‘निर्वासन’ में स्त्री विमर्श – प्रेमचंद

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      पिछली पोस्ट में मैने वादा किया था कि आपको प्रेमचंद की एक विलक्षण कहानी पढ़वाऊंगा। लीजिए, कहानी पढ़िए जिसका शीर्षक है – निर्वासन। यह पूरी कहानी संवाद शैली में लिखी गयी है। कहानीकार ने अपनी ओर से कुछ भी नहीं बताया है; लेकिन इस बात-चीत से तत्कालीन समाज में स्त्री की नाजुक स्थिति का जैसा चित्र उभर कर आया है वह मन को विदीर्ण कर देता है। हम उस परंपरा को ढो रहे हैं जिसमें अग्निपरीक्षा देने के बावजूद सीता को जंगल में निर्वासित जीवन बिताना पड़ा। आज भी स्थितियाँ बहुत नहीं सुधरी हैं। क्या आधुनिक स्त्री-विमर्श इस मानसिकता को बदल पाएगा?

निर्वासन

कहानी- प्रेमचंद

   परशुराम- वहीं-वहीं, दालान में ठहरो!

   मर्यादा- क्यों, क्या मुझमें कुछ छूत लग गयी?

   परशुराम- पहले यह बताओ तुम इतने दिनों कहाँ रहीं, किसके साथ रहीं, किस तरह रहीं और फिर यहाँ किसके साथ आयीं? तब, तब विचार… देखी जायगी।

   मर्यादा- क्या इन बातों के पूछने का यही वक्त है; फिर अवसर न मिलेगा?

   परशुराम- हाँ, यही बात है। तुम स्नान करके नदी से तो मेरे साथ ही निकली थीं। मेरे पीछे-पीछे कुछ देर तक आयीं भी; मैं पीछे फिर-फिरकर तुम्हें देखता जाता था, फिर एकाएक तुम कहाँ गायब हो गयीं?

   मर्यादा- तुमने देखा नहीं, नागा साधुओं का एक दल सामने से आ गया। सब आदमी इधर-उधर दौड़ने लगे। मैं भी धक्के में पड़कर जाने किधर चली गयी। जरा भीड़ कम हुई तो तुम्हें ढूँढ़ने लगी। बासू का नाम ले-लेकर पुकारने लगी, पर तुम न दिखायी दिये।

   परशुराम- अच्छा तब?

   मर्यादा- तब मैं एक किनारे बैठकर रोने लगी, कुछ सूझ ही न पड़ता कि कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ, आदमियों से डर लगता था। संध्या तक वहीं बैठी रोती रही।

   परशुराम- इतना तूल क्यों देती हो? वहाँ से फिर कहाँ गयीं?

   मर्यादा- संध्या को एक युवक ने आकर मुझसे पूछा, तुम्हारे घर के लोग खो तो नहीं गये हैं? मैंने कहा- हाँ। तब उसने तुम्हारा नाम, पता ठिकाना पूछा। उसने सब एक किताब पर लिख लिया और मुझसे बोला- मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें तुम्हारे घर भेज दूँगा।

   परशुराम- वह आदमी कौन था?

   मर्यादा- वहाँ की सेवा-समिति का स्वयंसेवक था।

   परशुराम- तो तुम उसके साथ हो लीं?

   मर्यादा- और क्या करती ? वह मुझे समिति के कार्यालय में ले गया। वहाँ एक शामियाने में एक लम्बी दाढ़ीवाला मनुष्य बैठा हुआ कुछ लिख रहा था। वही उन सेवकों का अध्यक्ष था। और भी कितने ही सेवक वहाँ खड़े थे। उसने मेरा पता-ठिकाना रजिस्टर में लिखकर मुझे एक अलग शामियाने में भेज दिया, जहाँ और भी कितनी खोयी हुई स्त्रियाँ बैठी हुई थीं।

   परशुराम- तुमने उसी वक्त अध्यक्ष से क्यों न कहा कि मुझे पहुँचा दीजिए?

   मर्यादा- मैंने एक बार नहीं सैकड़ों बार कहा; लेकिन वह यही कहते रहे, जब तक मेला न खत्म हो जाय और सब खोयी हुई स्त्रियाँ एकत्र न हो जायँ, मैं भेजने का प्रबन्ध नहीं कर सकता। मेरे पास न इतने आदमी हैं, न इतना धन।

   परशुराम- धन की तुम्हें क्या कमी थी, कोई एक सोने की चीज बेच देती तो काफी रुपये मिल जाते।

   मर्यादा- आदमी तो नहीं थे।

   परशुराम- तुमने यह कहा था कि खर्च की कुछ चिंता न कीजिए, मैं अपना गहना बेचकर अदा कर दूँगी?

   मर्यादा- नहीं, यह तो मैंने नहीं कहा।

   परशुराम- तुम्हें उस दशा में भी गहने इतने प्रिय थे?

   मर्यादा- सब स्त्रियाँ कहने लगीं, घबरायी क्यों जाती हो? यहाँ किस बात का डर है। हम सभी जल्द से जल्द अपने घर पहुँचना चाहती हैं; मगर क्या करें? तब मैं भी चुप हो रही।

   परशुराम- और सब स्त्रियाँ कुएँ में गिर पड़तीं तो तुम भी गिर पड़तीं?

   मर्यादा- जानती तो थी कि यह लोग धर्म के नाते मेरी रक्षा कर रहे हैं, कुछ मेरे नौकर या मजूर नहीं हैं, फिर आग्रह किस मुँह से करती? यह बात भी है कि बहुत-सी स्त्रियों को वहाँ देखकर मुझे कुछ तसल्ली हो गयी।

   परशुराम- हाँ, इससे बढ़कर तस्कीन की और क्या बात हो सकती थी? अच्छा, वहाँ कै दिन तस्कीन का आनन्द उठाती रहीं? मेला तो दूसरे ही दिन उठ गया होगा?

   मर्यादा- रात-भर मैं स्त्रियों के साथ उसी शामियाने में रही।

   परशुराम- अच्छा, तुमने मुझे तार क्यों न दिलवा दिया?

   मर्यादा- मैंने समझा, जब यह लोग पहुँचाने को कहते ही हैं तो तार क्यों दूँ?

   परशुराम- खैर, रात को तुम वहीं रहीं। युवक बार-बार भीतर आते-जाते रहे होंगे।

   मर्यादा- केवल एक बार एक सेवक भोजन के लिए पूछने आया था, जब हम सबों ने खाने से इनकार कर दिया तो वह चला गया और फिर कोई न आया। मैं रात-भर जागती ही रही।

   परशुराम- यह मैं कभी न मानूँगा कि इतने युवक वहाँ थे और कोई अंदर न गया होगा। समिति के युवक आकाश के देवता नहीं होते। खैर, वह दाढ़ीवाला अध्यक्ष तो जरूर ही देखभाल करने गया होगा?

   मर्यादा- हाँ, वह आते थे; पर द्वार पर से पूछ-पूछकर लौट जाते थे। हाँ, जब एक महिला के पेट में दर्द होने लगा था तो दो-तीन बार दवाएँ पिलाने आये थे।

   परशुराम- निकली न वही बात! मैं इन धूर्तों की नस-नस पहचानता हूँ। विशेषकर तिलक-मालाधारी दढ़ियलों को मैं गुरुघंटाल ही समझता हूँ। तो वह महाशय कई बार दवाएँ देने गये? क्यों, तुम्हारे पेट में तो दर्द नहीं होने लगा था?

   मर्यादा- तुम एक साधु पर आक्षेप कर रहे हो। वह बेचारे एक तो मेरे बाप के बराबर थे, दूसरे आँखें नीची किये रहने के सिवाय कभी किसी पर सीधी निगाह नहीं करते थे।

   परशुराम- हाँ, वहाँ सब देवता ही देवता जमा थे। खैर, तुम रात-भर वहाँ रहीं। दूसरे दिन क्या हुआ?

   मर्यादा- दूसरे दिन भी वहीं रही। एक स्वयंसेवक हम सब स्त्रियों को साथ लेकर मुख्य-मुख्य पवित्र स्थानों का दर्शन कराने गया। दोपहर को लौट कर सबों ने भोजन किया।

   परशुराम- तो वहाँ तुमने सैर-सपाटा भी खूब किया, कोई कष्ट न होने पाया। भोजन के बाद गाना-बजाना हुआ होगा?

   मर्यादा- गाना-बजाना तो नहीं; हाँ, सब अपना-अपना दुखड़ा रोती रहीं। शाम तक मेला उठ गया तो दो सेवक हम लोगों को लेकर स्टेशन पर आये।

   परशुराम- मगर तुम तो आज सातवें दिन आ रही हो और वह भी अकेली?

   मर्यादा- स्टेशन पर एक दुर्घटना हो गयी।

   परशुराम- हाँ, यह तो मैं समझ ही रहा था। क्या दुर्घटना हुई?

   मर्यादा- जब सेवक टिकट लेने जा रहा था, तो एक आदमी ने आकर उससे कहा- यहाँ गोपीनाथ की धर्मशाला में एक बाबूजी ठहरे हुए हैं, उनकी स्त्री खो गयी है, उनका भला-सा नाम है, गोरे-गोरे लम्बे-से खूबसूरत आदमी हैं, लखनऊ मकान है, झबाई टीले में। तुम्हारा हुलिया उसने ऐसा ठीक बयान किया कि मुझे उस पर विश्वास आ गया। मैं सामने आकर बोली, तुम बाबू जी को जानते हो? वह हँसकर बोला, जानता नहीं हूँ तो तुम्हें तलाश क्यों करता फिरता हूँ। तुम्हारा बच्चा रो-रोकर हलाकान हो रहा है। सब औरतें कहने लगीं, चली जाओ, तुम्हारे स्वामीजी घबरा रहे होंगे। स्वयंसेवक ने उससे दो-चार बातें पूछकर मुझे उसके साथ कर दिया। मुझे क्या मालूम था कि मैं किसी नर-पिशाच के हाथों में पड़ी जाती हूँ। दिल में खुशी थी कि अब बासू को देखूँगी, तुम्हारे दर्शन करूँगी। शायद इसी उत्सुकता ने मुझे असावधान कर दिया।

   परशुराम- तो तुम उस आदमी के साथ चल दीं? वह कौन था?

