पोला पर्व की धूम और विदर्भ पर इन्द्रदेव का कोप

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भारत का विदर्भ क्षेत्र खेती-बाड़ी के प्रयोजन से बहुत उर्वर और लाभकारी नहीं माना जाता। कपास, सोयाबीन इत्यादि की खेती करने वाले किसान अनेक समस्याओं से जूझते रहते हैं। मौसम की मार से फसल बर्बाद होने का सिलसिला लगातार चलता रहता है। कर्ज और बदहाली से तंग आकर उनके आत्महत्या कर लेने तक की घटनाएँ सुनायी देती रहती हैं। वर्धा विश्वविद्यालय के प्रांगण में रहते हुए मुझे दो माह से अधिक हो गये हैं। यहाँ के बरसाती मौसम में इस बार खूब जलवृष्टि हुई है। चारो ओर से बाढ़ और फसल की बर्बादी की खबरें आ रही हैं। ऐसे में जब पिछली शाम को अचानक पूर्वी आकाश में इन्द्रधनुष दिखायी दिया तो बारिश बंद होने की आशा जगी। लगातार होती बारिश ने हम जैसे अकिसान की नाक में भी दम कर रखा था।

    घर के पीछे पूर्वी क्षितिज पर उगा इंद्रधनुष    ठीक उसी समय पश्चिमी क्षितिज पर सूर्यास्त

अगले दिन बुधवार की सुबह जब सोकर उठा तो  इंद्रधनुष और मेरे अनुमान को धता बताते हुए बादल फिर से छा गये थे। बारिश बेखौफ़ सबकी छाती पर मूंग दल रही थी। लेकिन जब मैं स्टेडियम जा रहा था तो रास्ते में एक नया नज़ारा मिला। तमाम लोग ऐसे मिले जो बारिश की परवाह किए बिना सड़क किनारे बंजर जमीन में उगे पलाश की झाड़ियों से टहनियाँ और पत्ते तोड़कर ले जा रहे थे। जब मैं चौराहे पर पहुँचा तो एक ठेले पर यही पलाश बिक्री के लिए लदा हुआ दिखायी पड़ा। साइकिल पर पलाश की टहनियाँ दबाकर ले जाते एक दूधवाले से मैने पूछा  कि ये पलाश क्या करोगे। वह हिंदी भाषी नहीं था। मुझे उसने उचटती निगाह से देखा और कठिनाई से इतना बता सका- “परस बोले तो …पोला वास्ते” उसने पलाश को परस कहा यह तो स्पष्ट था लेकिन पोला? मैं समझ न सका।

शाम के वक्त बारिश की रिमझिम के बीच आर्वी नाका (चौराहा जहाँ से आर्वी जाने वाली सड़क निकलती है) की ओर जा रहा था तो अनेक जोड़ी बैल पूरी सजधज के साथ एक ही दिशा से आते मिले। सींगे रंगी हुई, गले में घण्टी लगी माला और मस्तक पर कलापूर्ण श्रृंगार, पीठ पर रंगीन ओढ़नी और नयी रस्सी से बना पगहा (बागडोर)। इनकी डोर इनके मालिक के हाथ में थी। टुन-टुन की आवाज करते, अपने मालिक के साथ लगभग दौड़ते हुए ये किसी एक मेला स्थल से वापस आ रहे थे। मैं मन मसोस कर रह गया कि काश इनकी तस्वीरें ले पाता। शुक्र है इसकी कुछ क्षतिपूर्ति गूगल सर्च से और कुछ सुबह के अखबार से हो गयी।

अगले दिन सुबह अखबार खोलकर देखा तो मुखपृष्ठ पर सजे-धजे बैल की पूजा करते किसान परिवार की रंगीन तस्वीर छपी थी। लेकिन उसके बगल में यह दिल दहला देने वाली खबर भी थी कि विदर्भ क्षेत्र के पाँच किसानों ने पिछले चौबीस घण्टे में आत्महत्या कर ली जिसमें एक वर्धा के निकट ही किसी किसान ने कुँए में कूदकर जान दे दी थी। खबर के अनुसार पिछले कई दिनों से जारी घनघोर बारिश के कारण उनकी कपास की फसल घुटने तक पानी में पूरा डूब गयी थी। जब वे खेत से यह बर्बादी का नज़ारा देखकर आये तो आगे आने वाली तक़लीफ़ों की कल्पना से इतना तनावग्रस्त हो गये कि आत्महत्या का रास्ता चुन लिया। समाचार पढ़कर मुझे इस उत्सव की उमंग फीकी लगने लगी। मैंने शहर की ओर जाते समय देखा कि आर्वी नाके पर पलाश की टहनियों का ढेर जमा हो चुका था और उसमें आग लगा दी गयी थी। pola 004हाई-वे बाई-पास से शहर की ओर जाने वाली सड़क के नुक्कड़ पर सुबह-सुबह अस्थायी कसाईबाड़ा देककर मुझे हैरत हुई। बहुत से बकरे काटे जा रहे थे, और ग्राहकों की भीड़ इकठ्ठा होने लगी थी। मैंने स्टेडियम में अपने एक साथी खिलाड़ी से इस पर्व के बारे में पूछा तो उन्होंने बहुत रोचक बातें बतायी जो आपसे बाँट लेता हूँ। 

भादो महीने की अमावस्या के दिन शुरू होने वाला दो दिवसीय पोला-पर्व मराठी संस्कृति का एक बहुत महत्वपूर्ण अंग है। यह कृषक वर्ग द्वारा मनाया जाने वाला खेती का उत्सव है। पारंपरिक रूप से बैल किसान का सबसे बड़ा सहयोगी रहा है। भादो महीने के मध्य जब खेतों में जुताई इत्यादि का कार्य नहीं हो रहा होता है तब गृहस्थ किसान अपने बैलों को सजा-सवाँरकर उनकी पूजा व सत्कार करता है। दरवाजे पर पलाश की डालियाँ सजायी जाती है और उनकी पूजा होती है। अच्छी फसल के लिए मंगल कामना की जाती है। वह अपने हलवाहे को नया वस्त्र देता है, उसके पूरे परिवार को अपने घर पर भोजन कराता है। हलवाहा उन सजे-धजे बैलों की जोड़ी लेकर गाँव के ऐसे घरों के दरवाजे पर भी जाता है जहाँ बैल नहीं पाले गये होते हैं। pola 003ऐसे प्रत्येक घर से बैलों की पूजा होती है, और सभी लोग हलवाहे को कुछ न कुछ दक्षिणा या बख्शीश भेंट करते हैं। शाम को गाँव के सभी बैलों की जोड़ियाँ एक नियत स्थान पर जमा होती हैं। इस स्थान को रंगीन झंडियों और पत्तों से बने तोरण द्वार से सजाया जाता है। यहाँ बैलों की सामूहिक पूजा होती है और उनकी दौड़ जैसी प्रतियोगिता होती है। इसमें विजेता बैल के मालिक को समाज के प्रतिष्ठित लोगों द्वारा ईनाम भी दिए जाते हैं।

