किताबों की खुसर-फुसर भाग-३

21 टिप्पणियाँ

पिछले साल मैने एक अत्यन्त प्रतिष्ठित संस्था के एक समृद्ध पुस्तकालय में जाकर वहाँ मौजूद किताबों की जो खुसर-फुसर सुनी थी, उसका वर्णन सत्यार्थमित्र के पन्नों पर दो किश्तों में किया था। लम्बे समय से लकड़ी और लोहे की आलमारियों में जस की तस पड़ी हुई किताबों की भाव भंगिमा देखकर और पीड़ा व उलाहना भरी बातें सुनकर मेरा मन इतना व्यथित हुआ था कि उसके बाद कभी अकेले में उन किताबों के पास जाने की मुझे हिम्मत नहीं हुई। अलबत्ता मैने उनकी कहानी यहाँ-वहाँ प्रकाशित और प्रसारित कराकर यह कोशिश की थी कि सुधी पाठकों और हिन्दी सेवियों के मन में उन बोलती किताबों के प्रति सम्वेदना जागृत हो, और लोग उनका हाल-चाल लेने अर्थात्‌ उनके पन्ने पलटने के लिए पुस्तकालय तक जा सकें।

मेरे इस प्रयास से उन पुस्तकों का कोई भला हो पाया हो या नहीं, लेकिन मुझे यह लाभ जरूर हुआ कि मुझमें कदाचित्‌ एक ऐसी इन्द्री विकसित हो गयी जो किताबों की बातचीत सुन सकती है और उनसे अपनी बात कह भी सकती है। मैने उस पुस्तकालय की सभी किताबों को एक बार पलटवाकर, झाड़-पोंछ कराकर और उनके निवास स्थल की मरम्मत व रंगाई-पुताई कराकर जो पुण्य लाभ अर्जित किया उसी के ब्याज से कदाचित्‌ यह संवाद शक्ति अर्जित हो गयी है। जैसे कोई आयतें उतरकर मेरे जेहन में नमूँदार हो गयी हों। हाल ही में मुझे अपनी इस छठी इन्द्री का अनुभव फिर से हुआ।

उस दिन इस संस्था के सभागार में एक साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित था। एक कहानी संग्रह का लोकार्पण और राष्ट्रीय स्तर के हिन्दी साहित्य के एक विद्वान द्वारा कहानी साहित्य पर एक उद्‌बोधन होना था। उस समय एक वक्तव्य राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना हुआ था जिसमें हिन्दी ब्लॉगजगत में कूड़ा प्रकाशित होने की बात कही गयी थी। इस साहित्यिक समागम में इस विषय पर भी कुछ सुनने की उम्मीद थी मुझे। आमन्त्रण पत्र पर छपे समय के हिसाब से मैं दो-चार मिनट पहले ही पहुँच गया था, ताकि सीट मिल जाय और कुछ छूट जाने की आशंका न रहे, लेकिन वहाँ पहुँचने पर बताया गया कि कार्यक्रम शुरू होने में अभी कुछ देर लगेगी, क्योंकि मुख्य अतिथि अभी नहीं पधारे हैं। कुछ अन्य गणमान्यों (VIPs) का भी रास्ते में होना बताया गया।

मैने अन्दर जाकर देखा तो सभागार बिल्कुल सूना था। बैनर, पोस्टर, माइक, स्पीकर, दरी, चादर, कुर्सी, मेज, पानी की बोतल, सरस्वती देवी का फोटो, हार, दीपक, तेल, बाती, मोमबत्ती, दियासलाई, कपूर, माला, बुके, स्मृति चिह्न इत्यादि सामग्रियों को कुछ कर्मचारी यथास्थान जमा रहे थे। आड़ी तिरछी कुर्सियों को सीधा किया जा रहा था लेकिन उन्हें पोछा नहीं जा रहा था। मैने अनुमान किया कि अगले आधे घण्टे में कुछ भी ‘मिस’ नहीं होने वाला है। मैं वहाँ से इत्मीनान से निकलकर पुस्तकालय की दिशा से खुद को बचाता हुआ संस्था के सचिव महोदय के कक्ष में जाकर बैठ गया।

वे फोन पर जमे हुए थे। सामने टेलीफोन नम्बरों की डायरी खुली हुई थी। एक के बाद एक अनेक लोगों का नम्बर मिलाते जा रहे थे और एक ही मज़मून का अनुरोध करते जा रहे थे, “ …आदरणीय फलाने जी, अभी चल दिए कि नहीं…! सब लोग आ चुके हैं… बस आपकी ही प्रतीक्षा है… जल्दी आ जाइए… आपके आते ही कार्यक्रम शुरू हो जाएगा… हाँ-हाँ, सब लोग हैं, आइए… नमस्कार।”

यह फोनवार्ता इतनी यन्त्रवत्‌ हो रही थी, और विषयवस्तु की इतनी पुनरावृत्ति हो रही थी कि अपनी मुस्कराहट छिपाने के लिए मुझे वहाँ से उठ जाना पड़ा। मैने ठीक सामने वाले कक्ष में कदम बढ़ा दिया, जहाँ इस संस्था द्वारा स्वयं प्रकाशित की गयी पुस्तकों का बिक्री काउण्टर है। इस कक्ष का वातावरण और नक्शा किसी दुकान सरीखा कतई नहीं है। इस कक्ष की चारो दीवारों से सटकर रखे हुए बुकशेल्व्स से एक बड़ा घेरा बनता है जिसके बीच में दो बड़ी-बड़ी मेंजें सटाकर रखी हुई हैं। इनके एक ओर दो कुर्सियाँ लगी थीं जिनमें से एक पर एक वृद्ध व्यक्ति बैठे थे, और कोहनी मेज पर टिकाए कुछ कागजों में खोये हुए थे। मैने अनुमान किया कि ये शायद ‘दरबारी जी’ होंगे जिन्हें सचिव जी ने अभी-अभी ‘हर्षबर्द्धन’ के साथ बुलाया था। मेज पर अनेक नयी ताजी आयी हुई किताबें पड़ी थीं जिनका शायद स्टॉक में अंकन किया जाना था।

चित्रों पर चटकाकर बड़ा कर सकते हैं

मैने चारो ओर एक उचटती सी दृष्टि डा्ली और दरबारी जी के सामने कुर्सी खींच कर बैठ गया।

“लगता है ज्यादा लोग नहीं आएंगे…!” मैने यूँ ही बात छेड़ी।

दरबारी जी शान्त थे। क्या जवाब देते? मौन रहकर सहमति जताना ठीक समझा होगा शायद। …तभी मुझे कुछ खनकती हुई हँसने की आवाजें सुनायी दीं। मैने चौक कर पीछे देखा। कोई नहीं था। …फिर पारदर्शी शीशे के पीछे से झाँकती लक-दक चमक बिखेरती हरि चरित्र नामक मोटी पुस्तक की हरकत दिखायी दी।

उसे शायद इस छोटी सी बात में कुछ ज्यादा ही रस मिल गया था। मैंने हैरत से उसकी ओर घूरा। जो बात निराशा पैदा करने वाली थी उसपर ऐसी हँसी? “आखिर बात क्या है…?” मैने उसे पुचकार कर पूछा।

वह एकाएक गम्भीर हो गयी। मैने उसके मन के भाव जानने की कोशिश की तो दार्शनिक अन्दाज में उसने जो बताया उसका सार यह था कि करीब सात सौ पृष्ठों की इस अनूठी पुस्तक की पान्डुलिपि को एक लम्बे समय से सहेजकर रखने वाले डॉ. शिवगोपाल मिश्र के सपनों को पूरा करने के लिए ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ ने इसे प्रकाशित तो कर दिया, लेकिन न तो आज लोकार्पित होने वाले कहानी संग्रह की तरह जन सामान्य तक पहुँचने का उसका भाग्य है, और न ही सरकारी खरीद के माध्यम से देश भर के पुस्तकालयों तक इसके जाने की कोई सम्भावना दिखती है। इसी से बेचारी कुछ विचलित सी हो गयी है।

