किताबों की खुसर-फुसर भाग-३

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पिछले साल मैने एक अत्यन्त प्रतिष्ठित संस्था के एक समृद्ध पुस्तकालय में जाकर वहाँ मौजूद किताबों की जो खुसर-फुसर सुनी थी, उसका वर्णन सत्यार्थमित्र के पन्नों पर दो किश्तों में किया था। लम्बे समय से लकड़ी और लोहे की आलमारियों में जस की तस पड़ी हुई किताबों की भाव भंगिमा देखकर और पीड़ा व उलाहना भरी बातें सुनकर मेरा मन इतना व्यथित हुआ था कि उसके बाद कभी अकेले में उन किताबों के पास जाने की मुझे हिम्मत नहीं हुई। अलबत्ता मैने उनकी कहानी यहाँ-वहाँ प्रकाशित और प्रसारित कराकर यह कोशिश की थी कि सुधी पाठकों और हिन्दी सेवियों के मन में उन बोलती किताबों के प्रति सम्वेदना जागृत हो, और लोग उनका हाल-चाल लेने अर्थात्‌ उनके पन्ने पलटने के लिए पुस्तकालय तक जा सकें।

मेरे इस प्रयास से उन पुस्तकों का कोई भला हो पाया हो या नहीं, लेकिन मुझे यह लाभ जरूर हुआ कि मुझमें कदाचित्‌ एक ऐसी इन्द्री विकसित हो गयी जो किताबों की बातचीत सुन सकती है और उनसे अपनी बात कह भी सकती है। मैने उस पुस्तकालय की सभी किताबों को एक बार पलटवाकर, झाड़-पोंछ कराकर और उनके निवास स्थल की मरम्मत व रंगाई-पुताई कराकर जो पुण्य लाभ अर्जित किया उसी के ब्याज से कदाचित्‌ यह संवाद शक्ति अर्जित हो गयी है। जैसे कोई आयतें उतरकर मेरे जेहन में नमूँदार हो गयी हों। हाल ही में मुझे अपनी इस छठी इन्द्री का अनुभव फिर से हुआ।

उस दिन इस संस्था के सभागार में एक साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित था। एक कहानी संग्रह का लोकार्पण और राष्ट्रीय स्तर के हिन्दी साहित्य के एक विद्वान द्वारा कहानी साहित्य पर एक उद्‌बोधन होना था। उस समय एक वक्तव्य राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना हुआ था जिसमें हिन्दी ब्लॉगजगत में कूड़ा प्रकाशित होने की बात कही गयी थी। इस साहित्यिक समागम में इस विषय पर भी कुछ सुनने की उम्मीद थी मुझे। आमन्त्रण पत्र पर छपे समय के हिसाब से मैं दो-चार मिनट पहले ही पहुँच गया था, ताकि सीट मिल जाय और कुछ छूट जाने की आशंका न रहे, लेकिन वहाँ पहुँचने पर बताया गया कि कार्यक्रम शुरू होने में अभी कुछ देर लगेगी, क्योंकि मुख्य अतिथि अभी नहीं पधारे हैं। कुछ अन्य गणमान्यों (VIPs) का भी रास्ते में होना बताया गया।

मैने अन्दर जाकर देखा तो सभागार बिल्कुल सूना था। बैनर, पोस्टर, माइक, स्पीकर, दरी, चादर, कुर्सी, मेज, पानी की बोतल, सरस्वती देवी का फोटो, हार, दीपक, तेल, बाती, मोमबत्ती, दियासलाई, कपूर, माला, बुके, स्मृति चिह्न इत्यादि सामग्रियों को कुछ कर्मचारी यथास्थान जमा रहे थे। आड़ी तिरछी कुर्सियों को सीधा किया जा रहा था लेकिन उन्हें पोछा नहीं जा रहा था। मैने अनुमान किया कि अगले आधे घण्टे में कुछ भी ‘मिस’ नहीं होने वाला है। मैं वहाँ से इत्मीनान से निकलकर पुस्तकालय की दिशा से खुद को बचाता हुआ संस्था के सचिव महोदय के कक्ष में जाकर बैठ गया।

वे फोन पर जमे हुए थे। सामने टेलीफोन नम्बरों की डायरी खुली हुई थी। एक के बाद एक अनेक लोगों का नम्बर मिलाते जा रहे थे और एक ही मज़मून का अनुरोध करते जा रहे थे, “ …आदरणीय फलाने जी, अभी चल दिए कि नहीं…! सब लोग आ चुके हैं… बस आपकी ही प्रतीक्षा है… जल्दी आ जाइए… आपके आते ही कार्यक्रम शुरू हो जाएगा… हाँ-हाँ, सब लोग हैं, आइए… नमस्कार।”

यह फोनवार्ता इतनी यन्त्रवत्‌ हो रही थी, और विषयवस्तु की इतनी पुनरावृत्ति हो रही थी कि अपनी मुस्कराहट छिपाने के लिए मुझे वहाँ से उठ जाना पड़ा। मैने ठीक सामने वाले कक्ष में कदम बढ़ा दिया, जहाँ इस संस्था द्वारा स्वयं प्रकाशित की गयी पुस्तकों का बिक्री काउण्टर है। इस कक्ष का वातावरण और नक्शा किसी दुकान सरीखा कतई नहीं है। इस कक्ष की चारो दीवारों से सटकर रखे हुए बुकशेल्व्स से एक बड़ा घेरा बनता है जिसके बीच में दो बड़ी-बड़ी मेंजें सटाकर रखी हुई हैं। इनके एक ओर दो कुर्सियाँ लगी थीं जिनमें से एक पर एक वृद्ध व्यक्ति बैठे थे, और कोहनी मेज पर टिकाए कुछ कागजों में खोये हुए थे। मैने अनुमान किया कि ये शायद ‘दरबारी जी’ होंगे जिन्हें सचिव जी ने अभी-अभी ‘हर्षबर्द्धन’ के साथ बुलाया था। मेज पर अनेक नयी ताजी आयी हुई किताबें पड़ी थीं जिनका शायद स्टॉक में अंकन किया जाना था।

चित्रों पर चटकाकर बड़ा कर सकते हैं

मैने चारो ओर एक उचटती सी दृष्टि डा्ली और दरबारी जी के सामने कुर्सी खींच कर बैठ गया।

“लगता है ज्यादा लोग नहीं आएंगे…!” मैने यूँ ही बात छेड़ी।

दरबारी जी शान्त थे। क्या जवाब देते? मौन रहकर सहमति जताना ठीक समझा होगा शायद। …तभी मुझे कुछ खनकती हुई हँसने की आवाजें सुनायी दीं। मैने चौक कर पीछे देखा। कोई नहीं था। …फिर पारदर्शी शीशे के पीछे से झाँकती लक-दक चमक बिखेरती हरि चरित्र नामक मोटी पुस्तक की हरकत दिखायी दी।

उसे शायद इस छोटी सी बात में कुछ ज्यादा ही रस मिल गया था। मैंने हैरत से उसकी ओर घूरा। जो बात निराशा पैदा करने वाली थी उसपर ऐसी हँसी? “आखिर बात क्या है…?” मैने उसे पुचकार कर पूछा।

वह एकाएक गम्भीर हो गयी। मैने उसके मन के भाव जानने की कोशिश की तो दार्शनिक अन्दाज में उसने जो बताया उसका सार यह था कि करीब सात सौ पृष्ठों की इस अनूठी पुस्तक की पान्डुलिपि को एक लम्बे समय से सहेजकर रखने वाले डॉ. शिवगोपाल मिश्र के सपनों को पूरा करने के लिए ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ ने इसे प्रकाशित तो कर दिया, लेकिन न तो आज लोकार्पित होने वाले कहानी संग्रह की तरह जन सामान्य तक पहुँचने का उसका भाग्य है, और न ही सरकारी खरीद के माध्यम से देश भर के पुस्तकालयों तक इसके जाने की कोई सम्भावना दिखती है। इसी से बेचारी कुछ विचलित सी हो गयी है।

श्रीमद्‌भागवत के दशम स्कन्ध में श्रीकृष्ण की समस्त लीलाओं का वर्णन हुआ है। संस्कृत में होने के कारण जब जन-सामान्य को इन लीलाओं को समझने में कठिनाई होने लगी, तो उनका भाषानुवाद होना स्वाभाविक था। सर्वप्रथम संवत्‌ १५८७ में रायबरेली (उ.प्र.) निवासी श्री लालचदास ने दशम्‌ स्कन्ध का अवधी में भाषानुवाद “हरि चरित्र’ के नाम से किया। इसकी विशेषता है कि उन्होंने ९० अध्यायों का अपनी बुद्धि के अनुसार दोहा-चौपाई शैली में अनुवाद प्रस्तुत कर दिया था। सन्त कवि तुलसीदास से ४४ वर्ष पूर्व अवधी में हरि-चरित्र की रचना सचमुच एक अनूठा प्रयास है। ‘सम्पूर्ण हरि चरित्र’ का अभी तक प्रकाशन नहीं हुआ था। अब कई प्राचीन हस्त-लिपियों के आधार पर इसका प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत किया गया है। लेकिन इसका भविष्य क्या है?

