गाली के बहाने दोगलापन…।

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आम बोलचाल की भाषा में गालियों के प्रयोग के बहाने एक चर्चा चोखेर बाली पर छिड़ी। दीप्ति ने लूज शंटिंग नामक ब्लॉग पर दिल्ली के माहौल में तैरती गालियों को लक्ष्य करके एक पोस्ट लिखी थी। इसपर किसी की मौज लेती प्रतिक्रिया पर सुजाता जी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि,

“ जब आप भाषा के इस भदेसपने पर गर्व करते हैं तो यह गर्व स्त्री के हिस्से भी आना चाहिए। और सभ्यता की नदी के उस किनारे रेत मे लिपटी दुर्गन्ध उठाती भदेस को अपने लिए चुनते हुए आप तैयार रहें कि आपकी पत्नी और आपकी बेटी भी अपनी अभिव्यक्तियों के लिए उसी रेत मे लिथड़ी हिन्दी का प्रयोग करे और आप उसे जेंडर ,तमीज़ , समाज आदि बहाने से सभ्य भाषा और व्यवहार का पाठ न पढाएँ। आफ्टर ऑल क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ,बेटियों ने लिया हुआ है?”

इस प्रतिक्रियात्मक पोस्ट में जो भाषा प्रयुक्त हुई उससे यह लगा कि जैसे पुरुषों ने किसी कीमती चीज पर एकाधिपत्य करके महिलाओं के साथ बेईमानी कर ली हो। जैसे इन्होंने गाली के प्रयोग का विशेषाधिकार लेकर लड़कियों और महिलाओं को किसी बड़े सुख से वंचित कर दिया हो। …यह भी कि अब आधुनिक नारियाँ अपने इस लुटे हुए अधिकार के लिए ताल ठोंककर खड़ी होने वाली हैं।

उम्मीद के मुताबिक जो प्रतिक्रियाएं आयीं उनमें लड़कियों को यह अवगुण अपनाने से मना करने के स्वर ही बहुतायत थे। प्रायः सबने यही कहा कि यह बुराई जहाँ है वहाँ से खत्म करने की बात होनी चाहिए न कि समाज का जो हिस्सा इससे बचा हुआ है उसे भी इसमें रस लेना प्रारम्भ कर देना चाहिए।

लेकिन सुजाता जी ने अपनी यह टेक कायम रखी कि यदि मात्र स्त्री होने के कारण हमें उन कार्यों से वर्जित रखा जाता है जिन्हें पुरुषों को करने की छूट प्राप्त है तो यह सोच का दोगलापन है। इसी दोगलेपन को दूर भगाने के लिए गाली का प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों के लिए समान रूप से स्वीकार्य या अस्वीकार्य होना चाहिए। यानि जबतक पुरुष इसका प्रयोग बन्द नहीं करते तबतक स्त्रियों को भी इसका प्रयोग सहज रूप से करने का हक बनता है।

इसे जब मैने एक मित्र को बताया तो वह तपाक से बोला कि मैं तो जाड़े की धूप में नंगे बदन सरसो का तेल लगाकर बाहर लान में बैठता हूँ, और कभीकभार शहर की अमुक बदनाम गलियों में होने वाले इशारों को देखकर मुस्कराता हुआ उस बाजार का साइकिल से चक्कर लगा आता हूँ। तो क्या ये लड़कियाँ भी यह छूट लेना चाहेंगी।

सुजाता जी के इस दृष्टिकोण में वास्तविक समाधान के बजाय मात्र नकारात्मक उग्र प्रतिक्रिया की प्रधानता से असहमत होते हुए तथा घुघूती बासूती जी की अर्थपूर्ण टिप्पणी से सहमत होते हुए इस ब्लॉग पोस्ट पर मैने यह टिप्पणी कर दी –

@वैसे बेहतर तो यह होगा कि हम पुरुषों के रंग में रंगने की बजाए पुरुषों को अपने रंग मे रंग दें। बात अति आशावादी तो है परन्तु असम्भव भी नहीं।
घुघूती बासूती
इस चर्चा की सबसे सार्थक बात यही है।
सुजाता जी,
आपसे यह विनती है कि सभ्यता और संस्कृति के मामले में यदि महिलाओं को पुरुषों से आगे दिखाने वाली कुछ बातें स्वाभाविक रूप से सबके मन में बैठी हुई हैं तो उन्हें ‘दोगलापन’ कहकर गाली की वस्तु न बनाइये।
वस्तुतः यह सच्चाई है कि अश्लील शब्द पुरुष की अपेक्षा महिला के मुँह से निकलने पर अधिक खटकते हैं। केवल हम पुरुषों को नहीं बल्कि असंख्य नारियों को भी। लेकिन मैं इसे दोगलापन कहने के बजाय महिलाओं की ‘श्रेष्ठता’ या पतन की राह में न जाने का सूचक कहूंगा।
स्त्री सशक्तीकरण के जोश में पुरुषों से गन्दी आदतों की होड़ लगाना कहीं से भी नारी समाज को महिमा मण्डित नहीं करेगा। गाली तो त्याज्य वस्तु है। इसमें कैसी प्रतिद्वन्द्विता?