   मर्यादा- क्या बतलाऊँ कौन था? मैं तो समझती हूँ, कोई दलाल था?

   परशुराम- तुम्हें यह न सूझी कि उससे कहतीं, जाकर बाबूजी को भेज दो?

   मर्यादा- अदिन आते हैं तो बुध्दि भ्रष्ट हो जाती है।

   परशुराम- कोई आ रहा है।

   मर्यादा- मैं गुसलखाने में छिपी जाती हूँ।

   परशुराम- आओ भाभी, क्या अभी सोयी नहीं, दस तो बज गये होंगे।

   भाभी- वासुदेव को देखने को जी चाहता था भैया, क्या सो गया?

   परशुराम- हाँ, वह तो अभी रोते-रोते सो गया है।

   भाभी- कुछ मर्यादा का पता मिला? अब पता मिले तो भी तुम्हारे किस काम की। घर से निकली हुई स्त्रियाँ थान से छूटी हुई घोड़ी है जिसका कुछ भरोसा नहीं।

   परशुराम- कहाँ से कहाँ मैं उसे लेकर नहाने गया।

   भाभी- होनहार है भैया, होनहार! अच्छा तो मैं जाती हूँ।

   मर्यादा- (बाहर आकर) होनहार नहीं है, तुम्हारी चाल है। वासुदेव को प्यार करने के बहाने तुम इस घर पर अधिकार जमाना चाहती हो।

   परशुराम- बको मत! वह दलाल तुम्हें कहाँ ले गया?

   मर्यादा- स्वामी, यह न पूछिए, मुझे कहते लज्जा आती है।

   परशुराम- यहाँ आते तो और भी लज्जा आनी चाहिए थी।

   मर्यादा- मैं परमात्मा को साक्षी देती हूँ, कि मैंने उसे अपना अंग भी स्पर्श नहीं करने दिया।

   परशुराम- उसका हुलिया बयान कर सकती हो?

   मर्यादा- साँवला-सा छोटे डील का आदमी था। नीचा कुरता पहने हुए था।

   परशुराम- गले में ताबीजें भी थीं?

   मर्यादा- हाँ, थीं तो।

   परशुराम- वह धर्मशाले का मेहतर था। मैंने उससे तुम्हारे गुम हो जाने की चर्चा की थी। उस दुष्ट ने उसका वह स्वाँग रचा।

   मर्यादा- मुझे तो वह कोई ब्राह्मण मालूम होता था।

   परशुराम- नहीं मेहतर था। वह तुम्हें अपने घर ले गया?

   मर्यादा- हाँ, उसने मुझे ताँगे पर बैठाया और एक तंग गली में, एक छोटे-से मकान के अंदर ले जाकर बोला, तुम यहीं बैठो, तुम्हारे बाबूजी यहीं आयेंगे। अब मुझे विदित हुआ कि मुझे धोखा दिया गया। रोने लगी। वह आदमी थोड़ी देर के बाद चला गया और एक बुढ़िया आकर मुझे भाँति-भाँति के प्रलोभन देने लगी। सारी रात रोकर काटी। दूसरे दिन दोनों फिर मुझे समझाने लगे कि रो-रोकर जान दे दोगी, मगर यहाँ कोई तुम्हारी मदद को न आयेगा। तुम्हारा एक घर छूट गया। हम तुम्हें उससे कहीं अच्छा घर देंगे जहाँ तुम सोने के कौर खाओगी और सोने से लद जाओगी। जब मैंने देखा कि यहाँ से किसी तरह नहीं निकल सकती तो मैंने कौशल करने का निश्चय किया।

   परशुराम- खैर,सुन चुका। मैं तुम्हारा ही कहना मान लेता हूँ कि तुमने अपने सतीत्व की रक्षा की, पर मेरा हृदय तुमसे घृणा करता है, तुम मेरे लिए फिर वह नहीं हो सकती जो पहले थीं। इस घर में तुम्हारे लिए स्थान नहीं है।

   मर्यादा- स्वामीजी, यह अन्याय न कीजिए, मैं आपकी वही स्त्री हूँ जो पहले थी। सोचिए, मेरी क्या दशा होगी?

   परशुराम- मैं यह सब सोच चुका और निश्चय कर चुका। आज छ: दिन से यही सोच रहा हूँ। तुम जानती हो कि मुझे समाज का भय नहीं है। छूत-विचार को मैंने पहले ही तिलांजलि दे दी, देवी-देवताओं को पहले ही विदा कर चुका; पर जिस स्त्री पर दूसरी निगाहें पड़ चुकीं, जो एक सप्ताह तक न-जाने कहाँ और किस दशा में रही, उसे अंगीकार करना मेरे लिए असम्भव है। अगर यह अन्याय है तो ईश्वर की ओर से है, मेरा दोष नहीं।

   मर्यादा- मेरी विवशता पर आपको जरा भी दया नहीं आती?

   परशुराम- जहाँ घृणा है वहाँ दया कहाँ? मैं अब भी तुम्हारा भरण-पोषण करने को तैयार हूँ। जब तक जीऊँगा, तुम्हें अन्न-वस्त्र का कष्ट न होगा। पर तुम मेरी स्त्री नहीं हो सकतीं।

   मर्यादा- मैं अपने पुत्र का मुँह न देखूँ अगर किसी ने मुझे स्पर्श भी किया हो।

   परशुराम- तुम्हारा किसी अन्य पुरुष के साथ क्षण-भर भी एकांत में रहना तुम्हारे पतिव्रत को नष्ट करने के लिए बहुत है। यह विचित्र बंधन है, रहे तो जन्म-जन्मांतर तक रहे; टूटे तो क्षण-भर में टूट जाय। तुम्हीं बताओ, किसी मुसलमान ने जबरदस्ती मुझे अपना उच्छिष्ट भोजन खिला दिया होता तो तुम मुझे स्वीकार करतीं?

   मर्यादा- वह…वह…तो दूसरी बात है।

   परशुराम- नहीं, एक ही बात है। जहाँ भावों का संबंध है, वहाँ तर्क और न्याय से काम नहीं चलता। यहाँ तक कि अगर कोई कह दे कि तुम्हारे पानी को मेहतर ने छू लिया है तब भी उसे ग्रहण करने से तुम्हें घृणा आयेगी। अपने ही दिल से सोचो कि तुम्हारे साथ न्याय कर रहा हूँ या अन्याय?

   मर्यादा- मैं तुम्हारी छुई हुई चीजें न खाती, तुमसे पृथक् रहती, पर तुम्हें घर से तो न निकाल सकती थी। मुझे इसीलिए न दुत्कार रहे हो कि तुम घर के स्वामी हो और समझते हो कि मैं इसका पालन करता हूँ।

   परशुराम- यह बात नहीं है। मैं इतना नीच नहीं हूँ।

   मर्यादा- तो तुम्हारा यह अंतिम निश्चय है?

   परशुराम- हाँ, अंतिम।

   मर्यादा- जानते हो इसका परिणाम क्या होगा?

   परशुराम- जानता भी हूँ और नहीं भी जानता।

   मर्यादा- मुझे वासुदेव को ले जाने दोगे?

   परशुराम- वासुदेव मेरा पुत्र है।

   मर्यादा- उसे एक बार प्यार कर लेने दोगे?

   परशुराम- अपनी इच्छा से नहीं, तुम्हारी इच्छा हो तो दूर से देख सकती हो।

   मर्यादा तो जाने दो, न देखूँगी। समझ लूँगी कि विधवा भी हूँ और बाँझ भी। चलो मन! अब इस घर में तुम्हारा निबाह नहीं। चलो जहाँ भाग्य ले जाय!

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ऎ बहुरिया साँस लऽ, ढेंका छोड़ि दऽ जाँत लऽ

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आज गिरिजेश भैया ने अपनी पोस्ट से गाँव की याद दिला दी। गाँव को याद तो हम हमेशा करते रहते हैं लेकिन आज वो दिन याद आये जब हम गर्मी की छुट्टियों में वहाँ बचपन बिताया करते थे। अपनी ताजी पोस्ट में उन्होंने पुरानी दुपहरी के कुछ बिम्ब उकेरे हैं। एक बिम्ब देखकर सहसा मेरे सामने वह पूरा दृश्य उपस्थित हो गया जो वैशाख-जेठ की दुपहरी में सास-बहू की तू-तू मैं-मैं से उत्पन्न हो सकता है। ये रहा उनकी कविता में रेखांकित बिम्ब और उसके आगे है उसकी पड़ताल-

हुई रड़हो पुतहो
घर में सास पतोहू लड़ीं।
भरी दुपहरी
मर्दों को अगोर रही
दुआरे खटिया खड़ी

इसके पीछे की कहानी यह रही–

धर दिया सिलबट पर
टिकोरा को छीलकर
सास बोल गई
लहसुन संग पीस दे पतोहू
मरिचा मिलाय दई
खोंट ला पुदीना…

बहू जम्हियाय
उठ के न आय

तो…
वहीं शुरू हुआ
रड़हो-पुतहो

धनकुट्टी की टिक टिक हमने भी सुनी है, धान कुटाने को साइकिल के बीच में बोरा लादकर गये भी हैं। ये बात दीगर है कि बहुत छोटी उम्र के कारण हमें धान कुटाने के लिए शारीरिक श्रम नहीं करना पड़ता। दरवाजे पर का आदमी  साथ होता। हम तो केवल उस मशीनी गतिविधि को देखने जाते थे। इंजन की आवाज इतनी तेज कि सभी एक दूसरे से इशारे में ही बात कर पाते। लेकिन वह एक बहुत बड़ी सुविधा थी जो आम गृहस्थ के घर की औरतों को ढेंका और जाँत से मुक्त होने की राह दिखा रही थी। इन्जन मशीन से चलने वाली चक्की और ‘हालर’ ने गाँव की रंगत बदल दी। अब तो हमारी भाषा से कुछ चुटीले मुहावरे इस मशीनी क्रान्ति की भेंट चढ़ गये लगते हैं। आइए देखें कैसे…!