श्रीमद्‌भागवत के दशम स्कन्ध में श्रीकृष्ण की समस्त लीलाओं का वर्णन हुआ है। संस्कृत में होने के कारण जब जन-सामान्य को इन लीलाओं को समझने में कठिनाई होने लगी, तो उनका भाषानुवाद होना स्वाभाविक था। सर्वप्रथम संवत्‌ १५८७ में रायबरेली (उ.प्र.) निवासी श्री लालचदास ने दशम्‌ स्कन्ध का अवधी में भाषानुवाद “हरि चरित्र’ के नाम से किया। इसकी विशेषता है कि उन्होंने ९० अध्यायों का अपनी बुद्धि के अनुसार दोहा-चौपाई शैली में अनुवाद प्रस्तुत कर दिया था। सन्त कवि तुलसीदास से ४४ वर्ष पूर्व अवधी में हरि-चरित्र की रचना सचमुच एक अनूठा प्रयास है। ‘सम्पूर्ण हरि चरित्र’ का अभी तक प्रकाशन नहीं हुआ था। अब कई प्राचीन हस्त-लिपियों के आधार पर इसका प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत किया गया है। लेकिन इसका भविष्य क्या है?

आजकल पुस्तकों की पाठक संख्या का जो हाल है,

और पुस्तक व्यवसाय में लगे व्यापारिक प्रतिष्ठानों द्वारा जिस प्रकार की एग्रेसिव कैम्पेन चलायी जाती है उसके मुकाबले एक शहर तक सिमटी आधुनिक प्रचार-प्रसार और विपनन के संसाधनों से विहीन सार्वजनिक संस्था के कन्धे पर सवार होकर यह मोटी-तगड़ी पुस्तक कितना रास्ता तय कर पाएगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। कदाचित्‌ इसी बोध से एक नैराश्य भाव इसकी खोखली हँसी में उभर आया था, क्योंकि कम श्रोताओं की बात सुनकर इसके ईर्ष्या भाव में जरूर कुछ कमी आयी होगी, और बरबस ये भाव निकल पड़े होंगे। (जारी…)

[अगली कड़ियों में हम कुछ और गोपनीय बातों का खुलासा करेंगे, जो मुझे उन चन्द घन्टों में उनके बीच बैठकर पता चलीं। शर्त यह है कि आप को इन बातों में कुछ रस मिल रहा हो, जिसकी गवाही आपकी टिप्पणियाँ देंगी।]

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Advertisements

लोकतन्त्र के भस्मासुर

27 टिप्पणियाँ

 

“कृपया मेरे सच बोलने पर नाराज न होइए; कोई भी व्यक्ति जो इस नगर-राज्य में घट रही अनेक अन्यायपूर्ण व गैरकानूनी घटनाओं को रोकने की कोशिश करेगा; और आपका या किसी अन्य ‘भीड़’ का सच्चा विरोध करेगा वह बच नहीं पाएगा। कोई भी व्यक्ति जो न्याय के लिए वास्तविक संघर्ष करता है, उसे यदि जीने की थोड़ी भी इच्छा है तो उसे सार्वजनिक जीवन त्याग कर निजी ज़िन्दगी बितानी होगी।” (एपॉल्जी से)

image यह उद्‍गार ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के गुरू सुकरात ने ‘जूरी’ के सामने भरी अदालत में तब व्यक्त किए थे जब उनके विरुद्ध देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा था। कुछ ही समय में वह जूरी उन्हें मृत्युदण्ड सुनाने वाली थी। प्लेटो ने अपने गुरू की मौत का कारण जिस राज-व्यवस्था को ठहराया उसे ‘डेमोक्रेसी’ कहा जाता था, जिसमें भींड़ द्वारा नितान्त अविवेकपूर्ण निर्णय लिए जाते थे, और प्रायः अन्यायपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। वही डेमोक्रेसी आज दुनिया की सबसे लोकप्रिय, सर्वमान्य और सर्वाधिक व्यहृत शासन व्यवस्था हो गयी है। यह बात अलग है कि राजनीति विज्ञान के जानकार प्राचीन ग्रीक कालीन डेमोक्रेसी और आधुनिक ‘लोकतंत्र’ में जमीन-आसमान का अन्तर बताएंगे।

प्लेटो ने जिस नगर-राज्य को देखा था उसकी जनसंख्या इतनी छोटी होती थी कि राज्य के सभी नागरिक एक स्थान पर एकत्र होकर बहुमत से अपना शासक चुन लेते थे। भीड़ का एक बड़ा हिस्सा जिसे पसन्द करता था वही राजा होता था और उसके फैसले सभी नागरिकों पर बाध्यकारी होते थे। सिद्धान्त रूप में आज भी लोकतंत्र का मतलब यही है- जनता की सरकार, जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों की बहुमत आधारित सरकार।

लेकिन प्लेटो ने इस बहुमत की व्यवस्था का जो विश्लेषण किया, वह इसकी खामियों को उजागर करने वाला है, और कदाचित्‌ सच्चाई के करीब भी है। उन्होंने राज्य की तुलना एक व्यक्ति से की थी, और बताया था कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के भीतर इन्द्रियबोध (sensation), चित्तवृत्ति (emotion), और बुद्धि (intelligence) के बीच उचित तालमेल से ही उसका सन्तुलित और स्वस्थ जीवन सम्भव है, उसी प्रकार राज्य के विभिन्न अवयवों के आपसी सामन्जस्य से ही न्यायपूर्ण राज-व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। यदि बुद्धि-विवेक के ऊपर मन व शरीर में पलने वाले काम, क्रोध, मद व लोभ जैसे विकार हावी हो जाते हैं, तो व्यक्तित्व दोषयुक्त और अन्या्यपूर्ण हो जाता है। शरीर के ऊपर मन और मन के ऊपर मस्तिष्क का नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। यदि नियन्त्रण की यह दिशा उलट-पु्लट जाय तो व्यक्ति नष्ट होने लगता है। पतन अवश्यम्भावी हो जाता है। यही स्थिति उस राज्य की भी होती है, जहाँ विवेक पर उन्माद हावी हो जाता है।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सभी व्यक्तियों को एक इकाई के रूप में बराबर माना जाता है। भले ही उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता तथा सामाजिक पृष्ठभूमि में भारी अन्तर हो। यह व्यवस्था इसी सिद्धान्त पर टिकी है कि राज्य/देश की सरकार चुनने में प्रत्येक व्यक्ति के मत का मान बराबर है। कोई किसी से कम या अधिक महत्व नहीं रखता। कुल मतदाताओं में से बहुमत जिसके पक्ष में हो, वही सरकार बनाता है। इस सरकार द्वारा जो भी निर्णय लिए जाते हैं वह उन अल्पमत वाले नागरिकों पर भी प्रभावी होता है जिनका मत इस सरकार के विरुद्ध रहा है।

सिद्धान्त रूप में इस व्यवस्था में कोई कमी नहीं नज़र आती; लेकिन व्यवहार में बहुत कुछ बदला हुआ नजर आता है। प्लेटो ने इन बदलावों पर कुछ प्रकाश डाला था। बहुमत की पसन्द कौन होता है? लोकप्रियता का पैमाना क्या है? व्यक्ति अपना नेता किसे चुनता है? जिसे देश की सम्पूर्ण जनता का ख़्याल रखना है; आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, सामरिक, राजनयिक, वाणिज्यिक आदि विषयों से सम्बन्धित लोकनीति बनानी है, उसका चुनाव करते समय जनता इन विषयों में उसकी प्रवीणता देखने के बजाय उसकी जाति, उसका धर्म व रंग देखती है; उसकी वक्तृता पर मोहित हो जाती है, किसी दूसरे क्षेत्र में उसके कौशल से प्रभावित हो लेती है; और अपना नेता चुन लेती है।