गाली देनी ही है तो गाली को ही गाली दीजिए। 🙂

लेकिन इसकी प्रतिक्रिया में सुजाता जी ने मेरी सोच को ही दोगला बता दिया क्योंकि उन्हें यह बात मानने के लिए वैज्ञानिक तर्क की दरकार है कि अश्लील शब्द पुरुष की अपेक्षा महिला के मुँह से निकलने पर अधिक खटकते हैं।

मैने यह तो कहा नहीं था कि पुरुष के मुँह से निकलकर गालियाँ अमृतवर्षा करती हैं और केवल लड़कियों और महिलाओं के मुँह से निकलकर ही आपत्तिजनक होती हैं। मात्र अपेक्षया अधिक खटकने की बात कहा था मैने जिसके लिए मुझे दोगलेपन के अलंकार से विभूषित होना पड़ा।

मैं ठहरा एक सामान्य बुद्धि का विद्यार्थी। हिन्दी शब्दों और वाक्यों का वही अर्थ समझता हूँ जो स्कूल कॉलेज की किताबों में पढ़ पाया हूँ। लेकिन निम्न सूचनाएं मुझे अपनी अल्पज्ञता का स्मरण दिला रही हैं।

बकौल सुजाता जी-

…“भाषिक व्यंजना को समझने मे आपसे भूल हो रही है ।”…

…“आप अपनी बेटी को जो चाहे वह शिक्षा दें , जब वह बाहर निकलेगी तो बहुत सी बातें स्वयम सीख लेगी, जीना तो उसी ने है दुनिया में”…

…“आप पोस्ट का तात्पर्य सिरे से ही गलत समझ रहे हैं और मै आपसे किसी तरह सहमत नही हो पा रही हूँ ।”…

…“हमारी दिक्कत यह है कि जब तक आप चोखेर बाली को देखने समझने के लिए एक वैकल्पिक सौन्दर्य दृष्टि या आलोचना दृष्टि नही लायेंगे तब तक आप यही सोचते रहेंगे कि सुजाता या अनुराधा या वन्दना या कोई भी चोखेर बाली समाज को तोड़ने और स्त्री के निरंकुश ,बदतमीज़,असभ्य हो जाने की पक्षधर हैं।”…

चलिए गनीमत है कि आधुनिक समाज में नारी सशक्तिकरण, लैंगिक समानता, और महिला अधिकारों का झण्डा उठाए रखने का दायित्व मुझ नासमझ के अनाड़ी हाथों में नहीं है। बल्कि तेज तर्रार और विदुषी चोखेर बालियों के आत्मनिर्भर और सक्षम हाथों में है जिनके पास एक वैकल्पिक सौन्दर्य दृष्टि और आलोचना दृष्टि है।

लेकिन सुजाता जी की यह बात मुझे भ्रम में डाल देती है-

“यह वाकई दयनीय है कि मैने यहाँ जो कुछ भी कहा उसके केन्द्रीय भाव तक काफी कम लोग पहुँच पाए।”

“मान लीजिए आपके सामने लड़कियाँ फटना-फाड़ना जैसे प्रयोग सहज हो कर कर रही हैं तो आप क्या केवल दुखी होकर ,क्या ज़माना आ गया है कहते हुए निकल जायेंगे ? या कान मूंद लेंगे? …मै चाह रही हूँ आप न कान बन्द करें , न दुखी हों , न दिल पर हाथ रखे ज़माने को कोसें …आप इसके कारणों को समझने का प्रयास करें और उन्हें दूर करने का प्रयास करें ।”

अरे भाई (क्षमा… बहन!) जब यही कहना था तो इतना लाल-पीला होने की क्या जरूरत थी? यह तो सभी पंचों की राय है:)

(सिद्धार्थ)

फूलों की खातिर…?

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  फूलों की खातिर

माली को गुलाब के पौधों की छटाई करते देखा। कल तक जिन डालियों में गुलाब के फूल खिले हुए थे आज उन्ही को काट कर हटाया जा रहा था।

जड़ द्वारा मिट्टी से खुराक लेकर उन डालियों में पत्तियाँ विकसित हुई थीं। उन हरी पत्तियों ने सूर्य के प्रकाश से भोजन बनाया था। प्रदूषण घटाया था। इन्हीं पत्तियों के बीच डालियों से गुलाब की कलियाँ निकली। कलियों को खिलकर फूल बनने के लिए जो पानी और पोषण चाहिए था वह इन डालियों की धमनियों से होकर ही आया होगा। हवा के साथ झूमकर इन डालियों ने फूल को झूला झुलाया था। हवा के झोकों के झटके को जज्ब करके फूलों को यथासम्भव टूटने और गिरने से बचाया था।

फिर समय बदला, मौसम बदला। डालियाँ पुरानी पड़ गयीं। पत्तियाँ पुरानी पड़ गयीं। अब इन टहनियों से नये फूल निकलने की सम्भावना जाती रही। इनमें जो हरियाली का जीवन बचा था वह किसी काम का नहीं था। इसलिए इन्हें काट कर अलग किया जा रहा था ताकि इनकी जगह नयी टहनियाँ निकल सकें और नये फूल खिल सकें।

गाँव में बूढ़ी गायों और भैसों को कसाई के हाथों बिकते देखा है। दूध और बछड़ा देने की सम्भावना मिटने के बाद उनका जीवन भी यूँ समाप्त कर दिया जाता है। पहले इनकी मृत्यु होने पर जमीन में गाड़ दिया जाता था। लेकिन अब इनके मांस हड्डी और चमड़े की नगद कीमत वसूल कर ली जाती है।

पश्चिम की ओर से आती ‘विकास की हवाएं’ बता रही हैं कि अब वहाँ बुजुर्गों को घर से अलग वृद्धाश्रम में रखने का चलन बढ़ गया है। ये हवाएं हमारे देश में भी बहने लगी हैं। 

मनुष्य का अब अगला कदम क्या होगा?
(सिद्धार्थ)

रामदुलारे जी नहीं रहे…!

