हे संविधान जी नमस्कार…

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हे संविधान जी नमस्कार,

इकसठ वर्षों के अनुभव से क्या हो पाये कुछ होशियार?
ऐ संविधान जी नमस्कार…

संप्रभु-समाजवादी-सेकुलर यह लोकतंत्र-जनगण अपना,
क्या पूरा कर पाये अब तक देखा जो गाँधी ने सपना?
बलिदानी अमर शहीदों ने क्या चाहा था बतलाते तुम;  
सबको समान दे आजादी, हो गयी कहाँ वह धारा गुम?
सिद्धांत बघारे बहुत मगर परिपालन में हो बेकरार,
हे संविधान जी नमस्कार…

बाबा साहब ने जुटा दिया दुनियाभर की अच्छी बातें,
दलितों पिछड़ों के लिए दिया धाराओं में भर सौगातें।
मौलिक अधिकारों की झोली लटकाकर चलते आप रहे;
स्तम्भ तीन जो खड़े किए वे अपना कद ही नाप रहे।
स्तर से गिरते जाने की ज्यों होड़ लगी है धुँआधार,
हे संविधान जी नमस्कार…

अब कार्यपालिका चेरी है मंत्री जी की बस सुनती है,
नौकरशाही करबद्ध खड़ी जो हुक्म हुआ वह गुनती है।
माफ़िया निरंकुश ठेका ले अब सारा राज चलाता है;
जिस अफसर ने सिस्टम तोड़ा उसको बेख़ौफ जलाता है।
मिल-जुलकर काम करे, ले-दे, वह अफसर ही है समझदार,
हे संविधान जी नमस्कार…

कानून बनाने वाले अब कानून तोड़ते दिखते हैं,
संसद सदस्य या एम.एल.ए. अपना भविष्य ही लिखते हैं।
जन-गण की बात हवाई है, दकियानूसी, बेमानी है;
यह पाँच वर्ष की कुर्सी तो बस भाग्य भरोसे आनी है।
सरकारी धन है, अवसर है, दोनो हाथों से करें पार,
हे संविधान जी नमस्कार…

क्या न्याय पालिका अडिग खड़ी कर्तव्य वहन कर पाती है?
जज-अंकल घुस आये तो क्या यह इसमें तनिक लजाती है?
क्या जिला कचहरी, तहसीलों में न्याय सुलभ हो पाया है?
क्या मजिस्ट्रेट से, मुंसिफ़ से यह भ्रष्ट तंत्र घबराया है?
अफ़सोस तुम्हारी देहरी पर यह जन-गण-मन है गया हार
हे संविधान जी नमस्कार…

आप सबको गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ…!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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हिंदी में लिखा जा रहा साहित्य प्रायः प्रासंगिक नहीं है

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प्रोफेसर गंगा प्रसाद विमल ने ‘शुक्रवारी’ में रखी बेबाक राय…

शुक्रवारी चर्चा आजकल जबर्दस्त फॉर्म में है। माहिर लोग जुटते जा रहे हैं और हम यहाँ बैठे लपक लेते हैं उनके विचार और उद्‌गार। इस विश्वविद्यालय की किसी कक्षा में मैं नहीं गया ; क्योंकि न यहाँ का विद्यार्थी हूँ और न ही शिक्षक हूँ। लेकिन एक से एक आला अध्यापकों को सुनने का मौका मिल रहा है जो देश और विदेश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों और दूसरे शिक्षा केंद्रों में लंबे समय तक पढ़ाते रहे हैं। विषय भी देश की नब्ज टटोलने वाले। पिछले दिन अशोक चक्रधर जी आये तो कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिंदी की दशा और दिशा पर अपने तीस-चालीस साल के अनुभव बताकर गये। पूरी तरह अपडेटेड लग रहे थे। रिपोर्ट यहाँ है। उसके पहले विनायक सेन को हुई सजा के बहाने नक्सलवादी आंदोलन के हिंसक स्वरूप और मानवाधिकार संबंधी मूल्यों की चर्चा गांधी हिल के मुक्तांगन में हुई। राजकिशोर जी ने अपनी कविता के साथ विनायक सेन का भरपूर समर्थन व्यक्त किया तो कुलपति विभूतिनारायण राय ने स्पष्ट किया कि उनके साथ सहानुभूति रखते हुए भी हम इतना जरूर याद दिलाना चाहेंगे कि आज के जमाने में राजसत्ता को हिंसा के भय से दबाया नहीं जा सकता। किसी हिंसक आंदोलन को समर्थन देना उचित नहीं है। हाँ, मनुष्यता की रक्षा के लिए जरूरी है कि विनायक सेन जैसे लोग जेल से बाहर रहें और स्वतंत्र होकर समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए कार्य कर सकें।

इस बार शुक्रवारी के संयोजक राजकिशोर जी ने चर्चा का विषय रखा था- वर्तमान समय में साहित्य की प्रासंगिकता; और बिशिष्ट वक्ता के रूप में बुलाया था प्रो. गंगा प्रसाद विमल को।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके पहले वे केंद्रीय हिंदी निदेशालय में निदेशक पद पर भी कार्यरत थे। आप एक सुपरिचित कवि और उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं। विमल जी के एक उपन्यास ‘मृगांतर’ पर हॉलीवुड में एक फिल्म भी बन चुकी है और इसका जर्मन भाषा में अनुवाद भी छप चुका है। चाय की चुस्कियों के बीच आपने हल्के मूड में जो बातें कहीं वो बहुत गम्भीर किस्म की थीं।

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बाएँ से:राजकिशोर,ए.अरविंदाक्षन,विमल

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बोले- साहित्य की प्रासंगिकता सदा से रही है। आज भी बनी हुई है। इसका सबूत यह है कि आज भी साहित्य का डर मौजूद है। समाज का प्रभु वर्ग आज भी साहित्य के प्रभाव के प्रति सतर्क रहता है। एक अमेरिकी लेखक ने उपन्यास लिखा- ‘पैलेस ऑफ़ मिरर्स’। इसमें उन्होंने चार बड़े अमेरिकी व्यावसायिक घरानों की पोल पट्टी खोल कर रख दी थी।  इसपर उनके प्राण संकट में पड़ गये। उन्हें मार डालने के लिए माफ़िया ने सुपारी दे दी। किताब का प्रकाशक बहादुर और जिम्मेदार निकला। लेखक को पाताल में छिपा दिया। उनकी रॉयल्टी पाबंदी से भेज देता है और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करता है। लेखक गुमनाम और भूमिगत है, लेकिन उसका रचा साहित्य खलबली मचा रहा है।

सलमान रुश्दी की किताब का नाम भी उन्होंने लिया। बोले- इसके चालीस पृष्ठ पढ़कर मैने छोड़ दिया था। कलात्मक दृष्टि से मुझे यह उपन्यास बहुत घटिया लगा। इसके रूपक भद्दे और बेकार लगे। फिर जब इसकी चर्चा बहुत हो ली तो मैने ‘मनुष्य जाति को इस्लाम का योगदान’ विषयक एम.एन.रॉय की पुस्तक पढ़ने के बाद इसे दुबारा पढ़ा। तब मुझे यह किताब कुछ समझ में आनी शुरू हुई। उन्होंने इस पुस्तक में बहुत बारीकी से मनुष्यता विरोधी विचारण को निरूपित किया है। यह विचारण किसी धर्म की रचना नहीं कर सकता। जिन लोगों ने उसे अपने धर्म का दुश्मन मान लिया वे मूर्ख हैं। वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से डरते हैं। सलमान रुश्दी मनुष्यता का दुश्मन नहीं है बल्कि मूर्खों को उससे दुश्मनी है।

ये उदाहरण बताते हैं कि साहित्य कितना बड़ा प्रभाव छोड़ सकता है। लेकिन हिंदी के साहित्य जगत पर दृष्टिपात करें तो निराशा ही हाथ लगती है। यहाँ ऐसी प्रासंगिक रचनाये प्रायः नहीं लिखी जा रही हैं। मनुष्यता के जो सही सवाल हैं उन्हें ठीक से नहीं उठाया जा रहा है। यह साहित्य पढ़कर मन में बेचैनी नहीं उठती। कोई एक्सटेसी महसूस नहीं होती। यहाँ प्रायोजित लेखन अधिक हो रहा है। एक खास समूह और वर्ग में रहकर उसके अनुकूल साहित्य रचा जा रहा है। पुरस्कारों के लिए लिखा जा रहा है। आपकी साहित्यिक प्रतिभा का मूल्यांकन इस या उस गुट की सदस्यता के आधार पर किया जा रहा है।

