कुर्सी में धँसकर गान्धी का कत्ल…

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अभी-अभी इलाहाबाद में एक गान्धी आये थे। …राहुल गान्धी । चर्चा में ‘गान्धी ’ पर बहस हो गयी… राहुल, वरुण, संजय, राजीव, इन्दिरा, फिरोज़, से होते हुए बात ‘असली गान्धी ’ तक पहुँच गयी।

सत्य, अहिंसा, भाईचारा, धार्मिक सहिष्णुता, गरीबी उन्मूलन, दरिद्रनारायण की सेवा, अस्पृश्यता निवारण का ध्येय, गीता के निष्काम-कर्म का प्रेय; यही तो थी गान्धी की राह! …विदेशी दुश्मन के सामने निर्भीक सीना ताने अडिग अपनी टेक पर स्वराज की चाह!

…साम्प्रदायिकता से लड़ाई अकेले लड़ने की धुन …जब पूरा देश स्वतंत्रता का झण्डा फहरा रहा था …तो भी वह संत इन्सानियत के शीतल जल से नोआखाली में हैवानियत की आग बुझा रहा था …

एक वहशी हिन्दू को यह गान्धीगीरी रास न आयी… उसकी गोलियों ने ‘राम-नाम’ के रस में डूबे उस निर्भीक सीने में जगह बनायी…। कानून ने पूरी चुस्ती और फुर्ती से अपना काम दिखाया …उस दरिन्दे को नियमानुसार फाँसी पर लटकाया। देश के नेताओं ने सबको ढाँढस बँधाया… “गान्धी व्यक्ति नहीं विचार है-जो कभी नहीं मरता…” ऐसा समझाया।

लेकिन यह बात समझने में हमारी आत्मा रोज झिझकती है। मन में बारम्बार यह बात खटकती है… गान्धी की तस्वीर को अपने पीछे की दीवार पर टाँगकर, उसके ‘विचारों’ की जघन्य हत्या करने की दुर्घटना रोज ही घटती है…

अखबार पलटता हूँ तो साफ दिखता है, कि आज कश्मीर में, हो रहा है रोज गान्धी का खून सरेआम… इसे अन्जाम देने वाले पहनते हैं गान्धी आश्रम की खादी… काट रहे हैं सत्ता की चाँदी… और उसी की टोपी पहनकर तिरंगे को करते हैं सलाम…

फैलने देते हैं साम्प्रदायिकता का जहर… बैठे हुए सत्ता की मखमली गद्दी में धँसकर… हिंसा को तबतक चलने देते हैं, जबतक न बन न जाये यह आँधी… भले ही कब्र में करवट बदलते-बदलते उकता कर उठ बैठें इनके बापू गान्धी…

अमरनाथ के यात्री भी हो जाते हैं अस्पृश्य, अपने ही देश में नहीं मिलती दो ग़ज जमीन, हो जाती है दुर्लभ, जहाँ बैठकर सुस्ता सकें… बाबा के दर्शन की थकान, घड़ीभर ठहरकर मिटा सकें…

ये संप्रभु राष्ट्र के शासक, जो बन बैठे अपनी कुल मर्यादा के विनाशक…। गान्धी की निर्भीकता और साहस को दफ़न करके डर से सहमते हैं… उन मूर्ख आततायियों से, जो एक ‘तानाशाह’ देश की शह पर, मज़हबी खूँरेज़ी के रास्ते से ‘ख़ुदमुख्तारी’ की बात करते हैं…।

आजादी दिलाने वाली पार्टी का विघटन करना ही उचित, यह मेरा नहीं उसी गान्धी का था विचार… लेकिन कत्ल इसका उसी क्षण हुआ जब बनी पहली भारत सरकार…।

गान्धी के ही नाम पर सत्ता की दुकानदारी चलती रही… देश में मक्कारी, गरीबी, मज़हब की तरफ़दारी, और जात-पात की लड़ाई बदस्तूर पलती रही…

गान्धी के इस देश में, उनके विचारों का यूँ तिल-तिलकर मरना हमें बहुत अँखरता है… हमारे सामने ही गान्धी के इन वंशजों के हाथों, गान्धी जो रोज मरता है…।

indiatimes.com से साभार

सोचिए, और बताइए… कहाँ है वो कानून, कहाँ अटक गया है? …गोडसे को फाँसी देने के बाद किस अन्धेरे गलियारे में भटक गया है?
(सिद्धार्थ)