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वैधानिक चेतावनी: यह शोक श्रद्धाञ्जलि नहीं है।

गाँव से जब यह खबर आयी तो हम चक्कर खा गये। विचित्र भाव मन में उठने लगे। रामदुलारे जी के जाने के बाद अब गाँव का माहौल कैसा हो जाएगा…? बिलकुल सूना, रसहीन, और बेसुरा। लोग-बाग कुछ दिन तक तो इनकी मौत की चर्चा करेंगे लेकिन जो आदमी नित नयी चर्चा का मसाला दिया करता था, उसकी साँसें थम जाने के बाद वह बात नहीं रह जाएगी।

तीन भाइयों, चार बेटों, चार बेटियों, और दर्जनों नाती-पोतों वाले रामदुलार जी जब ‘हार्टफेल’ होने से करीब ८० वर्ष की उम्र में भी अहर्निश सक्रियता को अचानक विराम देकर चलते बने तो उनकी मृत देह को कन्धा देने के लिए गाँव के वही लोग काम आये जिन्हें जेल भेजने का सपना देखते इनका जीवन बीता था। घर पर इनकी दूसरी ब्याहता पत्नी के अलावा और कोई नहीं था। सभी बेटे-बेटियाँ इनसे किनारा करके बाहर बस चुके थे। गाँव वालों ने २५ साल पहले घर छोड़ चुके बड़े बेटे तक सूचना पहुँचायी तो वह मुखाग्नि देने के लिए जरूर हाजिर हो गया। अपने भाइयों को तो इन्होंने कबका अलग कर दिया था।

बहुत हटके जीवन बिताया रामदुलार जी ने…।

गाँव में पहला पक्का मकान, उसमें लगा बुलन्द दरवाजा और पशुओं के लिए पक्के सीमेण्ट की चरन (नाद) सर्वप्रथम इन्हीं के पिताजी ने बनवायी थी। दरवाजे पर दो जोड़ी बैल, अनेक गायें और भैंसें, और अनाज रखने की ‘बखारें’ देखने से लगता था कि सरेह में खेती भी काफी अच्छी होगी। अंग्रेजी सरकार के कृपा पात्र होने से उन्होंने काफी धन-सम्पत्ति अर्जित कर ली थी। पैसा ‘कमाने’ का ही अच्छा तजुर्बा था उन्हें, लेकिन पिता की आँखों के तारे रामदुलारे जी ने जब होश सम्हाला तबसे पैसा ‘खर्च करने’ के तमाम करतब देखने को मिले।

कौड़ी और ताश के पत्तों से जुआ खेलने के शौक ने रामदुलारे जी की ख्याति कम उम्र में ही दिग-दिगन्त में फैला दी थी। दीपावली और होली के अवसर पर तो दिल खोलकर लुटाते थे। खान-पान के भी शौकीन थे। इनकी इस फितरत ने इनके आस-पास अनेक दोस्त जमा कर लिए और अपने सगे भाइयों को जल्दी ही बँटवारा कराकर अलग हो जाने की राह दिखा दी।

इन्हें मुकदमा लड़ने और लड़ाने का तो ऐसा नशा था कि जीवन पर्यन्त इनका एक पैर कचहरी में ही रहता था। पिता की मृत्यु और भाइयों के अलग हो जाने के बाद इन्होंने अपना सारा ध्यान यही दो शौक पूरा करने पर लगाया।

ये अपनी धुन के इतने पक्के थे कि कभी जीविका ‘कमाने’ के बारे में सोचने का मौका ही नहीं निकाल पाये। पहले पिता की छोड़ी गयी नगदी और जेवर और उसके बाद विरासत में मिली कभी गाँव में सबसे अधिक रही खेती की जमीन काम आयी। जब दोनों की स्थिति पूर्णिमा के चाँद से अमावस्या तक पहुँच गयी तब बेटियाँ भी सयानी हो गयीं थीं।

इनके सभी लड़के इतने ‘प्रखर’ थे कि एक-दो साल स्कूल आने-जाने के बाद ही उसकी ‘निस्सारता’ समझ गये। गाँव की बेरोजगारी व घर पर पिता की गालियों और प्रताड़ना की सहनसीमा पार करते हुए बारी-बारी से बाहर निकलते गये। सभी दोस्त इनकी जमीन और पैसे से लाभान्वित होने के बाद आगे की सम्भावना क्षीण देखकर अपनी राह चलते गये।

लेकिन ऐसी मामूली बातों से इनके उत्साह में कोई कमी नहीं आने वाली थी। बेटियों ने गाँव के दूसरे घरों में चौका-बरतन, झाड़ू-पोछा, और छोटे बच्चों को बहलाने का काम करना शुरू कर दिया। ब्राह्मण कन्याओं के प्रति दयाभाव से गाँव वालों और रिश्तेदारों ने मिलकर उनका हाथ भी पीला करा दिया। कुछ दूसरे लोगों ने सस्ते में ही ‘कन्यादान’ का पुण्य भी कमा लिया। …लेकिन इनकी कन्याओं की वर्तमान हालत बताने लायक नहीं है…।

सभी बेटिया जैसे-तैसे अपने-अपने ससुराल चली गयीं और सभी बेटे दिल्ली-पंजाब-लुधियाना जाकर कमाने लगे तो ये घर पर बिल्कुल निर्द्वन्द्व होकर अपना शौक पूरा करने लगे। एक जमीन बेचते और एक पड़ोसी पर मुकदमा ठोक देते। हमने उन्हीं को देखकर जाना कि बिना मेहनत के मिलने वाली धनराशि को खर्च करने का मजा ही कुछ और होता है।

धीरे-धीरे बाग-बगीचों और खेती वाली एक-एक इन्च जमीन से ‘भारमुक्त’ हो लेने के बाद बारी आयी पैतृक मकान वाली जमीन की। गाँव के भीतर की इस जमीन को इनके कुछ पड़ोसियों ने मुँहमांगी कीमत देकर बैनामा कराया। इन्होंने अपने हाथ से नापकर कब्जा दिया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद ये अपनी सीमा से सटे सभी पड़ोसियों को एक-एक करके अदालत खींच ले गये। इलजाम एक ही कि सबने इनकी जमीन पर कब्जा कर रखा है।

कायदा-कानून की दृष्टि से कमजोर इन दीवानी मुकदमों को यथासम्भव लम्बा खींचने का जुगाड़ लगाते रहे। लेकिन अन्ततः इनका भी कोई स्थायी मजा न आता देख इन्होंने फौजदारी के मुकदमें लिखाना शुरू किया। सहसा इन्हें अपने सभी पड़ोसियों से ‘जान-माल’ का खतरा रहने लगा। इस दौर में इनके पास जो ‘माल’ था वह केवल कचहरी के पुराने रिकार्ड्स में ही दर्ज था। घर तो कबका साफ हो चुका था।

