पालकी, मेंथी, धनिया, सोवा चाहत यार… (बैठे-ठाले)

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दीपावली के अगले दिन पारम्परिक रूप से थकान मिटाने और आराम करने का दिन होता है। हमारे यहाँ इस प्रतिपदा के दिन को ‘परुआ’ भी कहा जाता है। परुआ का एक अर्थ आलसी और कामचोर भी होता है। कृषि कार्यों के दौरान जो बैल हल खींचने या अन्यथा मेहनत से बचने के लिए अपने स्थान पर ही बैठ जाता है, और लाख पिटाई के बाद भी नहीं उठता है, उसे परुआ बैल कहा जाता है।

बचपन में हम लोग दीपावली के अगले दिन मिट्टी के दीये इकठ्ठा करते थे, उनमें बारीक छेद करके डोरी डालकर तराजू बनाते। दिन भर मिट्टी, बालू, राख, भूसी इत्यादि तौलने का खेल होता रहता। लड़कियाँ मिट्टी के खिलौने के रूप में जाँता (गेहूँ पीसने की घरेलू चक्की), चूल्हा, और रसोई के बर्तन आदि से खेलती। लड़के कुम्हार की बनायी मिट्टी की घण्टी बजाते। पूरा दिन इस लिए ‘स्पेशल’ होता था कि इस दिन कोई भी ‘पढ़ने’ के लिए नहीं कहता था। पढ़ाई से पूरी छुट्टी होती थी।

अन्य क्षेत्रों में इस दिन की पहचान किस रूप में होती है; इसकी विशेष जानकारी मुझे नहीं है। मेरे कुछ कायस्थ मित्र बताते हैं कि वे दीपावली के दिन रात में कलम की पूजा करने के बाद उसे बन्द करके रख देते हैं; और अगले दिन कलम नहीं पकड़ते हैं; यानि लिखने-पढ़ने का काम एक दिन पूरी तरह से बन्द रहता है। यहाँ हमारे ब्लॉगर मित्र यदि अपने-अपने क्षेत्र की परम्परा के बारे में बताएं तो रोचक संकलन तैयार हो जाएगा।

चित्रकृति: blueeyedcurse.com से साभार

मुझे हर साल की तरह इस साल भी परुआ बनकर घर में पड़े रहने की प्रतीक्षा थी; लेकिन सरकारी नौकरी ने सारा मजा किरकिरा कर दिया। छुट्टियों की लम्बी श्रृंखला को देखते हुए सरकार ने बैंकों और कोषागारों की छुट्टियाँ कम करते हुए Negotiable Instruments Act के अन्तर्गत प्रतिपदा और ‘भैया दूज’ को कार्यालय खोलने का निर्णय ले लिया। मुझे कोषागार जाना पड़ा। वहाँ दिन भर हम बैठे रहे। कुछ कायस्थ कर्मचारियों ने तो उपस्थिति पंजिका पर हस्ताक्षर तक नहीं किया। कलम न उठाने का नियम जो टूट जाता। पूरे दिन कोई काम हाथ नहीं लगा। पब्लिक तो इस दिन छुट्टी मना ही रही थी। सभी कर्मचारी इकठ्ठा होकर लोकचर्चा में व्यस्त रहे।

अमर बहादुर जी उप-कोषागार में रोकड़िया हैं। बैठे-ठाले चर्चा के बीच उन्होंने एक ‘स्वरचित’ दोहा सुनाया और इसके अर्थ पर बहस शुरू हो गयी। दोहा इस प्रकार था-

पालकी मेंथी धनिया सोवा चाहत यार।
लेसुन कहइ पीआज से गाजर अस ब्यौहार॥

चर्चा में अनेक सब्जी विशेषज्ञ और पाक-शास्त्री कूद पड़े। …इसका मतलब है कि पालक, धनिया और मेंथी के साग में सोया को मिलाना चाहिए। … या यह कि घनिया तो खुद ही अन्य सब्जियों में मिलायी जाती है; सोया के साथ भी और बगैर सोया के भी। …सोया सभी सब्जियों में नहीं मिलाया जा सकता। …इसे कच्चे सलाद में भी नहीं मिलाते। …जबकि धनिया सदाबहार है। …इसकी खुशबू हर सब्जी और सलाद को महका देती है।

दूसरी लाइन पर तो झगड़ा होने लगा। लहसुन, प्याज और गाजर; इन तीनो के बीच सम्बन्ध ढूँढे नहीं मिल रहा था। …ये तीनो कच्चे और पकाकर दोनो तरह से खाये जाते हैं, …इनके पौधों में पत्तियाँ जमीन से ऊपर और खाद्य भाग जमीन की सतह से नीचे होते हैं। …विज्ञान की दृष्टि से गाजर पौधे की जड़ है; जबकि लहसुन और प्याज पौधे के तना-भाग हैं। …कुछ लोग लहसुन-प्याज को सात्विक भोजन नहीं मानते; लेकिन गाजर के प्रति थोड़ी उदारता बरतते हैं। …व्रत में गाजर का हलवा चाव से खाया जाता है। लेकिन लहसुन प्याज अभी भी ‘अछूत’ बने हुए हैं।

गर्मा-गर्म चर्चा जब अछूत के जिक्र से झगड़े में तब्दील होने लगी तो खामोशी से बैठे समर बहादुर सिंह ने मुस्कराते हुए सबको शान्त होकर दोहा दुबारा सुनने के लिए कहा-

पालकी में थी धनिया, सोवा चाहत यार।
ले सुन! कहै ‘पी’ आजसे, गा जर अस व्यौहार॥

अब इसका अर्थ स्पष्ट किया गया-

‘धनिया’ अर्थात् नायिका ‘पालकी’ यानि डोली में बैठी थी। (पुराने जमाने में यात्रा करने का अच्छा साधन यही माना जाता था।) नायक का यार (यानि खलनायक) उसके साथ सोना चाहता था। इससे क्षुब्ध होकर नायिका अपने ‘पी’ यानि पिया से यह उलाहना देती है कि आजसे ऐसा व्यवहार (ऐसे दोस्त का व्यवहार) जल जाय अर्थात् समाप्त हो जाय। 🙂

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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॥शुभ दीपावली॥

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हिन्दी-सेवी मित्र जन, सबको शुभ-संदेश।
ज्योतिर्मय दीपावली, हर ले सबके क्लेष॥
हर ले सबके क्लेष, सदा मंगल हो घर में।
लक्ष्मी-नारायण निवास हो नारी – नर में॥
कर सिद्धार्थ कामना, टले विकट ये मंदी।
विश्व-पटल पर धूम मचाये अपनी हिन्दी॥‍

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बाप-बेटी के बीच फँसी एक उलझन…?

