यह सरकारी ‘असरकारी’ क्यों नहीं है?

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आलोक पुराणिक जी ने इस रविवार को अगड़म-बगड़म में भारत की शिक्षा व्यवस्था की तृस्तरीय दशा को अमेरिका, मलेशिया और बांग्ला देश के समतुल्य समानान्तर क्रियाशील बताते हुए एक अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है। एक ही देश में अनेक तरह की समानान्तर व्यवस्थाओं का चित्रण इस विडम्बना पर सोचने को मजबूर कर देता है। शिक्षा प्रणाली में व्याप्त एक और विडम्बना की ओर मेरा ध्यान बरबस जाता रहता है जिसे मैं आप सब के समक्ष रखना चाहता हूँ।

यह प्रश्न मेरे मन में अपने व्यक्तिगत अनुभव और अपनी आँखों-देखी सच्चाई से उद्भूत हुआ है। शायद आपने भी ऐसा देखा हो। यदि आपकी नजर में वस्तुस्थिति इससे अलग हो तो उसे यहाँ अवश्य बाँटें।

मुझे अपनी पढ़ाई के दिनों में पूर्वी उत्तर प्रदेश के सरकारी प्राइमरी स्कूल (प्राथमिक पाठशाला), निजी प्रबन्ध तंत्र द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मन्दिर, राजकीय अनुदान प्राप्त अशासकीय (निजी प्रबन्ध) विद्यालय, पूर्णतः राजकीय इण्टर कॉलेज और (स्वायत्तशासी) इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन करने का अवसर मिला है। नौकरी में आने के बाद बारी-बारी से प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा की सरकारी मशीनरी के भीतर काम करने का मौका भी मिला है। इस दौरान अपने आस-पास के निजी क्षेत्र की शिक्षण संस्थाओं में भी जाना हुआ है।

यह सब बताने का कारण सिर्फ़ ये है कि अपने निजी अनुभव के आधार पर मेरी यह धारणा पुष्ट होती गयी है कि “शिक्षा के क्षेत्र में जो ‘सरकारी’ है वह ‘असरकारी नहीं’ है।” आप अपने आस-पास नजर दौड़ाइए तो सहज ही इसकी सच्चाई सामने आ जाएगी। मेरी बात ‘अमेरिका टाइप’ संस्थानों के बजाय मलेशिया, बांग्लादेश और ‘सोमालिया टाइप’ संस्थानों तक सीमित रहेगी, जिनकी इस देश में बहुतायत है।

आप गाँव-गाँव में खोले गये प्राथमिक स्तर के सरकारी स्कूलों की तुलना गली-गली में उग आये प्राईवेट नर्सरी स्कूलों या तथाकथित साधारण ‘कान्वेन्ट स्कूलों’ से करके देखिए। एक सरकारी अध्यापक को जो वेतन और भत्ते (१० से २० हजार) सरकार दे रही है उसमें किसी साधारण निजी नर्सरी स्कूल के आठ-दस अध्यापक रखे जा सकते हैं। लेकिन शिक्षण कार्य के घण्टों की गणना की जाय तो स्थिति उल्टी हो जाएगी। एक सरकारी प्राथमिक शिक्षक एक माह में कुल जितने घंटे वास्तविक शिक्षण का कार्य करता है, प्राईवेट शिक्षक को उससे आठ से दस गुना अधिक समय पढ़ाने के लिए आबन्टित है।

सरकार की ओर से नौकरी की सुरक्षा की गारण्टी मिल जाने के बाद सरकारी शिक्षक अपने मौलिक कार्य (शिक्षण) से विरत हो जाते हैं। इसमें एक कारण तो तमाम ऐसी सरकारी योजनाओं को जिमका शिक्षक से कोई संबन्ध नहीं होना चाहिए उन्हें जमीनी स्तर पर लागू करने की कवायद में उन्हें शामिल कर लेने की नीति है, लेकिन जिन्हें कोई अन्य जिम्मेदारी नहीं दी गयी होती है वो भी इसी बहाने कामचोरी करते रहते हैं।

उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के जिन निजी विद्यालयों के वेतन बिल का भुगतान सरकारी अनुदान से होने लगता है, वहाँ शैक्षणिक गतिविधियों में हालिया सेंसेक्स की तरह गिरावट दर्ज होने लगती है। स्कूल के निजी श्रोतों से वेतन पाने वाले और निजी प्रबन्धन के अधीन कार्य करने वाले जो शिक्षक पूरे अनुशासन (या मजबूरी) के साथ अपनी ड्यूटी किया करते थे, सुबह से शाम तक स्कूल में छात्र-संख्या बढ़ाने के लिए जी-तोड़ मेहनत किया करते थे; वे ही सहसा बदल जाते हैं।

सरकार द्वारा अनुदान स्वीकृत हो जाने के बाद सरकारी तनख्वाह मिलते ही उनकी मौज आ जाती है। पठन-पाठन गौण हो जाता है। उसके बाद संघ बनाकर अपनी सुविधाओं को बढ़ाने और बात-बात में हड़ताल और आन्दोलन करने की कवायद शुरू हो जाती है। मुझे हैरत होती है कि एक ही व्यक्ति प्राइवेट के बाद ‘सरकारी’ होते ही इतना बदल कैसे जाता है। उसकी दक्षता कहाँ चली जाती है?
विडम्बना यह है कि सरकारी स्कूलों में उन्ही की नियुक्ति होती है जो निर्धारित मानक के अनुसार शैक्षिक और प्रशिक्षण की उचित योग्यता रखते हैं; कहने को मेरिट के आधार पर चयन होता है; लेकिन उनका ‘आउटपुट’ प्राइवेट स्कूलों के अपेक्षाकृत कम योग्यताधारी शिक्षकों से कम होता है। ऐसा क्यों?

उच्च शिक्षा का हाल भी कुछ इसी प्रकार का है। मैने कुछ ऐसे महाविद्यालय (degree college) देखे हैं जहाँ सरकार से मोटी तनख्वाह पाने वाले प्राध्यापक महीनों कक्षा में नहीं जाते, छात्रों को परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण दस-पाँच प्रश्न नोट करा देते हैं और बाजार में मिलने वाली कुंजी से उनका बेड़ा पार होता है। एक बार नौकरी मिल जाने के बाद इनका अध्ययन पूरी तरह छूट जाता है, और अध्यापन की जरूरत महसूस ही नहीं कर पाते। मैने तो ३०००० वेतन पाने वाले ऐसे ‘रीडर’ देखें हैं जो किसी भी विषय पर ०५ मिनट बोल पाने में अक्षम हैं। वह भी किसी विद्वत-सभा में नहीं बल्कि अपने ही छात्रों के बीच साधारण गोष्ठी के अवसर पर।

उच्च शिक्षा के सरकारी संस्थानों में प्रवेश और शिक्षण-प्रशिक्षण से लेकर परीक्षा की प्रणाली तक सबकुछ घोर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता जा रहा है। अब तो विश्वविद्यालयों के माननीय कुलपतिगण भी भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोपों की जाँच का सामना कर रहे हैं और दोषी पाये जाने पर बाक़ायदा बरखास्त किये जा रहे हैं।

इनकी तुलना में, या कहें इनके कारण ही निजी क्षेत्र के संस्थान जबर्दस्त प्रगति कर रहे हैं। यह प्रगति शैक्षणिक गुणवत्ता की दृष्टि से चाहे जैसी हो लेकिन मोटी फीस और दूसरे चन्दों की वसूली से मुनाफ़ा का ग्राफ ऊपर ही चढ़ता रहता है। बढ़ती जनसंख्या और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ-साथ प्राइवेट स्कूल-कॉलेज का धन्धा बहुत चोखा तो हो ही गया है; लेकिन सरकारी तन्त्र में जगह बना चुके चन्द ‘भाग्यशाली’ (?!) लोगों की अकर्मण्यता और मक्कारी ने इस समानान्तर व्यवस्था को एक अलग रंग और उज्ज्वल भविष्य दे दिया है।

आई.आई.टी., आई.आई.एम. और कुछ अन्य प्रतिष्ठित केन्द्रीय संस्थानों को छोड़ दिया जाय तो सरकारी रोटी तोड़ रहे अधिकांश शिक्षक और कर्मचारी-अधिकारी अपनी कर्तव्यनिष्ठा, परीश्रम, और ईमानदारी को ताख पर रखकर मात्र सुविधाभोगी जीवन जी रहे हैं। इनके भ्रष्टाचार और कर्तव्य से पलायन के नित नये कीर्तिमान सामने आ रहे हैं। जो नयी पीढ़ी जुगाड़ और सिफारिश के बल पर यहाँ नियुक्ति पाकर दाखिल हो रही है, वह इसे किस रसातल में ले जाएगी उसकी सहज कल्पना की जा सकती है।

