iindin woman

यह बात तो मुझे भी खटकती रही है। जब भी मैने किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि को गुलदस्ता भेंट करने के लिए किसी स्त्री-पात्र की ‘खोज’ करते आयोजकों को देखा तो मन खिन्न हो गया। क्या गुलदस्ता पेश करने का आइटम इतना जरूरी है कि मुख्य कार्यक्रम का समय काटकर भी बड़े जतन से इसे अन्जाम देने की व्यवस्था की जाती है। कभी कभी तो बाहरी कलाकारों की ‘आउटसोर्सिंग’ तक की जाती है। यद्यपि माननीय मन्त्री जी या कोई वी.आई.पी. शायद ही गुलदस्ता देने वाले अपरिचित चेहरे पर ध्यान देने की फुरसत में होते होंगे। गुलदस्ता भी क्षणभर में उनके पी.ए. के हाथों से होता हुआ अर्दली और फिर ड्राइवर के पास विराम पाता है। लेकिन इस चारण प्रथा के क्या कहने?

इस निहायत गैर जरूरी प्रथा को अस्वीकार्य बताते हुए सुजाता जी ने चोखेर बाली पर एक पोस्ट लिखी है। शुरुआती बात एकदम दुरुस्त है लेकिन इस एक बात के अलावा जो दूसरी बातें लिखीं गयी हैं, और उनपर जो प्रतिक्रियाएं आयी हैं, उन्हें पढ़ने के बाद मन में कुछ खटास आ गयी है। मेरा मन कुछ और सोच रहा है…।

मैंने पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक छोटे से कस्बे के एक सरस्वती शिशु मन्दिर से प्रारम्भिक शिक्षा पायी है। भारतीय संस्कृति और संस्कारों पर आधारित शिक्षा देने का छोटा सा प्रयास वहाँ होता था। विद्यालय के आचार्य (पुरुष और महिला ) हमें राष्ट्रीय पर्वों पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी कराते थे। इसके अतिरिक्त वसन्त पंचमी पर हम वार्षिक शिविर में तीन दिन और दो रातें विद्यालय प्रांगण में ही सामूहिक निवास करते हुए विविध पाठ्येतर क्रियाकलापों में सहभागी होते थे। वहाँ हम एक दूसरे को भैया-बहन सम्बोधित करते थे। हमने वहाँ गुलदस्ता भेंट कार्यक्रम नहीं देखा। मुख्य अतिथि के आने पर लड़कियों द्वारा सरस्वती वन्दना व स्वागत गीत, लड़कों द्वारा सलामी और स्वागत गान, लड़के-लड़कियों द्वारा सामूहिक गायन व नृत्य, नाटक, एकांकी, देशगान। मुख्य अतिथि का शिक्षकों द्वारा माल्यार्पण। इस सबके बीच ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी लड़की या शिक्षिका को उसकी गरिमा को ठेस लगाने वाला कोई कार्य सौंपा गया हो।

02-Air Hostessमेरा मानना है कि भारतीय परम्परा और संस्कृति के बारे में जानना हो तो महानगरों की लकदक दुनिया से निकल कर छोटे कस्बों और गाँवों की ओर जाना चाहिए। जहाँ पाश्चात्य शैली की भौतिकवादी हवा अभी नहीं पहुँच सकी है। वहाँ की औरतें भी अतिथि सत्कार करती हैं लेकिन गुलदस्ता थमाकर नहीं। अतिथि से पर्दा रखकर वे उसके खाने-पीने के लिए अच्छे पकवान बनाती हैं, खिलाते समय एक ओट लेकर पारम्परिक व विनोदपूर्ण गीत (गारी) भी गाती हैं। बच्चों के माध्यम से बात-चीत भी कर लेती हैं। घर परिवार में स्त्री-पुरुष के बीच का सम्बन्ध केवल पति-पत्नी का नहीं होता। भाई-बहन, बुआ-भतीजा, चाचा-भतीजी, बाप-बेटी, ससुर-बहू, जेठ-अनुजवधू, देवर-भाभी, जीजा-साली, सलहज-ननदोई, आदि अनेक रिश्तो का निर्वाह उनकी विशिष्टताओं के साथ पूरी गरिमा और बड़प्पन से होता है। मालिक-नौकरानी, या मालकिन-नौकर का सम्बन्ध भी एक मर्यादा में परिभाषित होता है।

आजकल भी जहाँ थोड़े सभ्य और समझदार लोग होते हैं वहाँ स्वागत कार्यक्रम में अतिथि का माल्यार्पण जरूर किया जाता है। लेकिन माला पहनाने का कार्य कभी भी विपरीत लिंग के व्यक्ति द्वारा नहीं किया जाता है। किसी पुरुष को महिला द्वारा या किसी महिला को पुरुष द्वारा माला पहनाने का सिर्फ़ एक ही स्थापित सन्दर्भ और प्रसंग भारतवर्ष में मान्यता प्राप्त है। वह है वैवाहिक अवसर जहाँ स्त्री-पुरुष एक दूसरे का वरण कर रहे होते हैं। इसके अतिरिक्त किसी परपुरुष या परस्त्री को फूलों की भेंट देना हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। प्रेमी जोड़े भी आपस में इसका आदान-प्रदान एक हद तक सामाजिक स्वीकृति के बाद करने लगे हैं।