आजकल पुस्तकों की पाठक संख्या का जो हाल है,

और पुस्तक व्यवसाय में लगे व्यापारिक प्रतिष्ठानों द्वारा जिस प्रकार की एग्रेसिव कैम्पेन चलायी जाती है उसके मुकाबले एक शहर तक सिमटी आधुनिक प्रचार-प्रसार और विपनन के संसाधनों से विहीन सार्वजनिक संस्था के कन्धे पर सवार होकर यह मोटी-तगड़ी पुस्तक कितना रास्ता तय कर पाएगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। कदाचित्‌ इसी बोध से एक नैराश्य भाव इसकी खोखली हँसी में उभर आया था, क्योंकि कम श्रोताओं की बात सुनकर इसके ईर्ष्या भाव में जरूर कुछ कमी आयी होगी, और बरबस ये भाव निकल पड़े होंगे। (जारी…)

[अगली कड़ियों में हम कुछ और गोपनीय बातों का खुलासा करेंगे, जो मुझे उन चन्द घन्टों में उनके बीच बैठकर पता चलीं। शर्त यह है कि आप को इन बातों में कुछ रस मिल रहा हो, जिसकी गवाही आपकी टिप्पणियाँ देंगी।]

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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लोकतन्त्र के भस्मासुर

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“कृपया मेरे सच बोलने पर नाराज न होइए; कोई भी व्यक्ति जो इस नगर-राज्य में घट रही अनेक अन्यायपूर्ण व गैरकानूनी घटनाओं को रोकने की कोशिश करेगा; और आपका या किसी अन्य ‘भीड़’ का सच्चा विरोध करेगा वह बच नहीं पाएगा। कोई भी व्यक्ति जो न्याय के लिए वास्तविक संघर्ष करता है, उसे यदि जीने की थोड़ी भी इच्छा है तो उसे सार्वजनिक जीवन त्याग कर निजी ज़िन्दगी बितानी होगी।” (एपॉल्जी से)

image यह उद्‍गार ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के गुरू सुकरात ने ‘जूरी’ के सामने भरी अदालत में तब व्यक्त किए थे जब उनके विरुद्ध देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा था। कुछ ही समय में वह जूरी उन्हें मृत्युदण्ड सुनाने वाली थी। प्लेटो ने अपने गुरू की मौत का कारण जिस राज-व्यवस्था को ठहराया उसे ‘डेमोक्रेसी’ कहा जाता था, जिसमें भींड़ द्वारा नितान्त अविवेकपूर्ण निर्णय लिए जाते थे, और प्रायः अन्यायपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। वही डेमोक्रेसी आज दुनिया की सबसे लोकप्रिय, सर्वमान्य और सर्वाधिक व्यहृत शासन व्यवस्था हो गयी है। यह बात अलग है कि राजनीति विज्ञान के जानकार प्राचीन ग्रीक कालीन डेमोक्रेसी और आधुनिक ‘लोकतंत्र’ में जमीन-आसमान का अन्तर बताएंगे।

प्लेटो ने जिस नगर-राज्य को देखा था उसकी जनसंख्या इतनी छोटी होती थी कि राज्य के सभी नागरिक एक स्थान पर एकत्र होकर बहुमत से अपना शासक चुन लेते थे। भीड़ का एक बड़ा हिस्सा जिसे पसन्द करता था वही राजा होता था और उसके फैसले सभी नागरिकों पर बाध्यकारी होते थे। सिद्धान्त रूप में आज भी लोकतंत्र का मतलब यही है- जनता की सरकार, जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों की बहुमत आधारित सरकार।

लेकिन प्लेटो ने इस बहुमत की व्यवस्था का जो विश्लेषण किया, वह इसकी खामियों को उजागर करने वाला है, और कदाचित्‌ सच्चाई के करीब भी है। उन्होंने राज्य की तुलना एक व्यक्ति से की थी, और बताया था कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के भीतर इन्द्रियबोध (sensation), चित्तवृत्ति (emotion), और बुद्धि (intelligence) के बीच उचित तालमेल से ही उसका सन्तुलित और स्वस्थ जीवन सम्भव है, उसी प्रकार राज्य के विभिन्न अवयवों के आपसी सामन्जस्य से ही न्यायपूर्ण राज-व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। यदि बुद्धि-विवेक के ऊपर मन व शरीर में पलने वाले काम, क्रोध, मद व लोभ जैसे विकार हावी हो जाते हैं, तो व्यक्तित्व दोषयुक्त और अन्या्यपूर्ण हो जाता है। शरीर के ऊपर मन और मन के ऊपर मस्तिष्क का नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। यदि नियन्त्रण की यह दिशा उलट-पु्लट जाय तो व्यक्ति नष्ट होने लगता है। पतन अवश्यम्भावी हो जाता है। यही स्थिति उस राज्य की भी होती है, जहाँ विवेक पर उन्माद हावी हो जाता है।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सभी व्यक्तियों को एक इकाई के रूप में बराबर माना जाता है। भले ही उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता तथा सामाजिक पृष्ठभूमि में भारी अन्तर हो। यह व्यवस्था इसी सिद्धान्त पर टिकी है कि राज्य/देश की सरकार चुनने में प्रत्येक व्यक्ति के मत का मान बराबर है। कोई किसी से कम या अधिक महत्व नहीं रखता। कुल मतदाताओं में से बहुमत जिसके पक्ष में हो, वही सरकार बनाता है। इस सरकार द्वारा जो भी निर्णय लिए जाते हैं वह उन अल्पमत वाले नागरिकों पर भी प्रभावी होता है जिनका मत इस सरकार के विरुद्ध रहा है।

सिद्धान्त रूप में इस व्यवस्था में कोई कमी नहीं नज़र आती; लेकिन व्यवहार में बहुत कुछ बदला हुआ नजर आता है। प्लेटो ने इन बदलावों पर कुछ प्रकाश डाला था। बहुमत की पसन्द कौन होता है? लोकप्रियता का पैमाना क्या है? व्यक्ति अपना नेता किसे चुनता है? जिसे देश की सम्पूर्ण जनता का ख़्याल रखना है; आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, सामरिक, राजनयिक, वाणिज्यिक आदि विषयों से सम्बन्धित लोकनीति बनानी है, उसका चुनाव करते समय जनता इन विषयों में उसकी प्रवीणता देखने के बजाय उसकी जाति, उसका धर्म व रंग देखती है; उसकी वक्तृता पर मोहित हो जाती है, किसी दूसरे क्षेत्र में उसके कौशल से प्रभावित हो लेती है; और अपना नेता चुन लेती है।

अच्छी भाषण कला में माहिर एक नेता किसी स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दे पर आम जनता का मत एक डॉक्टर की अपेक्षा अधिक आसानी से बदल सकता है। वह कमजोर और निरीह नागरिकों  को भी शत्रु देश पर हमले के लिए तैयार कर सकता है, जो एक आर्मी-जनरल नहीं कर सकता। जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रभावशाली भाषण के माध्यम से बड़े-बड़े जनसमूहों को सम्मोहित कर बेवक़ूफ बनाने और उनके अन्ध-समर्थन से अत्यन्त शक्तिशाली बन जाने के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है।

फ्रेडरिक नीत्शे कहते थे कि उन्माद, पागलपन, मूर्खता या विक्षिप्तता के लक्षण किसी व्यक्ति के भीतर किंचित्‌ ही पाये जाते हैं; लेकिन एक समूह, दल, राष्ट्र या किसी ऐतिहासिक कालखण्ड में ये लक्षण एक अनिवार्य नियम जैसे मिलते हैं। एक भीड़ या समूह का हिस्सा बन जाने पर व्यक्ति के सोचने समझने का ढंग पूरी तरह बदल जाता है। भीड़ में उसकी मानसिकता भेंड़ जैसी हो जाती है। विवेक भ्रष्ट हो जाता है। इसी भीड़ द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जब सरकार चलाते हैं तो सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ता है।