पहले हर बड़े घर में एक ढेंकाघर होता था। ढेंका से कूटकर धान का चावल बनाया जाता था। असल में यह कूटने की क्रिया ही इस यन्त्र से निकली हुई है। आजकल धान की ‘कुटाई’ तो होती ही नहीं। अब तो धान को ‘रगड़कर’ उसकी भूसी छुड़ाई जाती है। ढेंका के रूप में लकड़ी का एक लम्बा सुडौल बोटा दो खूंटों के बीच क्षैतिज आलम्ब पर टिका होता था जो लीवर के सिद्धान्त पर काम करता था। इसके एक सिरे पर मूसल जड़ा होता था जिसका निचला सिरा धातु से मढ़ा हुआ होता था। इस मूसल के ठीक नीचे जमीन की सतह पर ओखली का मुँह होता। आलम्ब के दूसरी ओर ढेंका का छोटा हिस्सा होता जिसपर पैर रखकर नीचे दबाया जाता था। नीचे दबाने पर इसका अगला हिस्सा ऊपर उठ जाता और छोड़ देने पर मूसल तेजी से ओखली में चोट करता। ओखली में रखे धान पर बार-बार के प्रहार से चावल और भूसी अलग-अलग हो जाते। इसे बाद में निकाल कर सूप से फटक लिया जाता।

मूसल के अग्र भाग को थोड़ा भोथरा रखते हुए इसी ढेंका से चिउड़ा कूटने का काम भी हो जाता था। धान को कुछ घण्टॆ पानी में भिगोकर निकाल लिया जाता है। फिर उसे कड़ाही में भूनकर गर्म स्थिति में ही ओखली में डालकर कूट लिया जाता है। चलते हुए मूसल के साथ ताल-मेल बनाकर ओखली के अनाज को चलाते रहना भी एक कमाल का कौशल मांगता है। मूसल की चोट से नौसिखिए की अंगुलियाँ कट जाने या टूट जाने की दुर्घटना प्रायः होती रहती थी। ओखली से अनाज बाहर निकालते समय ढेंका को ऊपर टिकाए रखने के लिए एक मुग्‌दर जैसी लकड़ी का प्रयोग होता था जिसे उसके नीचे खड़ा कर उसीपर ढेंका टिका दिया जाता था।

गेंहूँ से आटा बनाने के लिए भी हाथ से चलने वाली चक्की अर्थात्‌ ‘जाँता’ का प्रयोग किया जाता था। जाँता की मुठिया पकड़कर महिलाएं भारी भरकम चक्की को घुमातीं और गेंहूँ इत्यादि ऊपर बने छेद से डालते हुए उसका आटा तैयार करती। चक्की से बाहर निकलते आटे को सहेजने के लिए कच्ची मिट्टी का घेरा बना होता था। इसे बनाने के लिए दक्ष औरतों द्वारा तालाब की गीली मिट्टी से इसकी आकृति तैयार कर धूप में सुखा लिया जाता था। जाँता चलाते हुए इस अवसर पर पाराम्परिक लोकगीत भी गाये जाते जिन्हें जँतसार कहते थे। पं. विद्यानिवास मिश्र ने इन गीतों का बहुत अच्छा संकलन अपनी एक पुस्तक में किया है।

ढेंका-जाँत

ये दोनो यन्त्र गृहस्थी के बहुत जरूरी अंग हुआ करते थे। जिन गरीब घरों में ये उपलब्ध नहीं थे उन्हें अपने पड़ोसी से इसकी सेवा निःशुल्क मिल जाती थी। घर की बड़ी बूढ़ी औरतें इन यन्त्रों की देखभाल करती। बहुओं को भी बहुत जल्द इनका प्रयोग करना सीखना पड़ता था। जिन घरों में नौकर-चाकर होते उन घरों में यह काम वे ही करते। यहाँ तक आते-आते मेरी ही तरह आप के दिमाग में भी दो-तीन मुहावरे और लोकोक्तियाँ आ ही गयी होंगी। नयी पीढ़ी के बच्चों को शायद यह किताब से रटना पड़े कि ‘ओखली में सिर दिया तो मूसलॊं से क्या डरना’ का मतलब क्या हुआ। लेकिन जिसने ओखली में धुँआधार मूसल गिरते देखा हो उसे कुछ समझाने की जरूरत नहीं। गेंहूँ के साथ घुन भी कैसे पिस जाते हैं यह समझाने की जरूरत नहीं है।

कबीर दास जी ने यही चक्की देखी थी जब वे इस संसार की नश्वरता पर रो पड़े थे।

चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय।

दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय॥

आपको अपने आस-पास ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कोई भी काम करने में कमजोरी जाहिर कर देते हैं। किसी काम में लगा देने पर बार-बार उसके समाप्त होने की प्रतीक्षा करते हैं और ऐसे उपाय अपनाते हैं कि कम से कम मेहनत में काम पूरा हो जाय। ऐसे लोगों के लिए एक भोजपुरी कहावत है- “अब्बर कुटवैया हाली-हाली फटके” अब इस लोकोक्ति का अर्थ तभी जाना जा सकता है जब ढेंका से धान कूटने की प्रक्रिया पता हो। ढेंका चलाने में काफी मेहनत लगती है। कमजोर आदमी लगातार इसे नहीं चला सकता, इसलिए वह सुस्ताने के लिए धान से भूसी फटक कर अलग करने का काम जल्दी-जल्दी यानि कम अन्तराल पर ही करता रहता है।

आपने सौ प्याज या सौ जूते खाने की बोधकथा सुनी होगी। इसका प्रयोग तब होता है जब दो समान रूप से कठिन विकल्पों में से एक चुनने की बात हो और यह तय करना मुश्किल हो कि कौन वाला विकल्प कम कष्टदायक है। ऐसे में हश्र यह होता है कि अदल-बदलकर दोनो काम करने पड़ते हैं। इसी सन्दर्भ में हमारे ग्रामीण वातावरण में यह कहावत पैदा हुई होगी जब बहू को बहुत देर से ढेंका चलाते हुए देखकर उसकी सास प्यार से कहती है कि ऐ बहू, थोड़ा ब्रेक ले लो। तुम थक गयी होगी इसलिए ढेंका चलाना छोड़ दो और जाँता चलाना शुरू कर दो यानि धान कूटने के बजाय गेंहूँ पीस डालो।

ऎ बहुरिया साँस लऽ, ढेंका छोड़ि दऽ जाँत लऽ

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

निरुपमा के बाद रजनी को भी जान गँवानी पड़ी… क्यों???

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मोहब्बत में मिली रजनी को मौत 001 निरुपमा पाठक की मौत का मामला अभी अखबारी सुर्खियों से हटा भी नहीं था कि इलाहाबाद  में ऐसे ही क्रूर कथानक की पुनरावृत्ति हो गयी। इस बार किसी सन्देह या अनुमान की गुन्जाइश भी नहीं है। पुलिस को घटनास्थल पर मिले सबूतों के अनुसार परिवार वालों ने अपने पड़ोसी लड़के से प्रेम कर बैठी रजनी को उसके गर्भवती हो जाने के बाद पीट-पीटकर मार डाला और फिर उसे छत पर एक एंगिल से दुपट्टे के सहारे लटकाकर आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की। लेकिन यहाँ पोस्ट मार्टम रिपोर्ट ने सच्चाई से पर्दा उठाने में कोई चूक नहीं की।

रिपोर्ट ने जाहिर किया है कि रजनी को इतना पीटा गया कि शरीर के कई हिस्से काले पड़ गये। सिर में गम्भीर चोट पायी गयी। नाक से खून बहा। गले पर उंगलियों के निशान मिले हैं और सिर दीवार से टकराने की बात आयी है। गर्भवती रजनी के पेट पर वार किये गये थे जिससे उसे अन्दरूनी चोट लगी थी। पुलिस ने रजनी के माता-पिता, दो भाइयों और एक बहन को हिरासत में ले लिया। उसके प्रेमी से भी पुलिस पूछताछ कर रही है।(पूरी रिपोर्ट पढने के लिए अखबारी कतरन को क्लिक करिए)

यह मामला निरुपमा पाठक प्रकरण की तरह पेंचीदा नहीं है। बल्कि अत्यन्त सरल और उजाले की तरह साफ़ है। यहाँ लड़की केवल हाई स्कूल तक पढ़ी थी। निम्न मध्यम वर्ग के साहू परिवार में जन्मी रजनी ने घर वालों की इच्छा के विरुद्ध पड़ोसी केसरवानी परिवार के लड़के से प्रेम किया। घर वाले उसकी शादी की उम्र होने पर अन्यत्र शादी करना चाहते थे जिससे इन्कार करने पर उसे पीट-पीटकर अधमरा कर दिया गया और फिर फाँसी पर लटका दिया गया। यहाँ दलित और सवर्ण जाति के बीच बेमेल रिश्ते का प्रश्‍न भी नहीं था। यह कुकृत्य किसी पिछड़े ग्रामीण इलाके की खाप पंचायत की देखरेख में भी नहीं हुआ। किसी हाई-सोसायटी की परम आधुनिक जीवन शैली में जीने वाली कोई आधुनिका भी नहीं थी रजनी। लेकिन हश्र वही हुआ जो निरुपमा का हुआ था। आखिर क्यों?

व्यक्ति का अस्तित्व किन बातों पर टिका है यह विचारणीय है। परिवार, समाज, राज्य और वैश्विक परिदृश्य के सापेक्ष उसकी निजी हैसियत क्या है? समाज में नाक कट जाने के डर से परिवारी जन घोर अमानवीय कृत्य कर डालते हैं और यही समाज/राज्य उन्हें जेल भेंज देता है। क्या इससे नाक बची रह जाती है? फिर यह वहशीपन क्यों? आखिर इस कुकृत्य की प्रेरक शक्तियाँ कहाँ से संचालित होती हैं। सुधीजन इस पर अपने विचार रखें। बिना किसी अगड़े-पिछड़े, छोटे-बड़े, हिन्दू-मुस्लिम, अमीर-गरीब, वाम-दक्षिण, महिला-पुरुष के चश्में को चढ़ाये इस मुद्दे पर सोच कर देखिए। केवल मनुष्य के रूप में इस विषय पर चर्चा करिए। क्या कुछ निष्कर्ष निकल पा रहा है?