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शिक्षा विभाग में तैनात अधिकारी स्कन्द शुक्ला जो मेरे मित्र हैं, के मन की परेशानी एक अंग्रेजी के प्रतिष्ठित अखबार ने उन्ही के शब्दों में यहाँ छापी है। स्कन्द का मन अभी तक उलझन में है; क्योंकि सरकारी महकमें में काम करते हुए भी उन्होंने अपनी सामाजिक संवेदनाएं बचा कर रखी हुई हैं। नहीं तो, ग्रामीण भारत के पिछड़े समाज में सरकारी विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के स्तर पर ऐसे विद्रूप तो कदम-कदम पर दिख जाते हैं।

कहानी कुछ यूँ है कि कुछ वर्ष पहले एक जिले की प्राथमिक शिक्षा को सवाँरने का जिम्मा देकर इन्हें वहाँ का आला हाकिम बना भेजा गया था। देश के विकास का मूल आधार शिक्षा है, तथा शिक्षा के विकास का मूल आधार प्राथमिक शिक्षा है; यह सोचकर देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान का अवसर जान स्कन्द ने जिले में जाकर खूब मेहनत की। सरकारी योजनाओं को पूरे नियम से लागू करने का बेड़ा जो उठा लिया था।

गाँव-गाँव में खुले प्राइमरी स्कूलों की अवस्थापना सुविधाओं को सुदृढ़ करने, स्कूलों में प्राथमिक शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने, गरीब छात्रों को निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें व यूनीफॉर्म तथा दोपहर का भोजन उपलब्ध कराने, विद्यालय भवनों की मरम्मत व नवनिर्माण कराने, स्कूल छोड़ चुके छोटे बच्चों का दुबारा नाम लिखाने, फिर भी छूटे रह गये बच्चों को अलग से पढ़ाने की व्यवस्था कराने, उनका स्वास्थ्य परीक्षण कराने आदि जैसी अनेक कल्याणकारी योजनाएं देशी और विदेशी आर्थिक अनुदान से चलायी जा रही हैं। प्रत्येक जिले में करोड़ों का बजट।

आप जानते ही हैं प्राथमिक शिक्षा को संवैधानिक अधिकार का दर्जा मिला हुआ है। यहाँ जमीनी हकीकत का व्यौरा देने कि कोई आवश्यकता नहीं है। आप जरूर जानते होंगे। स्कन्द की उलझन को स्पष्ट करने के लिए मैं यहा चर्चा करूंगा इन्हीं योजनाओं में से एक अति महत्वाकांक्षी और ‘सफल’ योजना का जिसे शिक्षामित्र योजना कहते हैं-

ग्राम पंचायतों में खोले गये प्राथमिक विद्यालयों में छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए उसी गाँव के निवासी तथा इण्टरमीडिएट तक की शिक्षा प्राप्त अभ्यर्थियों में से सर्वोच्च मेरिट वाले अभ्यर्थी को शिक्षामित्र के रूप में चयनित किया जाता है; जो संविदा के माध्यम से ग्यारह माह के मानदेय भुगतान के बदले अपनी सेवाएं विद्यालय में देता है।

शिक्षामित्र योजना का उद्देश्य यह है कि स्थानीय स्तर पर कम लागत में बच्चों को क, ख, ग,… पढ़ाने के लिए पर्याप्त संख्या में मानव संसाधन जुटाए जा सकें। सरकारी प्रशिक्षित अध्यापकों की भारी कमी और उनकी नियुक्ति पर आने वाले भारी व्यय की तुलना में राजकोष की पतली हालत को देखते हुए यह कामचलाऊ योजना अत्यन्त उपयोगी साबित हुई है। बल्कि आज आलम यह है कि प्राथमिक शिक्षा का सारा दारोमदार इन्हीं शिक्षामित्रों के कंधों पर टिका हुआ है।

सरकारी विभागों में कार्यरत एक चपरासी से भी कम पारिश्रमिक पाने वाला शिक्षामित्र ग्रामीण भारत के गरीब बच्चों के भविष्य की एकमात्र आशा की किरण बना हुआ है। विभाग से मोटी तनख़्वाह पाने वाले अन्य सरकारी प्राथमिक शिक्षकों के ऊपर सरकार ने शिक्षण कार्य से इतर अनेक जिम्मेदारियाँ डाल रखी हैं। नये स्कूल भवनों का निर्माण कार्य, शिक्षा सम्बन्धी योजनाओं का प्रचार-प्रसार, सूचना संकलन, सर्वे, पल्स पोलियो, मीटिंग, गोष्ठी, अधिकारियों का दौरा, आवभगत, वेतन बिल का भुगतान और नेतागीरी। उन्हें इन सभी जिम्मेदारियों को पूरा करने का ही समय नहीं मिल पाता। बेचारे क्या करें…? शिक्षामित्र को स्कूल की चाभी देकर निकल लेते हैं।:)