भारतवर्ष में लोकतंत्र का जो मॉडल चलाया जा रहा है, उसमें भी इस उत्कृष्ट सिद्धान्त का व्यावहारिक रूप किसी धोखे से कम नहीं है। यहाँ का समाज भी जाति, धर्म, कुल, गोत्र, क्षेत्र, रंग, रूप, अमीर, गरीब, अगड़े, पिछड़े, दलित, सवर्ण, निर्बल, सबल, शिक्षित, अशिक्षित, शहरी, ग्रामीण, उच्च, मध्यम, निम्न, काले, गोरे, स्त्री, पुरुष, आदि के पैमानों पर इतना खण्ड-खण्ड विभाजित है; और ये पैमाने हमारी लोक संस्कृति में इतनी गहरी पैठ बना चुके हैं, कि किसी भी मुद्दे पर आम सहमति या सर्वसहमति नहीं बनायी जा सकती। राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना से हम कोसों दूर हैं। ऐसे में बहुमत का अर्थ मात्र दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों तक सिमट जाता है। शेष मत विखण्डित होकर इस आँकड़े से पीछे छूट जाते हैं।

कोई भी राजनेता यदि इस गणित को ठीक से समझ लेता है तो वह उन्हीं दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों को अपने पक्ष में सुनिश्चित हुआ जानकर सन्तुष्ट हो लेता है, और यह सन्देश भी देता है कि उनके हितों की रक्षा के लिए वह कुछ भी कर सकता है। सारे नियम-कायदे ताख़ अपर रख सकता है; दूसरे समूहों को सार्वजनिक रूप से गाली दे सकता है; साम्प्रदायिक हिंसा करा सकता है; मार-पीट, झगड़ा-लड़ाई, अभद्रता और गुण्डागर्दी से यदि उनका स्वार्थ सधता है तो उसका सहारा लेने में तनिक भी संकोच नहीं करता है। विरोधी मतवाले वर्ग के विरुद्ध खुलेआम अत्याचार और दुर्व्यवहार करने से यदि उसके पीछे खड़ी उन्मादी भीड़ तालिया पीटती है तो इस तथाकथित जनप्रतिनिधि को वह सब करने में कोई गुरेज़ नहीं है।

ऐसी हालत में लोकतन्त्र के चार उपहार- स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व व न्याय एक बड़े वर्ग के हाथ से छीन लिए जा रहे हैं, और इन्हें लोकतन्त्र के भस्मासुर अपनी चेरी बनाकर रखने में सफल हो रहे हैं। आजकल अखबारों की सुर्खिया ऐसे समाचारों से भरी पड़ी हैं जहाँ नेता जी अपनी बात मनवाने के लिए प्रशासन के अधिकारियों को मारने-पीटने से लेकर उनकी हत्या कर देने से भी गु़रेज नहीं करते। राजनैतिक पार्टियों द्वारा आपसी रंजिश में एक दूसरे पर राजनैतिक हमले करना तो अब पुरानी बात हो गयी है। अब तो सीधे आमने-सामने दो-दो हाथ कर लेने और विरोधी के जान-माल को क्षति पहुँचाने का काम भी धड़ल्ले से किया जा रहा है।

क्या हम प्लेटो के मूल्यांकन को आधुनिक सन्दर्भ में भी सही होता नहीं पा रहे हैं? 

बच के रहना रे बाबा… जाने कौन कैसा मिल जाय- भाग-२

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(इस पोस्ट को पढ़ने से पहले इसका पूर्वार्द्ध जानना आवश्यक है। यदि आप पिछली पोस्ट न पढ़ पाये हों तो यहाँ चटका लगाएं…।)

अब आगे… 

failed marriageजुलाई की ऊमस भरी गर्मी…। मैं अपने ऑफिस में बैठा कूलर की घर्र-घर्र के बीच चिपचिपे पसीने पर कुढ़ता हुआ सरकारी फाइलों और देयकों (bills) आदि का काम निपटा रहा था। बाहर का मौसम तेज धूप और रुक-रुक कर पड़ते बारिश के छींटो से ऐसा खराब बन गया था कि बहुत मजबूरी में ही बाहर निकला जा सकता था। मेरे कमरे में कोई दूसरा न था।

तभी एक स्मार्ट सा युवक अन्दर आया और मेरी अनुमति लेकर कुर्सी पर बैठ गया। उसका चेहरा कुछ जाना पहचाना लगा। एक दिन पहले ही इस चेहरे से परिचय हुआ था जब लखनऊ से कुछ प्रशिक्षु अधिकारियों का एक दल हमारे कोषागार में भ्रमण के लिए आया था। करीब पन्द्रह प्रशिक्षणार्थियों ने एक-एक कर अपना नाम बताया था और अपना संक्षिप्त परिचय दिया था। सुन्दर काया और किसी जिमखाने से निकली सुडौल देहयष्टि वाला यह नौजवान भी उस टी्म का एक सदस्य था। लेकिन तब उस परिचय में सबका नाम तत्काल याद कर पाना सम्भव नहीं हो पाया था।

“तुम तो कल आए थे…? सॉरी यार, मैं तुम्हारा नाम याद नहीं रख पाया…” मैने संकोच से पूछा।

“जी सर, मैं कल आया था। आपसे अकेले मिलने की इच्छा थी इसलिए आज चला आया। …मेरा नाम आप जानते होंगे। …मैं अमुक हूँ। …आज फेमिली कोर्ट में सुनवायी थी, लेकिन वो लोग फिर नहीं आए। केवल डिले करने की टैक्टिक्स अपना रहे हैं।”

“ओफ़्फ़ो, यार मैं तो तुम्हारे बारे में सुनकर बड़ा रुष्ट था। आखिर यह सब करने की क्या जरूरत थी? अच्छी भली लड़की का जीवन नर्क बना दिया।” मैं तपाक से बोल पड़ा।

उसके चेहरे पर एक बेचैनी का भाव उतर आया था, “सर, लगता है उसने यहाँ आकर भी अपनी कलाकारी का जादू चला दिया है…। सच्चाई यह है सर, कि जिन्दगी मेरी तबाह हुई है। उसने जो कहानी गढ़ी है वह उसके वकील की बनायी हुई है।”

मैंने अपने हाथ का काम बन्द कर दिया और उसकी बात ध्यान से सुनने लगा।

“सर, जब इन्स्टीट्यूट में यहाँ से फोन गया था तो मैं वहीं था। बाद में मुझे पता चला कि आपको भी इस मामले में गुमराह किया गया है। …उसने जो आरोप लगाया है वह पूरी तरह बेबुनियाद है।”

“भाई मेरे, इस आरोप को सही सिद्ध करने के लिए तो शायद उसने मेडिकल एक्ज़ामिनेशन की चुनौती दी है…।”

“सर, मैने तो एफिडेविट देकर इसकी सहमति दे दी है। लेकिन इक्ज़ामिनेशन उसका भी होना चाहिए। शादी के बाद हम साथ-साथ रहे हैं। वह अपनी सेक्सुअल एक्टिविटी को कैसे एक्सप्लेन करेगी…?”

“ऐसी परसनल बातें यहाँ करना ठीक नहीं है… लेकिन वो बता रही थी कि आप उसके साथ किसी डॉक्टर से भी मिले थे, फर्जी नाम से…”

“नहीं सर, मेरी जिन्दगी का सुख चैन छिन गया है। रात-दिन की घुटन से परेशान हूँ। सच्चाई कुछ और है और मेरे ऊपर वाहियात आरोप लगाया जा रहा है। …आप ही बताइए, मेरे घर में ही तीन-चार डॉक्टर हैं। मुझे कोई दिक्कत होती तो मैं उनसे परामर्श नहीं लेता?”