मेरी कोशिश तो फिलहाल असफल हो रही है। मनुष्य ने अपने लिए जो तमाम श्रेणियाँ बना रखी हैं उससे बाहर निकलना सचमुच बड़ा कठिन है। शायद असम्भव सा…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

पुण्यदायी व्यवसाय- तीर्थयात्रा कम्पनी…!

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भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने हेतु आदि शंकराचार्य नें भारत की चार दिशाओं में चार धामों की स्थापना की। उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम , पूरब में जगन्नाथपुरी एवं पश्चिम में द्वारका, हिन्दुओं के चार धाम हैं। आस्थावान हिन्दू इन धामों की यात्रा करना अपना पवित्र कर्तव्य मानते थे। शंकराचार्य से पूर्व पौराणिक काल से बद्रीनाथ, केदारनाथ, जमुनोत्री और गंगोत्री को चार धामों की प्रतिष्ठा प्राप्त है।  कालान्तर में हिन्दुओं के नये तीर्थ आते गये हैं। बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी के चार धामों के अतिरिक्त केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, ऋषिकेष, हरिद्वार, वैष्णो देवी, वाराणसी, प्रयाग, अयोध्या बैजनाथधाम, तिरुपति, शिरडी, गंगासागर, पशुपतिनाथ (काठमाण्डू) आदि तीर्थस्थल आस्थावान हिन्दुओं द्वारा विशेष श्रद्धा के साथ भ्रमण किये जाते हैं। शक्ति की देवी दुर्गाजी के अनेक रूपों के मन्दिर प्रायः पहाड़ों की चोटियों व दुर्गम स्थानों पर स्थापित है। लेकिन भक्तगण दुर्गम रास्तों की परवाह किए बिना माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने निकल पड़ते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रतिष्ठित भगवान शंकर से संबन्धित द्वादश ज्योतिर्लिंग भी हिन्दू आस्था और भक्ति के अनन्य केन्द्र हैं:

सौराष्ट्रे सोमनाथम्‌ च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्‌

उज्जयिन्याम्‌ महाकालम्‌ ओंकाराममलेश्वरम्‌

केदारम्‌ हिमवत्पृष्ठे डाकिन्याम्‌ भीमशंकरम्‌

वाराणास्यान्तु विश्वेशम् त्र्यम्बकम् गौतमीतटे

बैद्यनाथम्‌ चिताभूमौ नागेशम्‌ दारुकावने

सेतुबन्धेतु रामेश्वरम्‌ द्युश्मेशं च शिवालये

द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्‌

सर्वयाय विनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिः फलंलभेत्‌

इन पवित्र तीर्थस्थलों का दर्शन करने और पवित्र नदियों में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होने और पुण्य के अर्जन का विश्वास प्रायः सभी हिन्दुओं को तीर्थयात्रा के लिए प्रेरित करता है। मार्ग की तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुए प्राचीन काल में चारों धाम की यात्रा हिन्दुओं द्वारा देश की सांस्कृतिक एकता का दर्शन करने के लिये नहीं वरन्‌ अपना परलोक सुधारने के लिये ही की जाती होगी। इसी प्रकार गंगा का दर्शन करने लोग इस भाव से नहीं जाते कि वे सांस्कृतिक दृष्टि से भावविभोर हो जायें वरन्‌ इस भाव से जाते होंगे कि गंगा स्वयं शिव की जटा से निकली हैं और इसमें स्नान करने से उनके पापों का मोचन होगा।

पुराने जमाने में ये तीर्थयात्राएं बहुत कष्टकारी होती थीं। घर से बाहर निकलते ही कष्ट सहयात्री बन जाता था। कच्चे और दुर्गम मार्ग, दुर्लभ और धीमी सवारियाँ, प्रायः पैदल यात्रा की मजबूरी, खान-पान में कठिनाई और ठहरने के स्थानों का अभाव साधारण हैसियत वालों को यात्रा से रोकते थे। बहुत कम हिन्दू चारोधाम की यात्रा कर पाते थे। सुना जाता है कि भविष्य अनिश्चित्‌ जान बहुत से लोग यात्रा पर निकलने से पहले ही मृत्यु के बाद कराये जाने वाले कर्मकाण्ड और अनुष्ठान सम्पन्न कराकर जाते थे। जो भाग्यशाली होते थे और सकुशल यात्रा समाप्त कर लौट आते थे उनके दर्शन को भी पुण्यदायी माना जाता था। उनके पाँव पखारने और सेवा करने वालों की लाइन लग जाती थी।

पाप-पुण्य का विचार हमारे जनमानस में बहुत गहराई तक पैठा हुआ है। अच्छी और संस्कारित शिक्षा से हमारे मन को अच्छे और बुरे का भेद करना आता है। कम से कम हमारी आत्मा तो जानती ही है कि क्या गलत है और क्या सही। लेकिन लाख पढ़े-लिखे होकर भी ऐसे कम ही लोग हैं जो अपने सदाचरण पर टिके रहने को ही सबसे बड़ा पुण्य मानें। बहुतायत तो उन्हीं की है  जो इसके बजाय पहले काम, क्रोध, मद और लोभ के वशीभूत होकर निरन्तर अनैतिक कार्य करते जाते हैं और उसके बाद विश्वास रखते हैं कि पुरोहित द्वारा बताये गये कर्मकाण्डों के आयोजन और पवित्र तीर्थों के दर्शन द्वारा अपने एकाउण्ट से पाप की liability घटा लेंगे और पुण्य का asset बढ़ा लेंगे। इसी बैलेन्स शीट को कृत्रिम रूप से प्रभावशाली बनाने के प्रयास में  नये जमाने के लोग भी अपने पाप धोने के लिए संगम सहित तमाम नदियों व सरोवरों में खास मूहूर्त पर स्नान करने के लिए उमड़े जाते हैं और मन्दिरों में दर्शनार्थियों की भीड़ साल-दर-साल बढ़ती जा रही है।

इस पाप-पुण्य के व्यापार में बहुत से असली व्यापारियों ने व्यावसायिक पूँजी निवेश किया है। अब यात्रा की अनेकानेक सुविधाएं बढ़ती जा रही हैं। अब तो घर से ज्यादा बाहर की यात्रा खुशगवार होती जा रही है। पैकेज टूर ऑपरेटर्स, ट्रैवेल एजेन्सियाँ और सरकारी संस्थान, जैसे- रेलवे और पर्यटन विभाग द्वारा भी यात्रियों की जरूरत के अनुसार सुविधाए उपलब्ध करायी जा रही हैं। अब पुण्य कमाने निकले यात्रियों को सेवा देकर आर्थिक लाभ अर्जित करने वाली एजेन्सियों की भरमार होती जा रही है। मुझे यह सब चर्चा करने का मन इसलिए हुआ है कि हाल ही में मुझे एक ऐसी सुविधा से साक्षात्कार हुआ जो अत्यन्त सस्ते दर पर भारत के अधिकांश महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों की सैर लगातार पैंतीस दिनों तक कराती है। वह भी ऐसे कि यात्री को न तो अपने ठहरने का स्थान बदलना पड़ता और न ही सोने का बिस्तर। अपने सामान की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी नहीं, उसे यहाँ से वहाँ ढोने की फिक्र भी नहीं और खाने-पीने के लिए गर्म व ताजे घरेलू भोजन को मिस करने की मजबूरी भी नहीं है। मुझे तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगा।

रेलगाड़ी की चार बोगियों को विशेष रूप से तैयार कराकर  इस बड़ी यात्रा के लिए तीर्थयात्रा कम्पनी को उपलब्ध करा दिया जाता है। तीर्थयात्री को उसकी जो आरक्षित बर्थ यात्रा के प्रारम्भ में मिलती है वही अगले पैंतीस दिनों तक उसका बिस्तर होता है और वही कम्पार्टमेण्ट उसका घर बन जाता है। कम्पार्टमेण्ट की अन्य बर्थों के यात्री उसके परिवार के सदस्य बन जाते हैं और बगल का कम्पार्टमेण्ट उसका पड़ोसी घर हो जाता है। पूरी बोगी एक मुहल्ला और चार-पाँच बोगियाँ मिलकर एक शहर बना देती हैं। एक ऐसा शहर जिसमें देश के अलग-अलग राज्यों से आकर लोग बसे हुए हैं। सच में ‘भारत-दर्शन’ को निकले ये लोग स्वयं भारत का दर्शन कराते हैं। ये चारो डिब्बे अलग-अलग मार्गों पर अलग-अलग ट्रेनों से जुड़ते और टूटते हुए एक साथ देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँचते रहते हैं।

मुझे यह सब देखने और जानने का सुअवसर तब मिला जब एक ऐसी ही यात्रा मण्डली बसन्त पञ्चमी के दिन इलाहाबाद पहुँची। इस यात्रा दल में मेरे गाँव के आठ लोगों की टोली में मेरे माता-पिता भी शामिल थे। उत्सुकतावश मैं सुबह सोकर उठने के बाद जल्दी-जल्दी तैयार होकर आठ बजे स्टेशन पहुँच गया। इलाहाबाद जंक्शन पर मजार वाली प्लैटफ़ॉर्म के दोनो ओर यात्री दल के दो-दो डिब्बे खड़े थे लेकिन उनमें ताला बन्द था। कम्पनी के स्टिकर से पहचान हुई जिसके कर्मचारियों ने बताया कि यात्रा बनारस से रात में ही यहाँ आ गयी थी। प्रातःकाल सभी यात्री लक्जरी कोच बसों से संगम क्षेत्र की ओर चले गये हैं। गंगा स्नान करके बड़े हनुमान जी, अक्षयबट आदि का दर्शन करके आनन्द भवन जाएंगे। वहाँ से भारद्वाज आश्रम देखने के बाद  बसें उन्हें करीब बारह बजे स्टेशन छोड़ जाएगी। प्लैटफ़ॉर्म पर यात्रियों का भोजन कम्पनी के रसोइए तैयार कर रहे थे।

