वर्धा में ब्लॉगर सम्मेलन की तिथि दुबारा नोट कीजिए…

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ब्लॉगर सेमिनार की तिथि याद है न आपको? अरे वही जो मैने यहाँ आपको बतायी थी, और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की वेब साइट पर भी इसकी सूचना चिपकायी गयी थी। हिंदीसमय डॉट कॉम पर भी इस वार्षिक सम्मेलन का सूचना-पत्र प्रकाशित हुआ था। इतने जतन के बाद भी यदि आपको इस तिथि की जानकारी नहीं है तो हम इतना ही कर सकते हैं कि ……….आपको दुबारा इस तिथि की याद दिला दें।
हमें अफ़सोस तो है लेकिन क्या करें। मामला ही कुछ ऐसा बन पड़ा कि पिछले साल की ही तरह इस साल भी इसका मुहूर्त ठीक से नहीं देखा जा सका। कुलपति जी ने इसे जल्दी से जल्दी कराने के उद्देश्य से चटपट तारीख तय कर दी थी। लेकिन नतीजा एक बार फिर पिछले साल की ही तरह निकला। जी हाँ, इस बार भी इसकी तिथि एक बार आगे खिसकाने की नौबत आ गयी है। इसलिए जिन्हें पूर्व घोषित तिथि याद नहीं है उन्हें चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं। अब नयी तिथि सोच समझकर तय कर ली गयी है। इसे जरूर याद रखिएगा।
ढूँढिए- फुरसतिया, छींटे और बौछार,सुदर्शन, आलसी, क्वचिदन्यतोऽपि, शब्दों का सफर, प्राइमरी का मास्टर, अनन्त अन्वेषि, अनामिका प्रकाशन आदि-आदिइलाहाबाद का ब्लॉगर सम्मेलन- मील का पत्थर 
दरअसल, इस बार पहले जो तारीख तय की गयी थी वह बहुत अच्छी और शानदार थी। कुछ ज्यादा शानदार, इतनी शानदार कि हम इस दिन की सारी खुशियों को यहाँ वर्धा में समेट ही नहीं पाते। यह बात अलग है कि इसके इतना शानदार होने का ध्यान हमें बाद में आया। यह तारीख इतनी मुकद्दस और खुशियाँ लाने वाली थी कि हम घबरा कर पीछे हट गये। जी हाँ, मुझे कहने में और आपको पढ़ने में थोड़ा अजीब जरूर लगेगा, लेकिन बात ऐसी ही है कि हमें इस मुबारक तारीख की नेमत इतनी बड़ी लगी कि हमने इसे सम्हाल पाने में अपने को नाकाबिल पाया और दूसरी तारीख खोजने चल पड़े।
आप तो समझ ही गये होंगे कि मैं ११-१२ सितंबर की बात कर रहा हूँ जो पहले की तय तारीख थी। अब हमें पता चला है कि उस समय रमजान का आखिरी दिन होगा और सारा देश ईद मुबारक की खुशियों में डूबा रहेगा। ऐसे में यहाँ ब्लॉगरी का मजमा लगाकर अपनी भद्द पिटवाने का इन्तजाम भला कौन करेगा? सो उस समय हम भी घूम-घामकर ईद मनाएंगे। सेवइयाँ खाएंगे और जब यह निपट जाएगा तो नये जोशोखरोश से नयी तारीख पर ब्लॉगरी का सम्मेलन भी कराएंगे। कोशिश होगी कि यह इलाहाबाद सम्मेलन से भी बड़ा हो और ऊंचा उठे।

मित्रों, अब बता ही देता हूँ कि ईद मुबारक की तारीख से टकराने के कारण ब्लॉगर गोष्ठी की तारीख टालकर नयी तारीख तय कर ली गयी है। अब यह सम्मेलन ९-१० अक्टूबर, २०१० को आयोजित होगा। कुलपति जी ने इस तिथि की पुष्टि करते हुए आवश्यक तैयारियों का निर्देश जारी कर दिया है। तिथि परिवर्तन के अतिरिक्त बाकी सब बातें पूर्ववत रहेंगी। ……बाकी बातें क्या? …अच्छा, लीजिए फिर एक बार दुहराए देते हैं:

  • यह कि हिन्दी ब्लॉगरी का राष्ट्रीय सम्मेलन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा आयोजित किया जा रहा है।
  • सम्मेलन स्थल वर्धा विश्वविद्यालय का प्रांगण होगा, जो महाराष्ट्र में नागपुर से सत्तर किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
  • दो दिवसीय कार्यक्रम के पहले दिन अनुभवी विशेषज्ञों के माध्यम से एक कार्यशाला आयोजित कर हिन्दी चिठ्ठाकारी के तकनीकी कौशल और ब्लॉग प्रबन्धन के उपयोगी सूत्र इच्छुक विद्यार्थियों और अन्य पंजीकृत अभ्यर्थियों  को सिखाये जाएंगे।
  • कार्यशाला में प्रतिभाग के इच्छुक अभ्यर्थियों को निर्धारित प्रारूप पर सूचना प्रेषित करते हुए अपना पंजीकरण कराना होगा। पंजीकरण का कार्य सामान्यतः पहले आओ-पहले पाओ नियम के आधार पर किया जाएगा। निर्धारित संख्या पूरी हो जाने पर पंजीकरण का कार्य कभी भी बन्द किया जा सकता है।
  • प्रत्येक पंजीकृत अभ्यर्थी को रु. १००/- मात्र पंजीकरण शुल्क कार्यशाला प्रारम्भ होने से पहले जमा करना होगा। पंजीकृत अभ्यर्थियों को उनके पंजीकरण के सम्बन्ध में सूचना उनके द्वारा बताये गये ई-मेल पते पर भेंजी जाएगी। पंजीकरण फॉर्म डाक द्वारा अथवा ई-मेल द्वारा सीधे संयोजक को प्रेषित किए जा सकते हैं। बाकी सूचना यहाँ अथवा यहाँ से प्राप्त की जा सकती है।
  • कार्यक्रम के दूसरे दिन देश भर के नामचीन ब्लॉगर्स का सम्मेलन होगा। कम से कम चार अध्ययन पत्र पढ़े जाएंगे और उनपर खुली बहस होगी।
  • इस बार जिस विषय पर चर्चा होगी वह है- ब्लॉगरी की आचार संहिता (blogging ethics)
  • इस विषय के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन पत्र आमन्त्रित किए जा रहे हैं। आशा है हमारे सुधी ब्लोगर्स इस विषय पर अपने विचारों को सुव्यवस्थित ढंग से लिपिबद्ध करके पूरी तैयारी से आएंगे और इस सम्मेलन को एक गम्भीर बहस का मंच बनाएंगे। यदि आप अपनी प्रस्तावित विषयवस्तु की जानकारी पहले से उपलब्ध करा दें तो हमें वार्ताकार और विषय के अनुसार कार्यक्रम निर्धारित करने में सुविधा होगी। अंतिम समय में किसी प्रकार की आकस्मिक प्रस्तुति के प्रस्ताव पर विचार किया जाना सम्भव नहीं होगा। प्रथम आगत-प्रथम स्वागत का सिद्धान्त भी हमारा मार्गदर्शन करेगा।
  • सम्मेलन में विश्वविद्यालय द्वारा आमन्त्रित प्रतिभागियों को आने-जाने हेतु अधिकतम ए.सी. तृतीय श्रेणी के किराये और वर्धा में ठहरने व भोजन इत्यादि की व्यवस्था वि.वि. द्वारा की जाएगी।
  • संयोजक से सम्पर्क का पता:
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
आंतरिक संपरीक्षा अधिकारी
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
पोस्ट-मानस मंदिर, वर्धा (महाराष्ट्र) 442001
फोन-07152-230912 मोबा.09561646096
ई-मेल: sstwardha@gmail.com
  • आयोजन तिथि दुबारा नोट कीजिए- ९-१० अक्टूबर, २०१०, शनिवार-रविवार।

आशा है कि यह सम्मेलन एक बार फिर हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया में निरंतर हो रही प्रगति का साक्षी बनेगा और यहाँ होने वाला विचार मंथन हिंदी चिठ्ठाकारी की दिशा बताने वाला एक मील का पत्थर साबित होगा। सम्मेलन के संबंध में आपके सुझाव हमारा अमूल्य मार्गदर्शन कर सकते हैं। इस पोस्ट पर आपकी  टिप्पणियों, ई-मेल संदेशों व फोन के माध्यम से  आपके विचारों का स्वागत है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