लेकिन ‘जान’ को लेकर ये जरूर चिन्तित थे। हृदय रोग ने जब इनके शरीर में स्थायी घर बना लिया तो सभी पड़ोसी इनसे भयभीत रहने लगे। प्रत्येक सप्ताह थाने से कोई न कोई सिपाही इनकी शिकायत की तफ़्तीश करने गाँव में आने लगा। इन्हें छूना भी खतरे से खाली नहीं था। क्योंकि इनके बीमारी से मरने पर भी फँसना तय था। मौत का डर सिर्फ इन्हें ही नहीं था।

एक बार मैं छुट्टियों में गाँव गया हुआ था तो उनकी एक शिकायत पर होने वाले मुआयने का प्रत्यक्षदर्शी बना। इन्होंने अपने भतीजों पर यह संगीन आरोप लगाया था कि उन्होंने रातोरात इनके दरवाजे पर लगे पन्द्रह-सोलह आम के हरे पेड़ काट डाले और जड़ भी खोद ले गये ताकि कोई सबूत न रहे। थाने का सिपाही मौका-ए-वारदात पर पहुँचकर पेड़ों की जगह पूछने लगा तो सभी लोग हैरान हो गये। क्योंकि बाक़लमखुद के शौक ने इन्हें पेड़ों से बहुत पहले निजात दिला दी थी।

जब रामदुलारे जी पेड़ों की जगह दिखाकर सबूत नष्ट कर दिये जाने का आरोप लगाने लगे तो भीड़ में एकाएक ठहाके गूँज पड़े। हुआ ये था कि इनके एक भाई की जमीन पर जहाँ कूड़ा फेंकने की जगह थी उसपर इन्होंने कोर्ट में अपना दावा ठोंक रखा था। उसी जगह पर कुछ आम की गुठलियाँ फेंकी गयीं थी जिनसे कूड़े की खाद और नमीं के कारण पौधे (अमोला) निकल आये थे। भतीजे ने दरवाजे का कूड़ा साफ करते समय इन बित्ते भर के पौधों को भी साफ कर दिया था और अनजाने में एक और मुकदमे को न्यौता दे दिया था…।

गाँव के भूमिहीन मजदूरों को छोड़ दें तो वहाँ शायद ही कोई गृहस्थ ऐसा होगा जो अपना राशन एक दिन की जरूरत के हिसाब से रोज खरीदता हो। लेकिन ये महाशय प्रतिदिन दुकान से चावल/आटा खरीदकर ‘ताजा’ ही बनाते थे।

भगवान की ऐसी कृपा थी कि सारी जमीन चुक जाने के बाद भी इनके पास कैश की कभी कमी नहीं होने पाती थी। जमीन जायदाद जाने के बाद भी जब हाथ खाली होने की नौबत आती तो ये दिल्ली अपने बेटों के पास जाकर बैठ जाते और प्रतिदिन इतनी गालियाँ सुनाते कि वे आजिज आकर इन्हें ‘ससम्मान’ विदा कराने पर मजबूर हो जाते। इसके अलावा खण्डहर हो चुके पैतृक मकान से मिलने वाली इमारती लकड़ियों और ईंटों को बेचकर भी इनका दिन बड़े अमन-चैन से गुजरा। एक बार दिल्लीवासी बेटे ने नये कमरे बनवाने के लिए कुछ ईंटें मंगाकर रख दी। जब निर्माण कार्य में देरी होने लगी तो इन्होंने ईंटों को भी अपने शौक के लिए किसी जरूरतमन्द के हाथों बेचकर पैसा बना लिया।

रामदुलारे जी ने गाँव में छूत-अछूत का खेल भी खूब खेला। कुछ ब्राह्मण परिवारों को समाज से बहिष्कृत कराने का अभियान चलाया। लेकिन जब इनके बेटों ने बाहर जाकर अन्तर्जातीय विवाह रचा लिए और विजातीय बहुओं ने गाँव आकर इनके घर पर कब्जा जमाने का प्रयास किया तो इन्होंने फौरन उल्टी दिशा पकड़ ली। समतामूलक, प्रगतिशील और उदार दृष्टिकोण के ध्वजवाहक बन गये। उन्हें आशीर्वाद दिया और दिल्ली में जाकर उनके ‘दान’ को ग्रहण भी किया।

अस्सी कि उम्र में भी ये फौजदारी के लिए अपने पड़ोसियों को जिस तरह ललकारते थे उसे देखकर गाँव वाले मुँह दबाकर किनारा कर लेते थे। लगभग सभी भाई-पट्टीदार इनसे किसी न किसी बहाने भिड़ चुके थे।

इन विषेषताओं के अतिरिक्त उनमें फाग (होली गीत) गाने की विलक्षण प्रतिभा थी। जवानी के दिनों में तो पूरे फाल्गुन महीने भर इनकी टेर चलती रहती थी। लेकिन पिछली होली में अस्सी की अवस्था में भी इन्होंने ढोलक की थाप और झाल की झंकार पर जमकर फाग गाया।

अब उनके चले जाने के बाद गाँव में अजीब सा खालीपन आ जाएगा। उनके द्वारा थाने में की गयी शिकायतों की पोटली भी गठियाँ कर टांग दी जाएगी। गाँव में सिपाही भी नहीं आएंगे। मुकदमें का ‘सम्मन’ भी नहीं आएगा। पड़ोसी लम्बी तान कर बेखटक सोने लगेंगे। इनका साहचर्य खो देने के बाद इनकी पत्नी भी तत्काल बूढ़ी हो जाएंगी, शायद कोई बेटा अपने साथ ले जाना चाहे। फिर इनके सूने घर की खाली जमीन पर कब्जा करने वालों को कौन रोकेगा?