मेले से प्रसाद के साथ लौटकर आने के बाद किसान के घर में उत्सव का माहौल छा जाता है जो रात भर चलता है। यह पर्व खाने-पीने के शौकीन लोगों को अपना शौक पूरा करने का अच्छा बहाना देता है। श्रावण मास में मांसाहार से परहेज करने वाले लोग भादो माह के इस पर्व की बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं। गरीब हलवाहा भी इसदिन लोगों की बख्शीश पाकर कम खुश नहीं होता। इस खुशी का इजहार प्रायः वह शराब पीकर करता है। मांस खाने और दारू पीने का यह दौर दूसरे दिन तक चलता है। रात को जिस पलाश की पूजा होती है अगले दिन सुबह उसे एकत्र कर जलाया जाता है। मान्यता है कि इसके जलने से वातावरण में कीड़े-मकोड़ों और मच्छरों की संख्या कम हो जाती है।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन महिलाओं का तीज व्रत आ जाता है जिसे यहाँ  ‘कजरातीज’ कहा जाता है। आज दिनभर इस व्रत-त्यौहार संबंधी सामग्री से बाजार अटा हुआ था। केले के हरे पौधे, नंदी के खिलौने, फल-मूल और सुहागिन औरतों के श्रृंगार के साजो-सामान लिए एक महिला की दुकान की तस्वीर लेने के लिए जब मैं आगे बढ़ा तो वह हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी। गरीबी की दुहाई देने लगी। उसे लगा कि मैं कोई सरकारी आदमी हूँ जो सड़क पर दुकान लगाने के खिलाफ़ कार्यवाही करने वाला हूँ। मैंने उसे आश्वस्त किया लेकिन उसका चेहरा किसी अन्जानी आशंका से ग्रस्त होता देख मैं वापस मुड़ गया। हाँ, एक फोटो खींच लेने का लोभ-संवरण मैं फिर भी नहीं कर पाया।

आप जानते ही हैं कि भाद्रपद शुक्लपक्ष चतुर्थी के दिन महाराष्ट्र में गणपति की स्थापना होती है। उसके बाद महालक्ष्मी और दुर्गा के त्यौहार आ जाते हैं। इसप्रकार यहाँ त्यौहारों का मौसम पूरे उफ़ान पर है। ऐसे में इंद्रदेव की वक्रदृष्टि के शिकार विदर्भ के अधिकांश किसान विपरीत परिस्थितियों में भी पोला का पर्व धूमधाम से मना रहे हैं। लेकिन कुछ ने हिम्मत छोड़ दी और मौत को गले लगा लिया। यह विडम्बना देखकर मन परेशान है। क्या करे?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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लोकतन्त्र के भस्मासुर

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“कृपया मेरे सच बोलने पर नाराज न होइए; कोई भी व्यक्ति जो इस नगर-राज्य में घट रही अनेक अन्यायपूर्ण व गैरकानूनी घटनाओं को रोकने की कोशिश करेगा; और आपका या किसी अन्य ‘भीड़’ का सच्चा विरोध करेगा वह बच नहीं पाएगा। कोई भी व्यक्ति जो न्याय के लिए वास्तविक संघर्ष करता है, उसे यदि जीने की थोड़ी भी इच्छा है तो उसे सार्वजनिक जीवन त्याग कर निजी ज़िन्दगी बितानी होगी।” (एपॉल्जी से)

image यह उद्‍गार ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के गुरू सुकरात ने ‘जूरी’ के सामने भरी अदालत में तब व्यक्त किए थे जब उनके विरुद्ध देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा था। कुछ ही समय में वह जूरी उन्हें मृत्युदण्ड सुनाने वाली थी। प्लेटो ने अपने गुरू की मौत का कारण जिस राज-व्यवस्था को ठहराया उसे ‘डेमोक्रेसी’ कहा जाता था, जिसमें भींड़ द्वारा नितान्त अविवेकपूर्ण निर्णय लिए जाते थे, और प्रायः अन्यायपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। वही डेमोक्रेसी आज दुनिया की सबसे लोकप्रिय, सर्वमान्य और सर्वाधिक व्यहृत शासन व्यवस्था हो गयी है। यह बात अलग है कि राजनीति विज्ञान के जानकार प्राचीन ग्रीक कालीन डेमोक्रेसी और आधुनिक ‘लोकतंत्र’ में जमीन-आसमान का अन्तर बताएंगे।

प्लेटो ने जिस नगर-राज्य को देखा था उसकी जनसंख्या इतनी छोटी होती थी कि राज्य के सभी नागरिक एक स्थान पर एकत्र होकर बहुमत से अपना शासक चुन लेते थे। भीड़ का एक बड़ा हिस्सा जिसे पसन्द करता था वही राजा होता था और उसके फैसले सभी नागरिकों पर बाध्यकारी होते थे। सिद्धान्त रूप में आज भी लोकतंत्र का मतलब यही है- जनता की सरकार, जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों की बहुमत आधारित सरकार।

लेकिन प्लेटो ने इस बहुमत की व्यवस्था का जो विश्लेषण किया, वह इसकी खामियों को उजागर करने वाला है, और कदाचित्‌ सच्चाई के करीब भी है। उन्होंने राज्य की तुलना एक व्यक्ति से की थी, और बताया था कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के भीतर इन्द्रियबोध (sensation), चित्तवृत्ति (emotion), और बुद्धि (intelligence) के बीच उचित तालमेल से ही उसका सन्तुलित और स्वस्थ जीवन सम्भव है, उसी प्रकार राज्य के विभिन्न अवयवों के आपसी सामन्जस्य से ही न्यायपूर्ण राज-व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। यदि बुद्धि-विवेक के ऊपर मन व शरीर में पलने वाले काम, क्रोध, मद व लोभ जैसे विकार हावी हो जाते हैं, तो व्यक्तित्व दोषयुक्त और अन्या्यपूर्ण हो जाता है। शरीर के ऊपर मन और मन के ऊपर मस्तिष्क का नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। यदि नियन्त्रण की यह दिशा उलट-पु्लट जाय तो व्यक्ति नष्ट होने लगता है। पतन अवश्यम्भावी हो जाता है। यही स्थिति उस राज्य की भी होती है, जहाँ विवेक पर उन्माद हावी हो जाता है।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सभी व्यक्तियों को एक इकाई के रूप में बराबर माना जाता है। भले ही उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता तथा सामाजिक पृष्ठभूमि में भारी अन्तर हो। यह व्यवस्था इसी सिद्धान्त पर टिकी है कि राज्य/देश की सरकार चुनने में प्रत्येक व्यक्ति के मत का मान बराबर है। कोई किसी से कम या अधिक महत्व नहीं रखता। कुल मतदाताओं में से बहुमत जिसके पक्ष में हो, वही सरकार बनाता है। इस सरकार द्वारा जो भी निर्णय लिए जाते हैं वह उन अल्पमत वाले नागरिकों पर भी प्रभावी होता है जिनका मत इस सरकार के विरुद्ध रहा है।