यहाँ भी शोषक और शोषित का समाजशास्त्र विकसित हो चुका है। जो लोग सबसे अधिक दबे-कुचले वर्ग की बात करते हैं वे ही मौका मिलने पर शोषक वर्ग में शामिल हो जाते हैं। केरल और पश्चिम बंगाल में सबसे पहले वामपंथी सरकारें बनी। बंगाल में तो एक अरसा हो गया। लेकिन विडम्बना देखिए कि आज भी कलकत्ते में हाथगाड़ी पर ‘आदमी को खींचता आदमी’ मिल जाएगा। मार्क्स का नाम जपने वाले वामपंथी सत्ता प्राप्त करने के बाद कांग्रेस की तरह व्यवहार करने लगे और पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ बनाने लगे। यह दो-मुँहापन यहीं देखने को मिलता है। साहित्य जगत में भी ऐसी ही प्रवृत्तियाँ व्याप्त हैं।

ऐसी निराशाजनक स्थिति हिंदी साहित्य के क्षेत्र में खूब मिलती है। विरोधी खेमे को घेरकर चारो ओर से हमला किया जाता है। लेकिन यूरोप में स्थिति दूसरी है। फ्रांस में द’ गाल के शासनकाल में सार्त्र द्वारा उनका विरोध बड़े आंदोलन का रूप ले रहा था। सार्त्र को जेल में डाल देने की सलाह पर द’ गाल ने कहा कि मैं फ्रांस को गिरफ़्तार नहीं कर सकता। विरोधी विचार का सम्मान करना हिंदी पट्टी ने नहीं सीखा है। यहाँ पार्टी लाइन पर चलकर जो विरोध होता है वह भोथरे किस्म का होता हैं। तलवार की धार कुंद हो चुकी है। गदा जैसा प्रहार हो रहा है। प्राणहीन सा। हिंदी में जो कृतियाँ आ रही हैं वे निष्प्राण सी हैं। मन को उद्वेलित करने वाला कुछ नहीं आ रहा है।

वे पूछते हैं कि क्या स्वतंत्रता के बाद के साठ साल में ऐसी कोई घटना नहीं हुई जिसपर उत्कृष्ट साहित्य रचा जा सके। इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपात काल हो या पाकिस्तान के साथ लड़े गये युद्ध हों; या चीन के साथ हुआ संघर्ष। इन घटनाओं ने हिंदी साहित्यकारों को उद्वेलित नहीं किया। इनपर कोई बड़ी कृति सामने नहीं आयी। सुनामी जैसी प्राकृतिक विपदा भी मनुष्यता के पक्ष में साहित्यकारों को खड़ा नहीं कर सकी। क्या कारण है कि बड़ी से बड़ी घटनाएँ हमें विचलित नहीं करती। कड़वे यथार्थ से तालमेल बिठाने में हिंदी साहित्य असफल सा रहा है।

इतनी निराशा भरी बातें कहने के बाद उन्होंने पहलू बदला और बोले कि ऐसा नहीं है कि अच्छी प्रतिभाएँ हमारे बीच नहीं है। मुश्किल बस ये है कि उनका लिखा सामने नहीं आ पाता। आलोचना के जो बड़े मठ हैं वे इसे आने नहीं देते। उनकी देहरी पर माथा टेकने वाला ही पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाता है। समीक्षा उसी की हो पाती है जो उस परिवार का अंग बनने को तैयार होता है। राजकिशोर जी ने गुटबंदी की बात का समर्थन करते हुए विनोदपूर्वक कहा कि ‘यदि आप हमारे किरायेदार हैं तो आप सच्चे साहित्यकार हैं; यदि आप दूसरे के घर में हैं या अपना स्वतंत्र घर जमाने की कोशिश में हैं तो आपका साहित्य दो कौड़ी का भी नहीं है। एक खास विचारधारा का पोषण यदि आप नहीं करते तो आप अप्रासंगिक हैं।

मीडिया ने भी साहित्य जगत का और हिंदी भाषा का बड़ा नुकसान किया है। शब्द बदल गये हैं, शैली दूषित हो गयी है, वाक्य रचना अंग्रेजी की कार्बन कॉपी जैसी हो गयी है। कृतियों पर अंग्रेजी प्रभाव होता जा रहा है। नकल के आरोप भी खुलकर आ रहे हैं। मौलिकता समाप्त सी होती जा रही है।

आज हम सबका दायित्व है कि हम हिंदी में लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य को सामने लायें। मनुष्यता के मुद्दे उठाने वाली रचनाओं को तलाशें। संकुचित सोच के दायरे से बाहर आकर विराट धरातल पर विचार करें। मैं हद दर्जे का आशावादी भी हूँ। कुछ लोग बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। लेकिन उनकी संख्या अत्यल्प है। इसे कैसे बढ़ाया जाय इसपर विचार किया जाना चाहिए।

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विमल जी की बात समाप्त होने के बाद प्रश्न उत्तर का दौर चला। कई लोगों ने कई कारण गिनाए। मैंने पिछले दिनों श्रीप्रकाश जी की शुक्रवारी वार्ता के हवाले से बताया कि अच्छी रचना तब निकल कर आती है जब कोई बड़ा आंदोलन चल रहा हो। क्रांति का समय हो। शांतिकाल में तो साधारण बैद्धिक जुगाली ही होती रहती है। मुद्दों को तलाशना पड़ता है। इसपर जर्मनी से आये एक हिंदी अध्यापक ने अनेक ताजा मुद्दे गिनाये। दलित और स्त्री संबंधी विमर्श की चर्चा की। प्रायः सबने इसका समर्थन किया। लेकिन इन मुद्दों पर भी अच्छी रचनाओं की दरकार से प्रायः सभी सहमत थे। विदेशी मेहमान ने यह भी बताया कि यूरोप में हिंदी रचनाओं को ‘पश्चिम की नकल’ पर आधारित ही माना जाता है।

विमल जी ने हिंदी साहित्य के पाठकों की भी कमी के प्रति चिंता जाहिर की। बोले कि अब अच्छी रचनाओं के लिए भी पाठक नहीं मिलते। जेब से पैसा खर्च करके हिंदी की किताबें खरीदने और पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम है। इसके लिए वे ‘अध्यापक समाज’ को दोषी ठहराते हैं। कह रहे थे कि आजकल के अध्यापक न तो अपना पैसा खर्च करके किताबें खरीदते हैं, न पढ़ते हैं और न ही अपने छात्रों व दूसरे लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने बताया कि यदि उन्हें कोई अच्छी किताब मिल जाती है तो कम से कम सौ लोगों को उसे पढ़ने के लिए बताते हैं।

अन्य के साथ राजकिशोर जी ने अच्छी रचनाओं की कमी होने की बात का प्रतिवाद किया। बोले- मैं आपको हिंदी की कुछ मौलिक कृतियों का नाम बताता हूँ। आप इनके मुकाबले खड़ा हो सकने लायक एक भी अंग्रेजी पुस्तक का नाम बता पाइए तो बोलिएगा…। उन्होंने नाम बताने शुरू किए जिसमें दूसरे लोगों ने भी जोड़ा- श्रीलाल शुक्ल की `राग दरबारी’, रेणु का `मैला आँचल’, रांगेय राघव का `कब तक पुकारूँ’, यशपाल की `दिव्या’, अज्ञेय का `नदी के द्वीप’, अमृतलाल नागर का `बूँद और समुद्र’, भगवतीचरण वर्मा की `चित्रलेखा’, हजारी प्रसाद द्विवेदी की `बाणभट्ट की आत्मकथा’, आदि-आदि। किसी ने चुनौती देते हुए जोड़ा कि निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ यदि नकल पर आधारित है तो इसका असल अंग्रेजी रूप ही दिखा दीजिए। इसकी पहली पंद्रह पंक्तियों का अनुवाद ही करके कोई दिखा दे। इसके बाद और भी अनेक रचनाओं का नाम लिया जाने लगा।

