ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-४ डॉ.कविता वाचक्नवी (हिन्दी कम्प्यूटिंग) प्रथम भाग

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“हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया” के बारे में जो कार्यशाला इलाहाबाद में हुई उसकी तस्वीरें, विषय-प्रवर्तन, अखबारी चर्चा, अनूप शुक्ल जी की कथा-वार्ता और डॉ. अरविन्द मिश्रा जी की साइंस ब्लॉगिंग सम्बन्धी वार्ता के बारे में आप पिछली कड़ियों में देख और पढ़ चुके है। अब आगे…

आशीर्वाद मुख्य अतिथि का... इमरान ने बड़े आदर पूर्वक यह बताया कि ब्लॉगिंग की चर्चा को एक ब्रेक देना पड़ेगा क्योंकि हमारे मुख्य अतिथि महोदय को किसी जरूरी कार्य से जाना पड़ रहा है। इसलिए उनके हिस्से की औपचारिकता बीच में ही पूरी करनी पड़ेगी। प्रदेश के पुलिस मुख्यालय में अपर पुलिस महानिदेशक के पद की जिम्मेदारियाँ निभाने वाले एस.पी.श्रीवास्तव जी ने इस कार्यक्रम से इतना भावुक जुड़ाव महसूस किया कि उन्होंने अपनी घोर व्यस्तता के बावजूद उपस्थित श्रोताओं को करीब बीस मिनट तक आशीर्वाद दिया।

मुख्य अतिथि जी बताने लगे कि ब्लैक बेरी पर अंग्रेजी में बहुत दिनों से ब्लॉग लिखते रहे हैं।

“आज का यह कार्यक्रम देखकर मुझे यह ज्ञान हुआ है कि हिन्दी में भी ब्लॉगिंग की जा सकती है। मैं आज ही अपना हिदी ब्लॉग बना डालूंगा और नियमित रूप से लिखता रहूंगा।”

स्मृति चिह्नउन्होंने कम्प्यूटर और इन्टरनेट के बारे में अनेक गूढ़ बातें बतायी। मुख्य अतिथि महोदय कविता के क्षेत्र में भी बड़ा दखल रखते हैं, लेकिन समय ने इसकी इजाजत नहीं दी। उन्होंने वार्ता समाप्त करने के बाद सभी अन्य वक्ताओं को स्मृति चिह्न प्रदान किए जिसे इमरान ने बड़ी मेहनत और शौक से तैयार कराया था।

मुख्य अतिथि जी को आदर पूर्वक विदा करने के बाद इमरान ने अगली वार्ताकार डॉ. कविता वाचक्नवी जी को आमन्त्रित किया। वे यह बताना नहीं भूले कि आप स्त्री विमर्श की विशेषज्ञ हैं। आपका इन्टरनेट पर बहुत बड़ा पाठक वर्ग है। "हिन्दी भारत", वागर्थ, पीढियाँ, स्वर – चित्रदीर्घा, ब्लॉगरबस्ती (BLOGGER BUSTI), "बालसभा", हिन्दुस्तानी एकेडेमी
चिट्ठा चर्चा, Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श), *रामायण- संदर्शन
आदि अनेक ब्लॉग हैं जिनमें आप अकेले या सामूहिक रूप से लेखन का कार्य करती है।

कार्यशाला में यद्यपि ब्लॉगिंग की ही चर्चा की जानी थी और किसी सामाजिक – राजनैतिक मुद्दे पर भटकने की इजाजत नहीं थी लेकिन इमरान उनसे स्त्री विमर्श पर कुछ सुनने का लोभ संवरण नहीं कर सके। उन्हें यह छूट प्रदान कर दिया कि वे अपनी पसन्द से जो बोलना चाहें बोल सकती हैं। लेकिन कविता जी ने कार्यशाला के उद्देश्यों को महत्व देते हुए अन्तर्जाल पर हिन्दी के अनुप्रयोग और हिन्दी टूल्स के बारे में ही चर्चा करना उचित समझा।