…तो शिक्षामित्र के रूप में चयन के लिए बेरोजगारों की लम्बी फौज एकदम से टूट पड़ी। गाँव में अपने घर पर रहते हुए जो हार मान कर छिपी हुई बेरोजगारी से तालमेल बिठा चुके थे; उन्हें भी घर बैठे एक अवसर मिल गया। इण्टर तक पढ़ाई कर चुके वे नौजवान हों जो श्रम आधारित रोजगार की तलाश में बाहर भटक रहे थे, अथवा घरों के भीतर चूल्हे-चौके में अपनी नियति तलाश चुकी बहुएं हों या शादी की प्रतीक्षा में दिन काट रही बेटियाँ; सबको इस लम्बी कतार में देखा जा सकता था। सबने बक्से और आलमारी में छिपा कर रखे अपने अंकपत्र बाहर निकाल कर छाड़-पोंछ लिए और आवेदन ग्राम-प्रधान जी को प्रस्तुत कर दिया।

शुरुआती दौर में तो हाई स्कूल और इण्टर के अंकों को मेरिट में शामिल किया गया। बाद मे कुछ अधिमानी (preferential) योग्यताएँ निर्धारित की गयी। आरक्षण के नियम भी लागू हुए। ग्राम शिक्षा समितियों ने चयन में धाँधली शुरू की तो इसे जिला स्तर पर समिति गठित करके जिलाधिकारी के सर्वोच्च नियन्त्रण में सौंप दिया गया।

लेकिन मूल बात यह है कि यह नौकरी गाँव के ही अभ्यर्थी को उसके गाँव में ही मिलनी है। इसकी चयन प्रक्रिया की शुरुआत गाँव स्तर से ही होनी है। वहीं से सभी आवेदकों की सम्मिलित वरीयता सूची (merit list) शीर्षस्थ अभ्यर्थी के चयन के प्रस्ताव के साथ जनपदीय समिति के अनुमोदन के लिए भेजी जाती है।

यह प्रक्रिया देखने में जितनी सरल लगती है, व्यवहार में उतनी ही कठिनाई पैदा करने वाली है। हर कदम पर धाँधली और बेईमानी का प्रयास होता है। इसीलिए सम्बन्धित अधिकारी को उसी अनुपात में सजग और सतर्क रहना पड़ता है। क्रमशः सारी प्रक्रिया को इतना पारदर्शी बनाने की कोशिश की गयी है कि धाँधली और फर्जीवाड़ा करना बहुत मुश्किल हो गया है। लेकिन तू डालडाल मैं पातपात वाला खेल यहाँ खूब चलता है।

चित्रकृति : The Times of India से साभार

इस प्रकरण में जिस लड़की का जिक्र किया गया है, वह ग्राम पंचायत की मेरिट सूची में प्रथम स्थान पर थी। लेकिन उसके चयन का प्रस्ताव गाँव से भेजा नहीं जा रहा था। मेरिट सूची में दूसरे स्थान पर जो लड़का था, उसे अपना चयन कराने के लिए किसी भी तरीके से उस लड़की को अनर्ह (disqualified) घोषित कराना था।

उसे नियमों में सेंध लगाने का एक रास्ता हमारी उस सामाजिक व्यवस्था में मिला जिसके अनुसार लड़की का विवाह हो जाने के बाद वह हमेशा के लिए अपने पति के घर की हो जाती है। मायके में उसका अपना कोई अधिकार नहीं बचता। अपने ही माँ-बाप के पास वह केवल मेहमान बनकर आती है। वह तब वहाँ की निवासिनी नहीं रह जाती।

शिक्षामित्र की पहली शर्त है कि अभ्यर्थी उसी ग्राम-सभा का स्थाई निवासी हो। उस लड़की ने जब आवेदन किया था तो उसी गाँव की निवासी थी; लेकिन जब मेरिट लिस्ट बनायी जा रही थी तभी उसका विवाह हो गया। विवाह से एक साल के भीतर उसका गवना होना था; अर्थात् उसे अपनी ससुराल चला जाना था। ( ग्रामीण समाज में अभी भी विवाह के तत्काल बाद विदाई का रिवाज नहीं है।)

वह लड़की जनपदीय कार्यालय में यह शिकायत करने गयी थी कि भ्रष्ट SDI (Sub-deputy Inspector of School) जिसे डिप्टी साहब कहा जाता है, द्वारा उसके चयन का प्रस्ताव जानबूझकर जिले पर अनुमोदन के लिए नहीं भेजा जा रहा था। यह इसलिए कि उसका गवना हो जाने पर वह दूसरे स्थान वाले को चयनित करा सके। जबकि वह इस अवसर का लाभ उठाकर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। इस संवेदनशील अधिकारी ने उस SDI को पत्रावली और चयन प्रस्ताव के साथ अगले दिन कार्यालय तलब कर लिया। लड़की की उम्मीदें बलवती हुईं। वह प्रसन्न होकर घर लौट आयी।

शाम को ऑफिस से घर आने पर इस अधिकारी को अपने दरवाजे पर उसी लड़की का बाप हाथ जोड़े प्रतीक्षा करता मिला। असमय निवास पर आने का कारण पूछने पर उसने विनय पूर्वक बताया कि अपनी बेटी का चयन रोकने का प्रयास वह स्वयं कर रहा है, डिप्टी साहब नहीं। उसी ने उसके विवाहित होने की सूचना लिखकर उन्हें भेंजी है ताकि उसका नाम मेरिट सूची से हटा लिया जाय।

विस्मित होकर स्कन्द ने जब इस अप्रत्याशित फैसले का कारण पूछा तो उस गरीब ने अभयदान का आश्वासन पाने के बाद जो रहस्य खोला वह विचलित कर देने वाला था-

“साहब, …मुझ गरीब के लिए बेटी की नौकरी से अधिक जरूरी उसका गवना कराना है, जिससे मेरी इज्जत पर दाग न लगे। गवना का खर्चा मुझे उसी लड़के ने दिया है जो दूसरे नम्बर पर आया है…।”

स्कन्द के लिए अब फैसला लेना अत्यन्त कठिन हो गया; लेकिन अगले दिन सुबह-सुबह ऑफिस पहुँचने पर उन्हें अपने ट्रान्सफर का आदेश सबसे पहले मिला और कोई निर्णय लिए बिना उन्हें वहाँ से छुट्टी मिल गयी। (अकस्मात्‌ स्थानान्तरण की कहानी फिर कभी…)