अच्छी भाषण कला में माहिर एक नेता किसी स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दे पर आम जनता का मत एक डॉक्टर की अपेक्षा अधिक आसानी से बदल सकता है। वह कमजोर और निरीह नागरिकों  को भी शत्रु देश पर हमले के लिए तैयार कर सकता है, जो एक आर्मी-जनरल नहीं कर सकता। जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रभावशाली भाषण के माध्यम से बड़े-बड़े जनसमूहों को सम्मोहित कर बेवक़ूफ बनाने और उनके अन्ध-समर्थन से अत्यन्त शक्तिशाली बन जाने के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है।

फ्रेडरिक नीत्शे कहते थे कि उन्माद, पागलपन, मूर्खता या विक्षिप्तता के लक्षण किसी व्यक्ति के भीतर किंचित्‌ ही पाये जाते हैं; लेकिन एक समूह, दल, राष्ट्र या किसी ऐतिहासिक कालखण्ड में ये लक्षण एक अनिवार्य नियम जैसे मिलते हैं। एक भीड़ या समूह का हिस्सा बन जाने पर व्यक्ति के सोचने समझने का ढंग पूरी तरह बदल जाता है। भीड़ में उसकी मानसिकता भेंड़ जैसी हो जाती है। विवेक भ्रष्ट हो जाता है। इसी भीड़ द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जब सरकार चलाते हैं तो सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ता है।

भारतवर्ष में लोकतंत्र का जो मॉडल चलाया जा रहा है, उसमें भी इस उत्कृष्ट सिद्धान्त का व्यावहारिक रूप किसी धोखे से कम नहीं है। यहाँ का समाज भी जाति, धर्म, कुल, गोत्र, क्षेत्र, रंग, रूप, अमीर, गरीब, अगड़े, पिछड़े, दलित, सवर्ण, निर्बल, सबल, शिक्षित, अशिक्षित, शहरी, ग्रामीण, उच्च, मध्यम, निम्न, काले, गोरे, स्त्री, पुरुष, आदि के पैमानों पर इतना खण्ड-खण्ड विभाजित है; और ये पैमाने हमारी लोक संस्कृति में इतनी गहरी पैठ बना चुके हैं, कि किसी भी मुद्दे पर आम सहमति या सर्वसहमति नहीं बनायी जा सकती। राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना से हम कोसों दूर हैं। ऐसे में बहुमत का अर्थ मात्र दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों तक सिमट जाता है। शेष मत विखण्डित होकर इस आँकड़े से पीछे छूट जाते हैं।

कोई भी राजनेता यदि इस गणित को ठीक से समझ लेता है तो वह उन्हीं दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों को अपने पक्ष में सुनिश्चित हुआ जानकर सन्तुष्ट हो लेता है, और यह सन्देश भी देता है कि उनके हितों की रक्षा के लिए वह कुछ भी कर सकता है। सारे नियम-कायदे ताख़ अपर रख सकता है; दूसरे समूहों को सार्वजनिक रूप से गाली दे सकता है; साम्प्रदायिक हिंसा करा सकता है; मार-पीट, झगड़ा-लड़ाई, अभद्रता और गुण्डागर्दी से यदि उनका स्वार्थ सधता है तो उसका सहारा लेने में तनिक भी संकोच नहीं करता है। विरोधी मतवाले वर्ग के विरुद्ध खुलेआम अत्याचार और दुर्व्यवहार करने से यदि उसके पीछे खड़ी उन्मादी भीड़ तालिया पीटती है तो इस तथाकथित जनप्रतिनिधि को वह सब करने में कोई गुरेज़ नहीं है।

ऐसी हालत में लोकतन्त्र के चार उपहार- स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व व न्याय एक बड़े वर्ग के हाथ से छीन लिए जा रहे हैं, और इन्हें लोकतन्त्र के भस्मासुर अपनी चेरी बनाकर रखने में सफल हो रहे हैं। आजकल अखबारों की सुर्खिया ऐसे समाचारों से भरी पड़ी हैं जहाँ नेता जी अपनी बात मनवाने के लिए प्रशासन के अधिकारियों को मारने-पीटने से लेकर उनकी हत्या कर देने से भी गु़रेज नहीं करते। राजनैतिक पार्टियों द्वारा आपसी रंजिश में एक दूसरे पर राजनैतिक हमले करना तो अब पुरानी बात हो गयी है। अब तो सीधे आमने-सामने दो-दो हाथ कर लेने और विरोधी के जान-माल को क्षति पहुँचाने का काम भी धड़ल्ले से किया जा रहा है।

क्या हम प्लेटो के मूल्यांकन को आधुनिक सन्दर्भ में भी सही होता नहीं पा रहे हैं? 

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-४ डॉ.कविता वाचक्नवी (हिन्दी कम्प्यूटिंग) प्रथम भाग

9 टिप्पणियाँ

 

“हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया” के बारे में जो कार्यशाला इलाहाबाद में हुई उसकी तस्वीरें, विषय-प्रवर्तन, अखबारी चर्चा, अनूप शुक्ल जी की कथा-वार्ता और डॉ. अरविन्द मिश्रा जी की साइंस ब्लॉगिंग सम्बन्धी वार्ता के बारे में आप पिछली कड़ियों में देख और पढ़ चुके है। अब आगे…

आशीर्वाद मुख्य अतिथि का... इमरान ने बड़े आदर पूर्वक यह बताया कि ब्लॉगिंग की चर्चा को एक ब्रेक देना पड़ेगा क्योंकि हमारे मुख्य अतिथि महोदय को किसी जरूरी कार्य से जाना पड़ रहा है। इसलिए उनके हिस्से की औपचारिकता बीच में ही पूरी करनी पड़ेगी। प्रदेश के पुलिस मुख्यालय में अपर पुलिस महानिदेशक के पद की जिम्मेदारियाँ निभाने वाले एस.पी.श्रीवास्तव जी ने इस कार्यक्रम से इतना भावुक जुड़ाव महसूस किया कि उन्होंने अपनी घोर व्यस्तता के बावजूद उपस्थित श्रोताओं को करीब बीस मिनट तक आशीर्वाद दिया।

मुख्य अतिथि जी बताने लगे कि ब्लैक बेरी पर अंग्रेजी में बहुत दिनों से ब्लॉग लिखते रहे हैं।

“आज का यह कार्यक्रम देखकर मुझे यह ज्ञान हुआ है कि हिन्दी में भी ब्लॉगिंग की जा सकती है। मैं आज ही अपना हिदी ब्लॉग बना डालूंगा और नियमित रूप से लिखता रहूंगा।”

स्मृति चिह्नउन्होंने कम्प्यूटर और इन्टरनेट के बारे में अनेक गूढ़ बातें बतायी। मुख्य अतिथि महोदय कविता के क्षेत्र में भी बड़ा दखल रखते हैं, लेकिन समय ने इसकी इजाजत नहीं दी। उन्होंने वार्ता समाप्त करने के बाद सभी अन्य वक्ताओं को स्मृति चिह्न प्रदान किए जिसे इमरान ने बड़ी मेहनत और शौक से तैयार कराया था।

मुख्य अतिथि जी को आदर पूर्वक विदा करने के बाद इमरान ने अगली वार्ताकार डॉ. कविता वाचक्नवी जी को आमन्त्रित किया। वे यह बताना नहीं भूले कि आप स्त्री विमर्श की विशेषज्ञ हैं। आपका इन्टरनेट पर बहुत बड़ा पाठक वर्ग है। "हिन्दी भारत", वागर्थ, पीढियाँ, स्वर – चित्रदीर्घा, ब्लॉगरबस्ती (BLOGGER BUSTI), "बालसभा", हिन्दुस्तानी एकेडेमी
चिट्ठा चर्चा, Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श), *रामायण- संदर्शन
आदि अनेक ब्लॉग हैं जिनमें आप अकेले या सामूहिक रूप से लेखन का कार्य करती है।