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मैं फौरन लौटकर घर आया। कार्यालय में बॉस से मिलकर छुट्टी लिया और बच्चों को तैयार कराकर श्रीमती जी के साथ स्टेशन पर पहुँच गया। अपने सास-ससुर की पसन्द का भोजन तैयार करने में श्रीमती जी सुबह से ही व्यस्त रही थीं। चम्पा की मदद से हरे मटर की पूड़ियाँ, गोभी, लौकी, आलू और टमाटर की पकौड़ियाँ और पिताजी की पसन्दीदा खीर अपने हाथों तैयार कर डिब्बे में भर लिया था और झोले में अन्य जरूरी सामान डालकर हम स्टेशन पहुँच गये। ठोड़ी देर बाद यात्रियों का समूह प्लेटफ़ॉर्म पर आने लगा। प्रायः सबकी उम्र पचास के ऊपर थी। सबके चेहरे पर सन्तुष्टि का भाव तैर रहा था। लम्बी यात्रा की थकान जैसा कुछ भी नहीं दिखा। सबके गले में लटका परिचय पत्र जरूर ध्यान आकर्षित कर रहा था।

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एक चादर बिछाकर मैने अपने गाँव की यात्रा मण्डली को बिठाया। श्रीमती जी ने डिब्बा खोलकर अपने घर का पकवान परोसना शुरू किया और मैने इस यात्रा के प्रबन्धक को खोजना। वे निकट ही मिल गये। इतनी बड़ी यात्रा को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने वाला व्यक्ति निश्चित ही बहुत जानकार और गुणी होगा यह अनुमान पहले से कर चुका था।

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लाला लक्ष्मीनारायण अग्रवाल को देखकर कोई सहज ही अन्दाज लगा सकता है कि उन्होंने किसी मैनेजमेण्ट स्कूल से इवेन्ट मैनेजमेण्ट का कोई कोर्स नही किया है। न ही उन्होंने उन्होंने कोई प्रोफ़ेशनल डिग्री ही हासिल की होगी। लोहे की एक फोल्डिंग चेयर पर बैठे हुए वे अपने स्टाफ़ को जरूरी हिदायतें दे रहे थे। बीच-बीच में देश के अन्य हिस्सों में चल रही उनकी कम्पनी की अन्य तीर्थयात्रा बोगियों से आने वाले फोन काल्स भी सुनते जा रहे थे। अगली यात्रा की बुकिंग भी करते जा रहे थे, और टूर-पैकेज के बारे में भी बताते जा रहे थे। मल्टी-टास्किंग का बेजोड़ नमूना थे लालाजी।

“लालाजी, कबसे हैं आप इस धन्धे में…?” मैने उनका मोबाइल बन्द होते ही पूछ लिया।

“सरसठ से चल रहा है जी… बयालीस साल हो गये है” उन्होंने सहजता से उत्तर दिया।

मुझे अपनी अल्पज्ञता पर लज्जा आयी। जो काम १९६७ से वर्षानुवर्ष हो रहा है मुझे उसका पता अब जाकर चल पाया है। मैने झेंप छिपाते हुए आश्चर्य से पूछा, “लगातार बयालिस साल से आप यह वार्षिक यात्रा आयोजित कराते है…?”

“नहीं जी, …यह तो साल भर चलता रहता है। …अगला टूर एक हफ्ते बाद रवाना होगा। वह सत्रह दिन का है। साल में चार-पाँच हो जाते हैं”

“कैसे करते हैं आप यह सब?” मैने अपना कौतूहल छिपाते हुए पूछा।

“स्टाफ़ लगा रखा है जी। बाकी तो ऊपर वाला सब कराता है…सारा सामान हम साथ लेकर चलते हैं। लोकल केवल सब्जियाँ खरीदते हैं। हमारा स्टाफ़ अब ट्रेण्ड है। …सब प्रभु का आशीर्वाद है”

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मैने जब यात्रा के रूट और प्रमुख दर्शनीय स्थलों का व्यौरा जानना चाहा तो उन्होंने एक गुलाबी पर्चा थमा दिया। इस पर्चे में यात्रियों की जानकारी के लिए बहुत स्पष्ट और सूक्ष्म तरीके से सभी जरूरी बातें बतायी गयी थीं। नीचे सारणी में यात्रापथ का विवरण दूंगा। (अभी देर रात हो गयी है इसलिए इसे टालता हूँ)

वहीं पर गर्मागरम रोटियाँ सेंकी जा रही थीं। चार लोग मिलकर जिस कुशलता से लकड़ी की आग पर फुलके बना रहे थे उन्हें देखकर मैं लोभसंवरण न कर सका। आप यह वीडियो देखिए:

 

खाने में लहसुन-प्याज का प्रयोग नहीं होता। तेल, मिर्च और मसाला का प्रयोग भी बुजुर्गों की सहूलियत के हिसाब से कम किया जाता है। यात्री की उम्र, पसन्द और डाक्टरी सलाह का ध्यान रखते हुए सुबह की चाय, नाश्ता और दोपहर व शाम के भोजन को तैयार किया जाता था। हमारे गाँव के लोगों ने कहा कि ‘बहूजी’ ने इतना खिला दिया है कि अब कम्पनी का खाना हम नहीं खा सकते। हमें दावत दी गयी। हमने सहर्ष दावत कबूल की और सपरिवार डिब्बे में बैठ गये। डिब्बा क्या था बम्बई की किसी चाल का कमरा लग रहा था। ऊपर बाँधी गयी रस्सियों पर कपड़े झूल रहे थे। ऑलआउट मशीन और मोबाइल चार्जर की व्यवस्था सभी कूपों में थी। दवाइयाँ, चश्मे, और मोबाइल सबके सिरहाने रखे हुए। किसी चोर उचक्के या उठाई गीर के खतरे निश्चिन्त सबकुछ खुला हुआ जैसे घर में रखा हुआ हो। यात्रियों की आपसी बातचीत में घरेलू परिचय का पुट। इलाहाबाद में हम उनलोगों से मिलने वाले हैं यह पूरी बोगी के लोग जानते थे। वे सभी पिछले महीने भर से साथ जो थे।DSC02250

भोजन परोसने के लिए दक्ष कर्मचारी थे। सभी यात्रियों को उनकी बर्थ पर थालियाँ थमा दी गयीं। सादी सब्जी, तीखी-मसालेदार सब्जी, सादा चावल, मीठा चावल, मटर-पनीर स्पेशल (दाल के बदले) आदि बाल्टियों में भर-भरकर एक ओर से आते और जरूरत के हिसाब से थालियों में डालते हुए दूसरी ओर निकलते जाते। दस-पन्द्रह मिनट में ही स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन का काम पूरा हो गया।

वहाँ से लौटकर आया तो यही सोचता रहा कि स कम्पनी के बारे में आप सबको बताऊंगा। घर आकर गुलाबी पर्चा खोला तो उसमें सबसे पहले यही बताया गया था कि-

‘हमारी संस्था की सफलता को देखते हुए अन्य बहुत से अनुभवहीन व्यक्तियों ने नाम के आरम्भिक ‘श्री’ के स्थान पर अन्य नाम डिजाइन जोड़कर अपना नाम रख लिया है।और वे मिलते-जुलते नामों से VIP ए.सी. कोच से यात्रा करने के प्रलोभन द्वारा यात्रियों को भ्रमित कर रहे हैं। कृपया उनसे दस वर्ष पुराने यात्रियों की सूची रिकार्ड मांगे व उनके पुराने यात्रियों से सम्पर्क करके सुविधा, व्यवस्था की जानकारी करें तभी आपको वास्तविकता ज्ञात होगी। चूँकि हम यात्रियों को पूरी-पूरी सुविधा प्रधान करते हैं इसलिए हमारा खर्चा अन्य संस्थाओं से ज्यादा है। कृअपया आप हमारे पुराने यात्रियों से सुविधा व्यवस्था की जानकारी प्राप्त कर्रें व सन्तुष्ट होने के बाद हि सीट बुक कराएं।’ 

मुझे महसूस हुआ कि इस क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा का दखल हो गया है। ग्राहकों (यात्रियों) को इससे लाभ मिलना ही है। धार्मिक आस्था के वशीभूत हिन्दुओं को चारोधाम व द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से अधिकांश की यात्रा एक मुश्त कराने वाली यह योजना इन कम्पनियों को आर्थिक लाभ चाहे जो दे रही हो लेकिन प्रतिवर्ष हजारों लोगों को पुण्य अर्जन में सहयोग और सेवा प्रदान करने वाली कम्पनी के कर्मचारी और प्रबन्धक पुण्य का लाभ जरूर कमा रहे हैं। आप क्या सोचते हैं?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

वीडिओ पता:  http://www.youtube.com/watch?v=4vIE27ViX4o

एक घटिया व्यक्ति को चुनने के लिए इतनी कसरत… बाप रे बाप?