अंततः मुझे विमल जी से उनके प्रारम्भिक वक्तव्य की पुष्टि करानी पड़ी। उन्होंने माना कि अपनी इस बात को स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है कि साहित्य की प्रासंगिकता बनी हुई है लेकिन हिंदी में जो लिखा जा रहा है उसमें अधिकांश प्रासंगिक नहीं है। उन्होंने पहले यह भी बताया था कि वे एक नियमित स्तंभ लिखते रहे हैं जिसका नाम है ‘अप्रासंगिक’।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सांप्रदायिकता और तुष्टिकरण के बीच पिसता आम मुसलमान

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वर्धा विश्वविद्यालय में हुई धर्मनिरपेक्षता पर चर्चा

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के १३वें स्थापना दिवस के अवसर पर देश के तीन बड़े बुद्धिजीवियों को आमंत्रित कर जो चर्चा करायी गयी उसका विषय था भारतीय लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्षता क भविष्य । पिछली पोस्ट में मैने रमशरण जोशी जी द्वारा रखे गये विचार प्रस्तुत किये थे। अब प्रस्तुत है डॉ.रज़ी अहमद और कुलदीप नैयर द्वारा कही गयी बातें :

डॉ.रज़ी अहमद के स्वर में फूट पड़ा सदी का दर्द

गांधी संग्रहालय पटना के सचिव डॉ. रज़ी अहमद स्वयं को इतिहास का विद्यार्थी बताते हैं। इनकी अबतक चौदह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्हें देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में वार्ता देने के लिए बुलाया जाता रहा है। जब इन्होंने बताया कि वर्धा विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर अनेक लोगों ने इनको यहाँ आने से मना किया; मगर ये फिर भी आये तो सभागार में एक अर्थपूर्ण खिलखिलाहट दौड़ गयी। उन्होंने हवाई यात्रा की सुविधा पर भी चुटकी ली। इस बारे में उन्होंने बताया कि एक बार लोहिया जी गांधी जी से मिलने सेवाग्राम के लिए दिल्ली से नागपुर तक हवाई जहाज से आ गये। गांधीजी को पता चला तो उन्होंने टोका- “प्लेन से क्यों आये? दो दिन बाद ही पहुँच जाते तो कोई आसमान नहीं टूट पड़ता”

लेकिन उसके बाद जब इन्होंने गांधी को आधार बनाकर अपनी बात रखनी शुरू की तो वातावरण गंभीर हो उठा।

बोले- मैं सेकुलरिज़्म की बात गांधी के हवाले से करूँगा जिनकी आत्मा आज़ादी के बाद से अबतक कराह रही है। वह बार-बार पूछती है कि देश को हमने कहाँ लाकर खड़ा कर दिया। सेक्यूलरिज़्म की क्या हालत कर दी?

यदि हम आज़ाद भारत के इतिहास पर नज़र डालें तो शुरुआत से ही धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन हमारे हुक्मरानों द्वारा किया जाता रहा है। देश के पहले राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू के मना करने के बावजूद सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन किया था (इसका सिलान्यास शिलान्यास सरदार बल्लभ भाई पटेल ने किया था।) इतना ही नहीं उन्होंने बनारस जाकर १०५ पंडितों के पैर धुले थे। मुसलमानों से उन्हें इतना परहेज़ था कि राष्ट्रपति भवन के सभी मुस्लिम कर्मचारियों को उन्होंने बाहर का रास्ता दिखा दिया। बाद में नेहरू जी ने उन कर्मचारियों को विदेश मंत्रालय व अन्य विभागों में समायोजित कराया।

सत्ता में बैठे लोगों ने हमेशा सेक्युलरिज़्म को रुसवा किया है। वोट की खातिर सांप्रदायिक जहर फैलाया जाता रहा है। मुसलमानों को फुसलाया जाता रहा है। उनके विकास की बात कोई नहीं करता। भावनात्मक शोषण ओता रहा है। यहाँ का आम मुसलमान सांप्रदायिकता(communalism) और तुष्टिकरण(appeasement) के बीच पिसता रहा है। नेहरू के समय में जो इतिहास लिखा गया उसमें हिंदू और मुसलमान को अलग-अलग करके रखा गया। हिंदू पुनर्जागरण अभियानों में भी मुसलमान को अलग रखा गया था। ये हमेशा नदी के दो किनारों की तरह आमने-सामने रहे लेकिन इनमें मेल कभी नहीं हुआ। दयानंद सरस्वती ने भी मुसलमानों को अपने आंदोलन से अलग रखा।

सन्‌ 1857 ई. की क्रांति पर सबसे बेहतरीन किताब वी.डी.सावरकर ने लिखी थी। इसमें हिंदू-मुसलमान के संबंधों को सबसे अच्छे तरीके से निरूपित किया गया था। लेकिन राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उस इतिहास की गलत व्याख्या कर दी गयी। इतिहास को तोड़-मरोड़कर अपने निहित स्वार्थों के लिए प्रयोग करने की प्रवृत्ति सत्ता में बैठे लोगों में सदा से रही है। देश के बँटवारे का इल्ज़ाम मुसलमानों पर थोपा गया।

राजाराम मोहन राय ने जो सबसे पहला स्कूल रामपुर में खोला उसका नाम ‘हिंदू स्कूल’ रखा था लेकिन उन्हें भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत कहा गया; वहीं सर सैयद अहमद ने जब मुस्लिम स्कूल की नींव रखी तो इसे ‘दो देशों के सिद्धांत’ का नाम दे दिया गया। सन्‌ 1916 ई. में बनारस हिंदू वि.वि. की स्थापना करने वाले मालवीय जी को ‘महामना’ की उपाधि दी गयी और शिक्षा का सबसे बड़ा प्रचारक कहा गया, लेकिन 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी स्थापित करने वाले सर सैयद को वह सम्मान नहीं दिया गया; बल्कि उन्हें भारत की एकता का दुश्मन मान लिया गया।

‘मुसलमान पर आज भी अविश्वास की नजर रखी जा रही है। आज़ादी के बाद की तीसरी मुस्लिम पीढ़ी से भी पल-पल देशभक्ति का सबूत मांगा जाता है। आजका मुस्लिम युवक विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहा है।’ यह बात कहते हुए रज़ी साहब मानो रो पड़े। आवाज़ में एक कराह निकल रही थी।

महात्मा गांधी ने हिंदुओं और मुसलमानों को अपनी दो आँखें बताया था। उन्होंने कभी इनमें भेद नहीं किया। उनका मानना था कि भारतीय संस्कृति अपने भीतर तमाम दूसरे धर्मों और पंथों के तत्व समाहित करने और उनका स्वागत करने को तैयार है। लेकिन आज़ादी के बाद ऐसी स्थिति देखने में नहीं आयी है। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की दूरदर्शी आँखों ने यह देख लिया था। प्रथम गणतंत्र दिवस (26 जनवरी, 1950) की पूर्व संध्या पर उन्होंने कहा था कि कल से हम विरोधाभासों के युग में प्रवेश करने जा रहे हैं। एक तरफ़ हमारा संविधान लागू होगा जो स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा, न्याय और सामाजिक समरसता के सिद्धांतो पर बना हुआ है और दूसरी तरफ़ तमाम वर्गों में बँटा और जाति, धर्म, संप्रदाय, परंपरा आदि से पैदा हुई कुरीतियों से अँटा पड़ा समाज होगा जो इन सिद्धांतों को अपनाने में मुश्किल पैदा करेगा।

आज यदि गांधी जी हमारे गाँवो को देख रहे होंगे तो भ्रमित हो जाते होंगे कि यह सब क्या उनके नाम पर राज करने वालों का किया धरा ही है। विकास के जितने भी मॉडल चलाये जा रहे हैं वे सभी बड़े शहरों और महानगरीय जीवन को लाभ पहुँचा रहे हैं। गाँव की सुध लेने वाला कोई नहीं है। भारतीय संस्कृति, हिंदुस्तानी ज़बान और स्वदेशी पद्धति पर आधारित शिक्षा के प्रति गांधी जी की प्रतिबद्धता की मिसाल किसी और नेता में नहीं मिलती।