कार्यशाला में यद्यपि ब्लॉगिंग की ही चर्चा की जानी थी और किसी सामाजिक – राजनैतिक मुद्दे पर भटकने की इजाजत नहीं थी लेकिन इमरान उनसे स्त्री विमर्श पर कुछ सुनने का लोभ संवरण नहीं कर सके। उन्हें यह छूट प्रदान कर दिया कि वे अपनी पसन्द से जो बोलना चाहें बोल सकती हैं। लेकिन कविता जी ने कार्यशाला के उद्देश्यों को महत्व देते हुए अन्तर्जाल पर हिन्दी के अनुप्रयोग और हिन्दी टूल्स के बारे में ही चर्चा करना उचित समझा।

कविता वाचक्नवी कविता जी ने अपनी बात की शुरुआत इस ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए किया कि भारत में हिन्दी का बहुत बड़ा प्रयोक्ता समाज है। (वैसे तो बाहर भी कम नहीं है।) हिन्दी का प्रसार हो रहा है। लेकिन कम्प्यूटर में अभी हिन्दी के अनुप्रयोगों में बहुत कुछ किया जाना शेष है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि देवनागरी लिपि में लिखी हुई संस्कृत भाषा कम्प्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त भाषा है। लेकिन अंग्रेजी का प्रयोग अभी भी इण्टरनेट पर इतना छाया हुआ है कि हम अंग्रेजी में काम करने के आदी हो गये हैं। यदि हमारा ब्राउजर अंग्रेजी में काम करता है तो हिन्दी पढ़ने-लिखने के बावजूद हम अंग्रेजी प्रयोक्ता ही कहलाएंगे। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी हिन्दी को सर्वथा कम्प्यूटर-समर्थ बनाएं। इस दिशा में अनेक लोगों ने व्यक्तिगत स्तर पर बड़े प्रयास किए हैं। किसी बड़ी संस्था की मदद के बिना भी अनेक उत्साही हिन्दी-सेवियों ने हिन्दी अनुप्रयोगों की विशाल पूँजी इकठ्ठा कर दी है।

कुछ महत्वपूर्ण हिन्दी सुविधाएं निम्नवत्‌ हैं:

१.शब्दकोश (Dictionary):

अब आपको कागज पर छपे शब्दकोश के पन्ने पलटने की आवश्यकता नहीं है। दुनिया की अच्छी से अच्छी डिक्शनरी ऑन लाइन उपलब्ध है। मॉउस की एक क्लिक के साथ ही आप किसी भी शब्द का अर्थ सहज ही जान सकते हैं। अब हिन्दी का वृहत् शब्दकोश समानान्तर कोश के नाम से उपलब्ध है।

२. अनुवाद (Translation):

अब ऐसे सॉफ़्टवेयर उपलब्ध हैं कि आप किसी भी आलेख को दुनिया की किसी भी भाषा का तत्क्षण अनूदित कर सकते हैं। अन्तर्जाल पर विचरण करते हुए यदि आप को मिसाल के तौर पर स्कैन्डिनेवियाई भाषा में कोई रोचक सामग्री प्राप्त होती है तो आप उसे एक माउस की क्लिक से अपनी मनचाही भाषा में बदल सकते हैं। अपना हिन्दी में लिखा लेकर उसका दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी करा सकते हैं। हाँलाकि इस क्षेत्र में अभी बहुत कुछ अपेक्षित है। उदाहरणार्थ साहित्यिक रचनाओं का उचित अनुवाद मशीन द्वारा किया जाना सम्भव नहीं लगता है।

३. पारिभाषिक शब्दावली:

कुछ स्वप्रेरित लोगों के परिश्रम से विविध विषयों से सम्बन्धित पारिभाषिक शब्दों का संकलन तैयार हुआ है। इनका उपयोग भाषा के मानकीकरण में बहुत सहायक है।

४. लिप्यान्तरण (transliteration):

इस सुविधा का प्रयोग उन सभी लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर किया जा रहा है जिन्हें हिदी टाइपिंग की कोई जानकारी नहीं है। रोमन अक्षरों को की-बोर्ड पर देखकर टाइप करते हुए उनका हिन्दी प्रतिरूप प्राप्त किया जा सकता है। यानि ‘kavita’ टाइप करके ‘कविता’ पाया जा सकता है। यह सुविधा गूगल सहित अन्य अनेक साइट्स पर निःशुल्क ऑन लाइन’ उपलब्ध हैं। barahaIME इसके ‘ऑफ़ लाइन’ संस्करण निःशुल्क उपलब्ध कराती है जो इन्टरनेट से दो मिनट में डाउनलोड करके अपने कम्प्यूटर पर इन्स्टाल किया जा सकता है।

५. यूनीकोड:

इन्टरनेट पर सहज प्रयोग के लिए यूनिकोड फ़ॉण्ट की पद्धति लागू की गयी है। विश्व की सभी भाषाओं के समस्त वर्णों (अक्षरों) के लिए एक युनीक कोड निर्धारित कर दिया गया है तथा सभी कम्प्यूटर निर्माता कम्पनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि सभी कम्प्यूटर इस सुविधा से अनिवार्य रुप से लैस हों। देवनागरी लिपि के वर्णों को भी यूनीकोड फ़ॉण्ट में स्थान प्राप्त है। इससे दुनिया में कहीं भी हिन्दी नेट के माध्यम से लिखी और पढ़ी जा सकती है।

६. पारिभाषिक तकनीकी शब्दावली:

आप ज्ञान के जिस भी क्षेत्र में कार्य कर रहे हों उस क्षेत्र से सम्बन्धित मानक शब्दों की सर्वमान्य परिभाषा अत्यन्त आवश्यक होती है। हिन्दी सेवियों ने अन्तर्जाल पर इस विषय पर भी कठोर परिश्रम किया है। और विपुल मात्रा में तकनीकी शब्दकोशों की रचना कर डाली है।

७. कविता कोश:

अमीर खुसरो से लेकर आधुनिक भारत के वर्तमान कवियों तक की करीब ६०००० कविताओं को अन्तर्जाल पर कविता कोश में अपलोड कर दिया गया है। यह पूँजी अभी भी लगातार बढ़ रही है।

…क्रमशः

 कविता जी के श्रोता [कविता जी की वार्ता कुछ लम्बी ही थी। पूरे विषय को एक कड़ी में समेटना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने अपनी पाठ्य सामग्री से सम्बन्धित लिंक्स देने को कहा था, जो अभी प्रतीक्षित है। अगली कड़ी में इसे पूरा करने की कोशिश की जाएगी।]

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-२ (फुरसतिया उवाच)

25 टिप्पणियाँ

 

“हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया” में प्रवेशोत्सुक नये कलमकारों को चिठ्ठाकारी के विविध पक्षों से परिचित कराने के लिए जो कार्यशाला आयोजित की गयी उसकी तस्वीरें देखने के बाद विषय-प्रवर्तन सम्बन्धी पहला पाठ और अखबारों में इस कार्यक्रम की चर्चा आप देख चुके हैं। इस कक्षा का दूसरा पीरियड कानपुर से इसी एक काम के लिए इलाहाबाद आये अनूप शुक्ल जी का था। हमें पता चला है कि निराला सभागार में पहुँचने से पहले इन्होंने अनेक खतरों का सामना किया था। लेकिन अपनी वार्ता में इन्होंने उनका कोई जिक्र नहीं किया। वह सब आप यहाँ और यहाँ देख सकते हैं।

हम यहाँ आपको यह बताते हैं कि संचालक इमरान ने इन्हें बुलाने से पहले यह बताया कि हमारे अगले मेहमान कानपुर से चलकर, बहुत कष्ट उठाकर, और अपनी घोर व्यस्तता के बावजूद समय निकालकर यहाँ आये हैं। उन्होने सोचा होगा कि इससे श्रोताओं पर भारी इम्प्रेशन पड़ेगा। लेकिन अनूप जी ने अपनी बात की शुरुआत ही इस भूमिका के खण्डन से की।