कविता वाचक्नवी कविता जी ने अपनी बात की शुरुआत इस ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए किया कि भारत में हिन्दी का बहुत बड़ा प्रयोक्ता समाज है। (वैसे तो बाहर भी कम नहीं है।) हिन्दी का प्रसार हो रहा है। लेकिन कम्प्यूटर में अभी हिन्दी के अनुप्रयोगों में बहुत कुछ किया जाना शेष है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि देवनागरी लिपि में लिखी हुई संस्कृत भाषा कम्प्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त भाषा है। लेकिन अंग्रेजी का प्रयोग अभी भी इण्टरनेट पर इतना छाया हुआ है कि हम अंग्रेजी में काम करने के आदी हो गये हैं। यदि हमारा ब्राउजर अंग्रेजी में काम करता है तो हिन्दी पढ़ने-लिखने के बावजूद हम अंग्रेजी प्रयोक्ता ही कहलाएंगे। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी हिन्दी को सर्वथा कम्प्यूटर-समर्थ बनाएं। इस दिशा में अनेक लोगों ने व्यक्तिगत स्तर पर बड़े प्रयास किए हैं। किसी बड़ी संस्था की मदद के बिना भी अनेक उत्साही हिन्दी-सेवियों ने हिन्दी अनुप्रयोगों की विशाल पूँजी इकठ्ठा कर दी है।

कुछ महत्वपूर्ण हिन्दी सुविधाएं निम्नवत्‌ हैं:

१.शब्दकोश (Dictionary):

अब आपको कागज पर छपे शब्दकोश के पन्ने पलटने की आवश्यकता नहीं है। दुनिया की अच्छी से अच्छी डिक्शनरी ऑन लाइन उपलब्ध है। मॉउस की एक क्लिक के साथ ही आप किसी भी शब्द का अर्थ सहज ही जान सकते हैं। अब हिन्दी का वृहत् शब्दकोश समानान्तर कोश के नाम से उपलब्ध है।

२. अनुवाद (Translation):

अब ऐसे सॉफ़्टवेयर उपलब्ध हैं कि आप किसी भी आलेख को दुनिया की किसी भी भाषा का तत्क्षण अनूदित कर सकते हैं। अन्तर्जाल पर विचरण करते हुए यदि आप को मिसाल के तौर पर स्कैन्डिनेवियाई भाषा में कोई रोचक सामग्री प्राप्त होती है तो आप उसे एक माउस की क्लिक से अपनी मनचाही भाषा में बदल सकते हैं। अपना हिन्दी में लिखा लेकर उसका दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी करा सकते हैं। हाँलाकि इस क्षेत्र में अभी बहुत कुछ अपेक्षित है। उदाहरणार्थ साहित्यिक रचनाओं का उचित अनुवाद मशीन द्वारा किया जाना सम्भव नहीं लगता है।

३. पारिभाषिक शब्दावली:

कुछ स्वप्रेरित लोगों के परिश्रम से विविध विषयों से सम्बन्धित पारिभाषिक शब्दों का संकलन तैयार हुआ है। इनका उपयोग भाषा के मानकीकरण में बहुत सहायक है।

४. लिप्यान्तरण (transliteration):

इस सुविधा का प्रयोग उन सभी लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर किया जा रहा है जिन्हें हिदी टाइपिंग की कोई जानकारी नहीं है। रोमन अक्षरों को की-बोर्ड पर देखकर टाइप करते हुए उनका हिन्दी प्रतिरूप प्राप्त किया जा सकता है। यानि ‘kavita’ टाइप करके ‘कविता’ पाया जा सकता है। यह सुविधा गूगल सहित अन्य अनेक साइट्स पर निःशुल्क ऑन लाइन’ उपलब्ध हैं। barahaIME इसके ‘ऑफ़ लाइन’ संस्करण निःशुल्क उपलब्ध कराती है जो इन्टरनेट से दो मिनट में डाउनलोड करके अपने कम्प्यूटर पर इन्स्टाल किया जा सकता है।

५. यूनीकोड:

इन्टरनेट पर सहज प्रयोग के लिए यूनिकोड फ़ॉण्ट की पद्धति लागू की गयी है। विश्व की सभी भाषाओं के समस्त वर्णों (अक्षरों) के लिए एक युनीक कोड निर्धारित कर दिया गया है तथा सभी कम्प्यूटर निर्माता कम्पनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि सभी कम्प्यूटर इस सुविधा से अनिवार्य रुप से लैस हों। देवनागरी लिपि के वर्णों को भी यूनीकोड फ़ॉण्ट में स्थान प्राप्त है। इससे दुनिया में कहीं भी हिन्दी नेट के माध्यम से लिखी और पढ़ी जा सकती है।

६. पारिभाषिक तकनीकी शब्दावली:

आप ज्ञान के जिस भी क्षेत्र में कार्य कर रहे हों उस क्षेत्र से सम्बन्धित मानक शब्दों की सर्वमान्य परिभाषा अत्यन्त आवश्यक होती है। हिन्दी सेवियों ने अन्तर्जाल पर इस विषय पर भी कठोर परिश्रम किया है। और विपुल मात्रा में तकनीकी शब्दकोशों की रचना कर डाली है।

७. कविता कोश:

अमीर खुसरो से लेकर आधुनिक भारत के वर्तमान कवियों तक की करीब ६०००० कविताओं को अन्तर्जाल पर कविता कोश में अपलोड कर दिया गया है। यह पूँजी अभी भी लगातार बढ़ रही है।

…क्रमशः

 कविता जी के श्रोता [कविता जी की वार्ता कुछ लम्बी ही थी। पूरे विषय को एक कड़ी में समेटना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने अपनी पाठ्य सामग्री से सम्बन्धित लिंक्स देने को कहा था, जो अभी प्रतीक्षित है। अगली कड़ी में इसे पूरा करने की कोशिश की जाएगी।]

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

एक झलक ग्रामीण उच्च शिक्षा की…

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भारतवर्ष की हिन्दीभाषी गंगापट्टी जिसे कुछ विद्वान लोग गोबरपट्टी कहने में यथार्थवादी होने का सुख प्राप्त करते हैं; इसके दूरस्थ ग्रामीण इलाके शैक्षिक रूप से काफी पिछड़े हुए रहे हैं।

बनारस, इलाहाबाद, फैजाबाद, गोरखपुर और जौनपुर के विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध अनेक महाविद्यालयों की स्थापना पूर्वी उत्तरप्रदेश के देहाती इलाकों में उच्च शिक्षा के लिए हुई है। इनमें नये-नये व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाकर नौकरी लायक शिक्षा को स्थानीय स्तर पर सुलभ कराने की कोशिश की जा रही है। इसमें आजकल बी.एड. का पाठ्यक्रम खासा लोकप्रिय हो चला है।

सर्वप्रथम स्नातक की उपाधि प्राप्त कर चुके विद्यार्थियों को कक्षा-०६ से कक्षा-१० तक के लिए शिक्षक बनने का कैरियर चुनने के लिए इस पाठ्यक्रम को बनाया गया था। लेकिन परवर्ती सरकारों ने इस उपाधि के धारकों को प्राइमरी स्कूल से लेकर महाविद्यालयों (digree colleges) तक में पढ़ाने का अवसर देने के निर्णय लिए हैं। इसका असर ये हुआ है कि सर्वाधिक नौकरी के अवसर खोलने वाली इस उपाधि के लिए भारी भीड़ लग रही है। लड़के-लड़कियाँ, आदमी-औरत, युवा-प्रौढ़ आदि सभी बी.एड. करने को प्रयासरत हैं।

अतः इसके लिए राज्यस्तरीय प्रवेश परीक्षा आयोजित होती है जिसमें कई लाख स्नातक भाग लेते हैं, इसमें जो अभ्यर्थी सफल होता है वह इस प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में जब पढ़ने जाता है तो वहाँ का माहौल कुछ ऐसा पाता है- 🙂

[चित्र http://www.usc.edu.ph से साभार ]

(यह एक सच्ची घटना पर आधारित उदाहरण है जो योगेन्द्र कुमार त्रिपाठीप्रशिक्षु शिक्षक ने अपने निजी अनुभव के आधार पर बतायी है।)