सिद्धान्त रूप में इस व्यवस्था में कोई कमी नहीं नज़र आती; लेकिन व्यवहार में बहुत कुछ बदला हुआ नजर आता है। प्लेटो ने इन बदलावों पर कुछ प्रकाश डाला था। बहुमत की पसन्द कौन होता है? लोकप्रियता का पैमाना क्या है? व्यक्ति अपना नेता किसे चुनता है? जिसे देश की सम्पूर्ण जनता का ख़्याल रखना है; आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, सामरिक, राजनयिक, वाणिज्यिक आदि विषयों से सम्बन्धित लोकनीति बनानी है, उसका चुनाव करते समय जनता इन विषयों में उसकी प्रवीणता देखने के बजाय उसकी जाति, उसका धर्म व रंग देखती है; उसकी वक्तृता पर मोहित हो जाती है, किसी दूसरे क्षेत्र में उसके कौशल से प्रभावित हो लेती है; और अपना नेता चुन लेती है।

अच्छी भाषण कला में माहिर एक नेता किसी स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दे पर आम जनता का मत एक डॉक्टर की अपेक्षा अधिक आसानी से बदल सकता है। वह कमजोर और निरीह नागरिकों  को भी शत्रु देश पर हमले के लिए तैयार कर सकता है, जो एक आर्मी-जनरल नहीं कर सकता। जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रभावशाली भाषण के माध्यम से बड़े-बड़े जनसमूहों को सम्मोहित कर बेवक़ूफ बनाने और उनके अन्ध-समर्थन से अत्यन्त शक्तिशाली बन जाने के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है।

फ्रेडरिक नीत्शे कहते थे कि उन्माद, पागलपन, मूर्खता या विक्षिप्तता के लक्षण किसी व्यक्ति के भीतर किंचित्‌ ही पाये जाते हैं; लेकिन एक समूह, दल, राष्ट्र या किसी ऐतिहासिक कालखण्ड में ये लक्षण एक अनिवार्य नियम जैसे मिलते हैं। एक भीड़ या समूह का हिस्सा बन जाने पर व्यक्ति के सोचने समझने का ढंग पूरी तरह बदल जाता है। भीड़ में उसकी मानसिकता भेंड़ जैसी हो जाती है। विवेक भ्रष्ट हो जाता है। इसी भीड़ द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जब सरकार चलाते हैं तो सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ता है।

भारतवर्ष में लोकतंत्र का जो मॉडल चलाया जा रहा है, उसमें भी इस उत्कृष्ट सिद्धान्त का व्यावहारिक रूप किसी धोखे से कम नहीं है। यहाँ का समाज भी जाति, धर्म, कुल, गोत्र, क्षेत्र, रंग, रूप, अमीर, गरीब, अगड़े, पिछड़े, दलित, सवर्ण, निर्बल, सबल, शिक्षित, अशिक्षित, शहरी, ग्रामीण, उच्च, मध्यम, निम्न, काले, गोरे, स्त्री, पुरुष, आदि के पैमानों पर इतना खण्ड-खण्ड विभाजित है; और ये पैमाने हमारी लोक संस्कृति में इतनी गहरी पैठ बना चुके हैं, कि किसी भी मुद्दे पर आम सहमति या सर्वसहमति नहीं बनायी जा सकती। राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना से हम कोसों दूर हैं। ऐसे में बहुमत का अर्थ मात्र दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों तक सिमट जाता है। शेष मत विखण्डित होकर इस आँकड़े से पीछे छूट जाते हैं।

कोई भी राजनेता यदि इस गणित को ठीक से समझ लेता है तो वह उन्हीं दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों को अपने पक्ष में सुनिश्चित हुआ जानकर सन्तुष्ट हो लेता है, और यह सन्देश भी देता है कि उनके हितों की रक्षा के लिए वह कुछ भी कर सकता है। सारे नियम-कायदे ताख़ अपर रख सकता है; दूसरे समूहों को सार्वजनिक रूप से गाली दे सकता है; साम्प्रदायिक हिंसा करा सकता है; मार-पीट, झगड़ा-लड़ाई, अभद्रता और गुण्डागर्दी से यदि उनका स्वार्थ सधता है तो उसका सहारा लेने में तनिक भी संकोच नहीं करता है। विरोधी मतवाले वर्ग के विरुद्ध खुलेआम अत्याचार और दुर्व्यवहार करने से यदि उसके पीछे खड़ी उन्मादी भीड़ तालिया पीटती है तो इस तथाकथित जनप्रतिनिधि को वह सब करने में कोई गुरेज़ नहीं है।

ऐसी हालत में लोकतन्त्र के चार उपहार- स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व व न्याय एक बड़े वर्ग के हाथ से छीन लिए जा रहे हैं, और इन्हें लोकतन्त्र के भस्मासुर अपनी चेरी बनाकर रखने में सफल हो रहे हैं। आजकल अखबारों की सुर्खिया ऐसे समाचारों से भरी पड़ी हैं जहाँ नेता जी अपनी बात मनवाने के लिए प्रशासन के अधिकारियों को मारने-पीटने से लेकर उनकी हत्या कर देने से भी गु़रेज नहीं करते। राजनैतिक पार्टियों द्वारा आपसी रंजिश में एक दूसरे पर राजनैतिक हमले करना तो अब पुरानी बात हो गयी है। अब तो सीधे आमने-सामने दो-दो हाथ कर लेने और विरोधी के जान-माल को क्षति पहुँचाने का काम भी धड़ल्ले से किया जा रहा है।

क्या हम प्लेटो के मूल्यांकन को आधुनिक सन्दर्भ में भी सही होता नहीं पा रहे हैं? 

गाँव में ताज़िया का मेला: तब और अब

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इस साल बहुत दिनों के बाद मोहर्रम के मौके पर गाँव जाने का अवसर मिला। मन में यह जानने की उत्सुकता थी कि बचपन में हमें जिस ‘ताजिया मेला’ का इन्तजार सालोसाल रहता था, उसका अब क्या रूप हो गया होगा।

हमें याद है जब बगल के गाँव में लगने वाले ताजिया के मेले के दिन [मोहर्रम की दसवीं तारीख (योमे आशुरा) ] हम दोपहर से ही तैयार होकर घर के बड़े-बुजुर्गों से ‘मेला करने’ के लिए चन्दा इकठ्ठा करते थे। गाँव के बीच से गुजरने वाली सड़क से होकर मेले की ओर जाने वाली ताजियों की कतार व उन्हें ढोने वालों व साथ चलने वालों के कंठ से हासन-हुसैन की जै-जयकार के नारों के बीच ढोल नगाड़े की कर्णभेदी ध्वनियों के साथ उड़ती हुई धूल को दरकिनार कर उनके बीच में तमाशाई बन पहुँच जाते थे। मेले में पहुँचकर चारो ओर से आने वाली ताजियों की प्रदर्शनी देखते, मुस्लिम नौजवानों की तलवार बाजी व अन्य हथियारों का प्रदर्शन व विविध शारीरिक कौशल के करतब देखकर रोमांचित हो जाते।