हिन्दी के दुश्मन देश के दुश्मन…

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गूगल से साभाररविवार की शाम को NDTV24×7 चैनेल पर बरखा दत्त का कार्यक्रम “वी-द पीपुल” देखने का दुर्भाग्य हुआ। दुर्भाग्य…! जी हाँ, दुर्भाग्य। इस देश के अनेक कुलीन बुद्धिजीवी इकट्ठा होकर तथाकथित भाषा समस्या पर विचार कर रहे थे। बेलगाम जिले के मराठी भाषी ८६५ गाँवों को लेकर कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच जो अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो गयी है उसी को आधार बनाकर यह कार्यक्रम पेश किया गया था। लेकिन मराठी और कन्नड़ के बजाय असल मामला हिन्दी का उलझा हुआ जान पड़ा। कम से कम मुझे तो ऐसा ही प्रदर्शित किया जाता महसूस हुआ।
वहाँ बहुत से ऐसे लोग सुनायी पड़े जिन्हें दक्षिण के स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई बच्चों के ऊपर अनावश्यक बोझ लग रही थी। वे इस पक्ष में थे कि क्षेत्रीय भाषा के बाद अंग्रेजी को अन्य संपर्क भाषा के रूप में अपनाया जाना चाहिए। इस विचारधारा का परोक्ष पोषण एंकर के रूप में मोहतरमा बरखा जी स्वयं कर रही थीं।
हम वहाँ की चर्चा देख-सुनकर दंग रह गये कि आज भी हमारे देश की अंग्रेजी मीडिया में बैठे लोग किस प्रकार हिन्दी को हेय दृष्टि से देख रहे हैं। वहाँ उपस्थित अशोक चक्रधर जी ने हिन्दी के पक्ष में अपनी बात कहने की कोशिश की लेकिन उन्हें टोकाटाकी झेलनी पड़ी। देश की जनसंख्या कें मात्र ३-४ प्रतिशत लोगों द्वारा बोली जाने वाली अंग्रेजी को हिन्दी की तुलना में वरीयता देते ये सम्प्रभु लोग यह तर्क दे रहे थे कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सफल होने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान अनिवार्य है। गैर हिन्दी भाषी प्रदेश के लोग अपनी क्षेत्रीय भाषा के बाद यदि अंग्रेजी सीख लें तो उन्हें राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक अवसर प्राप्त हो जाएंगे। लेकिन हिन्दी को दूसरी भाषा के रूप में सीखने से उन्हें कोई फायदा नहीं होगा।
जो लोग हिन्दी को राष्ट्रीयता से जोड़ते हुए देश की सार्वजनिक भाषा बनाने के पक्ष में खड़े थे उनमें अशोक चक्रधर के अलावा सबसे महत्वपूर्ण मार्क टली थे।  मार्क टली वैसे तो अंग्रेज हैं, लेकिन भारत की धरती से उन्हें इतना लगाव है कि बीबीसी की नौकरी से अवकाश ग्रहण करने के बाद भी यहीं बस गये हैं। बीबीसी सम्वाददाता के रूप में अपने जीवन का बड़ा भाग भारत में गुजारते हुए उन्होंने दूर-दूर तक ग्रामीण भारत का भ्रमण किया है और वहाँ की सच्चाई से सुपरिचित हैं।  जब बरखा ने यह निष्कर्ष व्यक्त किया कि हमारे यहाँ मातृभाषा के अतिरिक्त सम्पर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग होना चाहिए तो पद्‍मश्री मार्क टली ने उलटकर पूछा कि अंग्रेजी के बजाय हिन्दी क्यों नही…। इसपर एक निर्लज्ज हँसी के अलावा बरखा जी के पास कोई जवाब नहीं था।
फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रही एक तमिल मूल की छात्रा से जब यह पूछा गया कि  क्या आप हिन्दी जानती हैं तो उसने कहा कि मैने जिन स्कूलों में पढ़ाई की है वहाँ दुर्भाग्य से हिन्दी पढ़ाई जाती थी इसलिए मुझे सीखनी पड़ी। लेकिन मैं बोलती नहीं हूँ (यानि बोलना पसन्द नहीं करती)। इसपर अधिकांश लोगों ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की वह रोषपूर्ण होने के बजाय प्रमोद व्यक्त करती अधिक जान पड़ी। मैं तो यह देखकर सन्न रह गया।
यहाँ वर्धा स्थित हिन्दी विश्वविद्यालय के परिसर में रहते हुए जब मैं इस बारे में सोचता हूँ तो मन में एक अजीब सी तकलीफ़ पैदा हो जाती है। हम यहाँ इस सन्देश को फैलाने की चेष्टा में हैं कि हिन्दी ही इस देश को एकता के सूत्र में पिरो सकती है, लेकिन देश का एक बड़ा मीडिया समूह इस विचारभूमि में सन्देह के बीज बोने का कुत्सित प्रयास कर रहा है।
हम हिन्दी को न सिर्फ़ उत्कृष्ट साहित्य का खजाना बनते देखना चाहते हैं बल्कि इसे ज्ञान विज्ञान की एक सक्षम संवाहक भाषा के रूप में निरन्तर विकसित होते देखना चाहते हैं। अखिल भारत की सम्पर्क भाषा तो यह है ही, इसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सम्पर्क भाषा का दर्जा दिलाने की गम्भीर कोशिश भी होनी चाहिए। संस्कृत मूल से उपजी तमाम भारतीय भाषाओं को एक मंच पर लाने में सक्षम यदि कोई एक भाषा है तो वह है हिन्दी जिसे बोलने वालों की संख्या सौ करोड़ के आस-पास है।
इसके बावजूद भारत की अंग्रेजी मीडिया हिन्दी की स्थिति निराशाजनक बताने पर तुली हुई है। देश की हिन्दी भाषी जनता से विज्ञापन द्वारा करोड़ॊ कमाने वाले ये मीडिया समूह ऐसी दोगली नीति पर काम कर रहे हैं तो मन में रोष पैदा होना स्वाभाविक ही है। क्या हिन्दी के ये दुश्मन देश के दुश्मन नहीं हैं?
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)