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के उद्घाटन के मौके पर तमाम अंग्रेज हुक्काम बुलाये गये थे। गांधी जी वहाँ हिंदी में बोलना चाहते थे लेकिन मालवीय जी ने उनसे अंग्रेजी में भाषण देने को कहा। गांधी जी ने बस इतना कहा- “मैं गंगा के किनारे खड़ा हूँ और मुझे टेम्स का पानी पीने को कहा जा रहा है” इसपर कार्यक्रम का संचालन कर रही एनी बेसेंट ने गांधी जी के हाथ से माइक ले लिया और उन्हें आगे नहीं बोलने दिया गया।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में सन्‌ 1967 ई. में जब पहली बार ग़ैर कांग्रेसी सरकारें  बनी थी उसे रज़ी साहब टर्निंग प्वॉइण्ट मानते हैं। क्षेत्रीयता की भावनाओं को उड़ान भरने का पहली बार मौका मिला। इसके बाद मम्दल मंडल आयोग की रिपोर्ट के लागू होने के बाद गरीबों के हित की सभी नीतियाँ बर्बाद हो गयीं। जातियों और उप-जातियों की आपसी लड़ाई ने इस देश का सर्वाधिक अहित किया है। यह देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है। आज हमारे देश में नेता तो बहुतेरे हैं लेकिन द्रष्टा (visionary) कोई नहीं है।

आज यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि गांधी के गुजरात को मोदी के गुजरात के नाम से जाना जा रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि प्रगतिशील शक्तियों (वामपंथियों) ने गांधी को नहीं समझा। उन्हें पूँजीवाद का प्रतिनिधि(दलाल) “agent of Capitalism’ कहा गया। गांधी के मूल्यों को अपनाये बिना हमारा कल्याण नहीं हो सकता। आज देश की युवा पीढ़ी को यह बात समझनी होगी।

रज़ी अहमद जब अपनी बात पूरी करके बैठने को हुए तो तालियों के बीच भी एक अजीब किस्म का सन्नाटा हमारे मन-मस्तिष्क पर हथौड़े बरसा रहा था। कुलदीप नैयर ने उनकी पीठ ठोंककर शाबासी दी और तत्काल संचालक द्वारा बुलाये जाने पर माइक संभाल लिया।

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कुलदीप नैयर का विश्वास चमत्कृत करता है :

सन्‌ 1923 ई. में 14 अगस्त को सियालकोट (पाकिस्तान) में जन्मे कुलदीप नैयर अपने वामपंथी रुझान के साथ पाकिस्तानी हित की बात करने वाले तथा भारत की पाकिस्तान विरोधी नीतियों की प्रखर आलोचना करने वाले ऐसे प्रतिष्ठित पत्रकार हैं जिन्होंने देश को आज़ाद होते देखा था और विभाजन की विभीषिका को भोगा था। कानून में स्नातक, पत्रकारिता में एम.एस-सी. और दर्शन शास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधियाँ धारण करने वाले कुलदीप नैयर के सिंडिकेट कॉलम दुनिया भर के पचास से अधिक अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में छपते हैं। पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ाने के लिए एक बड़ा भियान छेड़ने वाले कुलदीप नैयर ने जब बोलना शुरू किया तो हाल खचाखच भरा हुआ था लेकिन ‘सुई-टपक’ सन्नाटा भी स्थापित था।

बोले- मुझसे पूछोगे कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का भविष्य क्या है तो मैं पूरे विश्वास से कहूँगा कि भविष्य बहुत सुंदर है। सेक्यूलरिज़्म आगे बड़ा मजबूत होगा। इस देश का आम आदमी कम्युनल नहीं है। मैं बताना चाहता हूँ कि मज़हब ‘कौम’ नहीं बनाता। यह देश भी किसी एक धर्म से नहीं बना है। हिंदू और मुसलमान दोनो इसी देश के वासी हैं।

मौलाना अबुल क़लाम आजाद ने कहा था कि ‘मुझे हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब पर नाज़ है।’ मैं जब 13 सितंबर 1947 को सियालकोट से चला सबकुछ बदल चुका था। दोनो तरफ़ हजारो लोग मारे जा रहे थे। लेकिन जिन्ना बदल चुका था। उसने पाकिस्तान में रहने वाले सभी लोगों को बराबर का पाकिस्तानी माना था। लेकिन उसकी बात नहीं चली। पहले जिन्ना कहा करते थे कि ‘तुम्हारा खाना-पीना-सोना अलग है इसलिए हम दो देश हैं।’ इस बात का असर ज्यादा रहा। अल्लामा इकबाल कहा करते थे कि हमारी तहज़ीब में सबका योगदान है। खु़दा के सामने सभी उसी तरह झुकते हैं। (लेकिन देश फिर भी बँट गया।)

देश के बँटवारे पर हुए सांप्रदायिक दंगे में दस करोड़ हिंदु-मुसलमान मारे गये और बीस करोड़ लोग बेघर हुए। उन बेघरों में एक मैं भी था। मैं 15 सितंबर को दिल्ली पहुँचा और सबसे पहले बिड़ला हाउस गया- गांधी को देखने। गांधी इसलिए सबसे अलग हैं कि उन्होंने हमें ‘खुद्दारी’ दी। शाम की प्रार्थना सभा में जमा पाकिस्तान से विस्थापित होकर आये शरणार्थियों से उन्होंने कहा कि ‘आपका गुस्सा हमें पता है… भारत के हिंदू और मुस्लिम मेरी दो आँखें है।’ लेकिन वह समय पागलपन का था। लेकिन आज हम संभल चुके हैं। सेक्युलर फोर्सेज़ आज अपना काम कर रही हैं। देश की अदालते अपना काम कर रही हैं। हमें अपने पर विश्वास करने की जरूरत है।

बीच–बीच में ये जो घटनाएँ हो जाती है- सांप्रदायिक दंगे, बाबरी मस्ज़िद, गुजरात के दंगे, नरेंद्र मोदी आदि- वे महज एक क्षेपक (aberration) की तरह हैं। इनका कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ने वाला। इनसे घबराना नहीं चाहिए; बल्कि इनका मुकाबला करना चाहिए। इस देश ने मोदी को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सारे देश की मीडिया उसके पीछे पड़ी है। कानून अपना काम कर रहा है।

इस देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाने का काम किया था- इंदिरा गांधी ने। राजनीति से नैतिकता को खत्म करने का गुनाह किया- इंदिरा गांधी ने। उन्होंने ‘मॉरलिटी’ और ‘इम्मॉरलिटी’ के बीच की लाइन मिटा दी। आज हम जो कुछ देख रहे हैं उसकी शुरुआत तभी हुई थी। जयप्रकाश नारायण ने कुछ कोशिश जरूर की लेकिन खराब स्वास्थ्य के कारण वे सफल न हो सके। (आज उनके उत्तराधिकारियों के करतब देखिए…) लेकिन जेपी ने भी एक बड़ी ग़लती कर दी थी। सरकार बनाने के लिए उन्होंने ऐसे लोगों का हाथ थाम लिया जो सेक्यूलर नहीं थे।

हमें आशावादी होना चाहिए। अच्छी बातों को आगे बढ़ाना चाहिए। आज शिक्षा बढ़ रही है। मुस्लिम समुदाय ने अपनी शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया। नेहरू की शिक्षा नीति ठीक नहीं थी। उन्होंने मुस्लिम-शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया। नेहरू ने जुमले उछाले- Who lives if India dies; Who dies if India lives. आज भी देश में सेक्युलर लोगों की संख्या अधिक है। लेकिन रजनीति ने इसके स्वरूप को खराब कर दिया है।