इस माहौल को नजदीक से देखते हुए भी मैं यह समझ नहीं पाता कि वह कौन सा तत्व है जो एक ही व्यक्ति की मानसिकता को दो अलग-अलग प्रास्थितियों (status) में बिलकुल उलट देता है। अभावग्रस्त आदमी जिस रोजी-रोटी की तलाश में कोई भी कार्य करने को तैयार रहता है, उसी को वेतन की गारण्टी मिल जाने के बाद वह क्यों कार्य के प्रति दृष्टिकोण में यू-टर्न ले लेता है?

मैने देखा है कि प्राथमिक विद्यालय में १५००० वेतन पाने वाला अध्यापक चौराहे पर बैठकर गप करने और नेतागीरी में समय काटता है, और ३००० संविदा वेतन पाने वाला अस्थायी शिक्षामित्र एक साथ ३-४ कक्षाओं को सम्हालने की जी-तोड़ कोशिश कर रहा होता है। इंटरमीडिएट कॉलेज का प्रवक्ता प्रतिमाह २०००० लेकर प्रतिदिन दो घण्टे से अधिक नहीं पढ़ाना चाहता, और उन्हीं कक्षाओं को पढ़ाने के लिए ५००० के मानदेय पर नियुक्त अस्थायी ‘विषय-विशेषज्ञ’ लगातार छः घण्टे पढ़ाने को मजबूर है।

मैं आलोक पुराणिक जी समेत तमाम बुद्धिजीवियों और मनीषियों से यह जानना चाहूंगा कि हमारि आर्थिक प्रास्थिति हमारी सोच को इतने जघन्य तरीके से प्रभावित क्यों कर देती है?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

एक झलक ग्रामीण उच्च शिक्षा की…

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भारतवर्ष की हिन्दीभाषी गंगापट्टी जिसे कुछ विद्वान लोग गोबरपट्टी कहने में यथार्थवादी होने का सुख प्राप्त करते हैं; इसके दूरस्थ ग्रामीण इलाके शैक्षिक रूप से काफी पिछड़े हुए रहे हैं।

बनारस, इलाहाबाद, फैजाबाद, गोरखपुर और जौनपुर के विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध अनेक महाविद्यालयों की स्थापना पूर्वी उत्तरप्रदेश के देहाती इलाकों में उच्च शिक्षा के लिए हुई है। इनमें नये-नये व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाकर नौकरी लायक शिक्षा को स्थानीय स्तर पर सुलभ कराने की कोशिश की जा रही है। इसमें आजकल बी.एड. का पाठ्यक्रम खासा लोकप्रिय हो चला है।

सर्वप्रथम स्नातक की उपाधि प्राप्त कर चुके विद्यार्थियों को कक्षा-०६ से कक्षा-१० तक के लिए शिक्षक बनने का कैरियर चुनने के लिए इस पाठ्यक्रम को बनाया गया था। लेकिन परवर्ती सरकारों ने इस उपाधि के धारकों को प्राइमरी स्कूल से लेकर महाविद्यालयों (digree colleges) तक में पढ़ाने का अवसर देने के निर्णय लिए हैं। इसका असर ये हुआ है कि सर्वाधिक नौकरी के अवसर खोलने वाली इस उपाधि के लिए भारी भीड़ लग रही है। लड़के-लड़कियाँ, आदमी-औरत, युवा-प्रौढ़ आदि सभी बी.एड. करने को प्रयासरत हैं।

अतः इसके लिए राज्यस्तरीय प्रवेश परीक्षा आयोजित होती है जिसमें कई लाख स्नातक भाग लेते हैं, इसमें जो अभ्यर्थी सफल होता है वह इस प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में जब पढ़ने जाता है तो वहाँ का माहौल कुछ ऐसा पाता है- 🙂

[चित्र http://www.usc.edu.ph से साभार ]