स्कन्द के मन में अनिर्णय की स्थिति अभी भी बनी हुई है, और उलझन भी…। आप बताइए, आप क्या निर्णय लेते?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

धुंधुकारी कौन था? (भाग-२)…पुराण चर्चा।

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पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि धुंधुकारी और गोकर्ण गुरुकुल में जाकर परस्पर विपरीत प्रवृत्तियों की ओर उन्मुख हुए। अब आगे

धुंधुकारी के भीतर ब्राह्मणोचित गुणों का विकास शून्य था। वह परम क्रोधी और विघ्नतोषी हो गया। बुरी से बुरी वस्तुएं एकत्र करना, चोरी करना, लोगों के बीच झगड़ा करा देना और दीन – दुखियों को कष्ट पहुँचाना उसे बड़ा प्रिय था। वह खतरनाक हथियार लेकर घूमा करता और सज्जनो, मासूम पशु-पक्षियों व अन्य जीवों के लिए आततायी बन जाता। उसे पूजा-अराधना जैसे कार्य तुच्छ और हीन लगते थे। वह उम्र बढ़ने के साथ ही व्यभिचार में लिप्त रहने लगा। उसके वेश्यागमन से आत्मदेव की प्रतिष्ठा तार-तार होने लगी। आत्मदेव पुनः शोकमग्न रहने लगा।

गोकर्ण को अपने पितातुल्य आत्मदेव का दुःख देखा न गया। उसने उन्हें वैराग्य का उपदेश दे डाला। इस जगत को नश्वर और पुत्र, स्त्री व धन को मोह-माया का बन्धन बताते हुए इन्हें समस्त दुःखों का कारण बताया। सुख की प्राप्ति के लिए ऋषि- मुनियों की भाँति मोहरूपी अज्ञान को त्याग देने का उपदेश देकर गोकर्ण ने आत्मदेव को मोक्ष की प्राप्ति हेतु वनगमन करने की सलाह दे डाली।

गोकर्ण के उपदेश से आत्मदेव को अपना मार्ग मिल गया। उन्होंने गोकर्ण से वैराग्य का उपदेश प्राप्त किया और वैराग्य धारण कर वन की ओर प्रस्थान कर गये। वन में भगवत् साधना करते हुए उन्हे परम धाम की प्राप्ति हो गयी।

इधर पिता के चले जाने के बाद धुंधुकारी अधिक उन्मुक्त और स्वतंत्र हो गया। उसके द्वारा निरन्तर बढ़ रहे उपद्रव तथा धन के लिए डराने-धमकाने और प्रताणित करने से व्यथित धुंधुली ने कुँए में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। गोकर्ण भी माता-पिता का सानिध्य समाप्त हो जाने के बाद लम्बी तीर्थ यात्रा पर निकल गया। धुंधुकारी अब परम स्वतंत्र और निरंकुश हो गया। अब सदा वेश्याओं के साथ ही विलास में डूबा रहता था। इस व्यभिचार और कुकर्मों से उसकी बुद्धि नष्ट-भ्रष्ट हो गयी।

धुंधुकारी को दुष्कर्मों में लिप्त पाकर वेश्याओं ने उसका अधिकाधिक दोहन प्रारम्भ कर दिया। एक बार धुंधुकारी ने राजमहल में बड़ी चोरी की और लम्बा हाथ मारा। राजमहल का धन और आभूषण इत्यादि देखकर वेश्याओं ने सोचा कि राजा के सिपाही यदि इस चोरी का पता लगा लेंगे तो धुंधुकारी के साथ ही हम सब भी पकड़ी जाएंगी, और यह अपार सुख त्याग कर कारागार का कष्ट भोगना पड़ेगा।

इस भय से आक्रांत वेश्याओं ने मिलकर सोते हुए धुंधुकारी को दहकते हुए अंगारों से जलाकर मार डाला तथा उसी घर में गढ्ढा खोदकर दफ़ना दिया। अपने कुकर्मों के फल से धुंधुकारी प्रेत बनकर भटकने लगा।

इधर एक दिन गोकर्ण तीर्थों का भ्रमण करते हुए अपने नगर वापस आया तथा उसी पैतृक आवास में रात्रि-विश्राम को रुका। उसे वाहाँ पाकर धुंधुकारी ने भयंकर रूप धारण कर उसे डराने का प्रयास किया। किन्तु ज्ञानी गोकर्ण ने सहज ही अनुमान लगा लिया कि यह कोई दुर्गति को प्राप्त जीव है।

गोकर्ण द्वारा संयत और प्रेमपूर्ण वाणी में परिचय पूछने पर धुंधुकारी फूट-फूटकर रो पड़ा। अपनी दुर्गति और वेश्याओं द्वारा जलाकर मार दिये जाने की कहानी विस्तार से सुनाते हुए उसने गोकर्ण से हाथ जोड़कर प्रेतयोनि से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। अपने भाई के प्रति गोकर्ण के मन में संवेदना का भाव उमड़ पड़ा और उसने उसकी मुक्ति का प्रयास करने का वचन दे दिया।

गोकर्ण से मुक्ति का आश्वासन पाकर धुंधुकारी प्रसन्न भाव लेकर चला गया; किन्तु गोकर्ण की आँखों से नींद गायब हो गयी। अपना वचन पूरा करने का मार्ग नहीं सूझ रहा था। प्रातःकाल उसके नगर आगमन का समाचार पाकर क्षेत्र के विद्वतजन उसके दर्शनार्थ आए। गोकर्ण ने सबसे प्रेतबाधा के निवारण के उपायों पर चर्चा की लेकिन सभी वेदों और शास्त्रों को खंगालने के बाद भी सर्वसम्मत समाधान नहीं मिल सका।

गोकर्ण ने तब भगवान सूर्य की अराधना की और धुंधुकारी की प्रेतयोनि के अन्धकार से मुक्ति का उपाय पूछा।