आसपास के २०-२५ गाँवों के हिन्दू-मुस्लिम जुटते थे मेले में। दूर-दूर से लड़कियाँ, औरतें और बच्चे बैलगाड़ी में लद-फदकर आ जाते। अपने-अपने अभिभावक के साथ ‘मेला करते’ लाल-पीले-हरे परिधानों में लिपटे हुए। तेल-इत्र-फुलेल का प्रयोग पूरी उदारता से किया जाता था।

मेले में बिकने वाली कड़क लाल रंग की जलेबी, इसकी रंगीली रसीली बहन इमरती, गट्टा-बताशा, ल‍इया, मूँगफली, चिनियाबादाम, फोंफी, इत्यादि बच्चों को ललचाती थी तो घर-गृहस्थी के उपयोग की तमाम सामग्रियों से सजी दुकानें बड़ी उम्र के पुरुषों व महिलाओं को आकर्षित करती थीं। मेले में पुराने परिचितों और रिश्तेदारों से मुलाकात भी हो जाया करती थी। काफी समाचारों और हाल-चाल का आदान-प्रदान भी हो जाता था। कुछ जोड़ों की शादियाँ भी तय हो जाने की भूमिका बन जाया करती थी।

तब हमें यह कदाचित्‌ पता नहीं था कि मोहर्रम का पर्व पैगम्बर साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है जहाँ मूलतः शोक का भाव प्रधान होता है। हम बच्चों के लिए तो यह स्कूल से छुट्टी और मेले की मौज-मस्ती का दिन होता था।

पिछले बीस-पच्चीस सालों में ग्रामीण समाज में भी काफी बदलाव आ गये हैं। शहरों की ओर आवागमन बढ़ने से बाजार की संस्कृति का प्रसार तेजी से हुआ है। आर्थिक संसाधन बढ़े हैं, उपभोक्ता वस्तुओं का विपणन बढ़ा है और दूरस्थ क्षेत्रों तक इनकी पहुँच भी बढ़ गयी है।  अब मेले का रूप वह नही रहा। बाहरी चमक-दमक तो बढ़ गयी है लेकिन ग्रामीण लोगों की सामाजिकता संकुचित सी हो गयी है।

अब विशाल, ऊँचे और दामी ताजिये बनाने की होड़ लग रही है। इतने बड़े कि उन्हें कन्धों पर लादकर ढोते हुए मेले में ले जाना सम्भव ही नहीं रहा। अब तो जिस गाँव में ये बनाये जाते हैं, वहीं पर मेला लग जाता है। परिणाम यह है कि हर दूसरे गाँव में एक बड़े ताजिए के इर्द-गिर्द छोटा सा मेला लगा हुआ है। कई-कई लाख रूपयों की लागत लगाकर ताजिए बनाए जा रहे हैं। रचनात्मकता औए उत्कृष्ट हस्तकला का नित नया और सुन्दर नमूना पेश करने वाले कारीगर इन दिनों बहुत व्यस्त हो जाते हैं।

इस बार मुझे बगल का पारम्परिक मेला बेजान लगा तो दूसरे गाँव में बनी एक नामी ताजिया को देखने चल पड़ा। वहाँ की कुछ तस्वीरें मोबाइल के कैमरे मे कैद कर लाया हूँ:

 

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पूर्वी उत्तरप्रदेश के कुशीनगर जिले के ‘बन्धवा’ गाँव में खड़ी की गयी इस ताजिया के निर्माता कलाकारों ने बताया कि उन्होंने दिल्ली की मशहूर जामा मस्जिद का प्रतिरूप बनाने की कोशिश की है। लकड़ी, बाँस और रंगीन कागजों से तैयार इस ताजिए की इस ऊपर वाली तस्वीर में इसका पिछला भाग दिखाया गया है जबकि नीचे वाली तस्वीर में सामने की ओर बने प्रवेश द्वार से अन्दर जा रहे लोगों की अपार भीड़ दिखायी दे रही है।

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सुदूर ग्रामीण अञ्चल की दृष्टि से एक अद्‍भुत दृश्य उत्पन्न करने वाले इस मॉडल के सामने के मुख्य द्वार पर जियारत करने वालों की भीड़ लगी रही जिसमें मची ठेलमठेल के कारण मैं भीतर जाने से वञ्चित रह गया।

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मेले में जो लोग आये थे उनका उद्देश्य इस ताजिए को देखना ही था। वहाँ की दुकानों में सजी सामग्री कुछ खास नहीं थी। पान, तम्बाकू, गुटखा, चाय, पकौड़ी, जलेबी, सूजी का हलवा, उनपर भिनभिनाती मक्खियाँ, सस्ती-रंगीन टॉफी, बच्चों के हल्के कपड़े जैसी साधारण चीजें ही थीं। अलबत्ता देहात की औरतों और लड़कियों के साज-श्रृंगार के सामान, चूड़ियों और अधोवस्त्रों का फूहड़ प्रदर्शन करती दुकानें जरूर लगी हुई थीं। उनपर खरीदारों की भीड़ भी जमी हुई थी।

Image025 क्या खरीदें? कैसे खरीदें?

 Image026 चुप रह बेटा! चूड़ियाँ पसन्द तो कर लूँ…

Image024यह बिन्दी कैसे है? 

मेले में कुछ ऐसे दृश्य भी थे जिनकी तस्वीर लेना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। सरेआम भीड़ के बीच में ही खुले में बकरे-बकरियों को हलाल करके उनका चमड़ा छीलना, एक लठ्ठे से लटकाकर मांस की बोटियाँ काट-काटकर बेंचना, मुर्गे-मुर्गियों के पैर रस्सी में बाँधकर रखना और खरीदार की पसन्द के मुताबिक छाँटकर उसे उसके सामने ही जिबह करना, केंव-केंव के करुण क्रन्दन की क्रमशः कम होती ध्वनि से निस्पृह धारदार हथियार के यन्त्रवत प्रयोग से उनकी एक के बाद एक घटती संख्या छोटे-छोटे बच्चों के मानस-पटल पर क्या प्रभाव छोड़ेगी, यह सोचकर मन दुःखी हो गया।

निष्प्रयोज्य मांस के टुकड़ों व रक्त के लिए झगड़ते कुतों की टोली और उनपर भिनभिनाती मक्खियाँ पूरे मेला क्षेत्र में घूमते हुए अन्य खाद्य पदार्थों को दूषित कर रही थीं। 

सुर्ख लाल कलगी वाला

एक सफेद मुर्गा

दुकान पर बँधा

कोंय-कोंय करता हुआ

तेजी से मिट्टी खोद रहा है

अपने लिए अनाज के दाने

या कीड़े-मकोड़े खोज रहा है

ताकि वो उसे अपना आहार बना सके।

इस बात से बेखबर

बेपरवाह

कि वह किसी भी क्षण

आदमी का आहार बनने के लिए

काट दिया जाएगा

क्योंकि

उसका रेट लग चुका है

(सिद्धार्थ)