मैं चुपचाप सुनता रहा, इतनी अन्तरंग बातें कुरेदने की मंशा ही नहीं थी। लेकिन उसे अपने साथ हुए हादसे को बयान करना जरूरी लग रहा था। इसलिए मुझे भी उत्सुकता हो चली…

सर, यह मामला ‘थर्ड-परसन’ का है। लड़की का ऑब्सेसन एक दूसरे लड़के से है जिससे वह शादी नहीं कर सकती क्योंकि वह उसके ‘ब्लड रिलेशन’ में है। …विदा होकर जब यह मेरे साथ मेरे घर गयी तो अगले दिन ही ये जनाब मेरे घर पहुँच गये। …सीधा मेरे बेडरूम में जाकर पसर गये और फिर दिनभर जमे रहे। मेरे ही शहर में उसकी बहन का घर भी था। लेकिन सारा समय मेरे घर में, मेरी नयी नवेली पत्नी के साथ गुजारता रहा…

नयी-नयी शादी, ससुराल से आया हुआ चचेरा साला, संकोच में कुछ कहते नहीं बनता…। एक दिन बीता, दूसरा दिन गया, तीसरा दिन भी ढल गया…। रोज की वही दिनचर्या…. सुबह दोनो का एक साथ ब्रश करना, नाश्ता करना, आगे-पीछे नहाना-धोना, लन्च, डिनर सब कुछ साथ में; और देर रात हो जाने पर… “अब इतनी रात को कहाँ जाओगे, ताऊजी को फोन करदो, यहीं लेट जाओ”

“मैं बगल का कमरा ठीक करा देता हूँ? वहाँ आराम से सो जाओ…” मैने कहा था।

“नहीं-नहीं, किसी को क्यों डिस्टर्ब करेंगे। यहीं सोफ़े पर लेट जाता हूँ। …या फर्श पर ही गद्दा डाल लिया जाय… ” उसने ‘बेतक़ल्लु्फी’ दिखायी।

“हाँ-हाँ ठीक तो है, यहीं ठीक है।” मेरी पत्नी ने खुशी से ‘इजाजत’ दे दी थी।

यह सब करने में उन दोनो को कोई शर्म या संकोच नहीं था। भाई-बहन का रिश्ता  मेरे सामने ही अन्तरंग दोस्ताना बना रहता, एक दूसरे के बिना उनका मन ही नहीं लगता। अपने ही बेडरूम में अपनी ब्याहता पत्नी के साथ एकान्त क्षण पाने के लिए मैं तरसता रहता। 

धीरे-धीरे मेरा माथा ठनका। मैने उन्हें चेक करना शुरू किया और उन्होंने मुझे टीज़ करना…। मैने उस लड़के के घर वालों से बात की। उन्होंने इस ‘इल्लिसिट रिलेशन’ की बात स्वीकार की लेकिन इसे रोक पाने में अपने को असहाय प्रदर्शित किया। बोले, “हमने लड़की की शादी में इसी उम्मीद से सहयोग किया था कि शायद इसके बाद हमारा लड़का हमारे हाथ में आ जाय। …लेकिन अफ़सोस है कि वह हमारे हाथ से निकल चुका है।”

फिर मैंने अपने ससुर और साले से कहा। लेकिन उनकी बात से यही लगा कि सबकुछ जानते हुए भी उन्होंने यह शादी बड़े जतन से इस आशा में कर दी थी कि एक बार पति के घर चले जाने के बाद मायके की कहानी समाप्त हो जाएगी और लोक-लाज बची रह जाएगी। …दुर्भाग्य का यह ठीकरा मेरे ही सिर फूटना लिखा था। मुझे पिछले दो साल में जो ज़लालत और मानसिक कठिनाई झेलनी पड़ी है उसे बयान नहीं कर सकता।

“आपने पता चलने के बाद उस लड़के को घर से बाहर क्यों नहीं कर दिया?” मैंने अपनी व्यग्रता को छिपाते हुए पूछा।

उसने मुझे इसका मौका ही कहाँ दिया…? शुरू-शुरू में तो मैं संकोच कर रहा था। इतने बड़े धोखे की मुझे कल्पना भी नहीं थी। लेकिन जब उनकी गतिविधियाँ पूरी तरह स्पष्ट हो गयीं और आठवें-नौवें दिन जब उन्हें लगा कि असलियत जाहिर हो चुकी है तब वह उस लड़के के साथ अपने सारे जेवर और कीमती सामान गाड़ी में लेकर मायके चली आयी…।

“आजकल जेवर वगैरह तो लॉकर में रख दिए जाते हैं? आपने सबकुछ घर में ही रख छोड़ा था?”

नहीं सर, मैने उससे कीमती जेवर वगैरह पास के ही बैंक लॉकर में रखने को जब भी कहा था तो वह कोई न कोई बहाना बनाकर टाल जाती। अब मुझे लगता है कि सबकुछ योजनाबद्ध था। यहाँ तक की नौकरी मिलने के बाद मेरे पापा ने मेरे नाम से जो गाड़ी बुक करायी थी उसे भी इन लोगों ने कैन्सिल कराकर इसके नाम से रजिस्ट्रेशन कराया जबकि बुकिंग एमाउण्ट का रिफण्ड लेकर हमने इनके खाते में ट्रान्सफर किया था। सारे बैंक रिकॉर्ड मौजूद हैं।

“अभी क्या स्थिति है?”

अब मैं तलाक का मुकदमा लड़ रहा हूँ। फेमिली कोर्ट सुनवायी कर रही है। नियमित हाजिर होकर जल्द से जल्द निपटारा कराना चाहता हूँ ताकि दूसरी शादी कर सकूँ। उसे अब शादी करनी नहीं है इसलिए उन्के द्वारा किसी न किसी बहाने से मामले को लटकाए रखा जा रहा है। ऐसे मामलों की सुनवायी शुरू होने से पहले पत्नी के निर्वाह की धनराशि कोर्ट द्वारा तय की जाती है जो उसके पति को मुकदमें के अन्तिम निस्तारण होने तक प्रति माह अदा करनी पड़ती है। अभी कोर्ट ने मेरे वेतन को ध्यान में रखते हुए ढाई हजार तय किया है। वे लोग इसे बढ़वाना चाहते हैं। इसी लिए ‘पे-स्लिप’ की खोज कर रहे हैं…। अपने वेतन की सूचना तो मैने एफीडेविट पर दी है लेकिन उन्हें विश्वास नहीं है।

पहले उसने मेडिकल जाँच की माँग उठायी। मैने कोर्ट में इसके लिए सहमति दे दी। साथ में यह भी अनुरोध कर दिया कि उसकी भी जाँच होनी चाहिए। यदि उसके अनुसार मैं नपुंसक हूँ तो उसकी वर्जिनिटी भी सिद्ध होनी चाहिए। यदि उसमें नॉर्मल सेक्सुअल एक्टिविटी पायी जाती है तो उसका आधार भी उसे स्पष्ट करना पड़ेगा। इसके बाद उसका दाँव उल्टा पड़ गया है। अब ‘सबकुछ भूलकर साथ रहने को तैयार’ रहने का सन्देश आ रहा है। लेकिन सर, मैं इस नर्क से निकलना चाहता हूँ…।

वह अपने पिता के घर में ही रह रही है। प्रायः उस लड़के के साथ सिविल लाइन्स, मैक्डॉवेल्स, हॉट स्टफ या दूसरे स्पॉट्स पर घूमती और मौज उठाती दिख जाती है। लड़का भी एक सरकारी महकमें में मालदार पोस्ट पर काम करता है।

“उसके पिताजी यह सब करने की उसे अनुमति क्यों देते हैं? उन्हें यह सब कैसे देखा जाता है?”

असल में वह पूरा परिवार ही व्यभिचार और अनैतिक सम्बन्धों के मकड़जाल में उलझा हुआ है। ससुर जी का व्यक्तिगत जीवन भी मौज-मस्ती से भरा रहा है। उनके बड़े भाई का लड़का उनकी बेटी के साथ जिस अन्तरंगता से रहते हुए उनकी छाती पर मूँग दल रहा है उसे अलग करने का नैतिक बल उनके पास नहीं है। सुरा और सुन्दरी उनकी पुरानी कमजोरी रही है। यह सब उनकी लड़की बखूबी जानती है और यही सब देखते हुए बड़ी हुई है। उस लड़के के माँ-बाप ने स्वयं अपनी व्यथा मुझसे बतायी है। उस परिवार में केवल मेरे सगे साले की पत्नी है जो मेरे साथ हुए अन्याय की बात उठाती है। बाकी पूरे कुँए में भाँग मिली हुई है…।

“मुझे जहाँ तक याद है उन लोगों ने दहेज उत्पीड़न का मुकदमा भी कर रखा है। सामान वापस देने और क्षतिपूर्ति के लिए यदि आप तैयार हो जाँय तो क्या निपटारा हो सकता है?” मैने पूछा।

सर, मैं तो कबसे तैयार बैठा हूँ। लेकिन वे लोग बहुत लालची है। सुरसा की तरह उनका मुँह फैलता जा रहा है। मेरा प्रस्ताव है कि जिन लोगों ने यह शादी तय करायी थी, वे दोनो पक्ष के मध्यस्थ एक साथ बैठ जाँय, जो भी दहेज का सामान और रुपया पैसा मिला था उसकी सही-सही सूची बना दें। मैं उससे कुछ ज्यादा ही देकर इस कलंक से छुट्टी पाना चाहता हूँ।