जब 31 अक्तूबर, 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी तो अकेले दिल्ली में सरकारी आँकड़ों के मुताबिक ही करीब तीन हजार सिख मारे गये। लेकिन आज तक किसी गुनाहग़ार को फाँसी नहीं हुई। यह हमारी राजनीति का चरित्र है। याद रखिए कि देश किसी भी नेता से बड़ा है। देश के प्रति ग़लतियाँ मत करो। देश का नेता जब ग़लती करता है तो देश को उसका ख़ामियाजा भुगतना पड़ता है। कुछ ऐसा करें कि एक व्यक्ति की ग़लती का ख़ामियाजा देश को न भोगना पड़े। सजग रहें।

आज यह स्थिति क्यों हो गयी है कि किसी मुसलमान को किराये पर मकान नहीं मिलता। क्यों उन्हें एक ही इलाके में समूह बनाकर रहना पड़ता है। परस्पर प्यार और सहभागिता की कमी क्यों हो गयी है? sense of accomodation and tolerance की गूँज फीकी पड़ रही है। इसे बढ़ाइए। गाँवों में स्थिति अभी भी ठीक है। शहरों में महौल मीडिया की वजह से ज्यादा ख़राब हुआ है। ज़्यादातर मीडिया अब पॉलिटिकल लाइन पकड़ कर चल रही है।

भाषा का सवाल भी महत्वपूर्ण है। उर्दू को मुसलमानों की भाषा ठहरा दिया गया। इसे अब राजनीतिक रंग भी दे दिया गया है। मौलाना आज़ाद ने भी कहा था कि ‘देश के विभाजन के बाद उर्दू का मामला कमजोर पड़ गया (Case of Urdu was weakened after partition)।’ एक सुंदर साहित्यिक भाषा (a beauiful literary language) का अंत इस देश में होता जा रहा है। कुलदीप नैयर ने एक प्रसम्ग बताया जब गोविंद बल्लभ पंत की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा हिंदी को देश की प्रथम (राष्ट्रीय) भाषा बनाने और अंग्रेजी को सहयोगी भाषा बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया। जब पंत जी प्रस्ताव का प्रारूप लेकर नेहरू के पास गये तो उन्होंने अंग्रेजी के लिए प्रस्तावित कमतर दर्ज़े को देखकर उन्हें दुत्कार दिया और प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।

उन्होंने आपसी वैमनस्य की समस्या के समाधान की जिम्मेदारी बहुसंख्यक हिंदुओं के कंधे पर डालते हुए कहा कि यह भारत के हिंदुओं का यह दायित्व है कि वे मुसलमानों के लिए अपने दरवाज़े खोलें। गांधी के इस देश में उनके संदेश को भुलाया नहीं जाना चाहिए। कुलदीप नैयर ने बताया कि एक बार वे काबुल में खान अब्दुल गफ़्फ़ार खाँ ‘सीमांत गांधी’ से मिलने गये। यहाँ के साम्प्रदायिक दंगो की खबरें सुनकर वे हैरत से भरे हुए थे। उन्होंने आश्चर्य से पूछा – गांधी के देश में  (साम्प्रदायिक) दंगा कैसे हो गया? ये वही गफ़्फ़ार खाँ थे जिनके ‘लाल-कुर्ती’ आंदोलन (red-shirts) ने पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत (NWFP) में 1946 का चुनाव जीता था।

नैयर ने जोर देकर कहा कि हम उन लोगों से गद्दारी कर रहे हैं जिन लोगों ने हमें आज़ादी दिलायी। सत्ता की कुर्सी पाने के लिए और निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए हम गलत रास्तों पर चल रहे हैं। हम गांधी जी के उस सिद्धाम्त की बलि चढ़ा रहे हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि हमारा साधन अपवित्र है तो साध्य भी निश्चित रूप से अपवित्र हो जाएगा (If your means are vitiated, your ends are bound to be vitiated.)। आज देखता हूँ कि हर व्यक्ति अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में एक छोटे तानाशाह की तरह काम कर रहा है। हमें याद रकना चाहिए कि यहाँ के मुसलमान और सिख भी यहाँ बहुत दिनों से रह रहे हैं जो मिलजुलकर हिंदुस्तानी तहज़ीब का निर्माण करते हैं।

उन्होंने अपने दिल में छिपे उस सपने की चर्चा की जिसमें दक्षिण एशिया के सभी देश मिलकर यूरोपीय यूनियन की भाँति एक संयुक्त इकाई का निर्माण करेंगे और उन्हें अफ़गानिस्तान से लेकर वर्मा तक बिना वीज़ा के आने-जाने की छूट होगी।

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अतिथियों का स्वागत कुलपति व रजिस्ट्रार द्वारा

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कुलदीप नैयर को सुनने भारी भीड़ उमड़ पड़ी

भारत-पाकिस्तान की वाघा सीमा पर प्रत्येक वर्ष अपने और पाकिस्तान के जन्मदिवस (१४ अगस्त) पर शांति की प्रतीक मोमबत्तियाँ जलाने वाले कुलदीप नैयर जब हजारों लोगों के साथ हिंदुस्तान-पाकिस्तान-ज़िंदाबाद के नारे लगवाते हैं तो उनका आशावाद चरम पर होता है। कदाचित्‌ कड़वे यथार्थ से दूर भी।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

पुछल्ला : आजकल वर्धा विश्वविद्यालय में एक के बाद एक शानदार कार्यक्रम हो रहे हैं। सबमें उपस्थित रहना ही मुश्किल हो गया है। उसपर रिपोर्ट ठेलने की फुरसत तो नहीं ही मिल पा रही है। विदेशों में हिंदी पढ़ाने वाले अनेक शिक्षक आजकल यहाँ अभिविन्यास कार्यक्रम में प्रतिभाग कर रहे हैं। एक उपयोगी रिपोर्ट यहाँ है।

अनूप जी, अब सम्हालिए… सेमिनार तय हो गया!!

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पिछली पोस्ट में मैने जिस सेमिनार के न हो पाने की बात बतायी थी उसके आयोजन की तैयारी में आदरणीय अनूप शुक्ल जी ने बहुत समय खर्च किया था। जाने कितने चिठ्ठाकारों से चर्चा में लगे रहे। इन्होंने जाने कितने आदि, अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी चिठ्ठाकार भाइयों, बहनों और दोस्तों को इस राष्ट्रीय सेमिनार के स्वरूप के बारे में बताया होगा। अनेक प्रतिष्ठित और ‘स्टार’ ब्लॉगर जन को न्यौता भी इन्होंने ही दिया था। मैं तो सिर्फ़ इनका पता जानता था सो सारी बातें इन्हीं को बता देता था।

जब अचानक कार्यक्रम टलने की बात प्रकट हुई तो मुझे सबसे बड़ी कठिनाई यह समाचार फुरसतिया जी को बताने में हुई। अपने से अधिक निराश मैने इन्हें पाया था। करीब दो सप्ताह का उत्साह दो मिनट में ठण्डा पड़ गया था। उधर मेरे बड़े भाई डॉ. अरविन्द मिश्र जी ने मुझे पहले ही आगाह किया था कि जब तक सब प्रकार से बात पक्की न हो जाय और बजट की व्यवस्था सुनिश्चित न हो जाय तबतक हाथ न डलियो। इसलिए जब उन्होंने स्थगन का समाचार सुना था तो थोड़े दुखी तो जरूर हुए लेकिन अपनी भविष्यवाणी के सच होने पर उनके मन में एक स्थितिप्रज्ञ का सन्तोष भाव भी जरूर था।

लेकिन अब तो कहानी बदल गयी है। अब “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेहु…” की पॉलिसी पर चलना है।