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जनवरी की बेहद सर्द रात… एलार्म की घण्टी भोर में साढ़े चार बजे बज उठी है। घर के तीनो मोबाइल सेट एक साथ बजे हैं। तीनों में एलार्म इस लिए सेट किए कि कहीं कोई चूक न हो जाय। मामला इतना संवेदनशील है कि तैयार होकर साढ़े पाँच बजे तक हर हाल में निकल पड़ना है। सीजन का सबसे ठण्डा दिन… दाँत बज रहे हैं। बाहर कुहरे की मोटी चादर फैली हुई है। गहरी नींद और गर्म रजाई से निकलकर बाथरूम में… ऊफ़्‌ टैप का पानी तो हाथ काटे दे रहा है। इमर्सन रॉड से पानी गरम करने में आधा घण्टा लग जाएगा…. चलो तबतक ब्रश करके सेव करते हैं… किसी तरह ये दिन ठीकठाक बीत जाय …नहाकर पूजा करते हुए यही प्रार्थना मन में चल रही है…।

ड्राइवर का मोबाइल स्विच ऑफ़ है… उफ़्‌। यदि वह समय से नहीं आया तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी। सुरक्षाकर्मी न आया तो अकेले ही निकल लूंगा लेकिन ड्राइवर और गाड़ी के बिना तो कुछ भी सम्भव नहीं। रात ग्यारह बजे छोड़ते वक्त मैने उन दोनो को ठीक से समझा दिया था कि सुबह साढ़े पाँच बजे निकलना है… एक मिनट भी देर की तो मैं डीएम साहब के यहाँ जाकर दूसरी गाड़ी ले लूंगा… उसके बाद तुम लोग जेल जाना… मैं तो चुनाव कराने चला ही जाऊंगा…। लेकिन क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ? खुद की फसन्त भी तो है। डीएम साहब पूछेंगे कि रात में आए ही क्यों… क्या जवाब दे पाऊंगा। ड्राइवर ने फिर भी मोबाइल बन्द कर लिया है। उफ़्‌…! टेन्शन… टेन्शन…टेन्शन… चुनाव में यह किस-किसको नहीं झेलना पड़ता है…!

पूजा अधूरी छोड़नी पड़ी। भगवान को क्या समझाना… वह तो सब जानता है। चुनाव ड्यूटी के लिए छूट दे ही देगा। लेकिन ५:२५ पर भी ड्राइवर का फोन बन्द होना डरा रहा है। अचानक मुँह जल जाता है तो पता चलता है कि श्रीमती जी गरम चाय हाथ में दे गयी हैं। पहले उस ओर ध्यान नहीं गया। मोबाइल पर अटका हुआ है… अब क्या करूँ…??? सुबह-सुबह टेन्शन…।

ठीक साढ़े-पाँच बजे काल-बेल बज उठती है। दौड़ कर दरवाजा खोलता हूँ…। प्याली की चाय छलक जाती है। बाहर ड्राइवर और गार्ड दोनो मौजूद हैं। जान में जान आती है। चुनाव ड्यूटी का खौफ़ किसे न होगा…? फाइल लेकर गाड़ी में बैठ जाता हूँ।

“तुमने मोबाइल क्यों बन्द कर लिया भाई…?” मन में खुशी है कि समय पर प्रस्थान हो गया है।

“साहब, बैटरी डिस्चार्ज हो गयी है। रात में लाइट नहीं थी…” ओहो, मैने तो इन्हें ग्यारह बजे छोड़ा ही था। इन्हें अपने घर जाकर सोते हुए बारह बज गये होंगे फिर भी सुबह ठीक समय पर हाजिर हैं… इन्हें तो मुझसे भी कम समय सोने को मिला… मन को तसल्ली देता हूँ।

फिर उनके बारे में सोचने लगा जो उस देहात के अन्धेरे में कड़ी ठण्ड से ठिठुरते हुए ब्लॉक में बने बूथ पर टिके हुए हैं। चुनाव कराने गये करीब बीस शहरी लोगों की सुविधा के नाम पर ब्लॉक में लगा एक ‘इण्डिया मार्क-टू हैण्ड पम्प’, खुली खिड़कियों वाले बड़े से हाल में बिछी टेन्ट हाउस की चरर-मरर करती चारपाइयाँ और उनपर बिछे धूलधूसरित गद्दे, बीडिओ और ‘पंचायत साहब’ के सौजन्य से रखी कुछ मटमैली रजाइयाँ। रात में ब्लॉक के स्टाफ़ ने पूरी सेवा भावना से जो गरम-गरम पूड़ी और आलू की मसालेदार सब्जी खिलायी थी उसे खाने के बाद उस शौचालयविहीन परिसर में रुककर सोने की हिम्मत न हुई। वहाँ से मैं रात में दस बजे भाग आया। करीब साठ किलोमीटर की यात्रा वहाँ रुकने से कम दुखदायी थी।

हालाँकि ऑब्जर्वर महोदय की इच्छा थी कि सेक्टर मजिस्ट्रेट भी बूथ पर ही रात्रि विश्राम करें। यह भी कि रात भर इसपर निगरानी रखी जाय कि किसी दल या प्रत्याशी द्वारा पोलिंग पार्टी को प्रभावित करने का प्रयास न हो। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए ‘कुछ भी करेगा’ टाइप तैयारी। …पोलिंग पार्टी जब खा-पीकर सो गयी तब मैं वहाँ से हटा और जब सुबह सात बजे हाजिर हो गया तो पार्टी वाले अभी जगकर पहली चाय की बाट जोह रहे थे।

मतदान आठ बजे से प्रारम्भ होना था… आनन-फानन में हाल खाली करके मतदान की तैयारी कर ली गयी। मतदान के लिए गोपनीय घेरा बना लिया गया था। पुलिस वालों को स्ट्रेट्जिक प्वाइण्ट्स पर तैनात किया गया, वीडियो कैमरा वाले को लगातार आठ घण्टे वोटिंग की रिकॉर्डिंग करने के लिए जरूरी बैटरी बैकअप और कैसेट के साथ तैयार किया गया… पीठासीन अधिकारी अपनी टीम के साथ मुस्तैद होकर माननीय मतदाता की राह देखने लगे… प्रथम वोटर ग्यारह बजे पधारे।

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“साहब आप बहुत गलत कर रहे हैं, इतनी सख़्ती करेंगे तब तो हम चुनाव ही हार जाएंगे… ‘भाई’ को मुँह दिखाने लायक ही नहीं रह जाएंगे” प्रत्याशियों की ओर से तैनात मतदान अभिकर्ताओं में से एक ने व्यग्र होकर कहा।

प्रत्येक मतदेय स्थल (पोलिंग बूथ) पर प्रत्याशी द्वारा अपना एजेन्ट नियुक्त किया जाता है जो मतदाताओं की पहचान करने में पोलिंग पार्टी की मदद करते हैं और प्रतिद्वन्दी पार्टी द्वारा सम्भावित धाँधली पर भी नजर रखते हैं। इन्हें हाल के भीतर ही कुर्सियाँ दी जाती हैं। ये प्रत्येक मतदाता को देखते हैं और किसी भी फर्जी मतदाता की पहचान को चैलेन्ज कर सकते हैं। जो महोदय शिकायत कर रहे थे उनको मैने वोट डाल रहे मतदाताओं के नजदीक जाकर मतपत्र देखने की कोशिश से रोक दिया था। मतदान की गोपनीयता भंग होने की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती थी। हारकर वे हाल से बाहर आ गये थे और मुझे ‘समझाने-बुझाने’ की कोशिश करने लगे

“मैं समझा नहीं, आप चाहते क्या हैं…?” मैने अनभिज्ञता प्रकट की।

“अरे साहब, यदि वोटर को हमें वोट नहीं दिखाने देंगे तब तो वह धोखा दे देगा”

“कैसा धोखा…? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, गुप्त मतदान का तो उसे अधिकार है। इसी की रक्षा के लिए तो यह सारी मशीनरी लगी है”

“कैसा अधिकार साहब…, चार-चार लोगों से पैसा खाकर बैठे हैं सब… अगर ऐसे वोट डलवा देंगे तब तो यह हमारा खाकर भी दूसरे को वोट दे देंगे…”

“नहीं-नहीं, मैं ऐसा नहीं मानता… ये सभी खुद ही जनप्रतिनिधि हैं। जनता के वोट से चुनकर प्रधान और बीडीसी मेम्बर बने हैं। आज ये अपना एम.एल.सी चुनने आये हैं। ये लोकतन्त्र के खिलाफ़ कैसे जा सकते हैं?”

“बेकार की बात कर रहे हैं आप, इसी एलेक्शन की राजनीति में मैने जिन्दगी गुजार दी है साहब… यहाँ हमारी जाति के वोटर नहीं हैं। आपने अगर मदद नहीं की तो यहाँ से तो हम हार ही जाएंगे”

“मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ? मदद तो वोटर ही करेगा। आपके प्रत्याशी खासे लोकप्रिय हैं, मैने सुना है आसानी से जीत रहे हैं…” मैने ढाढस देते हुए कहा।

“बात वो नहीं है। चुनाव तो ‘भाई’ जीत ही रहे हैं, लेकिन इस बूथ से हार हो जाएगी तो मेरी बड़ी फजीहत हो जाएगी। क्या मुँह दिखाऊंगा मैं?”

“मुँह तो मैं नहीं दिखा पाऊंगा अगर यहाँ कोई धाँधली हो गयी… मेरी तो नौकरी ही चली जाएगी” मैने मजबूरी बतायी।

“किसकी मजाल है साहब जो आँख उठाकर देख ले… सख्ती सिर्फ़ आप कर रहे हैं। यहाँ किसी भी एजेण्ट की हिम्मत नहीं है जो हमारे खिलाफ़ खुलकर ऑब्जेक्शन करे। पता नहीं, आप ही क्यों नहीं समझ रहे है?”