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पानी में प्यासे बैठे हैं…

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मेरा एक घर जहाँ मेरे दादाजी ने अपना अधिकांश जीवन बिताया था, बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले में नारायणी नदी (बूढ़ी गण्डक) के किनारे है। वहाँ प्रायः प्रत्येक वर्ष घर के आंगन का पवित्रीकरण उफ़नाती नदी के जल से हो ही जाता है। इन दिनों जब बालमन ने समाचारों में बाढ़ की विभीषिका देखी तो उन्हें अपने वो दिन याद आ गये जब वे एक बार हफ़्तों वहाँ पानी से घिरे रहे:

पानी के सैलाबों में से, कुछ जगह दिखाई देती है।
कुछ लोग दिखाई पड़ते है, आवाज सुनाई देती है॥
सब डूब गया, सब नष्ट हुआ,कुछ बचा नहीं खाने को है।
बीवी को बच्चा होना है, और भैंस भी बियाने को है ॥

अम्मा जपती है राम-नाम, दो दिन से भूखी बैठी है।
वो गाँव की बुढिया काकी थी,जो अन्न बिना ही ऐंठी है॥
मोहना की मेहरारु रोती, चिल्लाती है, गुस्से में है।
फूटी किस्मत जो ब्याह हुआ, यह नर्क पड़ा हिस्से में है॥

रघुबर काका बतलाते हैं, अबतक यह बाढ़ नही देखी।
सत्तर वर्षों की उमर गयी, ऐसी मझधार नहीं देखी॥
कल टी.वी. वाले आये थे, सोचा पाएंगे खाने को।
बस पूछ्ताछ कर चले गए,मन तरस गया कुछ पाने को॥

http://www.divyabhaskar.co.in से साभार

पानी में प्यासे बैठे हैं, पर शौच नही करने पाते।
औरत की आफ़त विकट हुई, जो मर्द पेड़ पर निपटाते॥
पानी में बहती लाश यहाँ, चहुँओर दिखाई देती है।
कातर सी देखो गौ-माता, डंकार सुनाई देती है॥

मन में सवाल ये उठता है, काहे को जन्म दिये दाता ?
सच में तू कितना निष्ठुर है, क्यों खेल तुझे ऐसा भाता ?
किस गलती की है मिली सजा,जिसको बेबस होकर काटें।
सब साँस रोककर बैठे हैं, रातों पर दिन – दिन पर रातें॥

हो रहा हवाई सर्वेक्षण, कुछ पैकेट गिरने वाले हैं।
मन्त्री-अफसर ने छोड़ा जो, वो इनके बने निवाले हैं॥
है अंत कहाँ यह पता नहीं, पर यह जिजीविषा कैसी है।
‘कोसी’ उतार देगी गुस्सा, आखिर वो माँ के जैसी है॥

daylife.com से साभार

शब्द-दृश्यांकन: बालमन

कुछ कचोटते प्रश्न…???

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वैसे तो जबसे खबरिया चैनेलों ने समाचार दिखाने के बजाय विज्ञापन बटोरने की होड़ में घटिया तमाशा, भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रह-नक्षत्र, और बेडरूम के झगड़े इत्यादि पर कंसेण्ट्रेट करना शुरू कर दिया है तबसे मैने टी.वी. पर समाचार देखना लगभग बन्द सा कर दिया है, लेकिन शनिवार की शाम को भोजन के समय एक न्यूज चैनेल पर मेरी निगाह अटक ही गयी।

आइटम तो वही ‘स्टिंग ऑपरेशन’ वाला ही था; लेकिन यहाँ इस औंजार का शिकार किसी राजनेता, अभिनेता अथवा किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी को नहीं बनाया गया था। बल्कि इसके केन्द्र में एक आठ-नौ महीने की बच्ची की देखभाल कर रही नौकरानी थी। इस ऑपरेशन को अन्जाम देने वालों में भी कोई मीडिया वाला नहीं था। बल्कि, उस बच्ची की अपनी माँ थी, जो नौकरीशुदा होने के कारण अपनी दूधमुँही बच्ची को घर पर उस नौकरानी के भरोसे छोड़ कर जाती थीं। पतिदेव भी कहीं बड़े नौकर थे।

