुविधा बढ़वाने के जुगाड़ में ही उलझे रह जाते हैं। काम की रफ़्तार धीमी और त्वरित न्याय की आशा क्षीण हो जाती है। समस्या की जड़ में उन्होंने राजनीति को ही माना। यदि राजनीति इससे किनारे होती तो समाधान निकल सकता था।

उधर चक्रव्यूह में कल्याण सिंह घेरे जा रहे थे। ऐंकर ने पूछा- आपको छः दिसम्बर की उस दुर्घटना पर कोई अफ़सोस है? कोई शर्म नहीं… कोई पश्चाताप नहीं… कोई दुःख नहीं… बल्कि हमें इस दिन पर गर्व है। …मैने शपथपत्र दिया था कि ढाँचे की रक्षा करेंगे, पूरा इन्तजाम भी कर रखा था, लेकिन मैंने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश नहीं दिया। मुझे इसपर कोई खेद नहीं है। मैं रक्षा नहीं कर सका इसलिए तत्काल इस्तीफा दे दिया। …मैं और क्या कर सकता था?  प्रश्नकर्ता ने कहा आपने दो चार सौ लोगों की जान बचाने के लिए करोड़ों हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बँटवारा हो जाने दिया। गोली चल जाती तो अधिक से अधिक कुछ सौ जानें ही जातीं लेकिन आपने मस्जिद ढहाकर करोड़ों नागरिकों में कटुता फैला दी… घेरा बन्दी और तेज हुई तो कल्याण बस ‘बहुत धन्यवाद’ ‘बहुत धन्यवाद‘ ’बहुत धन्यवाद’ की रट लगाने को मजबूर गये। बेशर्मी मूर्तिमान थी… शायद दोनो ओर।

सोचता हूँ यह वार्षिक रुदन और प्रलाप तो अब रूटीन हो गया है। जिन्दगी उससे काफी आगे निकल चुकी है। पिछले साल इस दिन मैं बड़ा दुःखी हो गया था। मुम्बई हमले के बाद के माहौल में जब अयोध्या काण्ड की बरसी पड़ी तो उसी तारीख को पड़ने वाले अपने बेटे के जन्मदिन पर उत्सव मनाने का मन ही नहीं हुआ। लेकिन अब सोच रहा हूँ कि अपनी छोटी-छोटी खुशियों को इस राजनिति के गन्दे खेल को देखकर कुर्बान करना ठीक नहीं है। इसलिए मैंने आज बेटे को पूरा समय देने का मन बनाया है।

साँई मन्दिर के बाहर

सुबह-सुबह साँईं मन्दिर हो आये हैं। शाम को केक भी कटेगा और बच्चा पार्टी दावत भी उड़ाएगी।

सत्यार्थ (तीन वर्ष)

सत्यार्थ के ब्लॉग पर जन्मदिन की सूचना ब्लॉगजगत को दी जा चुकी है। आप सबका स्नेह और आशीर्वाद उसे मिलने भी लगा है। मैं भी बोलता हूँ “हैप्पी बड्डे”

 (सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

इलाहाबाद का फेफ़ड़ा… जहाँ साँसें ताजा होती हैं!

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संगोष्ठी स्मृति भेंटबहुत दिनों बाद आज छुट्टी टाइप मूड के साथ बिस्तर छोड़ने को मिला। जगने के बाद तुरन्त कोई जरूरी काम नहीं था। सिविल सर्विसेज की मुख्य परीक्षा के सिलसिले में कोषागार के द्वितालक दृढ़कक्ष (double-lock strong-room) को सुबह -सुबह खोलने की जिम्मेदारी भी आज नहीं निभानी थी। आज कोई पेपर नहीं था। इधर ब्लॉगरी में भी कोई नयी बात होती देखने की उत्सुकता नहीं थी। गंगा जी का पानी शान्त होकर अब अघोरी के किस्से कहने लगा है। ब्लॉगर संगोष्ठी की स्मृतियाँ ही बची हैं।

बिस्तर पर ही मुझे सूचना मिली कि मेरा परिवार मेरी भली पड़ोसन (प्रशिक्षु आई.ए.एस.) के साथ उनकी गाड़ी से ही सभी बच्चों समेत सुबह की ठण्डी हवा खाने पार्क में जा रहा है। मैने करवट बदलकर ‘ओके’ कहा और नींद की एक बोनस किश्त के जुगाड़ में पड़ गया। ….लेकिन कुछ देर बाद ही काम वाली के खटर-पटर से जागना पड़ा। सूने घर में अकेले पड़े बोर होने से अच्छा था कि मैं भी उधर ही निकल लूँ जहाँ बच्चे गये थे। स्कूटर से अल्फ्रेड पार्क जाने में पाँच मिनट लगे।