खामोशी में ऐसे मनाया छः दिसम्बर… ॥

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मेरी पिछली पोस्ट पर टिप्पणी देते हुए कार्तिकेय ने सत्यार्थ को जन्मदिन की शुभकामना दी है। जी हाँ, पिछले छः दिसम्बर को सत्यार्थ (मेरा बेटा) दो साल का हो गया। इस बार पारिवारिक रीति से सादगी पूर्वक जन्मदिन याद किया गया। हाँलाकि दिनभर ‘हैप्पी बर्डे’ और ‘थेंकू’ की रटंत होती रही, लेकिन नये कपड़े, खिलौने और चाकलेट की खुशी छोड़ दें तो उस मासूम को इस दिन में नया कुछ भी नहीं लगा होगा। रोज ही कुछ नये शब्द सीख रहा है। उसी कड़ी में ये शब्द भी उसके शब्दकोश में जुड़ गये होंगे।

अलबत्ता उसकी बड़ी बहन वागीशा अधिक उत्साहित थी। साढ़े आठ साल की उम्र में उसे यह बताना कि यह वक्त पार्टी लायक नहीं है, मुझे गैर-जरूरी लगा। उसकी अपेक्षा के अनुरुप घर में ही कुछ पारिवारिक मित्रों व उनके बच्चों को बुला लिया गया, और पार्टी भी हो ली। सत्यार्थ को टीका लगाने की औपचारिकता और भगवान की पूजा भी घर के मन्दिर में ही की गयी। कहीं बाहर जाकर घूमने का मन नहीं हुआ।

सत्यार्थमित्र पर भी इसकी तत्समय चर्चा करने का मन नहीं हुआ। उस दिन मुम्बई के आतंकी हमलों के बाद बने राष्ट्रीय परिदृश्य में बाबरी मस्जिद की बरसी पर सारा देश सहमा हुआ सा किसी बुरी घटना की आहट पर कान लगाए बैठा था। मेरे मन में भी यही कुछ चल रहा था। मेरी धर्मपत्नी ने भी इसे भाँपकर चुप्पी लगा ली थी।

मेरे गुरुदेव ज्ञान जी भी एक मालगाड़ी के पटरी से उतर जाने पर अचानक व्यस्त हो गये और नहीं आ सके।

मेरे मन में भारतवर्ष की बेचारगी टीस रही थी। कुछ विक्षिप्त नौजवानों द्वारा धर्म की अफीम खाकर मानवता को जार-जार करते हुए कथित तौर पर चन्द रूपयों से अपने परिवार की दरिद्रता मिटाने के लिए जो आपराधिक कुकृत्य किया गया था, उसका असर दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र और एक सम्प्रभु राष्ट्र की अस्मिता पर प्रश्नचिह्न लगाने वाला हो चुका था। साठ साल पहले जो हमें छोड़कर धर्म के आधार पर अलग हो गये वही आज फिर से हमारी छाती चीरने के लिए गोलबन्द होकर हमले कर रहे हैं, और हम कातर होकर दुनिया के चौकीदारों से गुहार कर रहे हैं।

इसी मनःस्थिति में मैने पिछली पोस्ट में यह बात रखी कि “हम अक्षम हैं… इसलिए बेचैन हैं…।” इसपर प्राप्त टिप्पणियों से यह बात और पुष्ट होती गयी। आदरणीय ज्ञानजी, समीर जी, अभिषेक जी, और राजभाटिया जी भी इसी मत के मिले। श्रद्धेय डॉ. अमर कुमार ने एक एतराज दर्ज तो किया लेकिन वह भी केवल सही शब्द के चयन को लेकर था। वस्तुतः वह भी अक्षमता को स्वीकार करते हैं।

मेरे प्रिय कार्तिकेय भारतीय संविधान में अपनी श्रद्धा को अभी भी अक्षुण्ण रखने के पक्षधर लगे। उन्हें इसमें कोई कमी नजर नहीं आती। वे लिखते हैं कि-

…इस निष्क्रियता के लिए संविधान को जिम्मेदार ठहराना अनुचित होगा.गलती संविधान की धाराओं में नही, बल्कि उनके स्वयंसिद्ध इंटरप्रेटशंस की है. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हमारी धर्मान्धता और कट्टरता के लिए उदारवादी वेदों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

मेरे विचार से आवश्यकता संविधान में परिवर्तन की नहीं, अपितु उसको क्लेअर -कट परिभाषित करने की है….

यानि कि सुस्पष्ट परिभाषा की आवश्यकता अभी बनी हुई है। मेरा मानना है कि जिस चुनावी प्रणाली से जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, लिंग और अगड़े – पिछड़े की संकुचित राजनीति करने वाले, भ्रष्ट, माफिया और लम्पट किस्म के जनप्रतिनिधि चुनकर सत्ता के गलियारों को दूषित करने पहुँच जा रहे हैं; और फिर भी इस प्रणाली को संविधान सम्मत मानना हमारी मजबूरी है, तो कुछ तो सुधार करना ही पड़ेगा।

चुनावों में मोटे तौर पर १०० मतदाताओं में से १०-१२ का वोट पाने वाला प्रत्याशी सत्ता की कुर्सी पर काबिज हो जाता है। क्योंकि ५०-५५ लोग तो वोट डालने जाते ही नहीं और ३०-३५ लोगों के वोट दर्जनों अन्य प्रत्याशी आपस में बाँट कर हार जाते हैं। इसी कारण से नेता जी लोग एक खास सीमित वर्ग के वोट जुटाने लायक नीतियों की खुलेआम अभ्यर्थना उन्हें खुश करने के लिए करते हैं, और साथ ही अन्य वर्गों के बीच आपसी कटुता और वैमनस्य के बीज बोते जाते हैं। आज के एक अत्यन्त लोकप्रिय और सफल केन्द्रीय मन्त्री जो पहले मुख्यमन्त्री रह चुके हैं, उन्होंने तो अपने वोटरों को निरन्तर पिछड़ेपन और अशिक्षा के दलदल में फँसाये रखने की नीति की लगभग घोषणा ही कर रखी थी। उन्हें बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा और अखबार की पहुँच से सायास दूर रखने की मानो नीति ही लागू थी।

दुनिया में ऐसी चुनाव प्रणालियाँ भी हैं जहाँ जीतने के लिए कम से कम ५० प्रतिशत वोट पाना आवश्यक है। सभी मतदाताओं के लिए अपना मत डालना अनिवार्य है, न डालने पर जुर्माना है। कदाचित्‌ मतपत्र में एक विकल्प सभी प्रत्याशियों को नकारने का भी है। क्या भारत में ऐसा हो जाने के बाद भी राजनेता अपनी छवि संकुचित दायरे में बना कर सफल हो पाएंगे? आज विडम्बना यह है कि देश में एक सच्चे जननायक और सर्वप्रिय नेता का अकाल पड़ा हुआ है। बहुत से माननीय सांसदों और विधायकों की प्रोफाइल देखकर सिर शर्म से झुक जाता है।