उस वयस्क उम्र की नौकरानी को दिखाया गया कि वह सारी ममता और दया को शर्मसार करती हुई किस प्रकार उस मासूम को चुप कराने के लिए थप्पड़ पर थप्पड़ रसीद करती जाती है, बिलख कर रोती हुई बच्ची की आवाज बन्द करने के लिए उसके मुँह में रबर की निप्पल जबरिया घुसेड़ देती है, और उसको एक मोटी सी चादर से पूरी तरह ढंक देती है। रोती हुई बच्ची उफ़नाकर चादर हटाती है तो फिर मार पड़ती है। प्रतिकार में वह अपने दम भर रोती है लेकिन अन्ततः थक कर सो जाती है। वह क्रूर औरत बच्ची को चुप कराने के बजाय मोबाइल पर बात करने को ज्यादा तरज़ीह देती है…। उस बच्ची की माँ का ये भी कहना था कि इस नौकरानी को घरेलू शिष्टाचार का अच्छा ज्ञान था। वह सबके सामने इसका प्रदर्शन करके विश्वासपात्र भी बन गयी थी। लेकिन माँ तो बस “माँ” होती है। उन्हें जाने कैसे शक हुआ और उन्होने यह हृदय विदारक ऑपरेशन कर डाला। अब उनके पास अफ़सोस है, और आँसू हैं…

यह सब देख-सुनकर मेरी पत्नी तो जैसे थर-थर काँपने लगीं। मेरी आठ वर्षीया बेटी भी उद्विग्न हो उठी। डेढ़ साल का बेटा तो मस्ती से सो रहा था, लेकिन उसकी माँ और दीदी के मन में उसके लिए जो एक डर बैठ गया उसे दूर करने के लिए मुझे काफ़ी परिचर्चा करनी पड़ी। याद दिलाना पड़ा कि मेरे बच्चे इस मामले में सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें माँ-बाप, भाई-बहन, दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मामा-मौसी आदि से युक्त संयुक्त परिवार का अपार स्नेह मिलता रहा है। घर छोड़कर नौकरी करने से थोड़ी अड़चन जरूर है। लेकिन वेतनभोगी नौकर के हाथ में उन्हे सौंपने की जरूरत नहीं आने वाली है। खैर…

अब, जब वे तीनों सो चुके हैं तो मेरे मन में कुछ सवाल उठ खड़े हुए हैं जिनका जवाब सीधा नहीं आ रहा है। एक सवाल मेरी पत्नी ने भी उठा दिया इसलिए शुरुआत उसी से करता हूँ।

उनका सवाल था कि उस महिला के स्थान पर यदि कोई पुरुष होता तो क्या वह भी उस अबोध के साथ ऐसा ही दुर्व्यवहार करता? मेरा जवाब था ‘पता नहीं’ लेकिन उनका मानना था कि कोई पुरुष शायद उस बच्ची को भले ही चुप नहीं करा पाता लेकिन वह ऐसा भी नहीं करता जैसा उस दुष्ट महिला ने किया।

यह विचार थोड़ा सब्जेक्टिव टाइप का है, इसलिए छोड़ते हैं। आप अपना विचार इसपर भी दे सकते हैं। लेकिन जो सवाल मुझे कचोट रहे हैं उनका यहाँ केवल जिक्र कर रहा हूँ। इनका जवाब हम मिलकर ढूँढेंगे:-

१.क्या एक सभ्य समाज के नाते हमें ऐसी व्यवस्था नहीं बनानी चाहिए कि एक मासूम को उसकी जीती-जागती माँ का वात्सल्य भरपूर मात्रा में मिल सके?

२.क्या पति-पत्नी दोनो का नौकरी करना इतना आवश्यक और अपरिहार्य हो गया है कि उसकी कीमत एक बच्चे को माँ की ममता से हाथ धोकर चुकानी पड़े?