प्रमुदित अनूप जी... अनूप जी बोले, ”मित्रों सबसे पहले मैं बताना चाहता हूं कि मैंने इलाहाबाद में अपनी जिन्दगी के सबसे महत्वपूर्ण चार साल बिताये हैं। जब मैं यहां मोतीलाल नेहरू रीजनल इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ता था। सन १९८१ से १९८५ तक। इसलिये इलाहाबाद आना मेरे लिये हमेशा घर आने जैसा लगता है। …जैसे लड़कियां अपने मायके आती हैं और जी भर कर बतियाती हैं उसी तरह से मेरा अनुरोध है कि मुझे मेहमान न समझ कर घर का व्यक्ति समझा जाये ताकि मैं अनौपचारिक होकर बिना संकोच के जो याद आता है , समझ में आता है वह आपके साथ बांट सकूं।”

मैं यह भी कहना चाहता हूं कि मैं कोई ऐसा व्यस्त नहीं हूं। छुट्टी लेकर आया हूं। फ़ुरसतिया मेरा ब्लाग है तो मैं व्यस्त कैसे हो सकता हूं। मेरी समझ में व्यस्त तो वह होता है जिसके पास कोई काम नहीं होता है। मेरे पास ब्लागिंग के अलावा भी और तमाम काम हैं लिहाजा मुझे व्यस्त जैसा न मानकर फ़ुरसतिया ही माना जाये तो मैं ज्यादा सहज रह सकूंगा।

पूरा हाल ठहाकों से गूँज गया जब उन्होंने यह जुमला बोला –

“क्या बात है बहुत बिजी दिख रहे हो…? आज कल कोई काम-धाम नहीं है क्या?”

इतनी इधर-उधर की ठेलने के बाद वे सीधे मुद्दे पर आ गये। ब्लॉगिंग की कहानी का प्रारम्भ करते हुए बोले-

“मेरी जानकारी के अनुसार पहला ब्लाग सन १९९७ में अमेरिका में शुरू किया गया। हिन्दी में पहला ब्लाग लिखने वाले आलोक कुमार आदि चिट्ठाकार के रूप में जाने जाते हैं। सन २००३ में उन्होंने पहली बार हिन्दी ब्लाग शुरू किया। ब्लाग के लिये चिट्ठा शब्द भी उन्होंने ही सुझाया।”

अपनी ब्लॉग यात्रा के बारे में उन्होंने बताया, “मेरी ब्लाग-यात्रा की शुरुआत के पीछे भी अप्रत्यक्ष रूप से इलाहाबाद का ही हाथ है। डा. पूर्णिमा वर्मन इलाहाबाद  की छात्रा रहीं हैं और उन्होंने यहीं से संस्कृत में पी.एच.डी. की है। उनके द्वारा संचाचिल  साप्ताहि्क इंटरनेट पत्रिका अभिव्यक्ति  दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्ययन के लिये मानक संदर्भ पत्रिका के रूप में देखी जाती है। मैं नेट से जुड़ने के बाद नियमित रूप से अभिव्यक्ति देखा करता था। इसी में मैंने रविरतलामी जी का लेख  अभिव्यक्ति का नया माध्यम:ब्लाग देखा, शायद १४-१५ अगस्त २००४ को।  इस लेख को पढ़ते ही हम भी अपना ब्लाग शुरू करने को छटपटाने लगे।

 फुरसतिया उवाच
अपना ब्लाग शुरू करने में सबसे बड़ी समस्या की-बोर्ड की थी। कहीं से की-बोर्ड मिल ही नहीं रहा था कि कैसे लिखना शुरू हो। खोजते-खोजते देबाशीष के ब्लाग नुक्ताचीनी पर मौजूद छहरी आन लाइन की-बोर्ड की सहायता से बड़ी मुश्किल से कुल जमा नौ शब्द लिखकर अपने ब्लाग की पहली पोस्ट लिखी। हिंदी ब्लाग जगत में मैं लम्बी पोस्टें लिखने के लिये इतना बदनाम हूं कि लोग लम्बी पोस्टों को फ़ुरसतिया टाइप पोस्ट कहते हैं। लेकिन शुरुआत में कुल नौ शब्द लिखकर की थी:

अब कब तक ई होगा ई कौन जानता है !

इसके बाद धीरे-धीरे लिखने लगे। उस समय कुल जमा पचीस-तीस ब्लागर थे। प्रमुख ब्लागरों में रविरतलामी, देबाशीष, जीतेन्द्र चौधरी, अतुल अरोरा आदि थे। पंकज नरूला जिनको हम लोग मिर्ची सेठ कहते थे अक्षरग्राम का संचालन करते थे। इस चौपाल पर सब लोग अपनी समस्यायें और सूचनाएं रखते थे।

उन दिनों WINDOWS 98 और डायल-अप नेट कनेक्शन का जमाना था। आज की तरह विण्डोज़-एक्सपी नहीं थे जिसमें हिंदी का यूनिकोड फ़ॉण्ट पहले से ही मौजूद रहता है और टाइपिंग में ज्यादा मेहनत नहीं उठानी पड़ती है। हमारे शुरुआती दिनों में WINDOWS 98 पर हिन्दी में टाइप करने के लिये तख्ती का प्रयोग किया जाता था। बजरंगबली के इस प्रसाद तख्ती के द्वारा हम अपने पी.सी. को हिन्दी समझने-बूझने लायक बनाते और फ़िर ‘आन लाइन’ हिन्दी की-बोर्ड छहरी की सहायता से कट-पेस्ट करते हुये पोस्ट लिखने लगे। टिपियाने के लिये भी कट-पेस्ट करते। तख्ती पर निर्भरता बहुत दिन तक रही। इसीलिये हम अपने को तख्ती के जमाने का ब्लागर कहते हैं।

पचीस-तीस लोगों के बीच ब्लाग-पोस्टें पढ़ीं जातीं। चिट्ठाविश्व संकलक देबाशीष चक्रवर्ती ने बनाया था। उसमें पोस्ट एक-दो दिन बाद दिखाई देतीं। हम उसी में खुश रहते। लोग एक-दूसरे की पोस्ट पर टिपियाते। ब्लाग संबंधी किसी भी परेशानी के लिये तकनीक के जानकार सदैव उपलब्ध रहते। उन दिनों ब्लागर जी-मेल से संबद्ध नहीं था। देबाशीष और जीतेन्द्र चौधरी के पास न जाने कितने ब्लागरों के पासवर्ड बने और मौजूद रहते थे। लोग ब्लाग लिखने में अपनी समस्या बताते और बाकी का काम ये और इनके अलावा दूसरे स्वयं-सेवक करते रहते। जीतेन्द्र तो  अपनी टिप्पणियों में लिखते भी  थे-

“आपसे केवल एक ई-मेल की दूरी पर हम हैं। कोई समस्या हो निस्संकोच बतायें।”

लोगों को लिखने के लिये उत्साहित करने के लिये कई उपाय किये गये। देबाशीष का इन गतिविधियों में खास योगदान रहा। बुनो कहानी के तहत एक कहानी को तीन लोगों ने मिलकर लिखने का काम शुरू किया। कहानी की शुरुआत कोई करता, उसका अगला भाग कोई लिखता और कहानी का समापन कोई तीसरा करता। हर लेखक को अपनी मर्जी से कहानी को कोई भी मोड़ देने की स्वतंत्रता थी। कुछ दिन में बुनो कहानी का सिलसिला टूट गया।उत्सुक श्रोता

अनुगूंज मेरी समझ में हिन्दी ब्लाग जगत के सबसे बेहतरीन अनुभवों  में से एक रहा। इसे देबाशीष ने शुरू करवाया। इसमें माहवार ब्लागर साथी किसी दिये विषय पर लेख लिखते और फ़िर जो साथी अनुगूंज का संचालन करता वह सभी लेखों की समीक्षा अक्षरग्राम चौपाल पर करता। मेरे ख्याल में हिन्दी ब्लागजगत के सबसे बेहतरीन लेखों का अगर संकलन किया जाये तो उनमें से काफ़ी कुछ अनुगूंज के दौरान लिखे गये होंगे। दिसंबर २००४ में हुये पहले अनुगूंज का विषय था- क्या देह ही है सब कुछ? संयोग कुछ ऐसा कि काफ़ी दिन चलने के बाद अनुगूंज का आयोजन भी बन्द हो गया।