एक बार जैसे-तैसे चुन लिए जाने के बाद बड़े से बड़ा अपकृत्य करने का और बच निकलने का लाइसेन्स इनके हाथ लग जाता है। संविधान में जो दायित्व दिये गये हैं उनके प्रति इनमें कोई जवाबदेही नहीं दिखायी देती। यह देश के भाग्य भरोसे है कि माननीय इसे किस रसातल तक ले जाकर छोड़ने को तैयार हैं। इश्कबाजी में उपमुख्यमन्त्री बरखास्त होते हैं। नौबत ये है कि संसद भवन से तिहाड़ आने-जाने का ट्रैफिक बढ़ता जा रहा है। कुछेक जो पढ़े-लिखे और जिम्मेदार वहाँ पहुँच भी जा रहे हैं उनके हाथ किसी अयोग्य मालिक के आगे जुड़े ही रहते हैं, और बँधे भी।

स्कन्द शुक्ला अपनी अंग्रेजी टिप्पणी में सवाल करते है कि यदि यह हमला किसी निम्नवर्गीय स्थल पर हुआ होता तो भी क्या ऐसी ही प्रतिक्रिया देखने को मिलती। रेलवे स्टेशन और कामा हॉस्पिटल पर भी हमले हुए लेकिन जितने टीवी कैमरे पंचसितारा होटलों पर फोकस किए गये उतने बाकी जगहों पर नहीं थे। इस बार शायद मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग को आतंकी खतरे का अनुभव कुछ ज्यादा ही हो गया है। आशा की जानी चाहिए कि उनके इस गुस्से का प्रस्फुटन चुनावों के समय अधिक मतदान के रूप में सामने आयेगा। उनका प्रश्न यह भी है कि हम अपनी ही चुनी हुई सरकार की आलोचना क्यों कर रहे हैं। इन्हें हमलों के बाद हुए मतदान के आँकड़े कुछ आशा बँधाते हैं कि शायद मध्यम वर्ग अपनी दोपहर की मीठी नींद से जाग रहा है।

लेकिन मुझे फिलहाल कोई आशा नहीं नजर आती। क्योंकि इस प्रकार के संकट से निपटने में हमारी कमजोरी सिर्फ एक मोर्चे पर नहीं है। इसका प्रसार चारो ओर है। कार्यपालिका की मानसिक दृढ़ता में कमजोरी, न्यायपालिका की जायज-नाजायज सीमाएं, विधायिका की अयोग्यता, भू-राजनैतिक परिस्थितियाँ, भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, राजनैतिक शासन प्रणाली, धार्मिक विश्वास और परम्परा, सामाजिक संघटन (composition of society ), निकम्मा राष्ट्रीय नेतृत्व, क्षीण इच्छा शक्ति, सर्वव्यापी भ्रष्टाचार, चारण-संस्कृति… दुष्ट, लापरवाह और पतनशील पड़ोसी। कहाँ तक गिनाऊँ… सूची अनन्त है।

फिर तो हमें बड़े परिवर्तन के लिए कमर कसना होगा। चलते-चलते ये पंक्तियाँ मन में मचल रही हैं, सो लिख ही देता हूँ।

सबने मिलबैठकर ये जान लिया,
मर्ज़ क्या है इसे पहचान लिया।
अब तो बस खोजनी दवाई है;
वो भी मिल जाएगी जो ठान लिया॥

(सिद्धार्थ)

पुनश्च :
कुछ टिप्पणियों के स्नेह और आशीष से प्रेरित होकर वागीशा और सत्यार्थ की एक तस्वीर लगा रहा हूँ। आप सबके स्नेह का शुक्रिया।

हम अक्षम हैं इसलिए बेचैन हैं…!

7 टिप्पणियाँ

मुम्बई में हुए आतंकी हमले के बाद एक आम भारतवासी के मन में गुस्से का तूफान उमड़ पड़ा है। सरकार की कमजोरी, खुफिया संगठनों की नाकामी, नेताओं की सत्ता लोलुपता, कांग्रेस में व्याप्त चारण-संस्कृति, राष्ट्रीय मुद्दों पर आम सहमति के बजाय जाति, धर्म, क्षेत्र और दल आधारित राजनीति की खींचतान, शासन और प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार और इससे उपजी दोयम दर्जे की कार्यकुशलता, विभिन्न सरकारी संगठनों में तालमेल का अभाव आदि अनगिनत कारणों की चर्चा से मीडिया और अखबार भरे पड़े हैं। जैसे इन बुराइयों की पहचान अब हो पायी है, और पहले सबकुछ ठीक-ठाक था। जैसे यह सब पहले से पता होता तो शायद हम सुधार कर लिए होते।

पहले के आतंकी हमलों की तुलना में इस बार का विलाप कुछ ज्यादा समय तक खिंच रहा है। आमतौर पर संयत भाषा का प्रयोग करने वाले लोग भी इसबार उग्र हो चुके हैं। पाकिस्तान पर हमले से लेकर आतंकी ठिकानों पर हवाई बमबारी करने, कांग्रेसी सरकार के प्रति विद्रोह करने, लोकतान्त्रिक व्यवस्था समाप्त कर देश की कमान सेना के हाथों में सौंप देने, जनता द्वारा सीधी कार्यवाही करने जैसी बड़ी बातों के अलावा टैक्स नहीं जमा करने, गली कूचों में पाकिस्तानी झण्डा फहराने वालों को सबक सिखाने, उर्दू बोलने वालों और जालीदार सफेद टोपी पहनने वालों की देशभक्ति पर सवाल खड़ा करने और यहाँ तक कि लिपिस्टिक-पाउडर तक की ओछी बातें भी आज राष्ट्रीय बहस का विषय बन गयी हैं।

दूसरों की खबर देते-देते भारतीय मीडिया भी खुद ही खबर बन गयी है। आतंकवादियों को कमाण्डो ऑपरेशन का सीधा प्रसारण ताज के भीतर टीवी पर दिखाकर इनके क्राइम रिपोर्टरों ने अपनी अच्छी फजीहत करा ली। एन.एस.जी. कमाण्डो की कार्यवाही देखकर इनकी प्रशंसा और आलोचना के स्वर बराबर मात्रा में उठ रहे हैं। हम तो मुग्ध होकर इनकी बहादुरी पर वाह-वाह कर रहे थे तभी अपने देश में आतंकवाद के विरुद्ध निरन्तर मोर्चा सम्हाल रहे इस्राइली विशेषज्ञों ने इनकी कमजोर तैयारी और असुरक्षित मोर्चाबन्दी की पोलपट्टी उजागर कर दी। तो क्या मन्त्रियों और नेताओं के चारो ओर शोभा की वस्तु बने ये चुस्त-दुरुस्त जवान उतने कुशल नहीं निकले जितना होना चाहिए? भारी कनफ्यूजन है, मन में खलबली है। सारी दुनिया हम पर हँस रही है और हम बड़े-बड़े बयान देते जा रहे हैं।

‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के सम्पादक वीर संघवी ने अपने रविवासरीय लेख में इस जबानी जमा-खर्च और पागल हाथी जैसे व्यवहार का कारण बताते हुए लिखा है कि दरअसल हम कुछ भी कर पाने में अक्षम हैं इसीलिए दिशाहीन होकर लफ़्फ़ाजी कर रहे हैं।

यह बात कितनी सही है इसपर विचार करना चाहिए। करीब सवा करोड़ की जनसंख्या वाले देश में आजादी के साठ साल बाद भी यह हालत है कि हमारे पास एक निर्विवाद, निष्कलुष और देशभक्त नेता नहीं है जो सभी प्रकार से भारत का नेतृत्व करने में सक्षम हो। पाश्चात्य और ईसाई संस्कारों में पली-बढ़ी एक विदेशी महिला के हाथ में सर्वोच्च सत्ता की चाभी है जिसके इशारे पर सारे सत्ताधारी नेता उठक-बैठक करने को तैयार हैं। त्रासदी यह है कि यह विडम्बनापूर्ण स्थिति किसी चुनावी धाँधली या सैनिक विद्रोह से नहीं पैदा हुई है, बल्कि इस देश के संविधान के अनुसार विधिवत् सम्पन्न कराये गये स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के फलस्वरूप बनी है। यानि हमारे देश की जनता अपने को इसी नेतृत्व के लायक समझती है।

सोनिया गान्धी के बारे में कोई भी विरोधी बात आपको भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विरुद्ध खड़ा कर सकती है, पोलिटिकली इनकरेक्ट बना सकती है; और कांग्रेस के भीतर रहकर ऐसा करना तो आपके अस्तित्व के लिए संकट खड़ा कर सकता है। इस सम्बन्ध में भारतीय हाई-कमान के विरुद्ध एक रोचक आरोप-पत्र यहाँ पढने को मिला। यह एक फ्रान्सीसी पत्रकार फ्रांस्वाँ गातिये द्वारा भारत की आन्तरिक राजनीति और सामाजिक सोच की विकलांगता पर तीखा व्यग्य है।

हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान जैसे दुष्ट पड़ोसी के कारण ही हमें ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं। हम यह भी जानते हैं कि मुस्लिम वोटबैंक की लालच हमारे देश के नेताओं को इनके भीतर पनप रही राष्ट्रविरोधी भावना पर लगाम लगाने में रोड़ा डाल रही है। लेकिन हम इन दोनो बुराइयों पर लगाम लगाने में असमर्थ हैं। हम ब्लैकमेल होने के लिए सदैव प्रस्तुत हैं। एक अपहृत हवाई जहाज में सफर कर रहे कुछ भारतीयों की जान बचाने के लिए अपनी जेलों में बन्द बर्बर आतंकवादियों को बाइज्जत रिहा करके हम अपनी कमजोरी पहले ही जतला चुके हैं। भले ही उन विषधरों ने उसके बाद कई गुना भारतीयों की हत्या कर दी हो। उस गलती को सुधारने के बजाय कांग्रेसी उसी का नाम लेकर अपने निकम्मेपन को जायज ठहराते रहते हैं। अफ़जल गुरू को फाँसी नहीं देने के सवाल पर कहते हैं कि जब भाजपा अफजल गुरू के गुरु मौलाना मसूद अजहर को फिरौती में कन्धहार छोड़ कर आ सकती है तो हम फाँसी क्यों दें? यानि भारतीय राजनीति में निर्लज्जता की कोई सीमा नहीं हो सकती।

देश की वर्तमान हालत यही बताती है कि यदि हमारे संविधान में कोई आमूल-चूल परिवर्तन करके एक सच्चे राष्ट्रभक्त जननायक को सत्ता के शिखर पर पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त नहीं किया गया, राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रविरोधी मानसिकता का पोषण और प्रसार करने वालों की पहचान कर उनका संहार नहीं किया गया, पकड़े गये आतंकवादियों के विरुद्ध कठोर सजा सुनिश्चित नहीं की गयी और देश की बहुसंख्यक आबादी की सभ्यता और संस्कृति का सम्मान अक्षुण्ण नहीं रखा गया तो वह दिन दूर नहीं जब हम एक बार फिर से गुलाम देश होने को अभिशप्त हो जाँय।

पी.एम. को पाती… आप भी कुछ जोड़ें!

14 टिप्पणियाँ

पिछला पूरा सप्ताह मुझसे शब्द रूठे रहे। शायद कुपित होकर कोप भवन चले गये थे। दिमाग सुन्न हो गया था, और हाथ जड़वत्। सूनी आँखों और भरे हृदय से सब कुछ देखता रहा। लगभग पूरा देश एक ही मनःस्थिति का शिकार है। इसी बीच ‘मेलबॉक्स’ में अग्रसारित सन्देश के रूप में प्रकाश बी. बजाज जी की एक चिठ्ठी मिली। अंग्रेजी में लिखी गयी इस चिठ्ठी में अपने प्रधानमन्त्री जी के लिए कुछ सन्देश है। मुझे इसका मजमून पसन्द आया और उद्देश्य भी…। मैने सोचा क्यों न इसमें हम सभी अपनी ओर से कुछ जोड़ें ताकि यह एक व्यक्ति के बजाय एक बड़े समूह का स्वर बन जाय।

बुधवार की शाम ‘गेटवे आव इण्डिया’ पर लाखों लोगों ने इकठ्ठा होकर ऐसा ही सन्देश दिया है। हमें अब इन नेताओं के बगैर भी सामूहिक आवाज उठानी होगी। इस पत्र को अविकल हिन्दी अनुवाद के रूप में यहाँ इस आशय से प्रस्तुत कर रहा हूँ कि आप अपनी टिप्पणियों के माध्यम से देश के मुखिया(?) के नाम लिखी गयी इस खुली पाती में अपना सन्देश जोड़ें।

[नोट: यह चिठ्ठी एक-दो दिन पुरानी है, उसके बाद देशमुख भी इस्तीफा दे चुके हैं]

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

मैं मुम्बई में रहने वाला खास किस्म का अदना सा प्राणी हूँ। चाहें तो चूहा समझ लीजिए। मुम्बई ‘लोकल’ के डिब्बे में 500 दूसरे चूहों के साथ सफ़र करता हूँ। भले ही ये डिब्बे 100 आदमियों के लिये बने हो। अलबत्ता हम असली चूहों की तरह चिचिया नहीं सकते। खैर….