३.जिस औरत को ममतामयी और दयालु कहकर महिमा-मण्डित किया जाता है क्या वह प्यार और ममत्व की सेवा (नौकरी) के बदले मजदूरी (वेतन) लेकर भी अपनी ड्यूटी न निभाते हुए इतनी क्रूर हो सकती है?

४.क्या वह पारम्परिक व्यवस्था जिसमें पति-पत्नी परिवार की गाड़ी के दो पहिए होते थे, जहाँ घर का पुरुष जीविका कमाकर बाहर से लाता था, और पत्नी घर के भीतर का प्रबन्ध संभालती थी; इतनी अनुपयुक्त और अधोगामी हो गयी है कि उसे पूरी तरह से त्याग कर काम के बंटवारे के बजाय काम में प्रतिस्पर्धा का वरण किया जाना अपरिहार्य हो गया है?

५.आज के उपभोक्तावादी समाज में कहा जाता है कि धनोपार्जन से ही सुख के साधन जुटाये जा सकते हैं। लेकिन क्या इस धन को ही सुख का एकमात्र साधन मान लेना हमें हमारे ‘साध्य’ से भटका तो नहीं रहा है? क्या इस आपा-धापी में धन ही हमारा साध्य नहीं होता जा रहा है?

६.नारी स्वतंत्रता और सशक्तिकरण के लिए उसका धनोपार्जन करना कितना जरूरी है? नारी की बौद्धिक जागृति के लिए नैतिक और मूल्यपरक शिक्षा अधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक है कि उसकी आर्थिक सम्पन्नता के लिए तकनीकी शिक्षा?

७.स्त्री और पुरुष के बीच अन्योन्याश्रित सम्बन्ध ठीक हैं कि उनके बीच हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा होना ठीक है। क्या स्त्री और पुरुष का आपस में प्रतिस्पर्धा करना प्रकृति-सम्मत भी है? ताजे ओलम्पिक खेलों में कुछ संकेत खोजे जा सकते हैं क्या?

८.परिवार का गठन कैसे हो? या, यही कि पारिवारिक जीवन कितना जरूरी है?

प्रश्न तो बहुत से बेतरतीब उमड़-घुमड़ रहे हैं, लेकिन अभी बस इतना ही। मैं इनपर आपके जवाब और टिप्पणियों की प्रतीक्षा करूंगा। इस संबंध में अपने मन की धारणाओं से भी आपको जरूर अवगत कराउंगा, अपनी अगली पोस्ट में।
(सिद्धार्थ)

कैसे-कैसे नर्क…? …पुराण चर्चा

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भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विकास में पुराणों का बहुत गहरा प्रभाव रहा है। कहते हैं कि पुराणों की रचना स्वयं ब्रह्मा जी ने सृष्टि के प्रथम और प्राचीनतम ग्रन्थ के रूप में की थी। ऐसी मान्यता है कि पुराण उचित और अनुचित का ज्ञान करवाकर मनुष्य को धर्म और नीति के अनुसार जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देते हैं। ये मनुष्य के शुभ-अशुभ कर्मों का विश्लेषण कर उन्हें सत्कर्म करने को प्रेरित करते हैं और दुष्कर्म करने से रोकते हैं।

यद्यपि पुराणों की विषय-वस्तु में समय-समय पर कतिपय स्वार्थी व लालची व्यक्तियों (पुरोहितों) द्वारा कर्मकाण्डों व रूढ़ियों की मिलावट भी की गयी है, फिर भी इनमें लिखित अनेक प्रकरण वस्तुतः उच्च मानवीय मूल्यों के पोषक व नैतिक जीवन के लिए पथ-प्रदर्शन का कार्य करने वाले हैं। कुछ अंश तो इतने अद्भुत, रोचक व भावपूर्ण हैं कि इनको पढ़ने से मन में अपने आस-पास के मानव समाज का चित्र सहज ही खिंचता चला जाता है।