उन दिनों की एक और याद है। अंग्रेजी ब्लाग वाले भारतीय ब्लाग मेला का आयोजन करते थे। उसमें वे लोग सप्ताह में चुनी हुई पोस्टों का जिक्र करते। हम हिंदी वाले ब्लागर भी वहां जाकर अपनी-अपनी पोस्टों का लिंक देने लगे। जो अंग्रेजी ब्लागर हिंदी समझ लेते थे उन लोगों ने हम लोगों की पोस्टों का जिक्र किया। लेकिन एक बार एक ब्लागर ने हमारी पोस्टों को क्षेत्रीय भाषा (हिन्दी) में  लिखी होने की बात कहकर उनका जिक्र करने से इन्कार कर दिया। फ़िर तो वो दे तेरे की, ले तेरे की हुई कि बेचारे को अपना कमेंट बक्सा बन्द करना पड़ा। इस घटना की  प्रतिक्रिया में २००५ के शुरू में चिट्ठा चर्चा प्रारम्भ किया गया जो संयोगवश अभी तक चल रहा है।

इसके बाद चिट्ठाविश्व के धीमा होने की बात कहकर फ़िर नारद की शुरुआत की गयी। इसे पंकज नरूला उर्फ़ मिर्ची सेठ ने शुरू किया था। बाद में इसका संचालन जीतेन्द्र चौधरी करने लगे। काफ़ी दिनों  तक  नारद हिन्दी ब्लाग जगत का सर्वप्रिय संकलक बना रहा। बीच में नारद पर ट्रैफ़िक बढ़ जाने के कारण इसके बंद होने की नौबत आयी तो ब्लागर साथियों ने चंदा करके इसको फ़िर से शुरू करवाया।

जून २००७ में हिंदी ब्लाग जगत के सबसे देरी तक चलने वाला नारद विवाद शुरू हुआ। एक ब्लागर ने बेंगाणी बंधुओं पर आपत्तिजनक व्यक्तिगत टिप्पणी कर दी थी। हमने आपसी सहमति से उस ब्लाग को नारद  पर  बैन कर दिया। इसके बाद तो शुरू हुआ विवाद बहुत दिन तक चला। सारे ब्लाग जगत के लोग दो खेमों में बंट गये। नारद-समर्थक और नारद-विरोधी। कुछ लोग सामंजस्य बिठाने की बात भी कर रहे थे लेकिन नारद विरोधी लोग हमें तानाशाह और अभिव्यक्ति का दुश्मन बताते हुये प्रतिबंध की तुलना आपातकाल से करते रहे। हम अपने कदम को जायज ठहरा रहे थे। मैंने भी इस पर एक पोस्ट लिखी- नारद पर ब्लाग का प्रतिबंध – अप्रिय हुआ लेकिन गलत नहीं हुआ

बहरहाल काफ़ी दिन विवाद चलने के बाद ब्लागवाणी संकलक भी शुरू हुआ। इसके बाद चिट्ठाजगत आया। अभी  नारद को मिलाकर यही तीन प्रमुख संकलक हैं।

आज की तारीख में हिंदी ब्लाग जगत में लगभग छह हजार से अधिक ब्लाग हैं। हर दिन कम से कम पन्द्रह-बीस ब्लाग नये जुड़ने की सूचना मिलती है। लेकिन जब हमारे ब्लागों की संख्या एक सौ होने वाली थी तो हम एक-एक ब्लाग की राह तकते रहते थे कि आंकड़ा सौ तक पहुंचे। पलक पांवड़े बिछाये हर नये ब्लाग का इंतजार करते। जैसे ही सौ ब्लाग हुये हम लोग बच्चों की तरह अस्सी, नब्बे पूरे सौ कहते हुये खुशी से उछल पड़े थे।

ब्लाग के बारे में अलग-अलग लोग अपने-अपने अनुसार धारणा बनाते हैं। पत्रकार इसे मीडिया के माध्यम के रूप में प्रचलित करना चाहते हैं और साहित्यिक रुचि के लोग इसका साहित्यिकीकरण करना चाहते हैं। मेरी समझ में ब्लाग अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। अब यह आप पर है कि आप इसका उपयोग कैसे करते हैं। लेख, कविता, कहानी, डायरी, फोटो, वीडियो, पॉडकास्ट और अन्य तमाम तरीकों से आप ब्लाग की सहायता से अपने को अभिव्यक्त कर सकते हैं।

अभिव्यक्ति के इसी सिलसिले में ब्लाग में कबाड़ से लेकर कंचन तक तक सब कुछ मौजूद है। अगर अस्सी फ़ीसदी कचरा है तो बीस फ़ीसदी कंचन भी मौजूद है। अब यह हम पर है कि हम यहां कंचन की मात्रा कैसे बढ़ाते हैं।

ब्लाग शुरू करना बहुत आसान है। आपका एक जीमेल एकाउन्ट होना चाहिये। इसके बाद आप ब्लागर डाट काम पर जाकर तीन चरणों में अपना ब्लाग शुरू कर सकते हैं। किसी भी किस्म की परेशानी होने पर किसी भी  ब्लाग पर जाकर या मेल लिखकर अपनी परेशानी बतायें वह दूर हो जायेगी। हिंदी के ब्लागर हर जगह मौजूद हैं।

हिंदी ब्लागिंग के इतिहास पर चर्चा के लिये मुझे पन्द्रह मिनट मिले थे। न जाने कितने यादें हैं पिछले चार-साढ़े चार की। सबको पन्द्रह-बीस मिनट की बतकही में समेटना मुश्किल है और आपके साथ अन्याय भी। इसलिये मैं अपनी बात यहीं समाप्त करता हूं। आपने मुझे इतने धैर्य से सुना इसके लिये शुक्रिया।

[नोट: अनूप जी ने अपनी आदत के मुताबिक कानपुर लौटकर स्मरण के आधार पर अपनी वार्ता की स्क्रिप्ट फुरसत से लिखकर मुझे उपलब्ध करा दिया। इसलिए मुझे इस पाठ को ठेलने में प्रायः कुछ भी नहीं करना पड़ा। इसलिए इसे ‘फुरसतिया टाइप पोस्ट’ के बजाय हू-बहू फुरसतिया पोस्ट ही समझा जाय। ]

…जारी

अगला पाठ: डॉ. अरविन्द मिश्रा साइंस ब्लॉगिंग पर

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

LiveJournal Tags:

मिलिए एक साहसी प्रत्याशी से…!

24 टिप्पणियाँ

 

शशि पाण्डेय चुनावी ड्यूटी के रूप में आजकल कोषागार के सभी अधिकारी प्रत्याशियों के चुनावी खर्चे का हिसाब लेने में व्यस्त हैं। व्यय रजिस्टर का सूक्ष्म परीक्षण करने के लिए निर्वाचन आयोग ने कड़े दिशा निर्देश जारी कर रखे हैं। बुधवार को मैं भी इसी कार्य में व्यस्त था। तभी मेरे बॉस का बुलावा आ गया। मैं उनके कार्यालय कक्ष में दाखिल हुआ तो वहाँ का नजारा देखकर दंग रह गया।

एक पढ़ी लिखी सम्भ्रान्त सी दिखने वाली युवती अपने हाथ में कागजों का पुलिन्दा लिए बदहवास सी रोए जा रही थी। गोरे चिट्टे स्निग्ध चेहरे का रंग सुर्ख लाल हो गया था और आँखों से अश्रु धारा बहती जा रही थी। लगातार बोलते रहने से आवाज बैठ गयी थी। क्रोध और असहायता का मिश्रित भाव समेटे उसकी आँखों में भी लाल डोरे उभर आए थे। भर्राती आवाज गला सूखने का संकेत दे रही थी। वहा बैठे दूसरे लोग इस मोहतरमा को चुप कराने की सूरत नहीं निकाल पा रहे थे।  एक तूफान सा उमड़ पड़ा था जो थमने का नाम नहीं ले रहा था।