अब अनूप जी को अपना पहले का किया श्रम व्यर्थ नहीं लगना चाहिए। कार्यक्रम की रूपरेखा जो हमने तब तय की थी कमोबेश वही रहने वाली है। शीघ्र ही महात्मागांधी अन्तर राष्ट्रीय  हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अधिकारियों के साथ इलाहाबाद में बैठकर हम कार्यक्रम को अन्तिम रूप देंगे। अतिथियों की सूची भी वहीं तय हो पाएगी, लेकिन हिन्दी ब्लॉगजगत का सच्चा प्रतिनिधित्व कराने का पूरा प्रयास होगा। आदरणीय अनूप जी, अरविन्दजी, ज्ञानदत्तजी, आदि ने सदैव मेरे प्रति जो स्नेह का भाव रखा है उसी की ऊर्जा से मैं यह आयोजन करा पाने का आत्मविश्वास सजो पा रहा हूँ।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा इस अवसर पर एक महत्वाकांक्षी योजना बनायी गयी है। आप सभी इसमें सक्रिय सहयोग दें। एक अनूठी कृति आकार लेने वाली है। निस्संकोच होकर अपना योगदान सुनिश्चित करें। एकेडेमी के सचिव डॉ.एस.के. पाण्डेय जी ने उस अनुपम प्रकाशन का लोकार्पण २३ अक्टूबर के उद्‌घाटन सत्र में कराने का निश्चय अभी कर लिया है, जबकि प्रकाश्य सामग्री का एक भी शब्द अभी तय नहीं हुआ है। लेकिन हमें पूरा विश्वास है कि एक जोरदार पुस्तक उस तिथि तक आपके सामने होगी। बस आप अपनी प्रविष्टियाँ तत्काल भेंज दीजिए। कहाँ और कैसे? यह जानने के लिए एकेडेमी के ब्लॉग पृष्ठ पर पधारें।

अस्तु, हे अनूप जी! आगे का जिम्मा आपै सम्हारौ। हम त चलै माता रानी का आशीष बटोरै…  अरविन्द जी यदि चुनाव कराने में नहीं लगाये गये तो बाकी सब काम उनके लिए बहुत सरल हो जाएगा।

वैष्णो देवी धाम से लौटकर जब मैं वापस आऊंगा तो एकेडेमी के मेल-बॉक्स में सैकड़ों प्रविष्टियाँ आ चुकी होंगी। उनको छाँटने-बीनने के बाद संपादक मण्डल किताब को अन्तिम रूप देने में अधिकतम सात दिन लेगा और मुद्रक किताब बनाकर देने में सात दिन और लेगा। बस तबतक ब्लॉगिंग का महाकुम्भ भी आ ही जाएगा। किताब का लोकार्पण भी लगे हाथों हो जाएगा।

अब तो हम यह पोस्ट ठेलकर ट्रेन में बैठ जाएंगे। एक सप्ताह बाद लौटकर जुट जाएंगे इस महामेला की तैयारी में। तबतक अनूप जी अपने तरीके से तैयारी पूरी ही कर डालेंगे। बस मौजा ही मौजा… 🙂

प्रगति मैदान के पुस्तक मेले से खबरें अच्छी नहीं हैं…

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किताबों की खुसर-फुसर… भाग-४

“…स्टॉल में रखी किताबें एकदम अकेली हैं। उनका अकेलापन अस्तित्ववादी नयी कविता और नयी कहानी के अकेलेपन से ज्यादा बड़ा सच है और भयावह है। दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता। दिखते हैं तो ऊँघते प्रकाशक और उनके कर्मचारी। लोग उनतक नहीं पहुँच रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा यही किया जा सकता है कि मेला लगा दिया जाय, लेकिन अगर कोई नहीं आए तो क्या करें?”

यह दृश्य दिल्ली के प्रगति मैदान का है और यह व्यथा बयान कर रहे हैं दैनिक हिन्दुस्तान के सम्पादकीय पृष्ठ पर श्री सुधीश पचौरी जी जो ‘बिन्दास’ नाम से स्तम्भ लिखते हैं। यह पढ़कर मुझे वह खुसर-फुसर फिर याद गयी जो मैने पिछले दिनों सत्यार्थमित्र पर आपसे बाँटना शुरू किया था, लेकिन बात पूरी नहीं हो पायी थी। मैने हिन्दुस्तानी एकेडेमी सभागार में आयोजित एक पुस्तक विमोचन समारोह के समय इस संस्था के बिक्री अनुभाग की आलमारियों में बन्द (कैद) किताबों का कष्ट वहाँ बैठकर देखा और सुना था।

इस संस्था ने अबतक हिन्दी की लगभग डेढ़ सौ और उर्दू की क़रीब तीस पुस्तकों का प्रकाशन किया है। इनमें से कोई पच्चीस किताबें तो पिछले डेढ़-दो वर्ष के भीतर ही आयी हैं। इन्ही नयी नवेली किताबों की आपस में जो बतकही सुनायी दी थी उससे मेरा मन खिन्न हो गया था।

abhidharm1 Bhartiya Jyotish Me Prayag Diye Ka Raag रामकथा और तुलसीदास Vrat aur parva घाघ और भड्डरी

(पुस्तकों को बड़ा करके देखने के लिए उनपर चटका लगाएं)

मैने बिक्री अनुभाग के उस कमरे में देखा कि डॉ. कविता वाचक्नवी की लिखी एक पुस्तक इस बात से तो खुश थी कि पाण्डुलिपि के रूप में लम्बा समय अज्ञातवास के रूप में बिताने के बाद अन्ततः आकर्षक रूप में इसका प्रकाशन हो गया और समारोह पूर्वक लोकार्पण भी करा दिया गया, लेकिन बड़े साहित्यिक मंचों और पत्र-पत्रिकाओं में इस शोधपरक कृति की समीक्षा नहीं होने से निराशा के भाव भी स्पष्ट नजर आ रहे थे। उसे ‘दिये का राग’ ने समझाया कि ऐसी जाने कितनी किताबें इस संस्था की आलमारियों और तहखाने में छापकर रखी गयी हैं जिनको सिर्फ़ लिखने वाला ही भलीभाँति जानता होगा।

ऐसा इसलिए नहीं है कि उनकी गुणवत्ता में कोई कमी है, या उन्हें कोई बेचना नहीं चाहता, बल्कि समस्या यह है कि निजी प्रकाशकों की भाँति बाजार को समझने, प्रचार-प्रसार की आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करने और सरकारी विभागों द्वारा थोक खरीद के लिए चयनित कराने की कोई सुविचारित नीति इस संस्था द्वारा न तो बनायी गयी है और न ही उसके क्रियान्वयन का कोई ढाँचा ही खड़ा किया गया है।

PrayagPradeep भारतीय चित्रकला उर्दू साहित्य में हिन्दुस्तानी तहज़ीब ज्ञान कोश सूर्यविमर्श समाज भाषा विज्ञान

कभी देश भर के साहित्यकारों और हिन्दुस्तानी भाषा व साहित्य के अनुरागियों की तीर्थस्थली रही यह संस्था आज योग्य और ऊर्जावान कर्मचारियों तथा पूर्णकालिक पदाधिकारियों की कमी का दंश झेल रही है। शासन ने स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों को इस संस्था को संचालित करने की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंप दी है। संस्था के मनोनीत सचिव द्वारा अपनी व्यक्तिगत अभिरुचि के जोर से अनेक उम्दा पुस्तकों के प्रकाशन कराये गये और कुछ उपयोगी विचार गोष्ठियाँ भी करायी गयीं। लेकिन ऐसे अधिकारी के पास अपने मूल विभाग के प्रशासनिक कार्यों से जो समय बचता है वह इस गुरुतर कार्य के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।

“तुम्हें क्या लगता है, यह दुकान वृद्ध हो चले दरबारी जी के हाथों में कितने दिन और चल पायेगी..?” प्रयाग प्रदीप ने  विजयदेव नारायण शाही के छँठवा दशक से पूछा।

श्री शालिग्राम श्रीवास्तव की १९३७ में प्रकाशित यह पुस्तक पाठकों की भारी मांग पर पुनर्मुद्रित होकर हाल ही में आयी है। इलाहाबाद से किसी भी रूप में जुड़े होने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह पुस्तक अनिवार्य संग्रह के लायक है, लेकिन पुरानी साख के बावजूद इसकी बिक्री भी बहुत उत्साहजनक नहीं है।

निराला की काव्यदृष्टि Diye Ka Raag Maa ke Liye Chawal Naye-Naye Kavita Ki Jatiyata सूर्यविमर्श