मैं यहाँ ऐसा ही एक रोचक विवरण ‘गरुड़ पुराण’ से प्रस्तुत कर रहा हूँ। गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु द्वारा अपने वाहन गरुड़ की जिज्ञासा को शान्त करने के लिए दिए गये उपदेशों का उल्लेख किया गया है। महर्षि कश्यप के पुत्र पक्षीराज गरुड़ ने भगवान विष्णु से प्राणियों की मृत्यु के बाद की स्थिति, जीव की यमलोक यात्रा, विभिन्न कर्मों से प्राप्त होने वाले नरकों, योनियों तथा पापियों की दुर्गति से सम्बन्धित अनेक गूढ़ प्रश्न पूछे थे। इन्ही रहस्यों से संबन्धित प्रश्नों का समाधान करते हुए इस पुराण में एक जगह बताया गया है कि यमलोक में ‘चौरासी लाख’ नरक होते हैं। मृत्यु लोक में मनुष्य द्वारा जिस-जिस प्रकार के “पापकर्म” किये गये होते हैं, उसी के अनुसार अलग-अलग प्रकार के नरकों का निर्धारण/आबन्टन यमपुरी के अधिकारी (धर्मध्वज, चित्रगुप्त और धर्मराज) उसकी मृत्यु के बाद करते हैं। यहाँ कुछ चुने हुए विशेष प्रकार के “नरकों” और जिन कर्मों के फलस्वरूप ये भोगे जाते हैं उन विशिष्ट प्रकार के “पापकर्मों” का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है:-

तामिस्र: जो व्यक्ति दूसरों के धन ,स्त्री और पुत्र का अपहरण करता है, उस दुरात्मा को तामिस्र नामक नरक में यातना भोगनी पड़ती है। इसमें यमदूत उसे अनेक प्रकार का दण्ड देते हैं ।

अंधतामिस्र: जो पुरूष किसी के साथ विश्वासघात कर उसकी स्त्री से समागम करता है, उसे अंधतामिस्र नरक में घोर यातना भोगनी पड़ती है।इस नरक में वह नेत्रहीन हो जाता है।

महारौरव: इस नरक में माँस खाने वाले रूरू जीव दूसरे जीवों के प्रति हिंसा करने वाले प्राणियों को पीड़ा देते हैं ।

कुम्भीपाक: पशु-पक्षी आदि जीवों को मार कर पकाने वाला मनुष्य कुम्भीपाक नरक में गिरता है। यहाँ यमदूत उसे गरम तेल में उबालते हैं।

असिपत्र: वेदों के बताए मार्ग से हट कर पाखण्ड का आश्रय लेने वाले मनुष्य को असिपत्र नामक नरक में कोड़ों से मारकर दुधारी तलवार से उसके शरीर को छेदा जाता है।

शूकरमुख: अधर्मपूर्ण जीवनयापन करने वाले या किसी को शारीरिक कष्ट देने वाले मनुष्य को शूकरमुख नरक मे गिराकर ईख के समान कोल्हू में पीसा जाता है।

अंधकूप: दूसरे के दुःख को जानते हुए भी कष्ट पहुचाने वाले व्यक्ति को अंधकूप नरक में गिरना पड़ता है। यहाँ सर्प आदि विषैले और भयंकर जीव उसका खून पीते हैं।

संदंश: धन चुराने या जबरदस्ती छीनने वाले प्राणी को संदंश नामक नरक में गिरना पड़ता है। जहाँ उसे अग्नि के समान संतप्त लोहे के पिण्डों से दागा जाता है।

तप्तसूर्मि: जो व्यक्ति जबरन किसी स्त्री से समागम करता है, उसे तप्तसूर्मि नामक नरक में कोड़े से पीटकर लोहे की तप्त खंभों से आलिंगन करवाया जाता है।

शाल्मली: जो पापी व्यक्ति पशु आदि प्राणियों से व्यभिचार करता है, उसे शाल्मली नामक नरक में गिरकर लोहे के काँटों के बीच पिसकर अपने कर्मों का फ़ल भोगना पड़ता है।

वैतरणी: धर्म का पालन न करने वाले प्राणी को वैतरणी नामक नरक में रक्त, हड्डी, नख, चर्बी, माँस आदि अपवित्र वस्तुओं से भरी नदी में फेंक दिया जाता है।

प्राणरोध: मूक प्राणियों का शिकार करने वाले लोगों को प्राणरोध नामक नरक में तीखे बाणों से छेदा जाता है।

विशसन: जो मनुष्य यज्ञ में पशु की बलि देतें हैं, उन्हें विशसन नामक नरक में कोड़ों से पीटा जाता है।