एक कक्षा बी.एड. की जिसमें हैं प्रशिक्षु
कुल ९८
महिलाएं १४
शादीशुदा १२
कुआँरी लड़कियाँ ०२
पुरुष ८४
शादीशुदा ४५
कुआँरे लड़के ३९
सबसे छोटी उम्र२४ वर्ष
सबसे बड़ी उम्र४२ वर्ष

कक्षा में एक चुटकुला जो एक उत्साही नौजवान छात्र ने सुना दिया

एक सरदार के तेरह बच्चे थे। उससे एक व्यक्ति ने पूछा- इस जमाने में भी इतने बच्चे? सरदार जी बोले- इसमें मेरा कोई कसूर नहीं, गलती सब मेरे ससुर की है। व्यक्ति चकराया, “वो कैसे?” सरदार ने साफ किया- “क्यूँ कि शादी के समय ससुर जी ने मुझसे जुबान लिया था कि मै उनकी बेटी को कभी खाली पेट न रखूँ।” 🙂
हा,हा,हा,हा…

इस पर बवाल हो गया। महिला प्रशिक्षुओं द्वारा आपत्ति 😦

सभ्यता संस्कृति की दुहाई
हूटिंग, हाय तौबा

पीड़ित चुटकुलेबाज द्वारा दुःखी होकर अपनी व्यथा एक कविता में डाल दी गयी
ये रही वो कविता 🙂

कल कक्षा में मुझसे एक छोटी सी बात हो गयी,
मैने यूँ ही कुछ कह दिया और इतनी बड़ी बात हो गयी
किसी ने सिखाया, किसी ने नैतिकता का पाठ पढ़ाया
किसी ने तो हद कर दी भाई
सभ्यता और संस्कृति का ऊँचाऊँचा पहाड़ दिखाया
लोगों की संवेदना जाग गयी
मैने सोचा चलो अच्छा हुआ भाई।
कम से कम लोगों में संवेदना तो आयी
किसी ने केवल प्रश्नचिह्न लगाया।
तो किसी की नाकनक्श और भौवें चढ़ आयीं
मैने तो केवल चुटकुला सुनाया था
लोगों को हँसाने का काल्पनिक बहाना बनाया था।
लेकिन ये लोगों की संस्कृति पर बन आयी।
मैने सोचा क्या इतनी बड़ी बात हो गयी
कल कक्षा में मुझसे एक छोटी सी बात हो गयी।

फिर आया महिलाओं का खेद प्रकाश

उन्हें अपने द्वारा की गयी हूटिंग पर सच में पछतावा हो गया -:(

फिर क्या था ?
उत्साह में फिर एक और कविता। ये रही:-

मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो
घर में क्या छुपछुप कर अश्लीलता में लजाते हो
कभी धर्म के नाम पर, कभी समाज के नाम पर
तुम तो हमेशा संस्कृति और सभ्यता चिल्लाते हो
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो

तो तुमसे एक प्रश्न है मेरा
क्यूँ नहीं लोगों में मानवता फैलाते हो
जब चौराहे पर लुट रही किसी की मर्यादा तो
क्यूँ नहीं सब मिलकर होहल्ला मचाते हो?
तब तो अपने दामन को पाक साफ बचाते हो
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो

माना कि मैने कुछ गलत कहा
तो क्यूँ नहीं तुम्ही सब सचसच बताते हो
बातों ही बातों में समता की बात चलाते हो
दुनिया भर की बातें हैं सोचने समझने को
तो फिर इस छोटी सी बात पर क्यूँ अटक जाते हो?
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो?

अब तो हद ही हो गयी।

लेकिन महिलाओं ने बात बढ़ाना उचित नहीं समझा
बस माफी मांग ली।
माफ़ी दे दो भाई!
हमने आपत्ति ग़लत उठाई!
🙂 (।) ):
(प्रकरण समाप्त)

क्या कहेंगे इसे?

नारी की हार, शान्ति की चाह, वादविवाद से पलायन, या और कुछ??

अभी नारीवाद को लम्बा रास्ता तय करना है।?

(सिद्धार्थ)