इस अनुभवी प्रश्न का जवाब दिया नये नवेले सूर्य विमर्श ने, “पिछले दिनों यहाँ से  पुस्तकालयाध्यक्ष, बिक्री सहायक, विपणन प्रभारी, प्रकाशन अधिकारी, वेब साइट संचालन विशेषज्ञ, आदि अनेक पदों हेतु प्रस्ताव किया गया है। लेकिन समस्या यह है कि इस स्वायत्तशासी संस्था की शक्तियाँ जिस कार्य परिषद में निहित हैं उसका अस्तित्व ही अधर में लटका हुआ है। कार्यपरिषद के गठन और उसके द्वारा सर्व शक्तिमान कार्य समिति के चुनाव के बाद ही कार्मिक प्रबन्धन किया जा सकता है।”

“फिर तो यह काफी लम्बी प्रक्रिया लगती है… शायद निकट भविष्य में पूरी होती नहीं दिखती…” घाघ और भड्डरी ने सहज अनुमान लगाते हुए बात पूरी की।

फादर (डॉ.) कामिल बुल्के द्वारा १९७६ में दिये गये व्याख्यान पर आधारित लोकप्रिय पुस्तक रामकथा और तुलसीदास के तीसरे संस्करण ने बताया कि जब वह पहली बार १९७७ में छपकर आयी थी तब भी ये कर्मचारी इसी प्रकार एकेडेमी की सेवा कर रहे थे। सरकारी अनुदान से इन्हें जो वेतन तब मिलता था वही वेतन आज भी मिल रहा है।

हिन्दुस्तानी लेख अनुक्रमणिका छठवा दशक Roop Lahariya Deep Dehari Dwar Keshav Granthavali-1 Hai To Hail

(पुस्तकों को बड़ा करके देखने के लिए उनपर चटका लगाएं)

वर्ष १९३३ में पहली बार प्रकाशित भारतीय चित्रकला के दूसरे नवीन संस्करण ने इन कर्मचारियों का जो चित्र खींचा वह मन को दुःखी कर गया। आजादी से पहले के जमाने से संस्था में जुटने वाले बड़े-बड़े साहित्यकारों और विद्वानों की सेवा में अपने किशोरवय से लगे रहने वाले और एकेडेमी को ही अपने जीवन का श्रेय-प्रेय मान चुके श्री ईश्वर शरण अब छिहत्तर साल की उम्र में कार्यालय अधीक्षक तो बने हुए हैं लेकिन इसके बदले उन्हें जो मानदेय मिल रहा है उससे दो जून की रोटी जुटाना ही दूभर है, अपनी बिटिया की शादी का बोझ कैसे उठाएं? दूसरों की हालत भी इनसे कुछ अलग नहीं है।

“…जो उम्र परिवार के बीच आराम करने की है उसमें एकेडेमी की नौकरी क्यों..?” संस्कृति पुरुष पं. विद्यानिवास मिश्र ने पूछा।

“क्योंकि यहाँ के कर्मचारियों को सेवानैवृत्तिक लाभ दिये जाने की कोई व्यवस्था नहीं है…।” मेरे मुँह से यह बरबस निकल पड़ा। लेकिन दूसरों की दृष्टि में अकारण हवा में बात करता जान कर मैने अपने को संयत कर लिया।

अभिधर्म कोश के चार खण्ड एक साथ बोल पड़े, “जाने क्यों १९६५ के बाद किसी परवर्ती वेतन आयोग की संस्तुति  इन कर्मचारियों पर लागू नहीं हुई। आज जो कर्मचारी यहाँ सबसे ज्यादा वेतन पाता है उसको भी किसी सरकारी चपरासी से आधी तनख्वाह ही मिलती है। १९६५ के वेतनमान अभी भी चल रहे हैं। पेंशन आदि की तो कोई बात ही नहीं है…।”

यहाँ बताते चलें कि  १९४२ के भारत छोड़ो आन्दोलन में आचार्य नरेन्द्र देव अहमदनगर किले की जेल में बन्द किए गये थे। वहीं पर उन्होंने वसुबन्धु कृत बौद्ध दर्शन की व्याख्या के ग्रन्थ का फ्रेन्च भाषा से हिन्दी में अनुवाद किया था। इस अनुवाद के आठ अध्यायों को एकेडेमी ने १९५८ में चार खण्डों में प्रकाशित किया था। इसका दूसरा संस्करण २००८ में प्रकाशित कराया गया है। लेकिन इस अमूल्य निधि को भारतवर्ष और दुनिया के दूसरे हिस्सों में जाने की प्रतीक्षा लम्बी होती जा रही है।

बातें तो और भी जारी थीं, …लेकिन एक कर्मचारी ने मेरी तन्द्रा भंग करते हुए बताया कि पुस्तक विमोचन समारोह के मुख्य अतिथि महोदय पधार चुके हैं और काम भर की भीड़ भी इकठ्ठा हो चुकी है…। मैने अपनी डायरी उठायी और सभागार की ओर चल पड़ा। पीछे से खुसर-फुसर की आवाजें तेज होती चली गयीं…।

उन बेबस ध्वनियों ने मेरा पीछा करना जारी रखा है…। मैने अपनी सीमाओं के भीतर रहते हुए कुछ रास्ते तलाशने भी जारी रखे हैं। लेकिन पुस्तक मेले की खबरें पढ़ने के बाद मेरे धैर्य की परीक्षा और कठिन हो गयी है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

हरितालिका व्रतकथा में भय तत्व

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imageहरितालिका तीज का व्रत अभी अभी सम्पन्न हुआ। एक दिन पहले पत्नी के साथ कटरा बाजार में जाकर व्रत सम्बन्धी खरीदारी करा लाया। वहाँ अपने उत्सवप्रधान समाज की छटा देखते ही बनती थी। दान के लिए चूड़ी, आलता, बिन्दी, सिन्दूर, साबुन, तेल, कंघी, शीशा, चोटी, रिबन, आदि सामग्रियों की मौसमी दुकानें ठेले पर सज गयी थीं। प्रायः सभी सुहागिनें इन सामानों के रेडीमेड पैकेट्स खरीद रहीं थीं, लेकिन निजी प्रयोग के लिए वही साजो-सामान ऊपर सजी पक्की दुकानों से पसन्द किये जा रहे थे। सभी ‘रेन्ज’ की दुकानें और सामान, और उतने ही रेन्ज के खरीदार भारी भीड़ के बीच एक दूसरे से कन्धा घिस रहे थे।

मैने भी यथासामर्थ्य अपनी धर्मपत्नी को फल, फूल, बिछुआ, पायल, और श्रृंगार व पूजा की सामग्री खरीद कराया। साथ में सड़क की पटरी पर बिक रही हरितालिका व्रत कथा की किताब भी दस रूपये में खरीद लिया। मेरा अनुमान है कि यह पुस्तक लगभग सभी घरों के लिए खरीदी गयी होगी।

तीज के दिन भोर में साढ़े तीन बजे अलार्म की सहायता से जगकर पत्नी को व्रत के लिए तैयार होता देखता रहा। चार बजे आखिरी चाय की चुस्की लेकर इनका उपवास शुरू हुआ। व्रत की पूजा का मूहूर्त प्रातः साढ़े नौ बजे से पहले ही था। इसीलिए स्नान ध्यान और पूजा का क्रम जल्दी ही प्रारम्भ हो गया था। आमतौर पर इस दिन की पूजा का क्रम शनैः-शनैः आगे बढ़ता है, ताकि मन उसी में रमा रहे और भूख को भूलाए रहे। किन्तु इस बार शुभ-मुहूर्त ने थोड़ी कठिनाई पैदा कर दी। image

शिव मन्दिर में जाकर शिवलिंग और पार्वती जी का पूजन-अभिषेक व घर में वेदिका बनाकर विशेष पूजन करते समय किताब में बतायी गयी पूजन विधि का अक्षरशः पालन करने का प्रयास जारी रहा। इस व्रत में उपवास के साथ व्रत की कथा सुनना भी अनिवार्य बताया गया था। घर से दूर अकेले रहने के कारण बड़े-बुजुर्ग या पण्डीजी की भूमिका मुझे ही निभानी पड़ी। धर्मपत्नी ने हाथ मे फूल अक्षत्‌ लेकर आसन जमाया और मेरे हाथ में पोथी थमा दिया।

व्रत की कथा माँ पार्वती और भगवान शंकर के बीच वार्ता के रूप में प्रस्तुत की गयी है। शिव जी अपनी धर्मपत्नी को उन्हीं की कहानी बता रहे हैं कि उन्होंने कैसे कठिन तपस्या करके शिव जी को वर के रूप में प्राप्त किया। अपने पिता द्वारा विष्णु के साथ उनके विवाह का निर्णय लिए जाने पर कैसे उन्होंने विरोध स्वरूप अपनी सखी (आली) के साथ स्वयं का हरण कराया और घने जंगल में जाकर घोर तपस्या करते हुए शिव जी को प्रसन्न किया, वर पाया और अन्ततः अपने पिता को शिव जी के वरण के लिए राजी किया। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को अपनी तपस्या का फल प्राप्त कर चुकी पार्वती जी ने शिवजी से ‘इस व्रत का माहात्म्य पूछा’। (शायद पाठकों और भक्तगणों को सुनाने के लिए उन्होंने ऐसा पुनरावलोकन किया होगा…!)