यह वही पार्क है जिसमें चन्द्र शेखर आजाद (को अंग्रेजो ने मार डाला था।)  को जब अंग्रेजों ने घेर लिया तो उन्होंने खुद को गोली मार ली और मरते दम तक आजाद रहे। २७ फरवरी, १९३१ को जब वे इस पार्क में सुखदेव के साथ किसी चर्चा में व्यस्त थे तो किसी मुखवीर की सूचना पर पुलिस ने उन्हें घेर लिया। इसी मुठभेड़ में आज़ाद शहीद हुए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसका नाम अब ‘चन्द्रशेखर आज़ाद राजकीय उद्यान’ कर दिया गया है।

ताकि भटक न जायें इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दक्षिण जी.टी.रोड से लगे हुए करीब १८३ एकड़ क्षेत्र पर फैले इस विशाल परिसर में अंग्रेजों के जमाने से स्थापित अनेक संस्थाएं आज भी अपने गौरव और ऐतिहासिकता के कारण बाहरी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। इसी परिसर में इलाहाबाद संग्रहालय है, अल्फ्रेड पब्लिक लाइब्रेरी है, हिन्दुस्तानी एकेडेमी है, और मदन मोहन मालवीय स्पोर्ट्स स्टेडियम भी है। इसी परिसर में उद्यान विभाग द्वारा संचालित दो पौधशालाएं हैं जो आम, अमरुद, आँवला और सजावटी फूलों के पौधे बहुत कम कीमत पर उपलब्ध कराती हैं। परिसर में कहाँ क्या है...

बहुत से औषधीय पौधे भी इस परिसर में यत्र-तत्र बिखरे हुए मिल जाते हैं। हाल ही में ‘भैया दूज’ के दिन श्रीमती जी ने ताना मारा कि इलाहाबाद आने के बाद लगता है आप गोधन कूटने और भाई को सरापने का पारम्परिक अनुष्ठान छुड़वा ही देंगे। ललकारे जाने पर ताव में आकर मैंने भजकटया, झड़बेरी, बरियार और चिचिड़ा (लटजीरा) सब का सब जुटाकर रख दिया था। गोबर्धन पूजा में लगने वाली ये कटीली झाड़ियाँ मैं यहीं से खोज कर लाया था। मेरी इज्जत रख ली इस उद्यान ने।

सुबह-सुबह नारियल पानी...शहर के बीचोबीच बसे इस हरे-भरे उद्यान में दूर-दूर से आकर टहलने, ताजी हवा खाने, व्यायाम करने, दोस्तों-यारों के साथ मधुर क्षण गुजारने और पिकनिक मनाने वालों की अच्छी भीड़ लगी रहती है। पार्क बन्द होने का समय रात ९:०० बजे से सुबह ४:०० बजे तक का ही है। शेष समय यहाँ कोई न कोई  लाभार्थी मौजूद ही रहता है।

सुबह पहुँचा तो गेट पर नारियल पानी वाला मिला, “इतनी सुबह कौन तुम्हारा ग्राहक होता है जी?”

“दिन भर लगाता हूँ जी, कोई न कोई इस समय भी आ जाता है।” फ्रूट सलाद और बहुत कुछ

सामने की ओर केला, पपीता, सेब, खीरा, ककड़ी, अंकुरित चना, मूली, इत्यादि का सलाद बनाकर बेचने वाले ठेले लगे हुए थे। जूस का खोमचा भी दिखा।  भीतर घुसते ही नीम, पीपल, पाकड़ और अन्य बड़े-बड़े पेड़ों की छाँव में खड़ी कारों, जीपों और दुपहिया वाहनों की कतार बता रही थी अन्दर बहुत से साहब और सेठ लोग भी हैं। दिनभर शहर के प्रदूषण में इजाफ़ा करने वाली गाड़ियाँ यहाँ हरियाली के बीच मानो खुद को रिफ़्रेश कर रही थीं।हरी ताजगी लेती गाड़ियाँ