सूर्यदेव प्रकट हुए और बोले- “वत्स! तुम्हारे भाई की मुक्ति केवल श्रीमद्भागवत पुराण के श्रवण से हो सकती है; इसलिए तुम उसे सप्ताह-श्रवण कराओ।” उन्होंने बताया कि इस दिव्य कथा के श्रवण से न केवल धुंधुकारी को प्रेतयोनि से छुटकारा मिल जाएगा; बल्कि सर्वत्र कलुष मिटेगा और सर्वमंगल की वर्षा होगी।

सूर्यदेव का मार्गदर्शन पाकर गोकर्ण ने धुंधुकारी के उद्धार और सर्वमंगल की कामना से श्रीमद् भागवत की कथा सुनाने का निश्चय किया। पूरे क्षेत्र में यह शुभ समाचार फैल गया। कथा सुनने के लिए विशाल जन समुदाय उमड़ पड़ा। एक उँचे आसन (व्यास-गद्दी) पर बैठकर गोकर्ण ने कथा का वाचन प्ररम्भ कर दिया।

कथा सुनने के लिए धुंधुकारी-प्रेत भी वहाँ पहुँचा। बैठने का स्थान खोजते हुए उसने वहाँ गाड़े गये सात बाँस देखे। उसी में से एक बाँस के भीतर बैठ गया और ध्यानमग्न होकर अमृतमय कथा का रसपान करने लगा।

संध्या होने पर जब कथा को विराम दिया गया, तभी वह बाँस जोरदार आवाज के साथ फट गया। इसी प्रकार सात दिन की कथा में सातो बाँस क्रमशः फटते गये। अन्तिम दिन धुंधुकारी प्रेतयोनि से मुक्त होकर दिव्यरूप में सबके सामने प्रकट हो गया। चेहरे पर दिव्य आभा, शरीर पर राजसी वस्त्राभूषण और सिर पर तेजमय मुकुट। सभी उसे विस्फारित आँखों से देखने लगे।

तभी वहाँ भगवान श्रीकृष्ण के पार्षदों को लेकर एक दिव्य विमान उतरा। पार्षदों ने आदरपूर्वक धुंधुकारी से विमान में बैठने का आग्रह किया। विस्मित गोकर्ण ने उन्हें टोका- “मान्यवरों! यहाँ सभी श्रोताओं ने समान रूप से कथा सुनी है; किन्तु आपने मात्र धुंधुकारी को ही इस विमान के लिए क्यों आमन्त्रित किया?”

मुख्य पार्षद ने स्पष्ट किया कि इसफलभेद का कारण श्रवणभेद है। यह सत्य है कि सबने कथा का श्रवण समान रूप से किया, किन्तु इस प्रेत के समान कथा पर मनन किसी और ने नहीं किया। धुंधुकारी ने सात दिनों तक निराहार रहकर अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखते हुए इस कथा का श्रवण किया था, और साथ में इसपर मनन भी करता रहा। इसीलिए यह भगवान श्रीकृष्ण के परम पद को प्राप्त करने का अधिकारी बना।

इतना कहकर सभी पार्षद धुंधुकारी को विमान में लेकर गोलोक को चले गये।
(कथा समाप्त)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

धुंधुकारी कौन था? …पुराण चर्चा।

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मैं बचपन से अपने गाँव-गिराँव में इस विशेषण का प्रयोग सुनता आ रहा हूँ। कदाचित् आपने भी किसी अत्यन्त उद्दण्ड, शैतान, झगड़ालू या बवाल काटने वाले बच्चे के लिए धुन्धकाली की उपमा सुनी होगी। आइए जानते हैं इस विशेष चरित्र के बारे में जो श्रीमद्भागवतपुराण के माहात्म्य को रेखांकित करने वाली एक रोचक कथा का मुख्य पात्र है:-

प्राचीन काल में तुंगभद्रा नदी के तटपर बसे एक सुन्दर नगर में आत्मदेव नाम का एक धर्मपरायण ब्राह्मण रहता था। उसका विवाह धुंधुली नामक एक उच्च कुल की सुन्दर कन्या से हुआ था। ‘विष रस भरा कनक घट जैसे’ की उक्ति को चरितार्थ करने वाली धुंधुली जितनी ही सुन्दर थी, उसका स्वभाव उतना ही दुष्ट, लोभी, ईर्ष्यालु व क्रूर था। कलहकारिणी पत्नी के साथ रहकर भी आत्मदेव अपनी गृहस्थी सन्तोषपूर्वक चला रहे थे। किन्तु विवाह के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी इस दम्पति को कोई सन्तान नहीं हुई। इसके लिए किये गये सभी उद्यम, यज्ञ-अनुष्ठान, व पुण्य-कर्म निष्फल रहे। अन्ततः हताश होकर प्राणत्याग की मंशा से आत्मदेव ने अपना घर छोड़ दिया।

अज्ञात दिशा में जा रहे आत्मदेव को मार्ग में एक सरोवर मिला। उसी के तटपर व्यथित हृदय बैठ गये। तभी एक तेजस्वी सन्यासी वहाँ से गुजर रहे थे। आत्मदेव को इसप्रकार दुःखी देखकर उन्होनें चिन्ता का कारण पूछा। आत्मदेव ने अपनी एकमात्र चिन्ता को सविस्तार बताया तो उस योगनिष्ठ तेजस्वी सन्यासी ने उसके ललाट को देखकर बताया कि – “निश्चित रूप से तुम्हारे मस्तक की रेखाएं बताती हैं कि तुम्हारे पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार तुम्हें सन्तान की प्राप्ति नहीं हो सकती।इसलिए यह विचार छोड़कर सन्तोष कर लो, और भगवत् भजन करो।”

आत्मदेव ने जब हठपूर्वक यह कहा कि बिना सन्तान के जीवित रहने की उसे कोई इच्छा नहीं है तो उस तेजमय सन्यासी ने दयावश उसे एक दिव्य फल दिया और उसे पत्नी को खिला देने का निर्देश देकर चले गये।