शिव जी बोले- हे देवि! सभी सुहागिनों को चाहिए कि ‘इन मन्त्रों तथा प्रार्थनाओं के द्वारा मेरे साथ तुम्हारी पूजा करे, तदनन्तर विधिपूर्वक कथा सुने और ब्राह्मण को वस्त्र, गौ, सुवर्ण, आदि प्रदान करे। इस तरह जो स्त्री अपने पति के साथ भक्तियुक्त चित्त से इस सर्वश्रेष्ठ व्रत को सुनती तथा करती है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, और उसे सात जन्म तक सुख तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है। लेकिन जो स्त्री तृतीया तिथि को व्रत न कर अन्न भक्षण करती है, वह सात जन्म तक वन्ध्या रहती है, और उसको बार-बार विधवा होना पड़ता है। वह सदा दरिद्री, पुत्र-शोक से शोकाकुल, कर्कशा स्वभाव की लड़की सदा दुख भोगने वाली होती है। उपवास न करने वाली स्त्री अन्त में घोर नरक में जाती है।’

‘तीज के दिन अन्न खाने से शूकरी, फल खाने से बन्दरिया, पानी पीने से जोंक, दूध पीने से नागिन, मांसाहार करने से बाघिन, दही खाने से बिल्ली, मिठाई खाने से चींटी, और अन्य वस्तुओं को खाने से मक्षिका (मक्खी) के जन्म में आती है। उस दिन सोने से अजगरी और पति को ठगने से कुक्कुटी (मुर्गी) होती है।’

imageइस कथा का यह अन्तिम भाग पढ़ते-पढ़ते मेरा धैर्य जवाब दे गया। मन की आस्था दरकने लगी। घर-घर में निर्जला उपवास कर रही धर्मभीरु गृहिणियों को इस व्रत के लिए तैयार करने तथा दान-पुण्य की ओर प्रवृत्त करने के ऐसे हथकण्डे को देखकर पहले तो थोड़ी हँसी आयी, लेकिन जब इस बकवास को लिखने और बेचने वाले धूर्त और पाखण्डी लोगों की ऐसी करतूत से हमारे समाज को होने वाली हानि की ओर ध्यान गया तो मन रोष से भर गया।

कथा पढ़ने के बाद कल से लेकर आजतक इसके बारे में सोचता रहा। टीवी, इण्टरनेट और अखबारों में सुहागिन स्त्रियों के सजे-सँवरे सुन्दर और उत्साही चित्रों को देखता रहा, मेहदी रचे हाथों को सायास प्रदर्शित करती भाव-भंगिमा को निहारता रहा। उत्सव का ऐसा मनोरम माहौल है कि अपने मन में उमड़ते-घुमड़ते इस विचार को कोई आश्रय नहीं दे पा रहा हूँ। मन में यह खटक रहा है कि इस कठिन व्रत का जितनी पाबन्दी से ये स्त्रियाँ खुशी-खुशी पालन करती दीखती हैं उसके पीछे इस ‘भय तत्व’ का भी कुछ हाथ है क्या?

मैं हृदय से यह मानना चाहता हूँ कि यह सब पति-पत्नी के बीच एक नैसर्गिक प्रेम और विश्वास, पारस्परिक सहयोग व समर्थन तथा मन के भीतर निवास करने वाली श्रद्धा, भक्ति, पूजा और अर्चना की स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण ही हो रहा होगा; लेकिन मन है कि बार-बार उस किताब में लिखी बातों में उलझ जा रहा है जो घर-घर पहुँच कर उसी श्रद्धा से बाँची और सुनी गयी होंगी।

इस उलझन से निकलने में कोई मेरी मदद तो करे…!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ब्लॉग की किताब चल कर आयी…

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मुखपृष्ठ सत्यार्थमित्र... आज स्वतन्त्रता दिवस है, और आज मेरी पुस्तक प्रेस से छूटकर मेरे घर आ गयी है। हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने इसे छापकर निश्चित रूप से एक नयी शुरुआत की है। कहना न होगा कि आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ।

ब्लॉग की किताब छापना व्यावसायिक रूप से कितना उपयोगी है इसका पता शायद इस किताब पर पाठकों की प्रतिक्रिया से पता चलेगा। अलबत्ता जिस संस्था ने इसका प्रकाशन किया है, उसके पास अपने उत्पादों के विपणन का कोई नेटवर्क नहीं है। पुराने जमाने में देश भर के लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार यहाँ आते रहते थे और एकेडेमी के बिक्री काउण्टर पर उपलब्ध प्रकाशनों को खरीदते थे और अपने शहर जाकर इसके बारे में बताते थे। इसप्रकार यहाँ की धीर गम्भीर, व शोधपरक पुस्तकें धीरे-धीरे लम्बे समय में बिकती थीं। कुछ खरीद सरकारी पुस्तकालयों द्वारा की जाती थी।

पहली बार लोकप्रिय श्रेणी की एक ऐसी हल्की-फुल्की पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसे आमपाठक वर्ग को आकर्षित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। लेकिन आम पाठकों तक इसे पहुँचाने का सही माध्यम क्या है, इसकी जानकारी हमें नहीं है। एकेडेमी द्वारा भी इस दिशा में कोई स्पष्ट व सुविचारित नीति अपनाये जाने का उदाहरण नहीं मिला है।

अतः मैं यहाँ अपने शुभेच्छुओं, मित्रों और वरिष्ठ चिठ्ठाकारों से अनुरोध करता हूँ कि वे इस सद्यःप्रकाशित ब्लॉग की किताब के प्रचार-प्रसार और बिक्री के कारगर उपाय सुजाने का कष्ट करें।

सत्यार्थमित्र आवरणसत्यार्थमित्र पुस्तक का आवरण 

इस पुस्तक में मेरे ब्लॉग सत्यार्थमित्र पर प्रकाशित अप्रैल-२००८ से मार्च-२००९ तक की कुल १०१ पोस्टों में से चयनित ६५ पोस्टें संकलित की गयी हैं। प्रत्येक पोस्ट के अन्त में कुछ चुनिन्दा टिप्पणियों के अंश भी दिये गये हैं। ऐसी टिप्पणियों को स्थान दिया गया है जिनसे कोई नयी बात विषयवस्तु में जुड़ती हो।

पुस्तक के अन्त में दिए गये परिशिष्ट में हिन्दी ब्लॉगजगत के सर्वाधिक सक्रिय ४० चिठ्ठों का नाम-पता दिया गया है जिनका सक्रियता क्रमांक चिठ्ठाजगत द्वारा निर्धारित है।

कुल २८८ पृष्ठों के इस सजिल्द संस्करण का बिक्री मूल्य रु.१९५/- मात्र रखा गया है। इसपर एकेडेमी की नीति के अनुसार छूट की व्यवस्था भी है।

तो देर किस बात की… आइए प्रिण्ट माध्यम में हिन्दी ब्लॉगजगत का एक झरोखा खोलने के इस अनुष्ठान में अपना भरपूर योगदान करें। इसके बारे में उन्हें बतायें जो अभी अन्तर्जाल की सुविधा से नहीं जुड़ सके हैं। पुस्तक प्राप्त करने का तरीका हिन्दुस्तानी एकेडेमी के जाल पते पर उपलब्ध है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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