तो फिर किसी अतिथि पुरुष के लिए नारी पात्र के हाथ में यह गुलदस्ता कहाँ से आया। मेरा मानना है कि यह फैशन उसी पश्चिमी सभ्यता से आयातित है जो कथित रूप से मनुष्य की स्वतन्त्रता, समानता और न्याय का स्वयंभू अलम्बरदार है। जहाँ पिता-पु्त्री, माँ-बेटा और भाई-बहन के अतिरिक्त स्त्री-पुरुष के बीच सभी रिश्ते लैंगिक सन्दर्भ में समान रूप से देखे जाते हैं। दो विपरीत लिंग के व्यक्तियों के बीच होने वाला स्वाभाविक आकर्षण वहाँ की व्यवहार संहिता (etiquettes) को निरूपित करता है। शायद वहाँ इसको बहुत बुरा नहीं माना जाता है। नारी देह के आकर्षण को भुनाने की रीति वहाँ स्थापित और जगविदित है। यदि प्रस्तोता उसमें सहज है तो उसके स्निग्ध स्पर्श और कोमल वाणी से किसे आपत्ति हो सकती है। आप यह तो मानेंगे ही कि सहजता कभी आरोपित नहीं की जा सकती।

बड़े-बड़े जलसों में स्वागत-सत्कार, मेहमानों  की सेवा, पुरस्कार का थाल सजाकर लाने-लेजाने और बिना बात मुस्कराने के लिए भाड़े पर कमनीय काया की धनी नवयौवनाओं की भर्ती जलसा-प्रबन्धकों  (event managers) द्वारा की जाती है। यह सब पश्चिम से ही इधर आया है। गुलदस्ता थमाने कि नौटंकी वहीं से आयातित है। लेकिन वहाँ इस विमर्श पर कान देने वाला कोई नहीं है।

विमान परिचारिका, फैशन व विज्ञापन मॉडेल्स, फिल्मी कलाकार, सौन्दर्य प्रतियोगिताएं, टीवी और इंटरनेट चैनेल्स तथा चमकीली रंगीन पत्र-पत्रिकाओं में अपना कैरियर तलाश करती लड़कियों का यू.एस.पी. क्या है? …एक पेश करने लायक व्यक्तित्व ( a presentable personality) या कुछ और? [कुछ लोग इसे ‘दिखाने लायक शरीर’ पढ़ और समझ लें तो मुझे उनकी सोच पर दया ही आएगी।] इन क्षेत्रों में लड़कों के साथ लड़कियों की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं होती। जबकि ये सारे कार्य लड़के भी कर सकते हैं। कहीं कहीं तो अघोषित रूप से शत-प्रतिशत आरक्षण लड़कियों के लिए ही है। जहाँ प्रतिस्पर्धा ही नहीं होती। लेकिन मैने इसे लेकर कहीं असन्तोष का स्वर नहीं सुना।

तो क्या अब स्त्री-विमर्श की नयी विचारभूमि इन सौन्दर्य और आकर्षक व्यक्तित्व पर आधारित व्यवसायों पर ताला लगवाने के उपाय ढूँढेगी? क्या यह मान लिया जाय कि यह सब स्त्री की गरिमा के विरुद्ध है क्योंकि इससे पुरुष आनन्द और सुख प्राप्त करते हैं। क्या यह निष्कर्ष भी निकाला जाय कि ऐसी लड़कियों को देखने वाला पुरुष उसे पत्नी या माशूका के रूप में कल्पित करता है? छिः…। कम से कम मैं ऐसा मानने को तैयार नहीं हूँ।

मुझे हैरानी है कि लेखनी की स्वतन्त्रता का ऐसा दुरुपयोग इस ब्लॉगजगत में हो रहा है। हम किस दिशा में जा रहे हैं?

और अन्त में…

मेरी पिछली पोस्ट में प्रकाशित कहानी की लेखिका श्रीमती रागिनी शुक्ला ने अपनी प्रतिक्रिया चिठ्ठी लिखकर भेंजी है। उन्हें हार्दिक धन्यवाद देते हुए पत्र यहाँ आपके लिए प्रस्तुत है:

LETTER BHABHI JI सिद्धार्थ जी, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने अपने ब्लॉग के माध्यम से पाठकों से मेरा परिचय करवाया। और आज ‘दुलारी’ की कहानी आपके ही द्वारा सभी तक पहुँची। सही मायने में दुलारी की डोली को आपने ही सजाया है। दुलारी की कहानी पिछले आठ सालों से घर के कोने में पड़ी धूल फाँक रही थी। यह कहानी पहले भी कई पत्रिकाओं में मैंने भेजी थी और सभी ने इसे कूड़ेदान में ही स्थान दिया। लेकिन आपने अपने ब्लॉग के माध्यम से इसे सम्मान दिया। आज दुलारी हमारे बीच नहीं है, लेकिन आपके माध्यम से वह फिर जीवित हो गयी है।

हमारे जैसे बहुत से लोग होंगे जो दुलारी जैसी न जाने कितनी कहानियाँ लिख कर अपने मन के भावों को शब्दों में पिरोए होंगे लेकिन सही माध्यम न मिलने के कारण वह पाठकों तक नहीं पहुँच पाती, और अपने मन की भावनाओं को कागज में लिखकर किसी कोने में डाल देते हैं। इसलिए मेरी भगवान से प्रार्थना है कि जो लोग किसी की पीड़ा को जानते हों और उसे लिखते हों तो उन्हें भी आपके जैसा माध्यम मिले जिससे उन्हें और लिखने की प्रेरणा मिल सके। और जैसे मेरी दुलारी की, उसी तरह सभी की भावनाओं की डोली सजे।

                        -रागिनी शुक्ला

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