“अभी यहाँ जोनल मजिस्ट्रेट, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और स्वयं ऑब्जर्वर कभी भी आ सकते हैं… आप किसी अनियमितता की उम्मीद मत करिए। तुरन्त शिकायत हो जाएगी…”

“कोई कुछ नहीं कहेगा साहब, ये साले वोटर एक बार मुझसे आँख मिलाएंगे तो जो मैं चाहूंगा वही करेंगे।”

मैने साफ हाथ जोड़ लिया। मुझसे निराश हो जाने के बाद एजेण्ट महोदय उठकर बेचैनी से टहलने लगे। थोड़ी दूर जाकर मोबाइल मिलाने लगे। दूर से उनका हाव-भाव बता रहा था कि काफ़ी कोशिश के बाद फोन मिल गया है। फोन के उस ओर जो भी था उसे कुछ समझाने लगे… काफ़ी देर तक समझाने के बाद मेरे नजदीक आए और मोबाइल मुझे थमाते हुए बोले-

“लीजिए साहब, बहुत मजबूरी में मुझे यह कदम उठाना पड़ा है… भाई से ही बात कर लीजिए”

“ओहो…! हेलो… कौन साहब बोल रहे हैं?” मैने गर्मजोशी से अभिवादन करते हुए कहा।

“साहब नमस्ते… ‘मैं’ बोल रहा हूँ… कैसे हैं? सब ठीक चल रहा है न…” इस बीच बगल से एजेण्ट महोदय ने इशारे से बता दिया कि फोन पर उनके प्रत्याशी हैं।

“हाँ-हाँ, सब आपकी दुआएं हैं। सब कुछ फ्री एण्ड फेयर चल रहा है। इधर निरक्षर मतदाता अधिक हैं इसलिए प्रिफ़रेन्शियल वोट डालने में समय अधिक लग रहा है। नियमानुसार आवश्यक होने पर वोटिंग हेल्पर की सुविधा दी जा रही है”

“वो तो ठीक है, लेकिन `इनको’ आप कोई सुविधा नहीं दे रहे हैं… ऐसे काम नहीं चलेगा, थोड़ी मदद कर दीजिए…”

“कैसी मदद, पोलिंग पार्टी तो वोटर्स की मदद कर ही रही है… आराम से वोट पड़ रहे हैं। किसी को कोई शिकायत नहीं है”

“अरे, इनकी शिकायत पर तो ध्यान दीजिए… कह रहे हैं कि आप वोट देखने नहीं दे रहे हैं…”

“नेता जी, क्या आप यह कहना चाहते हैं कि मैं मतदान की गोपनीयता भंग हो जाने दूँ”

“नहीं-नहीं, बस इनको देख लेने दीजिए, नहीं तो वोटर टूट जाएंगे, हमारा नुकसान कराकर आप को क्या मिल जाएगा…?”

“भाई साहब, इसके लिए माफ़ करिए। मैं अकेला नहीं हूँ यहाँ। पीठासीन अधिकारी है, माइक्रो ऑब्जर्वर हैम, पुलिस वाले हैं, दूसरे उच्चाधिकारी हैं, आयोग के ऑब्जर्वर हैं और सबके बाद पूरी वोटिंग की वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही है जिसे ऑब्जर्वर द्वारा देखकर संतुष्ट होने के बाद ही मतगणना करायी जाएगी। किसी प्रकार की धाँधली मतदान निरस्त करा सकती है। सरकार की और प्रशासन की बड़ी बदनामी हो जाएगी। आप अब भगवान के ऊपर छोड़ दीजिए… जो होगा अच्छा ही होगा।”

एक साँस में अपनी बात कहकर मैने फोन बन्द कर दिया और एजेन्ट महोदय से खेद प्रकट करते हुए उन्हें मोबाइल वापस कर दिया। भाई से हुई बात की जानकारी मैने अपने नजदीकी उच्चाधिकारी को फोन से दे दी। थोड़ी देर में अतिरिक्त फोर्स भी आ गयी। चार बजे की निर्धारित समय सीमा पूरी हो जाने तक एक स्थिर तनाव बना रहा। अन्ततः ९५ प्रतिशत मतदाताओं ने अपना वोट डाला।

***

ajit-ninan-024 पंचायतीराज व्यवस्था के लागू होने के बाद ग्राम पंचायत अध्यक्ष (ग्राम-प्रधान) और क्षेत्र पंचायत समिति के सदस्य (बीडीसी मेम्बर) पदों पर अनेक महिलाएं चुनी जा चुकी हैं।  विधान परिषद के स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता यही पंचायत प्रतिनिधि होते हैं। मतदान के लिए वहाँ आयी हुई अधिकांश महिलाएं अनपढ़ और निरक्षर थीं। उन्हें जिस वोट का अधिकार मिला था वस्तुतः उसका प्रयोग उनके पति, श्वसुर, देवर या पुत्र द्वारा ही किया जाना प्रतीत होता था। एक रबर स्टैम्प की भाँति उन्होंने बतायी गयी जगह पर ‘१’ की लकीर खींची होगी, शायद कुछ वोट सही जगह न पड़ पाने के कारण निरस्त भी करना पड़े। लोकतन्त्र की दुन्दुभि बजाते ये चुनाव क्या देश के जनमानस का सही प्रतिनिधि दे पा रहे हैं। ऐसा नेता जो हमें आगे की ओर सही दिशा में ले जा सके?

चुनाव के एक दिन पहले सुबह-सुबह कलेक्ट्रेट परिसर से पोलिंग पार्टियों की रवानगी से लेकर अगले दिन शाम तक वापस मतपेटियों के जमा होने तक की प्रक्रिया तो चुनावी महागाथा का बहुत संक्षिप्त अंश है। करदाता से वसूले गये करोड़ो रूपयों को खर्च करने, आम जन-जीवन अस्त-व्यस्त करने और लाखों कर्मचारियों-अधिकारियों द्वारा अपना रुटीन खराब करने के बाद चुनाव की प्रक्रिया सम्पन्न होती है तो एक ऐसे विजयी उम्मीदवार के नाम की घोषणा से जो अगले कुछ सालों में कुछ भी गुल खिला सकता है:

वह सदन में प्रश्न पूछने के लिए पैसा खा सकता है, सरकार चलाने के लिए माफ़िया से हाथ मिला सकता है, सरकार बचाने के लिए दलबदल कर करोड़ो कमा सकता है, कबूतरबाजी कर सकता है, साम्प्रदायिक और जातीय दंगे करवा सकता है, ईमानदार अधिकारियों की हत्या करा सकता है, आत्महत्या के लिए मजबूर कर सकता है, बेईमान अधिकारियों का गोल बनाकर सरकारी खजाना लूट सकता है, सरकारी ठेके दिला सकता है, सरकारी सौदों में दलाली खा सकता है, आम जनता और गरीबों का हक छीन कर अपनी तिजोरी भर सकता है, आतंकवादियों को जेल से छुड़ाकर उनके देश भेंज सकता है, राजभवन में पहुँचकर एय्याशी कर सकता है, मधु कोड़ा बन सकता है, देश बाँटने की साजिश रच सकता है।

ऐसी प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाकर क्या हम उस पाप के भागी नहीं बन रहे हैं?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

इलाहाबाद में अमरूद के लिए तरसने का मजा… !?!

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मुझे इलाहाबाद में नौकरी करते हुए ढाई साल हो गये। इसके पहले एक दशक से कुछ ही कम साल विद्यार्थी के रूप में यहाँ गुजार चुका हूँ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सर गंगानाथ झा छात्रावास में रहते हुए हम रोज शाम को लक्ष्मी टाकीज चौराहे पर चाय पीने आते और फलों की दुकान से मौसमी फल ले जाते। जाड़ा शुरू होते ही इलाहाबाद के प्रसिद्ध अमरूद मिलने लगते- बिल्कुल ताजे और स्वादिष्ट। पहली बार में ही इनकी खुशबू और मिठास का दीवाना कौन न हो जाय…! हमें जब गाँव जाना होता तो बैग भरकर अमरूद ही ले जाते। जब डिमाण्ड बढ़ती गयी तो एक बार यहाँ के खुसरूबाग से अमरूद का पौधा ही लेते गये। गाँव पर उसका पेड़ तो तैयार हो गया लेकिन वहाँ फल का स्वाद इलाहाबादी अमरूदों जैसा न रहा।

दुबारा इलाहाबाद की पोस्टिंग मिलने पर हम इस कारण से भी खुश हो लिए थे कि अब सेब से टक्कर लेते लाल-लाल अमरूदों का आनन्द खूब मिलेगा। उसपर जब सरकारी आवास मिला तो यह देखकर खुशी दोगुनी हो गयी कि घर के आगे-पीछे अमरूद के तीन-चार पेड़ लगे हुए थे। पिछवाड़े कोने में लगा पेड़ तो काफी बड़ा था और फलने के लिए पूरी तरह तैयार था। यानि वह अनुपम सुख बिना पैसा खर्च किए मिलने वाला था। मुझे यह भी बताया गया कि साल में इस पेड़ में दो-तीन बार फल लगते हैं।यहाँ हैं शिकारी तोताराम

फिर क्या था- पेड़ में फूल लगे और देखते-देखते फलों में बदलते गये। मैं इनके पकने का इन्तजार करने लगा। इनका आकार भी अच्छा खासा हो गया। असली इलाहाबादी ही थे। लेकिन कई दिनों के बाद भी जब मुझे कोई पका फल नहीं दिखा तो मैने थोड़ी निगरानी की। पता चला कि जब मेरे ऑफिस और बेटी के स्कूल चले जाने के बाद श्रीमती जी घर के भीतर अपनी गृहस्थी सम्हालने में व्यस्त हो जातीं, तो सुनसान देखकर कलेक्ट्रेट कैम्पस में रहने वाले कुछ कर्मचारियों के परिवारों से बच्चों के झुण्ड आते और चारदीवारी पर चढ़कर पेड़ की पूरी पैमाइश कर जाते।

एक बार मुझे अचानक ऑफिस से घर आना हुआ तो मैने देखा- दो बच्चे पेड़ पर, तीन दीवार पर और कुछ नीचे खड़े होकर पेड़ को खंगाल रहे थे। मुझे आता देख नीचे खड़े बच्चे सरपट भाग गये। दीवार वाले सीधे कूद पड़े और लड़खड़ाते हुए भागने लगे। पेड़ की डाल पर चढ़े हुए शूरमा भी हाथ के अमरूद फेंककर तेजी से उतरने लगे। मुझे चिन्ता हुई कि वे कहीं हड़बड़ी में गिरकर चोट न खा बैठें। मैनें हाथ के इशारे से उन्हें आश्वस्त किया कि घबराने की जरूरत नहीं है। (यानि मैं उनका कुछ करने वाला नहीं हूँ।) यह भी कि जो फल तोड़ लिए गये हैं वे उन्हीं के हैं…। मैने उन्हें आराम से उतरकर जाने दिया। बस एक सलाह देकर कि पहले अमरूद पक जाने देते…। गाँव पर बाग से आम की चोरी करते पकड़े गये बच्चों पर पिताजी के नर्म व्यवहार की याद आ गयी थी।