दूसरी शादी के लिए भी उम्र निकल जाएगी तो मैं कहीं का नहीं रहूँगा। उसे तो अब शादी की जरूरत ही नहीं है। वह चाहती है कि मैं उसे अपना आधा वेतन देता रहूँ, पति का नाम बना रहे और वह मायके में रह कर अपने साथी के साथ लिव-इन रिश्ता बनाये रखे। मुकदमा यूँ ही अनन्त काल तक चलता रहे…। (इति)

उसने इस दौरान जाने कितनी कानून की किताबें पढ़ ली हैं कि उसकी हर बात में आइपीसी, सीआरपीसी और सीपीसी की अनेक धाराएं उद्धरित होती रहती हैं। कानूनी पेंचों को वह समझने लगा है और सभी बातों में सतर्कता झलकती है। पीसीएस की तैयारी करके अपने दम पर नौकरी पाने वाले इस युवक की प्रतिभा और अनुशासन पर कोई सन्देह तो वैसे भी नहीं है लेकिन वह ऐसे सन्देह के घेरे में तड़प रहा है जिससे पार पाना मुश्किल जान पड़ता है…।

इतना सब सुनने के बाद मेरा दिमाग शून्य हो गया…। मैं निःशब्द होकर बैठा रहा। यह तय करना मुश्किल है कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ। आप कुछ निष्कर्ष निकाल पाएं तो जरूर बताएं।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सच्चाई की परख सबमें है… पर करते क्यों नहीं?

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यह दुनिया भी ग़जब निराली है। इसमें रहने वाले लोग अपनी सामाजिक प्रास्थिति में अपने व्यवहार को किसी न किसी आचार संहिता से निर्देशित करते हैं। सबका अपना वैल्यू सिस्टम है जो व्यक्ति के अनुवांशिक लक्षण, पारिवारिक पृष्ठभूमि, शिक्षा के स्तर, सामाजिक स्वरूप और इतिहास बोध से निर्धारित होता है। लेकिन ऐसा देखने में आया है कि प्रायः सबने इस आचरण नियमावली के दो संस्करण बना रखे हैं। एक अपने लिए और दूसरा दूसरों के लिए। एक ही सिचुएशन में जैसा व्यवहार वे स्वयं करते हैं वहीं दूसरों से बिल्कुल भिन्न व्यवहार की अपेक्षा करते हैं।

imageकुछ ऐसा व्यवहार इन बातों में झलकता है, “मेरे घर आओगे तो क्या लाओगे?”“मैं तुम्हारे घर आऊंगा तो क्या दोगे?”

हमें अपने आस-पास ऐसे लोग सहज ही मिल जाएंगे जो किसी भी मुद्दे पर अपनी सिनिकल राय रखने से बाज नहीं आते। मुहल्ले का कोई लड़का परीक्षा में फेल हो गया तो तुरन्त उसकी ‘आवारगी’ के किस्से सुना डालेंगे, किसी लड़की को बाइक चलाते या ब्वॉयफ्रेण्ड के साथ देख लिए तो उसकी बदचलनी का आँखों देखा हाल बयान कर देंगे। इतना ही नहीं, यदि किसी ने यूनिवर्सिटी भी टॉप कर लिया तो कहेंगे प्रोफ़ेसर से अच्छी सेटिंग हुई होगी। लोक सेवा आयोग से चयनित भी हो गया तो इण्टरव्यू में जुगाड़ और घूसखोरी तक की रिपोर्ट पेश कर देंगे।

लेकिन यही सब यदि उनके परिवार के बच्चों ने किया हो तो फेल होने का कारण ऐन वक्त पर तबियत खराब होना या ‘हार्ड-लक’ ही होगा, लड़का फिर भी बड़ा मेहनती और जहीन ही कहा जाएगा, लड़की पढ़ी-लिखी, आधुनिक और प्रगतिशील कही जाएगी, टॉपर लड़के की उत्कृष्ट छवि तो लोगों को बुला-बुलाकर बतायी ही जाएगी, कमीशन भी उच्च आदर्शों का प्रतिरूप हो जाएगा जहाँ प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों को पहचानने की अद्‌भुत प्रणाली विकसित हो गयी हो।

image मनुष्य की इस दोरुखी प्रवृत्ति का कारण समझने की कोशिश करता हूँ तो सिर्फ़ इतना जान पाता हूँ कि यथार्थ और आदर्श का अन्तर अत्यन्त स्वाभाविक है और इसे बदला नहीं जा सकता। अच्छी मूल्यपरक नैतिक शिक्षा और सत्‍संगति से इस अन्तर में थोड़ी कमी लाई जा सकती है।

मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि किसी कार्य की सफलता या असफलता के पीछे जो वाह्य और आन्तरिक कारक होते हैं उनकी व्याख्या व्यक्ति अपनी सुविधानुसार ही करता है। अपनी सफलता का श्रेय वह अपने आन्तरिक कारकों को देता है और असफलता का ठीकरा वाह्य कारकों पर फोड़ता है। लेकिन दूसरे व्यक्ति की समीक्षा के समय यह पैमाना उलट जाता है; अर्थात्‌ दूसरों की सफलता उनके वाह्य कारकों की वजह से और असफलता उनके आन्तरिक कारणों से मिलती हुई बतायी जाती है। इस मनोवृत्ति का सटीक उदाहरण समाचार चैनेलों के स्टूडियो में चुनाव परिणामों पर पार्टी नेताओं की बहस सुनते समय मिलती है।

लेकिन यह मनोवृत्ति चाहे जितनी स्वाभाविक और प्राकृतिक हो, इसे अच्छा नहीं कहा जा सकता। यह सोच एक शिष्ट और सभ्य समाज के सदस्य के रूप में हमें सच्चा नहीं बनाती। यह सत्यनिष्ठा और शुचिता के विपरीत आचरण ही माना जाएगा। जिनका मन सच्चा और आत्मा पवित्र होगी वे ऐसी विचित्र सोच को अपने विचार और व्यवहार में स्थान नहीं देंगे। हमारे वैदिक ऋषि, सन्त महात्मा, और सार्वकालिक महापुरुष इसीलिए महान कहलाए क्योंकि उन्होंने अपने व्यवहार में इस प्रवृत्ति को पनपने नहीं दिया। उन्होंने केवल उसी एक आचार संहिता का पालन किया जिसकी अपेक्षा उन्होंने दूसरों से भी की। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने सिद्धान्तों के साथ समझौता नहीं किया।

अस्तु, हमें सोचना चाहिए कि अपने व्यवहार को सच्चाई के करीब रखने के लिए और अपने विचार में शुचिता लाने के लिए हमें दुनिया के प्रति क्या धारणा बनानी चाहिए। अपनी सामाजिक भूमिका के लिए क्या पॉलिसी बनानी चाहिए।

केन्ट एम. कीथ ने इसकी जाँच के लिए एक दिग्दर्शक यन्त्र बनाया है। मेरा मानना है कि यदि उनके जाँच यन्त्र से हम जितना ही तादात्म्य बिठा सकें हम सच्चाई और सत्यनिष्ठा के उतने ही नजदीक पहुँचते जाएंगे। आइए देखें क्या है यह परीक्षण:

INTEGRITY TEST:

  • लोगों को मदद की जरूरत होती तो है लेकिन यदि आप मदद करने जाय तो वे आपके प्रति बुरा बर्ताव कर सकते हैं। फिर भी आप मदद करते रहें।
  • यदि आप किसी की भलाई करने जाते हैं तो लोग इसमें आपकी स्वार्थपरता का आरोप लगा सकते हैं। फिर भी आप भलाई करते रहें।
  • आप आज जो नेक काम कर रहे हैं वह कल भुला दिया जाएगा। फिर भी आप नेकी करते रहें।
  • यदि आप सफलता अर्जित करते हैं तो आपको नकली दोस्त और असली दुश्मन मिलते रहेंगे। फिर भी सफलता प्राप्त करते रहें।
  • ईमानदारी और स्पष्टवादिता आपको संकट में डाल देती है। फिर भी आप ईमानदार और स्पष्टवादी बने रहें।
  • आप यदि दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ अर्पित कर दें तो भी आपको घोर निराशा  हाथ लग सकती है। फिर भी अपना सर्वश्रेष्ठ अर्पित करते रहें।