आत्मदेव घर लौट आये और सारी कहानी बताकर वह फल पत्नी को खाने के लिए दे दिया; किन्तु उस दुष्टा ने सन्तानोत्पत्ति में होने वाले शारीरिक कष्ट, और उसके बाद पालन-पोषण की भारी जिम्मेदारी से बचने के लिए उस फल को खाने के बजाय कहीं छिपा दिया और आत्मदेव से झूठ में कह दिया कि उसने फल खा लिया है।

कुछ दिनों बाद धुंधुली की बहन मृदुली उससे मिलने आयी। हाल-चाल बताने में धुंधुली ने अपने झूठ के बारे में उसे बता दिया और भेद खुलने की चिन्ता भी व्यक्त करने लगी।

मृदुली ने अपनी बहन को चिन्तित देखकर एक योजना बना डाली। उसने कहा कि वह अपने गर्भ में पल रहे शिशु के पैदा होने के बाद उसे सौंप देगी। उस समय तक धुंधुली गर्भवती होने का स्वांग करती रहे। घर के भीतर पर्दे में रहते हुए ऐसा करना बहुत कठिन तो था नहीं। यह भी तय किया गया कि मृदुली अपने प्रसव के बारे में यह बता देगी कि जन्म के बाद ही उसका पुत्र मर गया।

योजना पर सहमति बन जाने के बाद मृदुली ने यह भी सलाह दिया कि उस दिव्य फल को तत्काल गोशाला में जाकर किसी गाय को खिला दिया जाय ताकि गलती से भी वह किसी के हाथ न लगे।

उसके बाद योजना के मुताबिक ही सबकुछ किया गया। मृदुली ने पुत्र-जन्म के तुरन्त बाद उसे अपने पति के हाथों ही धुंधुली के पास भेंज दिया और इधर उसकी मृत्यु हो जाने की सूचना फैला दी।

अपने घर में पुत्र के जन्म का समाचार पाकर आत्मदेव परम प्रसन्न हो गए और अन्न-धन इत्यादि का दान करने लगे। एक दिन धुंधुली ने अपनी दुर्बलता और खराब स्वास्थ्य, तथा अपनी सद्यःप्रसूता बहन के पुत्रशोक की कहानी एक साथ सुनाकर योजना के मुताबिक उसे घर बुलाने की मांग रख दी। आत्मदेव के समक्ष एक ओर बीमार और कमजोर पत्नी से उत्पन्न पुत्र को न मिल पाने वाला अमृत-तुल्य मातृ-सुख था तो दूसरी ओर पुत्र शोक में डूबी मृदुली का अतृप्त मात्रृत्व था। उन्हें पत्नी की मांग सहज ही उचित लगी और वे मृदुली को बुलाने स्वयं चले गये।

आत्मदेव ने मृदुली के घर जाकर अपने पुत्र के पालन-पोषण के लिए मृदुली को साथ ले जाने की याचना की। वह तो मानो तैयार ही बैठी थी। आत्मदेव का अनुरोध सहर्ष स्वीकार कर लिया गया। मृदुली पुत्र का पालन पोषण करने आत्मदेव के साथ धुंधुली के पास आ गयी।

बालक का नाम धुंधुली के नाम पर धुंधुकारी रखा गया।

उधर जिस गाय को वह दिव्य फल खिलाया गया था, उसके पेट से एक दिव्य बालक का जन्म हुआ जो अत्यन्त तेजस्वी था। आत्मदेव उस श्वेतवर्ण के बालक को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए तथा स्वयं उसके पालन-पोषण का निश्चय किया। बालक के कान गाय के समान देखकर उसका नाम गोकर्ण रख दिया गया।

(मैने अपने क्षेत्र के कुछ पुराने लोगों का नाम गोकर्ण, गोकरण, या गऊकरन रखे जाने का सन्दर्भ भी यहीं जाना है।)

…इस प्रकार दोनो बालक एक ही साथ पाले गये। बड़ा होने पर एक ही साथ शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरुकुल भेंजे गये; लेकिन वहाँ दोनो के संस्कार विपरीत दिशाओं में प्रस्फुटित हुए। विलक्षण प्रतिभा का धनी गोकर्ण गुरुकुल में अनुशासित रहकर वेदों और शास्त्रों का अध्ययन करते हुए परम ज्ञानी और तत्ववेत्ता बन गया; जबकि बुरे संस्कारों से उद्भूत धुंधुकारी अपनी उद्दण्डता और तामसिक प्रवृत्तियों के कारण निरन्तर अज्ञान के अन्धकार में समाता चला गया..। (जारी)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

एक झलक ग्रामीण उच्च शिक्षा की…

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भारतवर्ष की हिन्दीभाषी गंगापट्टी जिसे कुछ विद्वान लोग गोबरपट्टी कहने में यथार्थवादी होने का सुख प्राप्त करते हैं; इसके दूरस्थ ग्रामीण इलाके शैक्षिक रूप से काफी पिछड़े हुए रहे हैं।

बनारस, इलाहाबाद, फैजाबाद, गोरखपुर और जौनपुर के विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध अनेक महाविद्यालयों की स्थापना पूर्वी उत्तरप्रदेश के देहाती इलाकों में उच्च शिक्षा के लिए हुई है। इनमें नये-नये व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाकर नौकरी लायक शिक्षा को स्थानीय स्तर पर सुलभ कराने की कोशिश की जा रही है। इसमें आजकल बी.एड. का पाठ्यक्रम खासा लोकप्रिय हो चला है।

सर्वप्रथम स्नातक की उपाधि प्राप्त कर चुके विद्यार्थियों को कक्षा-०६ से कक्षा-१० तक के लिए शिक्षक बनने का कैरियर चुनने के लिए इस पाठ्यक्रम को बनाया गया था। लेकिन परवर्ती सरकारों ने इस उपाधि के धारकों को प्राइमरी स्कूल से लेकर महाविद्यालयों (digree colleges) तक में पढ़ाने का अवसर देने के निर्णय लिए हैं। इसका असर ये हुआ है कि सर्वाधिक नौकरी के अवसर खोलने वाली इस उपाधि के लिए भारी भीड़ लग रही है। लड़के-लड़कियाँ, आदमी-औरत, युवा-प्रौढ़ आदि सभी बी.एड. करने को प्रयासरत हैं।