लालाभक्ष: कामावेग के वशीभूत होकर सगोत्र स्त्री के साथ समागम करने वाले पापी व्यक्ति को लालाभक्ष नरक में रहकर वीर्यपान करना पड़ता है।

सारमेयादन: धन लूटने वाले अथवा दूसरे की सम्पत्ति को नष्ट करने वाले को व्यक्ति को सारमेयादन नरक में गिरना पड़ता है। जहाँ सारमेय नामक विचित्र प्राणी उसे काट-काट कर खाते हैं।

अवीचि: दान एवं धन के लेन-देन में साक्षी बनकर झूठी गवाही देने वाले व्यक्ति को अवीचि नरक में, पर्वत से पथरीली भूमि पर गिराया जाता है; और पत्थरों से छेदा जाता है।

अयःपान: मदिरापान करने वाले मनुष्य को अयःपान नामक नरक में गिराकर गर्म लोहे की सलाखों से उसके मुँह को छेदा जाता है।

क्षारकर्दम: अपने से श्रेष्ठ पुरूषों का सम्मान न करने वाला व्यक्ति क्षारकर्दम नामक नरक में असंख्य पीड़ाएँ भोगता है।

शूलप्रोत: पशु-पक्षियों को मारकर अथवा शूल चुभोकर मनोरंजन करने वाले मनुष्य को शूलप्रोत नामक नरक में शूल चुभाए जाते हैं। कौए और बटेर उसके शरीर को अपनें चोंचों से छेदते हैं।

अवटनिरोधन: किसी को बंदी बनाकर, उसे अंधेरे स्थान पर रखने वाले व्यक्ति को अवटनिरोधन नामक नरक में रखकर विषैली अग्नि के धुएँ से कष्ट पहुँचाया जाता है।

पर्यावर्तन: घर आए अतिथियों को पापी दृष्टि से देखने वाले व्यक्ति को पर्यावर्तन नामक नरक में रखा जाता है।जहाँ कौए, गिद्ध, चील, आदि क्रूर पक्षी अपनी तीखी चोंचों से उसके नेत्र निकाल लेते हैं।

सूचीमुख: सदा धन संग्रह में लगे रहने वाले और दूसरों की उन्नति देखकर ईर्ष्या करने वाले मनुष्य को सूचीमुख नरक में यमदूत सूई से वस्त्र की भाँति सिल देते हैं।

कालसूत्र: पिता और ब्राह्मण से वैर करने वाले मनुष्य को इस नरक में कोड़ों से मारा जाता है; और दुधारी तलवार से छेदा जाता है।

चित्रकृति elfwood.com से साभार

(जाहिर है कि पूर्ण सूची देना इस ब्लागर और इस पोस्ट की सीमा से परे है क्यों कि इनकी कुल संख्या ८४ लाख बतायी जाती है। लेकिन इतने से ही यह तो स्पष्ट होता ही है कि इस संसार में मनुष्य योनि में पैदा होने वाले जीवों के भीतर जो पापकर्म दिखायी देते हैं उनकी पहचान भारतीय सभ्यता के आदिकाल में ही बहुत सूक्ष्मता से कर ली गयी थी।)
(सिद्धार्थ)

सब ढंक गया.!..

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यमुना नदी का सरस्वती घाट,
जिसके हो चले हैं
अब अच्छे ठाट ।
वहाँ पक्की, मजबूत सीढ़ियाँ देखकर
सहसा ठिठक गया ।
नदी किनारे की वो बालू की जमीन,
उस जमीन पर बना
वह दो जोड़ी पैरों का निशान,
सब ढक गया?