इस जाँच यन्त्र का मूल अंग्रेजी पाठ यदि पढ़ना चाहें तो यहाँ मिल जाएगा।

मुझे लगता है कि हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए यह बताने वाली एक आवाज हमारे भीतर ही उठती रहती है। लेकिन पता नहीं क्यों हम इस आवाज को अनसुना करते रहते है। प्रकृति ने हमें सच्चाई की परख करने के लिए एक आन्तरिक दृ्ष्टि दे रखी है लेकिन हम इस दृष्टि का प्रयोग नहीं कर पाते। काम, क्रोध, मद और लोभ हमारे व्यवहार को दिशा देने में अधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। ये चारो हमारे विवेक को भ्रष्ट कर देते हैं।

अरे, यह पोस्ट तो घँणी उपदेशात्मक होती जा रही है। अब पटाक्षेप करता हूँ। यहाँ तक पढ़ने वालों का धन्यवाद।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-४ डॉ.कविता वाचक्नवी (हिन्दी कम्प्यूटिंग) प्रथम भाग

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“हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया” के बारे में जो कार्यशाला इलाहाबाद में हुई उसकी तस्वीरें, विषय-प्रवर्तन, अखबारी चर्चा, अनूप शुक्ल जी की कथा-वार्ता और डॉ. अरविन्द मिश्रा जी की साइंस ब्लॉगिंग सम्बन्धी वार्ता के बारे में आप पिछली कड़ियों में देख और पढ़ चुके है। अब आगे…

आशीर्वाद मुख्य अतिथि का... इमरान ने बड़े आदर पूर्वक यह बताया कि ब्लॉगिंग की चर्चा को एक ब्रेक देना पड़ेगा क्योंकि हमारे मुख्य अतिथि महोदय को किसी जरूरी कार्य से जाना पड़ रहा है। इसलिए उनके हिस्से की औपचारिकता बीच में ही पूरी करनी पड़ेगी। प्रदेश के पुलिस मुख्यालय में अपर पुलिस महानिदेशक के पद की जिम्मेदारियाँ निभाने वाले एस.पी.श्रीवास्तव जी ने इस कार्यक्रम से इतना भावुक जुड़ाव महसूस किया कि उन्होंने अपनी घोर व्यस्तता के बावजूद उपस्थित श्रोताओं को करीब बीस मिनट तक आशीर्वाद दिया।

मुख्य अतिथि जी बताने लगे कि ब्लैक बेरी पर अंग्रेजी में बहुत दिनों से ब्लॉग लिखते रहे हैं।

“आज का यह कार्यक्रम देखकर मुझे यह ज्ञान हुआ है कि हिन्दी में भी ब्लॉगिंग की जा सकती है। मैं आज ही अपना हिदी ब्लॉग बना डालूंगा और नियमित रूप से लिखता रहूंगा।”

स्मृति चिह्नउन्होंने कम्प्यूटर और इन्टरनेट के बारे में अनेक गूढ़ बातें बतायी। मुख्य अतिथि महोदय कविता के क्षेत्र में भी बड़ा दखल रखते हैं, लेकिन समय ने इसकी इजाजत नहीं दी। उन्होंने वार्ता समाप्त करने के बाद सभी अन्य वक्ताओं को स्मृति चिह्न प्रदान किए जिसे इमरान ने बड़ी मेहनत और शौक से तैयार कराया था।

मुख्य अतिथि जी को आदर पूर्वक विदा करने के बाद इमरान ने अगली वार्ताकार डॉ. कविता वाचक्नवी जी को आमन्त्रित किया। वे यह बताना नहीं भूले कि आप स्त्री विमर्श की विशेषज्ञ हैं। आपका इन्टरनेट पर बहुत बड़ा पाठक वर्ग है। "हिन्दी भारत", वागर्थ, पीढियाँ, स्वर – चित्रदीर्घा, ब्लॉगरबस्ती (BLOGGER BUSTI), "बालसभा", हिन्दुस्तानी एकेडेमी
चिट्ठा चर्चा, Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श), *रामायण- संदर्शन
आदि अनेक ब्लॉग हैं जिनमें आप अकेले या सामूहिक रूप से लेखन का कार्य करती है।

कार्यशाला में यद्यपि ब्लॉगिंग की ही चर्चा की जानी थी और किसी सामाजिक – राजनैतिक मुद्दे पर भटकने की इजाजत नहीं थी लेकिन इमरान उनसे स्त्री विमर्श पर कुछ सुनने का लोभ संवरण नहीं कर सके। उन्हें यह छूट प्रदान कर दिया कि वे अपनी पसन्द से जो बोलना चाहें बोल सकती हैं। लेकिन कविता जी ने कार्यशाला के उद्देश्यों को महत्व देते हुए अन्तर्जाल पर हिन्दी के अनुप्रयोग और हिन्दी टूल्स के बारे में ही चर्चा करना उचित समझा।

कविता वाचक्नवी कविता जी ने अपनी बात की शुरुआत इस ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए किया कि भारत में हिन्दी का बहुत बड़ा प्रयोक्ता समाज है। (वैसे तो बाहर भी कम नहीं है।) हिन्दी का प्रसार हो रहा है। लेकिन कम्प्यूटर में अभी हिन्दी के अनुप्रयोगों में बहुत कुछ किया जाना शेष है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि देवनागरी लिपि में लिखी हुई संस्कृत भाषा कम्प्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त भाषा है। लेकिन अंग्रेजी का प्रयोग अभी भी इण्टरनेट पर इतना छाया हुआ है कि हम अंग्रेजी में काम करने के आदी हो गये हैं। यदि हमारा ब्राउजर अंग्रेजी में काम करता है तो हिन्दी पढ़ने-लिखने के बावजूद हम अंग्रेजी प्रयोक्ता ही कहलाएंगे। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी हिन्दी को सर्वथा कम्प्यूटर-समर्थ बनाएं। इस दिशा में अनेक लोगों ने व्यक्तिगत स्तर पर बड़े प्रयास किए हैं। किसी बड़ी संस्था की मदद के बिना भी अनेक उत्साही हिन्दी-सेवियों ने हिन्दी अनुप्रयोगों की विशाल पूँजी इकठ्ठा कर दी है।

कुछ महत्वपूर्ण हिन्दी सुविधाएं निम्नवत्‌ हैं:

१.शब्दकोश (Dictionary):

अब आपको कागज पर छपे शब्दकोश के पन्ने पलटने की आवश्यकता नहीं है। दुनिया की अच्छी से अच्छी डिक्शनरी ऑन लाइन उपलब्ध है। मॉउस की एक क्लिक के साथ ही आप किसी भी शब्द का अर्थ सहज ही जान सकते हैं। अब हिन्दी का वृहत् शब्दकोश समानान्तर कोश के नाम से उपलब्ध है।

२. अनुवाद (Translation):

अब ऐसे सॉफ़्टवेयर उपलब्ध हैं कि आप किसी भी आलेख को दुनिया की किसी भी भाषा का तत्क्षण अनूदित कर सकते हैं। अन्तर्जाल पर विचरण करते हुए यदि आप को मिसाल के तौर पर स्कैन्डिनेवियाई भाषा में कोई रोचक सामग्री प्राप्त होती है तो आप उसे एक माउस की क्लिक से अपनी मनचाही भाषा में बदल सकते हैं। अपना हिन्दी में लिखा लेकर उसका दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी करा सकते हैं। हाँलाकि इस क्षेत्र में अभी बहुत कुछ अपेक्षित है। उदाहरणार्थ साहित्यिक रचनाओं का उचित अनुवाद मशीन द्वारा किया जाना सम्भव नहीं लगता है।

३. पारिभाषिक शब्दावली:

कुछ स्वप्रेरित लोगों के परिश्रम से विविध विषयों से सम्बन्धित पारिभाषिक शब्दों का संकलन तैयार हुआ है। इनका उपयोग भाषा के मानकीकरण में बहुत सहायक है।

४. लिप्यान्तरण (transliteration):

इस सुविधा का प्रयोग उन सभी लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर किया जा रहा है जिन्हें हिदी टाइपिंग की कोई जानकारी नहीं है। रोमन अक्षरों को की-बोर्ड पर देखकर टाइप करते हुए उनका हिन्दी प्रतिरूप प्राप्त किया जा सकता है। यानि ‘kavita’ टाइप करके ‘कविता’ पाया जा सकता है। यह सुविधा गूगल सहित अन्य अनेक साइट्स पर निःशुल्क ऑन लाइन’ उपलब्ध हैं। barahaIME इसके ‘ऑफ़ लाइन’ संस्करण निःशुल्क उपलब्ध कराती है जो इन्टरनेट से दो मिनट में डाउनलोड करके अपने कम्प्यूटर पर इन्स्टाल किया जा सकता है।

५. यूनीकोड:

इन्टरनेट पर सहज प्रयोग के लिए यूनिकोड फ़ॉण्ट की पद्धति लागू की गयी है। विश्व की सभी भाषाओं के समस्त वर्णों (अक्षरों) के लिए एक युनीक कोड निर्धारित कर दिया गया है तथा सभी कम्प्यूटर निर्माता कम्पनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि सभी कम्प्यूटर इस सुविधा से अनिवार्य रुप से लैस हों। देवनागरी लिपि के वर्णों को भी यूनीकोड फ़ॉण्ट में स्थान प्राप्त है। इससे दुनिया में कहीं भी हिन्दी नेट के माध्यम से लिखी और पढ़ी जा सकती है।

६. पारिभाषिक तकनीकी शब्दावली:

आप ज्ञान के जिस भी क्षेत्र में कार्य कर रहे हों उस क्षेत्र से सम्बन्धित मानक शब्दों की सर्वमान्य परिभाषा अत्यन्त आवश्यक होती है। हिन्दी सेवियों ने अन्तर्जाल पर इस विषय पर भी कठोर परिश्रम किया है। और विपुल मात्रा में तकनीकी शब्दकोशों की रचना कर डाली है।

७. कविता कोश:

अमीर खुसरो से लेकर आधुनिक भारत के वर्तमान कवियों तक की करीब ६०००० कविताओं को अन्तर्जाल पर कविता कोश में अपलोड कर दिया गया है। यह पूँजी अभी भी लगातार बढ़ रही है।

…क्रमशः

 कविता जी के श्रोता [कविता जी की वार्ता कुछ लम्बी ही थी। पूरे विषय को एक कड़ी में समेटना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने अपनी पाठ्य सामग्री से सम्बन्धित लिंक्स देने को कहा था, जो अभी प्रतीक्षित है। अगली कड़ी में इसे पूरा करने की कोशिश की जाएगी।]

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

सालगिरह से निकली नयी राह…

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ये रही एक माइक्रो-पोस्ट

टूटी-फूटी से हुआ, सपना इक साकार।

भेंट चढ़ा ब्लॉगरी के पूरा इक परिवार॥

आप सबकी शुभकामनाओं की सख़्त जरूरत है।

पुछल्ला:

डॉ. अरविन्द मिश्रा ने आज हमारी जोड़ी की तस्वीर तलाश किया जो थी ही नहीं। नहीं मिली तो किसी जोड़ा-जामा टाइप फोटू की फरमाइश भी कर दिए। हम ठहरे तकनीक से पैदल, सो शादी वाली फोटू यहाँ चेंप न सके। लेकिन एकदम ताजी फोटू भतीजे से खिंचवा ली है। आप भी देखिए 🙂

परिणय दशाब्दि  (2) (सिद्धार्थ)

प्रकृति ने औरतों के साथ क्या कम हिंसा की है…?

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हाल ही में ऋषभ देव शर्मा जी की कविता ‘औरतें औरतें नहीं हैं’ ब्लॉगजगत में चर्चा का केन्द्र बनी। इसे मैने सर्व प्रथम ‘हिन्दी भारत’ समूह पर पढ़ा था। बाद में डॉ.कविता वाचक्नवी ने इसे चिठ्ठा चर्चा पर अपनी पसन्द के रूप में प्रस्तुत किया। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस (८ मार्च) के अवसर पर स्त्री विमर्श से सम्बन्धित चिठ्ठों की चर्चा के अन्त में यह कविता दी गयी और इसी कविता की एक पंक्ति को चर्चा का शीर्षक  बना दिया गया। इस शीर्षक ने कुछ पाठकों को आहत भी किया।

स्त्री जाति के प्रति जिस हिंसा का चित्रण इस कविता में किया गया है वह रोंगटे खड़ा कर देने वाला है। युद्ध की एक विभीषिका विजित राष्ट्र के पकड़े गये सैनिकों, नागरिकों, मर्दों और औरतों के साथ की जाने वाली कठोर और अमानवीय यातना के रूप में देखी जाती है। विजेता सैनिकों में उठने वाली क्रूर हिंसा की भावना का शिकार सबसे अधिक औरतों को होना पड़ता है। इसका कारण कदाचित्‌ उनका औरत होना ही है। बल्कि और स्पष्ट कहें तो उनका मादा शरीर होना है। जो पुरुष ऐसी जंगली पाशविकता की विवेकहीन कुत्सा के वशीभूत होकर इस प्रकार से हिंस्र हो उठता है वह स्वयं मानव होने के बजाय एक नर पशु से अधिक कुछ भी नहीं होता। मेरा मानना है कि जिसके भीतर मनुष्यता का लेशमात्र भी शेष है वह इस प्रकार के पैशाचिक कृत्य नही कर सकता। इस कविता में ऐसे ही नर-पिशाचों की कुत्सित भावना का चित्रण किया गया है।

सभ्यता के विकास की कहानी हमारे लिए भौतिक सुख साधनों की खोज और अविष्कारों से अधिक हमारी पाशविकता पर विवेकशीलता के विजय की कहानी है। यह मनुष्य द्वारा जंगली जीवन से बाहर आकर मत्स्य न्याय की आदिम प्रणाली का त्याग करके उच्च मानवीय मूल्यों पर आधारित समाज विकसित करने की कहानी है। यह एक ऐसे सामाजिक जीवन को अपनाने की कहानी है जहाँ शक्ति पर बुद्धि और विवेक का नियन्त्रण हो। जहाँ जीव मात्र की अस्मिता को उसकी शारीरिक शक्ति के आधार पर नहीं बल्कि उसके द्वारा मानव समाज को किये गये योगदान के महत्व को आधार बना कर परिभाषित किया जाय। जहाँ हम वसुन्धरा को वीर-भोग्या नहीं बल्कि जननी-जन्मभूमि मानकर आदर करें। जहाँ हम नारी को भोग की वस्तु के बजाय सृजन और उत्पत्ति की अधिष्ठात्री माने और उसे उसी के अनुरूप प्रतिष्ठित करें।

यदि हम अपने मन और बुद्धि को इस दृष्टिकोण से संचालित नहीं कर पाते हैं तो यह हमें उसी पाशविकता की ओर धकेल देगा जहाँ निर्बल को सबल के हाथों दमित होते रहने का  दुष्चक्र झेलना पड़ता है। वहाँ क्या पुरुष और क्या नारी? केवल ‘शक्तिशाली’ और ‘कमजोर’ की पहचान रह जाती है। इस जंगली व्यवस्था में नर की अपेक्षा नारी को कमजोर पाया जाता है और इसी लिए उसे पीड़िता के रूप में जीना-मरना पड़ता है।

आपने देखा होगा कि यदि बन्दरों के झुण्ड में अनेक नर वानर हों तो वे आपस में भी हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। मादा वानर पर आधिपत्य के लिए अधिक शक्तिशाली नर कमजोर नर को भी अपनी हिंसा का शिकार उसी प्रकार बनाता है जिस प्रकार वह मादा को अपनी शक्ति से वश में करने के लिए हिंसा का भय दिखाता है। यह बात दीगर है कि बन्दरों में भी मादा को रिझाने के लिए मनुष्यों की भाँति ही दूसरे करतब दिखाने की प्रवृत्ति भी पायी जाती है। कदाचित्‌ इसलिए कि कोमल प्रेम का अवदान बलप्रयोग से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

हम अपने समाज में जो हिंसा और उत्पीड़न देखते हैं उसके पीछे वही पाशविकता काम करती है जो हमारे आदिम जीवन से अबतक हमारे भीतर जमी हुई है। सभ्यता की सीढ़ियाँ चढते हुए हम आगे तो बढ़ते आये हैं लेकिन इस सतत प्रक्रिया में अभी बहुत लम्बा रास्ता तय करना बाकी है। बल्कि सम्पूर्ण मानव प्रजाति के अलग-अलग हिस्सों ने अलग-अलग दूरी तय की है। तभी तो हमारे समाज में सभ्यता के स्तर को भी ‘कम’ या ‘ज्यादा’ के रूप में आँकने की जरूरत पड़ती है। जिस समाज में स्वतंत्रता, समानता और न्याय के मूल्य जिस मात्रा में प्रतिष्ठित हैं वह समाज उसी अनुपात में सभ्य माना जाता है।

औरत को प्रकृति ने कोमल और सहनशील बनाया है क्यों कि उसकी कोंख में एक जीव की रचना होती है। उसे वात्सल्य का स्निग्ध स्पर्श देना और स्वयं कष्ट सहकर उस नन्हें जीव को सकुशल इस धरती पर उतारना होता है।