कुछ लोग डरने लगे हैं कि कहीं उनका प्रेत न आ जाय…।

(सिद्धार्थ)

एक गुमनाम चित्रकार की सत्यकथा…।

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वैसे तो दुनिया में एक से बढ़कर एक प्रतिभाएं मौजूद हैं, लेकिन यदि किसी दुर्लभ प्रतिभा का धनी व्यक्ति बिल्कुल साधारण ढंग से आपके घर में बैठकर आँखों के सामने सजीव बात कर रहा हो और जो आपके गाँव-घर का हो तो एक अद्‍भुत गर्व व रोमांच का अनुभव होता है।

श्री जय कुमार पाठक से अपने आवास पर पहली बार मिलकर मुझे ऐसा ही लगा। उन्हें देखकर एक बारगी यह कल्पना करना कठिन था कि इनके हाथ में ईश्वर ने सचमुच एक जादुई तूलिका थमा रखी है। वे मेरे एक मामा जी के साथ आये थे। सामान्य कु्शल-क्षेम पूछने के बाद जब मैने इलाहाबाद आने का प्रयोजन पूछा तो वे अत्यन्त संकोच और लज्जा के साथ इतना कह सके कि पडरौना के एक साधारण मुहल्ले में बीत रही गुमनामी की जिन्दगी से बाहर निकलकर अपनी कला के लिए कोई रास्ता ढूँढना चाहते हैं।

स्थानीय स्तर पर ‘पुजारी जी’ के नाम से जाने जाते ४३ वर्षीय श्री पाठक आठ भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं। घर की गरीबी से तंग आकर इन्होंने सातवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी और १५ साल की उम्र में अयोध्या चले गये। वहाँ वासुदेवाचार्य जी के वैष्णव सम्प्रदाय में सम्मिलित होकर ‘जयनारायण दास’ बन गये थे। वहीं आश्रम में इनकी भेंट झाँसी से पधारे प्रेम-चित्रकार से हो गयी।

अच्छा गुरू मिलते ही इन्हें रेखांकन और चित्रों के रंग संयोजन की बारीकियाँ समझते देर नहीं लगी और शीघ्र ही इन्होंने प्राकृतिक सौन्दर्य, पोर्ट्रेट और धार्मिक पात्रों से सम्बन्धित चित्रों को कैनवस पर सजीव उतार लेने में महारत हासिल कर ली।
आगे की कहानी जानने से पहले आइए देखते हैं इनके हाथ से जीवन्त हो चुके कुछ अनमोल चित्र:

[ये सभी चित्र मैने इनके पास उपलब्ध पोस्ट्कार्ड साइज के उस एलबम से लिए हैं जो इनकी चित्रकृतियों के साधारण फोटोकैमरे से दसियों साल पहले लिए गये छायाचित्रों को सहेजकर बनाया गया है।]

धार्मिक पात्रों के अतिरिक्त पुजारी जी अन्य प्राकृतिक दृश्यों और मानव आकृतियों को पूरी सच्चाई के साथ उतारने में पारंगत हैं। सिर ढंकी हुई राजस्थानी युवती की यह तस्वीर अखबार में छपे इसकी संगमरमर की मूर्ति के छायाचित्र को देखकर बनायी गयी है। इसके नीचे उर्वशी का यह रूप पुजारी जी की अपनी कल्पना है।


भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित चित्रों से ही पुजारी जी को कुछ आर्थिक लाभ मिल पाता है। इनके महापरिनिर्वाण स्थल कुशीनगर में आने वाले विदेशी पर्यटकों के हाथों बिककर इनके चित्र थाईलैण्ड,जापान,कोरिया,आदि देशों तक तो चले गये, सम्भव है उनकी अनुकृतियाँ बेचकर किसी ने पैसा भी कमाया हो, लेकिन यह सब पुजारी जी की आर्थिक दुरवस्था को किसी प्रकार से दूर करने में कारगर नहीं हो सके।


वृन्दावन में राधाजी को झूला झुलाते हुए श्रीकृष्ण की यह तस्वीर पुजारी जी के गुरू प्रेम-चित्रकार द्वारा बनायी गयी है। इसमें पुजारी जी ने राधा और कृष्ण को आभू्षण पहनाने का काम किया है। लेकिन वे गुरू की निशानी इस तस्वीर को सदैव अपने पास रखते हैं।

कुशीनगर जिले के पडरौना कस्बे (जिला मुख्यालय) के पास पटखौली ग्राम के मूल निवासी पुजारी जी को उनके वृद्ध होते पिता के मोह ने १५ साल बाद अयोध्या से घर वापस बुला लिया। पितृमोह और परिवार की फिक्र से ये वापस तो आ गये लेकिन जीविकोपार्जन की कोई मुकम्मल व्यवस्था न होने के कारण जीवन कठिन हो चला है। विवाह का विचार तो पहले ही त्याग चुके हैं। अब भाइयों बहनों के साथ घर-परिवार में रहकर पडरौना के नौका टोला मुहल्ले में ‘पुजारी आर्ट’ के नाम से एक सेवा केन्द्र चलाते हैं। कुछ लोग शौकिया तौर पर चित्र और पोर्ट्रेट बनवा कर ले जाते हैं लेकिन इनकी मेहनत, लगन और प्रतिभा के अनुरूप आर्थिक आय हासिल नहीं हो पाती है।

वस्तुतः यदि इनके हाथों को सही काम मिले और पारखी प्रायोजकों का समर्थन मिले तो शायद हम राजा रवि वर्मा को मूर्त रूप में पुनः देख सकें। फिलहाल तो ये गुमनामी के बियाबान में भटकने को अभिशप्त कलाकार का जीवन जी रहे हैं।

(सिद्धार्थ)

एक सच्ची बात माननीय की…

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कलकत्ते वाले रतीराम जी के एक रिश्तेदार हैं मतीरामजी। इनकी भी यहाँ इलाहाबाद के कटरा में चाय की दुकान है। यूनिवर्सिटी से लगा होने के कारण यहाँ विद्यार्थियों का जमावड़ा लगा रहता है। यह बात-चीत इसी दुकान पर दो प्रतियोगी छात्रों के बीच सुनने को मिली जो हाल ही में शहर आये हुए लगते थे –

-मुम्बई हमलों के बाद संसद में जो बहस हुई उसे सुनकर मन प्रसन्न हो गया।

-क्यों भला?