(यह एक सच्ची घटना पर आधारित उदाहरण है जो योगेन्द्र कुमार त्रिपाठीप्रशिक्षु शिक्षक ने अपने निजी अनुभव के आधार पर बतायी है।)

एक कक्षा बी.एड. की जिसमें हैं प्रशिक्षु
कुल ९८
महिलाएं १४
शादीशुदा १२
कुआँरी लड़कियाँ ०२
पुरुष ८४
शादीशुदा ४५
कुआँरे लड़के ३९
सबसे छोटी उम्र२४ वर्ष
सबसे बड़ी उम्र४२ वर्ष

कक्षा में एक चुटकुला जो एक उत्साही नौजवान छात्र ने सुना दिया

एक सरदार के तेरह बच्चे थे। उससे एक व्यक्ति ने पूछा- इस जमाने में भी इतने बच्चे? सरदार जी बोले- इसमें मेरा कोई कसूर नहीं, गलती सब मेरे ससुर की है। व्यक्ति चकराया, “वो कैसे?” सरदार ने साफ किया- “क्यूँ कि शादी के समय ससुर जी ने मुझसे जुबान लिया था कि मै उनकी बेटी को कभी खाली पेट न रखूँ।” 🙂
हा,हा,हा,हा…

इस पर बवाल हो गया। महिला प्रशिक्षुओं द्वारा आपत्ति 😦

सभ्यता संस्कृति की दुहाई
हूटिंग, हाय तौबा

पीड़ित चुटकुलेबाज द्वारा दुःखी होकर अपनी व्यथा एक कविता में डाल दी गयी
ये रही वो कविता 🙂

कल कक्षा में मुझसे एक छोटी सी बात हो गयी,
मैने यूँ ही कुछ कह दिया और इतनी बड़ी बात हो गयी
किसी ने सिखाया, किसी ने नैतिकता का पाठ पढ़ाया
किसी ने तो हद कर दी भाई
सभ्यता और संस्कृति का ऊँचाऊँचा पहाड़ दिखाया
लोगों की संवेदना जाग गयी
मैने सोचा चलो अच्छा हुआ भाई।
कम से कम लोगों में संवेदना तो आयी
किसी ने केवल प्रश्नचिह्न लगाया।
तो किसी की नाकनक्श और भौवें चढ़ आयीं
मैने तो केवल चुटकुला सुनाया था
लोगों को हँसाने का काल्पनिक बहाना बनाया था।
लेकिन ये लोगों की संस्कृति पर बन आयी।
मैने सोचा क्या इतनी बड़ी बात हो गयी
कल कक्षा में मुझसे एक छोटी सी बात हो गयी।

फिर आया महिलाओं का खेद प्रकाश

उन्हें अपने द्वारा की गयी हूटिंग पर सच में पछतावा हो गया -:(

फिर क्या था ?
उत्साह में फिर एक और कविता। ये रही:-

मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो
घर में क्या छुपछुप कर अश्लीलता में लजाते हो
कभी धर्म के नाम पर, कभी समाज के नाम पर
तुम तो हमेशा संस्कृति और सभ्यता चिल्लाते हो
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो

तो तुमसे एक प्रश्न है मेरा
क्यूँ नहीं लोगों में मानवता फैलाते हो
जब चौराहे पर लुट रही किसी की मर्यादा तो
क्यूँ नहीं सब मिलकर होहल्ला मचाते हो?
तब तो अपने दामन को पाक साफ बचाते हो
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो

माना कि मैने कुछ गलत कहा
तो क्यूँ नहीं तुम्ही सब सचसच बताते हो
बातों ही बातों में समता की बात चलाते हो
दुनिया भर की बातें हैं सोचने समझने को
तो फिर इस छोटी सी बात पर क्यूँ अटक जाते हो?
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो?

अब तो हद ही हो गयी।

लेकिन महिलाओं ने बात बढ़ाना उचित नहीं समझा
बस माफी मांग ली।
माफ़ी दे दो भाई!
हमने आपत्ति ग़लत उठाई!
🙂 (।) ):
(प्रकरण समाप्त)

क्या कहेंगे इसे?

नारी की हार, शान्ति की चाह, वादविवाद से पलायन, या और कुछ??

अभी नारीवाद को लम्बा रास्ता तय करना है।?

(सिद्धार्थ)

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