कुछ क्षण के लिए मैं भी विस्मय से निहारता रहा। फिर मैने महिला गार्ड से ठण्डा पानी लाने को कहा और उन्हें शान्त होकर अपनी बात नये सिरे से धीरे-धीरे कहने का अनुरोध करने लगा। वो अकस्मात्‌ फिर से शुरू हो गयीं तब मैने उनकी बात सुनने से पहले ठण्डा पानी पीने और आँसू पोंछकर बिलकुल नॉर्मल हो जाने की शर्त रख दी।

जब आँधी और बूँदा बाँदी थम गयी तब मुझे पता चला कि ये एक निर्दल प्रत्याशी हैं जो इलाहाबाद से सांसद बनकर देश की सेवा करने का सपना पूरा करना चाहती हैं। एक सपना जो इन्होंने अपने बचपन में ही देखा था और जिसे पूरा करने के लिए अन्य बातों के अलावा अविवाहित रहने का फैसला भी कर लिया था।

फिलहाल जिस समस्या से ये हलकान हुई जा रही थीं वो ये थी कि इनके द्वारा प्रस्तुत खर्च का व्यौरा जाँच अधिकारी ने अस्वीकृत कर दिया था। इस बात का आसन्न खतरा मडराता देखकर इनके होश उड़ गये थे कि शायद इनकी उम्मीदवारी खतरे में न पड़ जाय।

सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर चुकी कु. शशि पांडेय करीब डेढ़ साल पहले अपने पुराने शहर वापस आयी जहाँ २३ वर्ष पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की थी। भारत की संसद में लोकसभा के लिए चुने जाने का सपना इनके दिल और दिमाग पर इस कदर छाया हुआ है कि बड़ी से बड़ी बाधा की चट्टान इनके फौलादी इरादों को रोक नहीं सकती।

सम्पन्न माँ बाप की इकलौती दुलारी बेटी ने अपने लिए जो रास्ता चुना है उसपर चलते हुए इन्होंने दिल्ली की पॉश कॉलोनी की आभिजात्य जीवन शैली का त्याग कर इलाहाबाद की मेजा, माण्डा, करछना तहसीलों के धूल भरे दुर्गम और अन्जान रास्तों पर निकल कर देहात में पसरी बदहाल गरीबी, भुखमरी और लाचारी के बीच उम्मीद की किरण फैलाने का फैसला किया है। कॉन्वेन्ट शिक्षा की विशुद्ध अंग्रेजी जुबान छोड़कर ग्रामीण परिवेश की स्थानीय अवधी/भोजपुरी बोली में संवाद कायम करने की चेष्टा बार-बार मुखरित हो जाती है। 

सुश्री शशि पाण्डे- सांसद प्रत्याशी इलाहाबाद

Name: Km. Shashi Pandey

D/O: shri Vishwanath Pandey

Date of Birth: 13 June, 1963

Marital Status: Unmarried

Residence:  Pitam Nagar, Allahabad

 

Education & Qualifications:

Graduation: BA with  Eng.Literature, History, Political Science-1984 (University of Allahabad)

Post Graduation: MA in Political Science-1986 (AU).

LT : KP Training College, Allahabad-1988.

EDP: Entrepreneur Development Programme- FICC Tanasen Marg- 1994

LLB: Delhi University- Law Centre-2nd.(2001)

Diploma in Human Rights Law (2002): Indian Law Institute(Deemed University)

Family Background: Armed Forces Officers’ Family.

-Represented Delhi University in March 2000 for 1st PN Bhagawati Moot Court Competion in Benglore, Adjudged- “runner up”.

-Member: “Hum Aapke” – a registered NGO for Legal assistance to those who work in public interest. PIL on Ajmer Shariff to root out corruption rampant in Dargah Shariff, Ajmer.

“ I fought for the cause and rights of poor, indigent and sick which was deer to Khwaja Sahib”

“Pain of masses is my own pain. It pains me to watch them without water, electricity, sanitation, cleanliness, road and other basic amenities of life.”

किसी पार्टी का समर्थन प्राप्त किए बिना, समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम गठित किए बिना, और चुनावी अभियान की विस्तृत रूपरेखा तैयार किए बिना ही संसद की मंजिल तक पहुँचने की राह दुश्‍वार नहीं लगती? इस प्रश्‍न का उत्तर कु.शशि बड़े आत्मविश्वास से देती हैं। अपने पहले प्रयास में मेरी कोशिश है कि मैं ग्रामीण जनता से व्यक्तिगत रूप से मिलूँ और उन्हें विश्वास दिलाऊँ कि राजनीति में स्वच्छ और ईमानदार छवि के लोग भी आगे कदम बढ़ाने को इच्छुक हैं।  गाँव के बड़े-बुजुर्गों और महिलाओं ने जिस हर्षित भाव से मेरे सिर पर हाथ रखा है उसे देखकर मुझे बहुत खुशी मिल रही है।

गाँव-गाँव में घूमकर लोगों से अपने लिए वोट जुटाने में लगी शशि को रास्ता बताने वाले भी क्षेत्र से ही खोजने पड़ते हैं। अपनी सुरक्षा के लिए भी इन्होंने जिलाधिकारी से गनर नहीं मांगे। एक मात्र ड्राइवर के साथ सुबह का ‘ब्रन्च’ लेकर जब ये अपनी निजी इण्डिका में निकलती हैं तो पता नहीं होता कि आज किससे मिलना है। जिधर ही दस-बीस लोग दिख जाते हैं वहीं गाड़ी से उतरकर अपना परिचय देती हैं , अपनी योजनाओं को समझाती हैं, आशीर्वाद मांगती हैं, और वहीं से कोई आदमी गाड़ी में बैठकर अगले पड़ाव तक पहुँचा देता है। रात ढल जाने पर किसी देहाती बाजार, छोटे कस्बे या तहसील मुख्यालय में ही धूल, मिट्टी, मच्छर और गर्मी के बीच बिना बिजली के रात बिताने के चिह्न आसानी से चेहरे पर देखे जा सकते हैं। प्रत्येक तीसरे दिन चुनावी खर्चे का एकाउण्ट दिखाना अनिवार्य है इसलिए शहर आकर समय खराब करना पड़ता है।

इतने मजबूत और नेक इरादों वाली लड़की यदि छोटी सी बात पर रोती हुई पायी जाती है तो इसका क्या अर्थ क्या समझा जाय? एक नेता यदि इतना अधीर हो जाएगा तो कठिन परिस्थियों में कैसे नेतृत्व देगा? इस सवाल पर शशि झेंप जाती है लेकिन झटसे सच्चाई का खुलासा करती है। दर‍असल मुझे लगा कि मेरी एक चूक से मेरा सारा सपना यहीं चकनाचूर हुआ जा रहा है। मैं नियम कानून का अक्षरशः पालन करने में विश्वास करती हूँ। कोई गलत काम करने के बारे में सोच भी नहीं सकती। कानून का पेशा है मेरा। फिर भी यदि एक कानूनी चूक से मुझे ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है तो यह मेरे लिए सबसे बुरा होगा। इसी घबराहट में मेरा धैर्य जवाब दे गया था।

http://www.blogger.com/img/videoplayer.swf?videoUrl=http%3A%2F%2Fvp.video.google.com%2Fvideodownload%3Fversion%3D0%26secureurl%3DqAAAAO3T1daHheEeH3ZcEQIwEb8mRnHhAFuqg4tt95n1BnfOn9SjxYC5CIotgf9uVx8Kg7aO3Ei0FwXD4UB8jPlBw8n7Up5b6ozvkBOhnQFgGFvipx3n93yPg77hxxXAPrzi2hOS1T2yrmH2ReJvFxHCr1NHO-6m_gCedHPtDg9MzdFcenZwHoMYajPjuW9nrnskC0odgUHAV-nhBDIAJAmApuaXRNkg6IzihC_dlJyfgwlg%26sigh%3DIrwYFAa54VNWUfAD3THYwHXiFRo%26begin%3D0%26len%3D86400000%26docid%3D0&nogvlm=1&thumbnailUrl=http%3A%2F%2Fvideo.google.com%2FThumbnailServer2%3Fapp%3Dblogger%26contentid%3D22fb359df14b3852%26offsetms%3D5000%26itag%3Dw320%26sigh%3DlNYU8HcsB-HUO9p1MZOPjhhR3VA&messagesUrl=video.google.com%2FFlashUiStrings.xlb%3Fframe%3Dflashstrings%26hl%3Den

शशि से लम्बी बात-चीत मैने अपने मोबाइल कैमरे से रिकॉर्ड की है। इसे दो-तीन बार सुन चुका हूँ। सुनने के बाद मेरा मन बार-बार यही पूछ रहा है कि इस युग में क्या ईमानदारी भी मनुष्य को कमजोर बना देती है?