अतः इसके लिए राज्यस्तरीय प्रवेश परीक्षा आयोजित होती है जिसमें कई लाख स्नातक भाग लेते हैं, इसमें जो अभ्यर्थी सफल होता है वह इस प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में जब पढ़ने जाता है तो वहाँ का माहौल कुछ ऐसा पाता है- 🙂

[चित्र http://www.usc.edu.ph से साभार ]

(यह एक सच्ची घटना पर आधारित उदाहरण है जो योगेन्द्र कुमार त्रिपाठीप्रशिक्षु शिक्षक ने अपने निजी अनुभव के आधार पर बतायी है।)

एक कक्षा बी.एड. की जिसमें हैं प्रशिक्षु
कुल ९८
महिलाएं १४
शादीशुदा १२
कुआँरी लड़कियाँ ०२
पुरुष ८४
शादीशुदा ४५
कुआँरे लड़के ३९
सबसे छोटी उम्र२४ वर्ष
सबसे बड़ी उम्र४२ वर्ष

कक्षा में एक चुटकुला जो एक उत्साही नौजवान छात्र ने सुना दिया

एक सरदार के तेरह बच्चे थे। उससे एक व्यक्ति ने पूछा- इस जमाने में भी इतने बच्चे? सरदार जी बोले- इसमें मेरा कोई कसूर नहीं, गलती सब मेरे ससुर की है। व्यक्ति चकराया, “वो कैसे?” सरदार ने साफ किया- “क्यूँ कि शादी के समय ससुर जी ने मुझसे जुबान लिया था कि मै उनकी बेटी को कभी खाली पेट न रखूँ।” 🙂
हा,हा,हा,हा…

इस पर बवाल हो गया। महिला प्रशिक्षुओं द्वारा आपत्ति 😦

सभ्यता संस्कृति की दुहाई
हूटिंग, हाय तौबा

पीड़ित चुटकुलेबाज द्वारा दुःखी होकर अपनी व्यथा एक कविता में डाल दी गयी
ये रही वो कविता 🙂

कल कक्षा में मुझसे एक छोटी सी बात हो गयी,
मैने यूँ ही कुछ कह दिया और इतनी बड़ी बात हो गयी
किसी ने सिखाया, किसी ने नैतिकता का पाठ पढ़ाया
किसी ने तो हद कर दी भाई
सभ्यता और संस्कृति का ऊँचाऊँचा पहाड़ दिखाया
लोगों की संवेदना जाग गयी
मैने सोचा चलो अच्छा हुआ भाई।
कम से कम लोगों में संवेदना तो आयी
किसी ने केवल प्रश्नचिह्न लगाया।
तो किसी की नाकनक्श और भौवें चढ़ आयीं
मैने तो केवल चुटकुला सुनाया था
लोगों को हँसाने का काल्पनिक बहाना बनाया था।
लेकिन ये लोगों की संस्कृति पर बन आयी।
मैने सोचा क्या इतनी बड़ी बात हो गयी
कल कक्षा में मुझसे एक छोटी सी बात हो गयी।

फिर आया महिलाओं का खेद प्रकाश

उन्हें अपने द्वारा की गयी हूटिंग पर सच में पछतावा हो गया -:(

फिर क्या था ?
उत्साह में फिर एक और कविता। ये रही:-

मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो
घर में क्या छुपछुप कर अश्लीलता में लजाते हो
कभी धर्म के नाम पर, कभी समाज के नाम पर
तुम तो हमेशा संस्कृति और सभ्यता चिल्लाते हो
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो

तो तुमसे एक प्रश्न है मेरा
क्यूँ नहीं लोगों में मानवता फैलाते हो
जब चौराहे पर लुट रही किसी की मर्यादा तो
क्यूँ नहीं सब मिलकर होहल्ला मचाते हो?
तब तो अपने दामन को पाक साफ बचाते हो
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो

माना कि मैने कुछ गलत कहा
तो क्यूँ नहीं तुम्ही सब सचसच बताते हो
बातों ही बातों में समता की बात चलाते हो
दुनिया भर की बातें हैं सोचने समझने को
तो फिर इस छोटी सी बात पर क्यूँ अटक जाते हो?
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो?

अब तो हद ही हो गयी।

लेकिन महिलाओं ने बात बढ़ाना उचित नहीं समझा
बस माफी मांग ली।
माफ़ी दे दो भाई!
हमने आपत्ति ग़लत उठाई!
🙂 (।) ):
(प्रकरण समाप्त)

क्या कहेंगे इसे?

नारी की हार, शान्ति की चाह, वादविवाद से पलायन, या और कुछ??

अभी नारीवाद को लम्बा रास्ता तय करना है।?

(सिद्धार्थ)

एक अद्भुत संयोग…! (भाग-२)

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पिछली कड़ी में आपने परिवार से परित्यक्त राजकुमारी के बारे में पढ़ा। अब आगे

राजकुमारी देवी के लिए उस दुधमुँही बच्ची को गोद में लेना, उसे अपने आँचल की छाँव देना और उस मासूम को गले लगाकर उसमें जीवन का संचार कर देना उसके लिए इतना भारी पड़ गया कि उसकी हिम्मत जवाब देने लगी…।

जिस पति के साथ उसने पच्चीस वर्षों से अपना जीवन समर्पित कर बिताया था, उसके लिए वह त्याज्य हो गयी। …बेहद गरीबी में दिहाड़ी मजदूरी करके अपना जीवन बसर कर रहे इस परिवार के मुखिया और राजकुमारी के पति नरेश ने एक बोरे में भर कर रखा गया आटा जानवरों को डाल दिया; क्यों कि उसे उसकी पत्नी ने उसी हाथ से छू दिया था, जिससे वह उस मासूम को सहला चुकी थी।