आज मैंने आपका भाषण सुना। इसमें आपने कहा- “किसी को बख्शा नहीं जाएगा”। मुझे आपको याद दिलाने का मन हो रहा है कि इसी मुम्बई में सीरियल बम धमाकों की घटना घटे चौदह साल हो गए। दाऊद मुख्य षड़यंत्रकारी था। उसे आज के दिन तक पकड़ा नहीं जा सका है। हमारे तमाम फ़िल्मी-सितारे, बिल्डर और गुटखा किंग उससे मिलते रहते हैं; लेकिन आपकी सरकार उसे नही पा सकती। इसका कारण बहुत स्पष्ट है- आपके सारे मंत्री गुप-चुप उसके साथ हैं। यदि उसको सही में पकड़ लिया जाएगा तो बहुतों की कलई खुल जाएगी। भारत के अभागे लोगों के लिए आपका यह वक्तव्य कि “किसी को बख्शा नहीं जाएगा” बड़ा ही क्रूर मजाक है।

अब तो हद की भी हद हो गई है। जिस प्रकार करीब एक दर्जन लड़कों ने इस आतंकी हमले को अंजाम दिया है, उससे मुझे लगता है कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो वह दिन दूर नही जब आतंकी हवाई हमले करेंगे और हमारे परमाणु ठिकानों पर बम-वर्षा करके एक और ‘हिरोशिमा’ दुहरा देंगे।

हम भारत के लोगों की अब एक ही नियति रह गयी है- “पैदा होने के बाद बम से मारे जाना और दफन हो जाना” (womb to bomb to tomb) आपने तो मुम्बई वालों को ‘शंघाई’ का वादा किया था, लेकिन दे दिया ‘जलियावाला बाग’।

आज ही आपके गृहमंत्री ने इस्तीफ़ा दिया। बताइए न, आपको इस जोकर को लात मार कर बाहर निकालने में इतनी देर क्यों लगी ? इसका एक ही कारण था कि वह गांधी राजपरिवार के प्रति वफ़ादार था। इसका मतलब यही है न कि गांधी परिवार की वफ़ादारी मासूम लोगों के खून से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

मैं 58 साल पहले मुम्बई में पैदा हुआ और तबसे यहीं पला-बढा हूँ। आप मेरा यकीन करिए कि महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार बिहार से भी खराब है। यहाँ के सभी नेताओं को देख लीजिए- शरद पवार, छगन भुजबल, नारायण राणे, बाल ठाकरे, गोपीनाथ मुण्डे, राज ठाकरे, विलासराव देशमुख, सब के सब धन में लोट रहे हैं।

अबतक मैने जितने मुख्यमन्त्री देखे हैं उनमें विलासराव देशमुख सबसे घटिया मुख्यमन्त्रियों में से एक है। उसका एक मात्र धन्धा प्रत्येक दूसरे दिन FSI(?) बढ़ाना है, उसमें पैसा बनाना है, और उसमें से दिल्ली भेजना है ताकि कांग्रेस अगला चुनाव लड़ सके।इस मसखरे को एक नया रास्ता मिल गया है। अब यह मछुआरों के लिए FSI बढ़ा देगा जिससे वे समुद्री किनारे पर पक्का मकान बना सकें। अगली बार आतंकवादी आराम से उन घरों में रह सकेंगे, समुद्र की सुन्दरता का मजा ले सकेंगे और मनचाहे तरीके से मुम्बई पर हमला कर सकेंगे।

हाल ही में मुझे मुम्बई में घर खरीदना हुआ। मैं करीब दो दर्जन बिल्डरों से मिला। सभी मुझसे ३०प्रतिशत कीमत कालेधन में चाहते थे। मेरे जैसा आम आदमी जब इस बात को जानता है, तब भी आप और आपके वित्त मन्त्री जी तथा आपकी सी.बी.आई. और तमाम खुफिया एजेन्सियाँ इससे अनभिज्ञ हैं। यह सब का सब कालाधन कहाँ जाता है? इसी अण्डरवर्ड में ही न? हमारे राजनेता इन्हीं गुण्डों की मदद से लोगों की जमीन खाली कराते हैं। मैं खुद इसका भुक्तभोगी हूँ। अगर आपके पास समय है तो मेरे पास आइए। मैं आपको सबकुछ बताउंगा।

अगर यह देश केवल मूर्खॊं और पगलेटों का होता, तो मैं यह पत्र आपको लिखने के बारे में सोचता ही नहीं। यह विडम्बना देखिए कि एक तरफ लोग कितने प्रतिभाशाली हैं कि हम चाँद पर जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ आप नेताओं ने ‘अमृत’ को जानलेवा ‘जहर’ बना दिया।

मैं कुछ भी हो सकता हूँ- हिन्दू, मुसलमान, अनुसूजित, पिछड़ा, अनुसूचित ईसाई, क्रीमी लेयर आदि-आदि। बस मैं एक वर्ग में अपनी पहचान नहीं बता सकता- ‘भारतीय’। आप नेताओं ने `बाँटो और राज करो’ की नीति से भारतमाता के हर हिस्से के साथ दुराचार किया है। कुछ तत्व मुम्बई को उत्तर-दक्षिण के बीच बाँटने मेंलगे हुए थे। ये पिछले हफ्ते से कहीं छिपकर आराम फरमा रहे हैं। जैसे चूहा बिल में घुस जाता है। एक महीना पहले उनकी करतूतें भी किसी आतंकवादी से कम नहीं थीं। बस गोलियों का अन्तर था

हमारे पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे.कलाम जी का उदाहरण देखिए। क्या प्रतिभाशाली व्यक्तित्व रहा है उनका, और कितने उम्दा इन्सान हैं वे….! लेकिन आप नेताओं ने उनको भी नहीं बख्शा। आपकी पार्टी ने विपक्षी पार्टियों से हाथ मिलाकर उन्हें चलता कर दिया। क्योंकि राजनेता ये महसूस करते हैं कि वे ही सर्वोच्च हैं और किसी भले आदमी के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है।

तो, प्यारे पी.एम. जी, आप स्वयं भी अत्यन्त बुद्धिमान और सबसे अधिक पढ़े-लिखे लोगों में गिने जाते हैं। बस, अब जाग जाइए, एक सच्चा सरदार बन जाइए। सबसे पहले तमाम स्वार्थी नेताओं को नंगा कर दीजिए, स्विस बैंक से सभी भारतीय खाताधारकों का नाम मांग लीजिए। सी.बी.आई. की बागडोर किसी स्वतन्त्र एजेन्सी को सौंप दीजिए। उसे हमारे बीच छिपे हुए भेड़ियों का पता लगाने दीजिए। कुछ राजनीतिक उठापटक जरूर होगी। लेकिन हम यहाँ जो मौत का नंगा नाच देख रहे हैं, उससे तो यह बेहतर ही होगा।

आप हमें एक ऐसा माहौल दीजिए जहाँ हम बिना किसी डर के ईमानदारी से अपना काम कर सकें। कानून का राज तो कायम करिए। बाकी बातें अपने आप ठीक हो जाएंगी।

अब चुनाव आप को करना है। आप एक व्यक्ति के पीछे-पीछे चलना चाहते हैं कि १०० करोड़ व्यक्तियों के आगे चलकर उनका नेतृत्व करना चाहते हैं।

प्रकाश बी. बजाज
चन्द्रलोक ‘ए’ विंग
फ्लैट संख्या- १०४
९७,नेपियन सागर मार्ग
मुम्बई-४०००३६ दूरभाष: ०९८२१०-७११९४

उफ़्‌… ये क्या हो रहा है?

8 टिप्पणियाँ

ॐ शान्तिः।

कोई शब्द नहीं हैं…।
बस…।
अब बहुत हो चुका…।

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