चुनावी कुण्डलियाँ… वाह नेता जी!

18 टिप्पणियाँ

 

indian_election_392765

आजकल चुनावी सरगर्मी में कोई दूसरा विषय अपनी ओर ध्यान नहीं खींच पा रहा है। दिनभर दफ़्तर से लेकर घर तक और अखबार-टीवी से लेकर इण्टरनेट तक बस चुनावी तमाशे की ही चर्चा है। सरकारी महकमें तो बुरी तरह चुनावगामी हो गये हैं।

ऐसे में मेरा मन भी चुनावी कविता में हाथ आजमाने का लोभ संवरण नहीं कर सका। तो लीजिए पेश हैं:

चुनावी कुण्डलियाँ

smile_embaressed

वामपन्थ की रार से अलग पड़ गया ‘हाथ’।
सत्ता की खिचड़ी पकी, अमर मुलायम साथ॥

अमर मुलायम साथ चले कुछ मास निभाए।
बजा चुनावी बिगुल, छिटक कर बाहर आए॥

यू.पी. और बिहार में, नहीं ‘हाथ’ का काम।
तीन-चार मोर्चे बने, ढुल-मुल दक्षिण-वाम॥

smile_omg

अडवाणी की मांग पर, मनमोहन हैं मौन।
सत्ताधारी पीठ का,     असली  नेता कौन॥

असली नेता कौन समझ में अभी न आया।
अडवानी,  पसवान,  मुलायम,  लालू,  माया॥

लोकतंत्र का मन्त्र,  जप रही बर्बर वाणी।
‘पी.एम. इन वेटिंग’ ही  बन बैठे अडवाणी॥

smile_wink

नेता पहुँचे क्षेत्र में, भाग-भाग हलकान।
वोटर से विनती करें, हमें चुने श्रीमान्‌॥

हमें चुनें श्रीमान्,    करूँ वोटर की पूजा।
मैं बस एक महान, नहीं है काबिल दूजा॥

मचा   चुनावी शोर,  घोर घबराहट देता।‌
पाँच वर्ष के बाद    लौटकर आया नेता॥

आप चुनाव का भरपूर आनन्द लीजिए। लेकिन एक विनती है कि मतदान के दिन धूप, गर्मी, और शारीरिक कष्ट की परवाह किए बिना अपना वोट ई.वी.एम. मशीन में लॉक कराने जरूर जाइए। यदि हम इस महत्व पूर्ण अवसर पर अपने मताधिकार का सकारात्मक प्रयोग नहीं करते हैं तो राजनीतिक बहसों में हिस्सा लेने का हमें कोई हक नहीं है।

(सिद्धार्थ)

संगम से यमुना पुल तक नौका-विहार

13 टिप्पणियाँ

 

माघ की पूर्णिमा का स्नान सम्पन्न होने के बाद प्रयाग का माघ मेला अपने अवसान पर पहुँच गया है। कल्पवासी भी संगम क्षेत्र का प्रवास पूरा करके अपने घर की राह पकड़ रहे हैं। साइबेरिया से आने वाले प्रवासी पक्षी भी ठंडक समाप्त होने के बाद अपने देश को लौटने वाले हैं।

वसन्त का आगमन हो ही चुका है। इस सुहाने मौसम में संगम क्षेत्र की छटा निराली हो जाती है। हल्की गुनगुनी धूप में खुली नाव में बैठकर यमुना के गहरे हरे पानी पर अठखेलियाँ करते प्रवासी पक्षियों के बीच सैर करना अद्‌भुत आनन्द देने वाला है। गत दिनों सपरिवार इस सुख का लाभ उठाने का अवसर मिला।

आप जानते ही हैं कि इलाहाबाद में यमुना नदी गंगा जी में मिलकर परम पवित्र संगम बनाती है। संगम पर मिलने से ठीक पहले यमुना पर जो आखिरी पुल बना है वह अभी बिलकुल नया (सन्‌ २००४ ई.) है तथा आधुनिक अभियान्त्रिकी का सुन्दर नमूना भी है। दो विशालकाय खम्भों से बँधे तारों ले लटकता हुआ (Cable-stayed bridge) यह ६१० मीटर लम्बा पुल संगम क्षेत्र में आने वाले लोगों के लिए एक अतिरिक्त आकर्षण का केन्द्र बन गया है।

Structure: Allahabad Yamuna River Bridge
Location: Allahabad, Uttar Pradesh, India
Structural Type:
 

Cable-stayed bridge
H-pylon, semi-fan arrangement

Function / usage:
 

Road bridge

eight-lane highway

Next to: Allahabad Yamuna River Bridge (1911)
main span 260 metre
total length 610 metre
girder depth 1.4 metre
deck width 26 metre
deck slab thickness 250 millimetre

मोटर चालित नौका पर बैठकर जब हम संगम से यमुना जी की ओर धारा की विपरीत दिशा में इस पुल की दिशा में बढ़े तो मेरे मोबाइल का कैमरा आदतन सक्रिय हो उठा:

पुल ११ नाव पर से नया पुल ऐसा दिखता है- पीछे पुराना पुल
पुल १४ किनारे के बाँध से दिखती पुल के नीचे जाती नाव
पुल ९ पुल के नीचे से लिए गये चित्र में इन्द्रधनुष …?
पुल १ एक दूसरी नाव से क्रॉसिंग भी हुई
 पुल ५यहाँ यमुना की गहराई की थाह नहीं है
पुल २ किला-घाट : बड़े हनुमान जी पास में ही लेटे हुए हैं
पुल ८अकबर का किला यमुना जी को छूता हुआ खड़ा है 
पुल ४ यमुना जी की सतह पर कलरव करते विदेशी मेहमान
पुल १३ यमुना तट पर वोटक्लब जहाँ ‘त्रिवेणी-महोत्सव’ होगा 
पुल ७पुराना यमुना पुल (निर्माण सन्‌ १९११ई.)

नाव से हम संगम के निकट बने घाट पर उतरे। यमुना का गहरा हरा और साफ पानी गंगाजी के मटमैले किन्तु ‘पवित्र’ जल से मिलता हुआ एक अद्‌भुत कण्ट्रॉस्ट बना रहा था।

पुल ६

बदलता रंग:  संगम पर गंगाजी से मिलती हुई यमुनाजी

कुछ तस्वीरें बाल-गोपाल की इच्छा पर यहाँ देना जरूरी है:

Image051 सारथी पुल १० दादी और बाबा जी
Image063 माँ-बेटा पुल १७
अभी क्यों उतार दिया नाव से?

अनावश्यक सूचना:)

अगले सप्ताह से (१५ से २१ फरवरी तक) त्रिवेणी महोत्सव शुरू हो रहा है। लगातार सात शामें यमुना तट पर गुजरेंगी। उस दौरान अपनी ब्लॉगरी को विराम लगना तय है।:)smile_cry

(सिद्धार्थ)

Older Entries Newer Entries