-सभी सांसदों ने पार्टी लाइन से ऊपर उठकर एकता का परिचय दिया और आतंकवाद को करारा जवाब देने के लिए सबने सामूहिक प्रयास का संकल्प लिया।

-तो क्या अब आतंकवाद के दिन पूरे होने वाले हैं?

-देश की दोनो प्रमुख पार्टियाँ मिलकर इससे लड़ने जा रही हैं। विश्वास कीजिए अब वह दिन दूर नहीं।

-अच्छा! यानि बीजेपी ने कांग्रेस से फिर हाथ मिला लिया?

-हाँ भाई! इस मुद्दे पर तो मिला ही लिया, लेकिन क्या पहले भी कभी कमल ने ‘हाथ’ से हाथ मिलाया है?

-हाँ-हाँ, अभी तो हाल ही में अविश्वास प्रस्ताव के समय मिलाया था।

-नहीं भाई, तब तो भाजपा ने अविश्वास प्रस्ताव के विरोध में वोट डालने के लिए अपना चाबुक (whip) फटकारा था।

-यहीं तो धोखा खा गये आप…।

-धोखा? …वो कैसे? …यह तो हम सभी जानते हैं। सारे अखबार और मीडिया में भरा पड़ा था।

-यह राजनीति की बातें तो केवल पब्लिक के मनोरंजन के लिए थी। देशहित में सभी एक हो जाते हैं।

-तो क्या भाजपा सांसदों को कुछ और समझाया गया था?

-जी हाँ।

-वो क्या?

-मुझे पूरी बात तो नहीं मालूम लेकिन सरकार को इन भाजपा सांसदों ने ही बचाया था।

-इससे क्या? वह तो दो-चार सांसदों की करोड़ों की लालच का नतीजा था।

-आप यह कैसे कह सकते हैं? कोई सबूत…

-सबूत मेरे पास नहीं है। लेकिन आप जो कह रहे हैं उसके क्या सबूत है?

-हैं ना!

-अच्छा! तो क्या आपके पास इस बात का सबूत है कि भाजपा इस सरकार को बचाना चाहती थी?

-जी हाँ! सोमा भाई पटेल को नहीं सुना क्या?

-ये कौन महाशय हैं?

-ये गुजरात के वृन्दनगर से तीसरी बार चुने गये भाजपा के माननीय सांसद हैं। इनकी मदद से सरकार बची थी।

-क्या इन्होंने पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया था?

-नहीं, पार्टी ने इनसे सरकार के पक्ष में वोट डालने को कहा था।

-झूठ बोल रहे होंगे ये।

-नहीं भाई, सच में। ये आज पत्रकारों को बता रहे थे कि मुझे पार्टी से ऐसा कोई संदेश नहीं मिला कि मुझे सरकार के विरुद्ध वोट डालना है।

-क्या जो व्हिप जारी हुई थी वो फर्जी थी?

-वो एस.एम.एस. तो अंग्रेजी में था। बता रहे थे कि अंग्रेजी इन्हें नहीं आती।

-हिन्दी रूपान्तर भी तो रहा होगा?

-कह रहे थे कि हिन्दी भी केवल बोलना सीख पाये हैं। हिन्दी लिखना पढ़ना नहीं आता। केवल मैट्रिक पास हैं।

-पार्टी मीटिंग में किसी ने नहीं बताया?

-नहीं जी, इसका कोई सबूत नहीं है।

-मीडिया से तो पता चला होगा?

-मीडिया की बात का क्या भरोसा? बहुत सी अफवाहें फैलाती रहती है। वैसे भी यहाँ केवल हिन्दी-अंग्रेजी का ही बोल-बाला है जो भाषा इन्हें नहीं आती।

-आप इनकी बातों पर यकीन कर गये?

-मैने ही नहीं भाई साहब, घूसकाण्ड की जाँच कर रही संसदीय समिति ने यकीन करके इनको ‘क्लीन चिट’ दे दी है।

-वाह! क्या यह संसदीय समिति बहुत ऊँची चीज है?

-जी हाँ, इसका बड़ा सम्मान होता है। सोमा भाई पटेल भी विदेश मामलों की एक समिति के सम्मानित सदस्य हैं…

(सिद्धार्थ)

घर-बाहर की दुनिया कुछ तस्वीरों में…

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नवम्बर का अन्त कुछ ऐसे हुआ कि महीने भर सहेज कर रखे गये बुजुर्ग पेन्शनर्स के कुछ दुर्लभ और रोचक चित्र यहाँ पोस्ट करने का मौका ही नहीं मिला। दिसम्बर का प्रारम्भ भी नवम्बर के आखिरी सप्ताह के काले अन्त की छाया से दुष्प्रभावित रहा। मैने इस विपरीत काल के संकट को इतना व्यापक मान लिया कि सामान्य होते-होते अपने परिवार के एक सुखद क्षण का आनन्द भी नहीं ले सका। आज कुछ देर से ही सही, मैं इन दो आयामों का कण्ट्रास्ट तस्वीरों के माध्यम से प्रस्तुत करता हूँ-

सत्यार्थ अपने जन्मदिन पर पोज देते हुए

दोनो भाई बहन स्टुडियो पहुँचे। घरेलू कैमरा और मोबाइल का क्या काम?