वहाँ कभी थी गीली-दलदली जमीन,
जिसके पास ही उसने
सूखी और साफ जगह दिखायी थी।
थोड़ी देर शान्त और एकान्त बैठकर,
अपनी बात सुनाने को,
उसने अपने दुपट्टे की चादर बिछायी थी।

था एक कठिन दौर,
जब वह अपनी कमजोरी
या कहें, कायरता
मिटा न सका था।
घर–परिवार के सपने तोड़कर,
अपने मदमस्त सपने
सच साबित करने का हौसला
जुटा न सका था।

उनके बीच की डोर
तनती जा रही थी।
प्यार के सपनों की राह पर
दुनियादारी की दीवार
बनती जा रही थी।

दुनिया से हारकर दोनो नें
अपनी उस दुनिया को
समेट लिया था।
दूर हो जाएंगे, यह जानकर
एक दूसरे को मन ही मन
भेंट लिया था।

फिर भी
बैठे रहते थे,
ठहरी हुई सी यमुना के किनारे,
उस मुट्ठी भर समय को पकड़कर।
जैसे रोक ले कोई,
पानी से भींगी रेत को
मुट्ठी में जकड़कर।

इस आस में,
कि जब तक पानी है,
यह रेत मुट्ठी से नहीं निकलेगी।
मानो यहाँ की गहरी यमुना
चन्द कदम चलकर,
वेगवती गंगा में नहीं मिलेगी।

बुझती आस को
जिन्दा करने की उम्मीद में,
उन्होंने समय की उस रेत में
आँखों का पानी भी मिलाया था।
लेकिन होनी तो होनी ही थी,
अँधेरा घना हुआ, वे लौट गये,
यमुना का पानी गंगा में जा समाया था ।
(सिद्धार्थ)

पन्द्रह अगस्त पर शुभ कामनाएं…

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(१)
देखो भाई आ गया, फिर पन्दरह अगस्त।
आग लगी है देश में, नेता फिर भी मस्त।

नेता फिर भी मस्त, खूब झण्डा फहराया।
जम्मू कर्फ्यूग्रस्त, बड़ा संकट गहराया॥

सुन सत्यार्थमित्र बैरी को बाहर फेंको।
सर्प चढ़ा जो मुकुट, दंश देता है देखो॥

(२)
आज़ादी की बात पर होता नहीं गुमान।
बहुत गुलामी देश में पसरी है श्रीमान्॥

पसरी है श्रीमान् यहाँ बदहाल गरीबी।
जाति-धर्म के भेद और आतंक करीबी॥

घोर अशिक्षा, पिछड़ापन, बढ़ती आबादी।
भ्रष्टतंत्र की भेंट चढ़ी अपनी आज़ादी॥

s3.amazonaws.com से साभार

कश्मीर को संभालो…

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sachiniti.wordpress.com

हे अमरनाथ के बाबा!
तू क्यों बर्फ़ की तरह जम गया है?
तेरे सामने, देखते ही देखते,
धर्म के नाम पर,
मानवता का रास्ता थम गया है।

तुम्ही ब्रह्मा, तुम्ही विष्णु
तुम्ही हो अल्लाह भी;
और तेरी ही है मसीहाई,
तुम्हारी इस बात पर
सबको है भरोसा,
कि यह धरती तुमने ही बनायी।

जंगल, जानवर और वहाँ का कानून
सब तुम्हारी ही करनी है।
तो क्या इस ख़ौफनाक ख़ता की सजा,
हम इन्सानों को भरनी है?

तुमने तो,
इन्सान के भीतर अपना अंश
डाला था!
तेरी किताबें कहती हैं,
इन्सान को
तूने बनाके अपना वंश
पाला था!

हे परम पिता परमेश्वर, तारणहार,
ऐ रसूल अल्लाह, परवरदिग़ार!
तेरी फितरत हम समझ क्यों नहीं पाते?
क्या है तेरा दीन-धरम,
खुलकर क्यों नहीं बताते?

graphics8.nytimes.com

ये तसद्दुद, ये खूँरेज़ी,
ये रंज़ो-ग़म।
ये ज़मीन की लड़ाई, ये बलवा
क्या यही है धरम?

रोक ले इसे,
सम्हाल ले, अभी-इसी वक्त!
नहीं तो देख ले समय,
निकला जा रहा है कमबख़्त।

डरता हूँ,
कहीँ तेरा दामन,
उसकी पाक़ीज़गी
दागदार न हो जाये।
करने को तुझे सज़दा,
तेरी पूजा, तेरी अर्चना,
कोई
तमीज़दार न रह जाये।
(सिद्धार्थ)

ये तस्वीरें इण्टरनेट से खोजकर उतारी गयी हैं। यदि इसमें किसी कॉपीराइट का उल्लंघन निहित है तो कृपया सूचित करें, (साभार)

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