ये फ़सल किस काम की

लेकिन उस दिन मुझसे जो ‘गलती’ हुई उसका खामियाजा अबतक भुगत रहा हूँ।  मेरे पूर्वाधिकारी ने कदाचित्‌ अपने रौब और गार्डों के माध्यम से उन बच्चों के मन में जो डर बनाया होगा वह उसी दिन से काफूर हो गया। …और निःशुल्क ताजे पके अमरुद खाने का मेरा सपना चकनाचूर हो गया। अब तो वे बेधड़क अपनी मर्जी से दीवार के सहारे चढ़कर अमरूद तलाशते रहते हैं।

हमने आशा का दामन फिर भी नहीं छोड़ा था। पेड़ में बहुत से अमरूद छिपे हुए भी होते हैं, जिनपर जल्दबाजी में काम करने वाले शिकारी बच्चों की निगाह नहीं पड़ती। मैं पेड़ों का मालिक होने के कारण आराम से खोज-खोजकर उन बचे-खुचे फलों को तोड़ सकता था। वे मेरे छोटे से परिवार के आनन्द के लिए पर्याप्त होते। चिड़ियों की दावत लेकिन तभी मुझे एक और शिकारी वर्ग से दो-चार होना पड़ा। मैने देखा कि पेड़ के नीचे कच्चे और अधपके फलों के छोटे-छोटे टुकड़े गिरे हुए हैं। ऊपर देखा तो हैरान रह गया। कई फल टहनी से तो लगे हुए थे लेकिन आधा-तिहाई खाये जा चुके थे। यानि कि मेरे सपने पर केवल मनुष्य ही नहीं पक्षी भी तुषारापात करने को कमर कस चुके थे। भूरे रंग की स्थानीय देशी चिड़िया; जिसका नाम मुझे नहीं मालूम (शायद मैना), झुण्ड में आकर पेड़ की एक-एक डाल पर मंडराने लगी। फिर अपने तोताराम कैसे पीछे रहते? ये भी सपरिवार पधारने लगे। बड़ी सफाई से फलों को कुतरा जाने लगा। टहनी से बिना अलग किए अमरूद का ज्यादातर हिस्सा चट हो जाता।

फिर तो मेरे आकर्षण का केन्द्र अमरूद न होकर ये अनोखे मेहमान हो गये। मैं चुपके से छिपकर इनका फल कुतरना देखता। सच में इनकी कारीगरी देखकर मजा आने लगा। मैने जब भी इनकी फोटो खींचनी चाही, जाने कैसे इन्हें पता चल जाता और ये फुर्र हो जाते। फिर भी मेरा प्रयास जारी रहा। अन्ततः आज तोते की एक जोड़ी मेरे कैमरे की पकड़ में आ ही गयी। वह भी ऐसे कि चोरी का माल पंजे में दबाए साबुत बरामद हुआ। अमरूद की हरी-हरी पत्तियों और हरे फलों के बीच बैठे हुए ये हरे पंख और लाल चोंच वाले आकर्षक जीव आँखों को इतनी तृप्ति देते हैं कि मैं इनपर सारे फल खुशी-खुशी न्यौछावर कर दूँ।

पंजे में दबाकर ले उड़े

समाधान के तौर पर मैं एक दिन बाजार से कुछ अमरूद खरीद लाया तो श्रीमती जी का ताना सुनना पड़ा कि घर का अमरूद दूसरे खा रहे हैं और आप बाजार से ला रहे हैं… लानत है। तबसे मैने बाजार के अमरूद की ओर आँख उठाना भी छोड़ दिया है। अब आप ही बताइए मुझे इलाहाबादी अमरूद का सुखद स्वाद कैसे मिलेगा?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

इलाहाबाद की राष्ट्रीय ब्लॉगर गोष्ठी से पहले…

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(१)

भाव हमारे शब्द उधार के…

पाँच दिनों की ट्रेनिंग पूरी करके लखनऊ से इलाहाबाद लौटा हूँ। पत्नी और बच्चे बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। दीपावली की छुट्टी मनाने मेरे दो भाई भी अपने-अपने हॉस्टेल से आ चुके थे। घर में एक जन्मदिन भी था। लेकिन मुझे इसकी खुशी मनाने के लिए कोई उपहार खरीदने या अन्य तैयारी का कोई समय नहीं मिल पाया था। बस रात के नौ बजे तक घर पहुँच जाना ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि रही। रिक्शे से उतरकर सबसे पहले पड़ोसी के लॉन से गुलाब के फूल माँग लाया और घर में प्रवेश करते ही उन्ही फूलों को पेश करते हुए  यह उधार का शेर सुना डाला-

तमाम उम्र तुम्हें जिन्दगी का प्यार मिले।

खु़दा करे ये खुशी तुमको बार-बार मिले॥

“हैप्पी बड्डे” का काम पूरा हो लिया था। तभी मेरे एक दोस्त ने चार खूबसूरत लाइनें बता दीं। तड़ से मैने एक सुनहले कार्ड पर उन्हें लिखा और चुपके से वहाँ रख दिया जहाँ उनकी नजर जल्दी से पहुँच जाय-

चन्द मासूम अदाओं के सिवा कुछ भी नहीं।
महकी-महकी सी हवाओं के सिवा कुछ भी नहीं॥
आज के प्यार भरे दिन पे तुम्हें देने को,
पास में मेरे दुआओं के सिवा कुछ भी नहीं।

फिर क्या था। आनन्द आ गया। भाव जम गया था। मेरी भावनाएं पूरी तरह से संचारित हो गयीं। दोनो तरफ़ सन्तुष्टि का भाव था। मेरे मन को बहुत तसल्ली मिल गयी और कुछ न कर पाने का मलाल थोड़ा मद्धिम हुआ।

(२)

कहानी कुछ यूँ पलटी:

अब मैं अगली चिन्ता की ओर से बरबस मोड़े हुए मन को दुबारा उस ओर ले जाने का उपक्रम करने लगा। कम्प्यूटर पर बैठकर आगामी कार्यक्रम की तैयारियों की प्रगति समीक्षा के उद्देश्य से मेलबॉक्स चेक करना था। कार्यक्रम के संयोजक श्री सन्तोष भदौरिया जी से बात करनी थी। अपने छोटे भाइयों से कम्प्यूटर तकनीक पर कुछ नया सीखना था, और अपने ब्लॉग पर एक नयी पोस्ट लिखने का मन भी था।

राष्ट्रीय सेमिनार के आयोजन में हमारे चिठ्ठाकार बन्धुओं ने जिस उत्साह और सौजन्यता से प्रतिभाग करने हेतु अपनी सहमति भेंजी है उसका धन्यवाद ज्ञापन भी करना था और ज्योतिपर्व दीपावली की शुभकामनाएं भी प्रेषित करनी थीं। इन सभी कार्यों पर एक के बाद एक ध्यान दौड़ाता रहा, लेकिन एकाग्र नहीं हो सका।

तभी एक जबरदस्त तुकबन्दी मेरे कानों से टकरायी। मेरी गृहिणी को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। उन्हें मुझसे शिकायत हो ली थी और वह तुकबन्दी उसी का बयान कर रही थी।

मैने पीछे मुड़कर पूछा, “इसके आगे भी कुछ जोड़ोगी कि यहीं अटकी रहोगी?”

“इसके आगे आप जोड़िए… मेरे भाव से तो आप भली भाँति परिचित हैं ही। …मैं चली सोने।” यह कहकर वो सही में चली गयीं।

अब मेरा सारा प्रोग्राम चौपट हो गया। पत्नी का आदेश पालन करना अपना धर्म समझते हुए मैने उस दो लाइन की तुकबन्दी को यथावत्‌ रखते हुए आगे की पंक्तियाँ जोड़ डाली हैं। इनमें व्यक्त भावों का कॉपीराइट मेरा नहीं है और इनसे मेरा सहमत होना भी जरूरी नहीं है। अस्तु…।

(३)

भाव तुम्हारे शब्द हमारे…

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती।

तब अपने पतिदेव के दिल के भीतर होती॥

 

मैं सहचरी नहीं रह पायी अब उनकी जी।

इस निशिचर ने चुरा लिया है अब उनका जी॥

घर में मुझसे अधिक समय उसको देते हैं।

आते ही अब हाल-चाल उसका लेते हैं॥

चिन्ता नहीं उन्हें मेरी जो ना घर होती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती….

 

सुबह शाम औ दिन रातें बस एक तपस्या।

नहीं दीखती घर में कोई अन्य समस्या॥

बतियाना औ हँसना, गाना कम्प्यूटर से।

रूठ जाय तो उसे मनाना है जी भर के॥

चिन्ता नहीं उन्हें चाहे मैं ठनकर रोती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती॥

 

घर की दुनिया भले प्रतीक्षा कर ले भाई।

कम्प्यूटर की दुनिया की जमती प्रभुताई॥

‘घर का मेल’ बने, बिगड़े या पटरी छोड़े।

पर ‘ई-मेल’ बॉक्स खुलकर नित सरपट दौड़े।

वैसी अपलक दृष्टि कभी ना मुझपर होती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती॥

 

शादी के अरमान सुनहरे धरे रह गये।

‘दो जिस्म मगर एक जान’ ख़तों में भरे रह गये॥

कम्प्यूटर ने श्रीमन्‌ की गलबहिंयाँ ले ली।

दो बच्चों की देखभाल, मैं निपट अकेली॥

लगे डाह सौतन को इच्छा जीभर होती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती॥

 

(४)

शुभकामनाएं

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आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। सपरिवार सानन्द रहें। पति-पत्नी और बच्चों को महालक्ष्मी जी अपार खुशियाँ दें। सभी राजी खुशी रहें। हमपर भी देवी-देवता ऐसे ही प्रसन्न रहें, इसकी दुआ कीजिए। २३-२४ अक्टूबर को ब्लॉगर महाकुम्भ में यहाँ या वहाँ आप सबसे मुलाकात होगी ही।

!!!जय हो लक्ष्मी म‍इया की!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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