घरमें बच्चों की मासूम शरारत तो ऑफिस में बुजुर्ग पेंशनर्स की अलग-अलग तस्वीरें। कोई बहुत खुश तो कोई थोड़ा कम। किसी-किसी को उठाकर लाना पड़ा तो कोई पच्चानबे साल पर भी खुद ही खटखटाता हाजिर। इन्हें देखकर मैने जो ग़ज़ल की आजमाइश ‘सत्यार्थमित्र’ पर की थी उसे ‘अमर उजाला’ ने न्यूज आइटम बना दिया। फिर तो मुझे उसकी ढेरों प्रतिलिपियाँ बाँटनी पड़ी।

बड़ा और स्पष्ट देखने के लिए चित्रों पर चटका लागाइए…।

नीचे की तस्वीर में दोनो पेंशनर हैं, और पिता-पुत्र हैं। सरकारी अभिलेखों में इनके बीच केवल १३ साल का अन्तर है। कारण पूछने पर मुस्करा कर टाल जाते हैं। अंग्रेजी राज की बात थी। कभी किसी ने टोका नहीं।

चलते चलते एक नजारा आदमी के साथ प्रकृति के खेल पर। शेषन साहब कहा करते थे कि भगवान ने कुछ सिरों को देखने लायक बहुत सुन्दर और सुडौल बनाया है। बाकी को बालों से ढक दिया…। यहाँ दोनो छटाएं माघ-मेला की तैयारी बैठक में मेरे मोबाइल कैमरे ने कैद की। बस आपके लिए…



(सिद्धार्थ)

खामोशी में ऐसे मनाया छः दिसम्बर… ॥

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मेरी पिछली पोस्ट पर टिप्पणी देते हुए कार्तिकेय ने सत्यार्थ को जन्मदिन की शुभकामना दी है। जी हाँ, पिछले छः दिसम्बर को सत्यार्थ (मेरा बेटा) दो साल का हो गया। इस बार पारिवारिक रीति से सादगी पूर्वक जन्मदिन याद किया गया। हाँलाकि दिनभर ‘हैप्पी बर्डे’ और ‘थेंकू’ की रटंत होती रही, लेकिन नये कपड़े, खिलौने और चाकलेट की खुशी छोड़ दें तो उस मासूम को इस दिन में नया कुछ भी नहीं लगा होगा। रोज ही कुछ नये शब्द सीख रहा है। उसी कड़ी में ये शब्द भी उसके शब्दकोश में जुड़ गये होंगे।

अलबत्ता उसकी बड़ी बहन वागीशा अधिक उत्साहित थी। साढ़े आठ साल की उम्र में उसे यह बताना कि यह वक्त पार्टी लायक नहीं है, मुझे गैर-जरूरी लगा। उसकी अपेक्षा के अनुरुप घर में ही कुछ पारिवारिक मित्रों व उनके बच्चों को बुला लिया गया, और पार्टी भी हो ली। सत्यार्थ को टीका लगाने की औपचारिकता और भगवान की पूजा भी घर के मन्दिर में ही की गयी। कहीं बाहर जाकर घूमने का मन नहीं हुआ।

सत्यार्थमित्र पर भी इसकी तत्समय चर्चा करने का मन नहीं हुआ। उस दिन मुम्बई के आतंकी हमलों के बाद बने राष्ट्रीय परिदृश्य में बाबरी मस्जिद की बरसी पर सारा देश सहमा हुआ सा किसी बुरी घटना की आहट पर कान लगाए बैठा था। मेरे मन में भी यही कुछ चल रहा था। मेरी धर्मपत्नी ने भी इसे भाँपकर चुप्पी लगा ली थी।

मेरे गुरुदेव ज्ञान जी भी एक मालगाड़ी के पटरी से उतर जाने पर अचानक व्यस्त हो गये और नहीं आ सके।

मेरे मन में भारतवर्ष की बेचारगी टीस रही थी। कुछ विक्षिप्त नौजवानों द्वारा धर्म की अफीम खाकर मानवता को जार-जार करते हुए कथित तौर पर चन्द रूपयों से अपने परिवार की दरिद्रता मिटाने के लिए जो आपराधिक कुकृत्य किया गया था, उसका असर दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र और एक सम्प्रभु राष्ट्र की अस्मिता पर प्रश्नचिह्न लगाने वाला हो चुका था। साठ साल पहले जो हमें छोड़कर धर्म के आधार पर अलग हो गये वही आज फिर से हमारी छाती चीरने के लिए गोलबन्द होकर हमले कर रहे हैं, और हम कातर होकर दुनिया के चौकीदारों से गुहार कर रहे हैं।

इसी मनःस्थिति में मैने पिछली पोस्ट में यह बात रखी कि “हम अक्षम हैं… इसलिए बेचैन हैं…।” इसपर प्राप्त टिप्पणियों से यह बात और पुष्ट होती गयी। आदरणीय ज्ञानजी, समीर जी, अभिषेक जी, और राजभाटिया जी भी इसी मत के मिले। श्रद्धेय डॉ. अमर कुमार ने एक एतराज दर्ज तो किया लेकिन वह भी केवल सही शब्द के चयन को लेकर था। वस्तुतः वह भी अक्षमता को स्वीकार करते हैं।

मेरे प्रिय कार्तिकेय भारतीय संविधान में अपनी श्रद्धा को अभी भी अक्षुण्ण रखने के पक्षधर लगे। उन्हें इसमें कोई कमी नजर नहीं आती। वे लिखते हैं कि-

…इस निष्क्रियता के लिए संविधान को जिम्मेदार ठहराना अनुचित होगा.गलती संविधान की धाराओं में नही, बल्कि उनके स्वयंसिद्ध इंटरप्रेटशंस की है. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हमारी धर्मान्धता और कट्टरता के लिए उदारवादी वेदों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

मेरे विचार से आवश्यकता संविधान में परिवर्तन की नहीं, अपितु उसको क्लेअर -कट परिभाषित करने की है….