जिस बहू को स्नेहवश राजकुमारी ने घर से बाहर मजदूरी करने से मना कर दिया था और उसे घर के भीतर सुख से रखने के लिए खुद बाहर का काम करती थी; उसी बहू ने उसके बाल पकड़कर घसीट दिया और मार-पीट कर बाहर निकालते हुए अलग हो जाने का फैसला सुना दिया। राजकुमारी के तीनो बेटे जो बाहर (दिल्ली) कमाने गए हुए हैं, उनकी ओर से भी माँ के प्रति कोई समर्थन नहीं मिला। अब कच्ची मिट्टी और घास-फूस का घर भी राजकुमारी के लिए अपना न रह सका।

इधर लोगों में उस बच्ची के प्रति जो शुरुआती कौतूहल था वह क्षीण होता गया; अब वह केवल राजकुमारी पर ही आश्रित रह गयी। उसपर जिसे अपने ही आश्रय का संकट खड़ा हो गया था। कदाचित्‌ यह विडम्बना भाँपकर ही ईश्वर ने पड़ोस के जिले महराजगंज के एक गाँव में चल रही एक अन्य व्यथा की कथा का पटाक्षेप करने का विधान रच दिया था…।

उस गाँव के एक गोस्वामी ब्राह्मण परिवार की एक महिला अपने विवाह के पन्द्रह वर्ष बीत जाने के बावजूद सूनी रह गयी कोंख को भरने के सारे जतन करके थक जाने के बाद घोर निराशा की शिकार हो गयी थी। बड़े-बड़े डॉक्टर-हकीम से लेकर अनेक ज्योतिषी, पण्डित व ओझा-सोखा इत्यादि तक का दरवाजा खटखटा कर हताश हो चुकी उस महिला के पेट में कुछ दिनों पहले जब दर्द के साथ कुछ उभार उठना शुरू हुआ तो अचानक उसके जीवन में एक उम्मीद लौट आयी थी। उसके सपने आसमान छूने लगे थे।

वह शुरुआती दर्द से खुश होती रही, मीठे सपनों के साथ उसे तबतक सहन करती रही जब तक किसी साहसी चिकित्सक ने उसे यह नहीं बता दिया कि यह उभार उसके सपने को पूरा करने वाला नहीं है। यह तो उसके गर्भाशय में लम्बे समय से पलने वाला रोग था जो अब ट्यूमर का रूप लेकर खतरनाक तरीके से बढ़ रहा था। यह सूचना उस महिला के लिए किसी वज्राघात से कम न थी। तत्काल ऑपरेशन किया जाना अपरिहार्य था और वह बेचारी बाँझपन के दंश से उपजे मानसिक अवसाद से उबरने की सम्भावना को दूर धकेलती जा रही थी।

उसके पति की चिन्ता थी बीमार पत्नी की जीवन रक्षा। एक बड़े ऑपरेशन के लिए पत्नी को तैयार करने में उन्हें यह वचन देना पड़ा कि उसकी सूनी गोद बहुत जल्द भर दी जाएगी। वह बावरी इस वादे पर विश्‍वास कर बैठी और अस्पताल में भर्ती हो गयी। ऑपरेशन हुआ। ट्यूमर बाहर निकला। सबने राहत की साँस ली; लेकिन चैन उसे नहीं था। उसे तो गोद भरने की जिद थी।

इसी समय अखबार में छपी खबर पढ़कर जवाहरलाल की उम्मीद का दीया टिमटिमा उठा। पत्नी को अस्पताल में अन्य परिजनों के भरोसे छोड़कर भागे चले आए – मेरे गाँव। यहाँ राजकुमारी उस मासूम को छाती से चिपकाए अपनी विपत्ति को टालने के लिए भगवान से प्रार्थना कर रही थी। यहाँ इन दो उम्मीदों का ऐसा मिलन हुआ कि सुनने और देखने वालों की आँखें फटी की फटी रह गयीं। अद्भुत संयोग ही था यह।

जवाहरलाल उस गौरांग बालिका को देखकर मोहित हो गये। सुन्दर और तीखे नाक-नख़्स वाली उस अबोध शिशु को उन्होंने अपने लिए ईश्वर का वरदान मान लिया तो राजकुमारी को जवाहरलाल में साक्षात्‌ नारायण के दर्शन हो गए। उसकी एक सप्ताह की कठिन तपस्या का ऐसा अन्त देखने सारा गाँव उमड़ पड़ा। …लेकिन `एक अनजान आदमी को बच्ची कैसे सौंप दी जाय?’ यह प्रश्‍न खड़ा कर दिया गया।

जवाहरलाल उल्टे पाँव लौट पड़े; अगले दिन फिर आने का वादा कर गये…।

चित्र flickr.com से साभार : कदाचित्‌ जवारलाल की पत्नी की मुस्कान कुछ ऐसी ही रही होगी।

वादे के मुताबिक वे अगले दिन गाँव में एक जीप से आये। जीप से तीन औरतें और कई आदमी उतरे। उसमें मातृत्व-सुख से वंचित जवाहरलाल की पत्नी भी थी, अपनी दो बहनों के साथ। बाकी उनके गाँव के बड़े-बुजुर्ग थे।

…उस बच्ची के भावी माँ-बाप ने राजकुमारी से हाथ जोड़कर विनती करते हुए उसकी याचना की। राजकुमारी ने अपने को धन्य मानकर बच्ची को उनके गोद में डाल दिया।

…कृतज्ञता ज्ञापन में उनलोगों ने राजकुमारी को नयी साड़ी, कपड़े, फल-मूल और डेढ़ हजार रूपये भेंट किए। उसकी आँखें इस ईश्वरीय कृपा से भर आयीं…।

राजकुमारी को प्राप्त हुई भेंट उसे उसके पति और बहू से दुबारा मेल कराने के लिए पर्याप्त थी।

(सिद्धार्थ)

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