मुझे अपने बच्चों को ढूँढने में देर नहीं लगी थी। चादर बिछाकर योगासन करती मम्मी लोग के पास बैठे बच्चे बोर हो रहे थे। मैने उन तीनो को साथ लिया और पार्क का चक्कर लगाने निकल पड़ा। शरदकालीन फूलों का खिलना अभी शुरू नहीं हुआ है। क्यारियाँ तैयार की जा रही हैं। कुछ जगह तो अभी जुताई ही हुई है। लेकिन सदाबहार किस्म के फूल बदस्तूर मुस्कराते मिले। उनकी मुस्कराहटों के बीच करीब पौने तीन किलोमीटर के पैदल परिक्रमा पथ पर टहलने के बाद सुस्ताते हुए अनेक बुजुर्ग, जवान, औरतें और बच्चे मिले। झाड़ि्यों की झुरमुट के पीछे और घने पेड़ों के नीचे लगी बेन्चों पर बैठे लड़के-लड़कियाँ भी मिले।

 हम यहाँ बोर होने नहीं आये हैं..!

रविवार का लाभ उठाते हुए कुछ साप्ताहिक सैर करने वाले परिवार भी मिले। हमने अपने बच्चों की फोटुएं उतारी। वागीशा और सत्यार्थ के साथ पड़ोस की कीर्तिचन्द्रा भी अपनी मम्मी को छोड़कर तोप पर सवारी करती हुई तस्वीर खिंचाने में खुश हो रही थी। मास्टर सत्यार्थ ने जरूर अपने उत्साह पर हावी होते डर को प्रकत करने के लिए कुछ क्षण के लिए मुँह रुआँसा कर लिया। लेकिन कैमरे का फ्लैश बड़ों बड़ों से ऐक्टिंग करा देता है तो वह कैसे बच जाता।

पार्क में एक सफेद रंग की गुम्बजाकार इमारत मिली जिसके केन्द्र में एक ऊँचा चबूतरा था। पता चला कि इस चबूतरे पर किसी जमाने में महारानी विक्टोरिया की बड़ी सी प्रतिमा विराजमान थी। पार्क के बीचोबीच जो बड़ा सा घेरा बना है उसके चारो ओर लगी बेंचों पर बैठकर अंग्रेज बहादुर लोग अपनी-अपनी मेमों के साथ सुबह-शाम हवा खाते थे। घेरे के बीच में जो गोल चबूतरा है उसपर बैंडसमूह पाश्चात्य संगीत बजाते थे। अभी भी उस चबूतरे को ‘बैण्ड-स्टैण्ड’ ही कहा जाता है। आजादी के बाद विक्टोरिया महारानी यहाँ से हटा दी गयी हैं जो अब संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही हैं।

महारानी विक्टोरिया का चबूतरा थोड़ा सुस्ता लें..
बीता जमाना बैण्ड स्टैण्ड वाला घेरा
मैं तो डर गया डर हुआ काफूर
ध्यान-योग की कक्षा सूरज उग चुका है
विश्राम करते दादा जी लोग थक गया डैडी..!

उद्यान में एक तरफ कोई योगगुरू कुछ लोगों को ध्यान और योगासन सिखा रहे थे। कुछ लोग बिना गुरू के ही अपना अभ्यास कर रहे थे। कुछ कम-उम्र और हम‍-उम्र जोड़े भी अपनी बतकही में व्यस्त थे। हमने उधर ध्यान न देना ही उचित समझा और अपने साथ के बच्चों को फोटो खिंचाने के इधर से उधर ले जाता रहा। इसी उपक्रम में संयोग से एक रोचक स्नैप ऐसा भी क्लिक हो गया है।यह भी खूब रही......

औरतनुमा पुरुष जाते हुए और पुरुषनुमा महिला आती हुई’  इस तस्वीर में आ गयी है यह घर आने पर पता चला। यद्यपि टहलने वालों की भीड़ वापस लौट चुकी थी और `इतवारी’ टाइप कम ही लोग बचे रह गये थे लेकिन बच्चों ने घूम-घूमकर इतना मजा किया, और फोटू खिंचाने में इतना मशगूल रहे कि काफी देर तक बाहर गाड़ी में प्रतीक्षा करती मम्मी लोगों को इनकी खोज करने के लिए फॉलोवर को भेंजना पड़ा।