यानि कि सुस्पष्ट परिभाषा की आवश्यकता अभी बनी हुई है। मेरा मानना है कि जिस चुनावी प्रणाली से जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, लिंग और अगड़े – पिछड़े की संकुचित राजनीति करने वाले, भ्रष्ट, माफिया और लम्पट किस्म के जनप्रतिनिधि चुनकर सत्ता के गलियारों को दूषित करने पहुँच जा रहे हैं; और फिर भी इस प्रणाली को संविधान सम्मत मानना हमारी मजबूरी है, तो कुछ तो सुधार करना ही पड़ेगा।

चुनावों में मोटे तौर पर १०० मतदाताओं में से १०-१२ का वोट पाने वाला प्रत्याशी सत्ता की कुर्सी पर काबिज हो जाता है। क्योंकि ५०-५५ लोग तो वोट डालने जाते ही नहीं और ३०-३५ लोगों के वोट दर्जनों अन्य प्रत्याशी आपस में बाँट कर हार जाते हैं। इसी कारण से नेता जी लोग एक खास सीमित वर्ग के वोट जुटाने लायक नीतियों की खुलेआम अभ्यर्थना उन्हें खुश करने के लिए करते हैं, और साथ ही अन्य वर्गों के बीच आपसी कटुता और वैमनस्य के बीज बोते जाते हैं। आज के एक अत्यन्त लोकप्रिय और सफल केन्द्रीय मन्त्री जो पहले मुख्यमन्त्री रह चुके हैं, उन्होंने तो अपने वोटरों को निरन्तर पिछड़ेपन और अशिक्षा के दलदल में फँसाये रखने की नीति की लगभग घोषणा ही कर रखी थी। उन्हें बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा और अखबार की पहुँच से सायास दूर रखने की मानो नीति ही लागू थी।

दुनिया में ऐसी चुनाव प्रणालियाँ भी हैं जहाँ जीतने के लिए कम से कम ५० प्रतिशत वोट पाना आवश्यक है। सभी मतदाताओं के लिए अपना मत डालना अनिवार्य है, न डालने पर जुर्माना है। कदाचित्‌ मतपत्र में एक विकल्प सभी प्रत्याशियों को नकारने का भी है। क्या भारत में ऐसा हो जाने के बाद भी राजनेता अपनी छवि संकुचित दायरे में बना कर सफल हो पाएंगे? आज विडम्बना यह है कि देश में एक सच्चे जननायक और सर्वप्रिय नेता का अकाल पड़ा हुआ है। बहुत से माननीय सांसदों और विधायकों की प्रोफाइल देखकर सिर शर्म से झुक जाता है।

एक बार जैसे-तैसे चुन लिए जाने के बाद बड़े से बड़ा अपकृत्य करने का और बच निकलने का लाइसेन्स इनके हाथ लग जाता है। संविधान में जो दायित्व दिये गये हैं उनके प्रति इनमें कोई जवाबदेही नहीं दिखायी देती। यह देश के भाग्य भरोसे है कि माननीय इसे किस रसातल तक ले जाकर छोड़ने को तैयार हैं। इश्कबाजी में उपमुख्यमन्त्री बरखास्त होते हैं। नौबत ये है कि संसद भवन से तिहाड़ आने-जाने का ट्रैफिक बढ़ता जा रहा है। कुछेक जो पढ़े-लिखे और जिम्मेदार वहाँ पहुँच भी जा रहे हैं उनके हाथ किसी अयोग्य मालिक के आगे जुड़े ही रहते हैं, और बँधे भी।

स्कन्द शुक्ला अपनी अंग्रेजी टिप्पणी में सवाल करते है कि यदि यह हमला किसी निम्नवर्गीय स्थल पर हुआ होता तो भी क्या ऐसी ही प्रतिक्रिया देखने को मिलती। रेलवे स्टेशन और कामा हॉस्पिटल पर भी हमले हुए लेकिन जितने टीवी कैमरे पंचसितारा होटलों पर फोकस किए गये उतने बाकी जगहों पर नहीं थे। इस बार शायद मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग को आतंकी खतरे का अनुभव कुछ ज्यादा ही हो गया है। आशा की जानी चाहिए कि उनके इस गुस्से का प्रस्फुटन चुनावों के समय अधिक मतदान के रूप में सामने आयेगा। उनका प्रश्न यह भी है कि हम अपनी ही चुनी हुई सरकार की आलोचना क्यों कर रहे हैं। इन्हें हमलों के बाद हुए मतदान के आँकड़े कुछ आशा बँधाते हैं कि शायद मध्यम वर्ग अपनी दोपहर की मीठी नींद से जाग रहा है।

लेकिन मुझे फिलहाल कोई आशा नहीं नजर आती। क्योंकि इस प्रकार के संकट से निपटने में हमारी कमजोरी सिर्फ एक मोर्चे पर नहीं है। इसका प्रसार चारो ओर है। कार्यपालिका की मानसिक दृढ़ता में कमजोरी, न्यायपालिका की जायज-नाजायज सीमाएं, विधायिका की अयोग्यता, भू-राजनैतिक परिस्थितियाँ, भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, राजनैतिक शासन प्रणाली, धार्मिक विश्वास और परम्परा, सामाजिक संघटन (composition of society ), निकम्मा राष्ट्रीय नेतृत्व, क्षीण इच्छा शक्ति, सर्वव्यापी भ्रष्टाचार, चारण-संस्कृति… दुष्ट, लापरवाह और पतनशील पड़ोसी। कहाँ तक गिनाऊँ… सूची अनन्त है।

फिर तो हमें बड़े परिवर्तन के लिए कमर कसना होगा। चलते-चलते ये पंक्तियाँ मन में मचल रही हैं, सो लिख ही देता हूँ।

सबने मिलबैठकर ये जान लिया,
मर्ज़ क्या है इसे पहचान लिया।
अब तो बस खोजनी दवाई है;
वो भी मिल जाएगी जो ठान लिया॥

(सिद्धार्थ)

पुनश्च :
कुछ टिप्पणियों के स्नेह और आशीष से प्रेरित होकर वागीशा और सत्यार्थ की एक तस्वीर लगा रहा हूँ। आप सबके स्नेह का शुक्रिया।

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