जीवोत्पत्ति की सक्रिय वाहक बनने की प्रक्रिया स्त्री को अनेक शारीरिक कष्ट और मानसिक तनाव देती है। यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही उसके शरीर से रक्तश्राव का प्राकृतिक चक्र शुरू हो जाता है और इसके प्रारम्भ होते ही तमाम हार्मोन्स उसकी मनोदशा को तनाव ग्रस्त करते जाते हैं। इस अतिरिक्त जिम्मेदारी के साथ जीना उसे सीखना ही पड़ता है। वह इसे प्रकृति का अनुपम वरदान मानकर  इसमें सुख ढूँढ लेती है। रितु क्रिया को लेकर अनेक धार्मिक और पारिवारिक रूढ़ियाँ स्त्री को हीन दशा में पहुँचाने का काम करती हैं। कहीं कहीं इस अवस्था में उसे अछूत बना दिया जाता है। घर के किसी एकान्त कोने में अस्पृश्य बनकर पड़े रहना उसकी नियति होती है। घर की दूसरी महिलाएं ही उसकी इस दशा को लेकर एक बेतुकी आचार संहिता बना डालती हैं। आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक जानकारी के अभाव में यह सजा किसी भी औरत को भोगनी पड़ जाती है।

तरुणाई आते ही शरीर में होने वाले बड़े बदलाव के दर्द को महसूस करती, अपने आस पास की नर आँखों से अपने यौवन को ढकती छुपाती और बचपन की उछल कूद को अपने दुपट्टे में बाँधती हुई लड़की अपने समवयस्क लड़कों की तेज होती रफ़्तार से काफी पीछे छूट जाती है। लड़के जहाँ अपनी शारीरिक शक्ति का विस्तार करते हैं वहीं लड़कियों को परिमार्जन का पाठ पढ़ना पड़ता है।

जीवन में आने वाले पुरुष के साथ संसर्ग का प्रथम अनुभव भी कम कष्टदायक नहीं होता। आदमी जब अपने पुरुषत्व के प्रथम संधान का डंका पीट रहा होता है तब औरत बिना कोई शिकायत किए एक और रक्तश्राव को सम्हाल रही होती है। ऐसे रास्ते तलाश रही होती है कि दोनो के बीच प्रेम के उत्कर्ष का सुख सहज रूप में प्राप्त हो सके। पुरुष जहाँ एक भोक्ता का सिंहनाद कर रहा होता है, वहीं स्त्री शर्माती सकुचाती भोग्या बनकर ही तृप्ति का भाव ढूँढती है।

स्त्री देह में एक जीव का बीजारोपण शारीरिक और मानसिक तकलीफों का एक लम्बा सिलसिला लेकर आता है। इस पूरी प्रक्रिया में कभी कभी तो जान पर बन आती है। लेकिन सामान्य स्थितियों में भी अनेक हार्मोन्स के घटने बढ़ने से शुरुआती तीन-चार महीने मितली, उल्टी और चक्कर आने के बीच ही कटते हैं। बहुत अच्छी देखभाल के बावजूद ये कष्ट प्रायः अपरिहार्य हैं। जहाँ किसी अनुभवी महिला द्वारा देखभाल की सुविधा उपलब्ध नहीं है वहाँ समस्या गम्भीर हो जाती है।

जब हम किसी कष्ट को बड़ा और असह्य बताना चाहते हैं तो उसकी तुलना ‘प्रसव वेदना’ से करते हैं। लेकिन उसका क्या कीजिए जिसे प्रकृति ने ही इस वेदना का पात्र बना रखा  है। कोई पुरुष दुःख बाँटने की चाहे जितनी कोशिश कर ले, यह कष्ट सहन करने का भार औरत के ही हिस्से में रहेगा। अत्यन्त पीड़ादायी प्रसव के बाद महीनों चलने वाला रक्त श्राव हो या नवजात के साथ रात-दिन जाकर उसकी सफाई-दफाई करने और स्तनपान कराने का क्रम हो, ये सभी कष्ट अपरिहार्य हैं। इन्हें स्त्री प्रकृति का वरदान मानकर गौरव का अनुभव भले ही करती है और इससे कष्ट के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन भी हो जाता होगा, लेकिन कष्ट की मात्रा कम नहीं होती।

ऊपर मैने जो कष्ट गिनाए हैं वो तब हैं जब स्त्री को भले लोगों के बीच सहानुभूति और संवेदना मिलने के बावजूद उठाने पड़ते हैं। अब इसमें यदि समाज के हम नर-नारी अपनी नासमझी, पिछड़ेपन, ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, काम, क्रोध, मद, लोभ, उन्माद, महत्वाकांक्षा, आदि विकारों के वशीभूत होकर किसी स्त्री को अन्य प्रकार से भी कष्ट देते हैं तो इससे बड़ी विडम्बना कुछ नहीं हो सकती है।

मुझे ऐसा लगता है कि प्रकृति ने स्त्री के लिए जैसी जिम्मेदारी दे रखी है उसे ठीक से निभाने के लिए उसने पुरुष को भी अनेक विशिष्ट योग्यताएं दे रखी हैं। शारीरिक ताकत, युद्ध कौशल, शक्तिप्रदर्शन, निर्भीकता, मानसिक कठोरता, स्नेहशीलता, अभिभावकत्व, और विपरीत परिस्थितियों में भी दृढ़्ता पूर्वक संघर्ष करने की क्षमता प्रायः इनमें अधिक पायी जाती है। लेकिन यह भी सत्य है कि पुरुषों के भीतर पाये जाने वाले ये गुण स्त्रैण विशिष्टताओं की भाँति अनन्य नहीं हैं बल्कि ये स्त्रियों में भी न्यूनाधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

ऐसी हालत को देखते हुए एक सभ्य समाज में स्त्री के प्रति किए जाने वाले व्यवहार में प्रकृतिप्रदत्त इस पीड़ा को कम करने के लिए भावनात्मक सम्वेदना, सहानुभूति और कार्यात्मक सहयोग देना अनिवार्य है। उसकी कठिनाई को उसके प्रति सहृदयता, संरक्षण और सामाजिक सुरक्षा देकर कम किया जा सकता है। समाज में उसकी प्रास्थिति को सृजन और उत्पत्ति के आधार के रूप में गरिमा प्रदान की जानी चाहिए, उसे एक जननी के रूप में समादृत और महिमा मण्डित किया जाना चाहिए, जीवन संगिनी और अर्धांगिनी के रूप में बराबरी के अधिकार का सम्मान देना चाहिए और सबसे बढ़कर एक व्यक्ति के रूप में उसके वहुमुखी विकास की परिस्थितियाँ पैदा करनी चाहिए।

इसके विपरीत यदि हम किसी औरत की कमजोरी का लाभ उठाते हुए उसका शारीरिक, मानसिक वाचिक अथवा अन्य प्रकार से शोषण करते हैं तो निश्चित रूप से हम सभ्यता के सोपान पर बहुत नीचे खड़े हुए हैं।

आजकल स्त्री विमर्श के नाम पर कुछ नारीवादी लेखिकाओं द्वारा कुछेक उदाहरणों द्वारा पूरी पुरुष जाति को एक समान स्त्री-शोषक और महिला अधिकारों पर कुठाराघात करने वाला घोषित किया जा रहा है और सभी स्त्रियों को शोषित और दलित श्रेणी में रखने का रुदन फैलाया जा रहा है। इनके द्वारा पुरुषवर्ग को गाली देकर और महिलाओं में उनके प्रति नफ़रत व विरोध की भावना भरकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जा रही है। यह सिर्फ़ उग्र प्रतिक्रियावादी पुरुषविरोधवाद होकर रह गया है। यह प्रवृत्ति न सिर्फ़ विवेकहीनता का परिचय देती है बल्कि नारी आन्दोलन को गलत धरातल पर ले जाती है।

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हमें कोशिश करनी चाहिए कि सामाजिक शिक्षा के आधुनिक माध्यमों से स्त्री-पुरुष की भिन्न प्रास्थितियों को समझाते हुए उनके बीच उच्च मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु मिल-बैठकर विचार-विमर्श करें और कन्धे से कन्धा मिलाकर साझे प्रयास से एक प्रगतिशील समतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में आशावादी होकर काम करें।

आइए हम खुद से पूछें कि प्रकृति ने औरतों के साथ क्या कम हिंसा की है जो हम इस क्रूरता को तोड़्ना नहीं चाहते…? यदि तोड़ना चाहते है तो सच्ची सभ्यता की राह पर आगे क्यों नहीं बढ़ते…?

(सिद्धार्थ)

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