तन्दुरुस्ती हजारो नियामत है

मैने भी कैमरा समेटा और डाँटे जाने का मौका न देते हुए स्कूटर की ओर बढ़ लिया।  चलते चलते एक मोटे से पेंड़ में लटके बहुश्रुत संदेश की फोटू भी कैमरे में कैद कर ली। इस परिसर को किसी ने इलाहाबाद का फेफ़ड़ा कहा था जहाँ शुद्ध ऑक्सीजन की आपूर्ति लेने दूर दूर से लोग आते हैं। आप भी इसे देखिए और अपनी अगली इलाहाबाद यात्रा पर इस परिसर के लिए कम से कम एक दिन जरूर रखिए। धन्यवाद।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ब्लॉग की किताब चल कर आयी…

45 टिप्पणियाँ

 

मुखपृष्ठ सत्यार्थमित्र... आज स्वतन्त्रता दिवस है, और आज मेरी पुस्तक प्रेस से छूटकर मेरे घर आ गयी है। हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने इसे छापकर निश्चित रूप से एक नयी शुरुआत की है। कहना न होगा कि आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ।

ब्लॉग की किताब छापना व्यावसायिक रूप से कितना उपयोगी है इसका पता शायद इस किताब पर पाठकों की प्रतिक्रिया से पता चलेगा। अलबत्ता जिस संस्था ने इसका प्रकाशन किया है, उसके पास अपने उत्पादों के विपणन का कोई नेटवर्क नहीं है। पुराने जमाने में देश भर के लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार यहाँ आते रहते थे और एकेडेमी के बिक्री काउण्टर पर उपलब्ध प्रकाशनों को खरीदते थे और अपने शहर जाकर इसके बारे में बताते थे। इसप्रकार यहाँ की धीर गम्भीर, व शोधपरक पुस्तकें धीरे-धीरे लम्बे समय में बिकती थीं। कुछ खरीद सरकारी पुस्तकालयों द्वारा की जाती थी।

पहली बार लोकप्रिय श्रेणी की एक ऐसी हल्की-फुल्की पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसे आमपाठक वर्ग को आकर्षित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। लेकिन आम पाठकों तक इसे पहुँचाने का सही माध्यम क्या है, इसकी जानकारी हमें नहीं है। एकेडेमी द्वारा भी इस दिशा में कोई स्पष्ट व सुविचारित नीति अपनाये जाने का उदाहरण नहीं मिला है।

अतः मैं यहाँ अपने शुभेच्छुओं, मित्रों और वरिष्ठ चिठ्ठाकारों से अनुरोध करता हूँ कि वे इस सद्यःप्रकाशित ब्लॉग की किताब के प्रचार-प्रसार और बिक्री के कारगर उपाय सुजाने का कष्ट करें।

सत्यार्थमित्र आवरणसत्यार्थमित्र पुस्तक का आवरण 

इस पुस्तक में मेरे ब्लॉग सत्यार्थमित्र पर प्रकाशित अप्रैल-२००८ से मार्च-२००९ तक की कुल १०१ पोस्टों में से चयनित ६५ पोस्टें संकलित की गयी हैं। प्रत्येक पोस्ट के अन्त में कुछ चुनिन्दा टिप्पणियों के अंश भी दिये गये हैं। ऐसी टिप्पणियों को स्थान दिया गया है जिनसे कोई नयी बात विषयवस्तु में जुड़ती हो।

पुस्तक के अन्त में दिए गये परिशिष्ट में हिन्दी ब्लॉगजगत के सर्वाधिक सक्रिय ४० चिठ्ठों का नाम-पता दिया गया है जिनका सक्रियता क्रमांक चिठ्ठाजगत द्वारा निर्धारित है।

कुल २८८ पृष्ठों के इस सजिल्द संस्करण का बिक्री मूल्य रु.१९५/- मात्र रखा गया है। इसपर एकेडेमी की नीति के अनुसार छूट की व्यवस्था भी है।

तो देर किस बात की… आइए प्रिण्ट माध्यम में हिन्दी ब्लॉगजगत का एक झरोखा खोलने के इस अनुष्ठान में अपना भरपूर योगदान करें। इसके बारे में उन्हें बतायें जो अभी अन्तर्जाल की सुविधा से नहीं जुड़ सके हैं। पुस्तक प्राप्त करने का तरीका हिन्दुस्तानी एकेडेमी के जाल पते पर उपलब्ध है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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